|
لــك
الخيــر
حـدثني
بطبيـة
عـامر
|
ومـا
حالهـا
مـن
بعـدنا
يا
مسامري
|
|
وروح
فــؤادا
ذاب
مــن
حـر
بعـدها
|
بتــذكاره
إن
كنــت
يومـاً
مـذاكري
|
|
فـــإن
أحـــاديث
الأحبـــة
مرهــم
|
لقلـبي
مـن
الـداء
العضال
المخامر
|
|
هـوى
حـل
فـي
قلـبي
وواطـن
مهجـتي
|
وخــالط
أجــزائي
وســار
بســائري
|
|
إذا
فــاتني
قــرب
الأحبـة
واللقـا
|
ففــي
ذكرهــم
أنـس
لوحشـة
خـاطري
|
|
فـإن
لـم
يصـبها
وابـل
صـيب
الندى
|
فطــل
بــه
يحيــى
مــوات
سـرائري
|
|
فشـــنف
بتــذكار
الأحبــة
مســمعي
|
وأخلصــه
عــن
أغيـار
غيـر
مغـاير
|
|
فتــذكارهم
راحــي
وروحـي
وراحـتي
|
يطيــب
بــه
قلـبي
وتصـفو
ضـمائري
|
|
أنـا
الهـاتم
المفتـون
في
حب
سادة
|
تهتكــت
فيهــم
بيــن
بـاد
وحاضـر
|
|
وخيــرت
فــاخترت
الغــرام
طريقـة
|
أمــوت
وأحيــا
هكـذا
يـا
معاشـري
|
|
وإن
التفـــاني
والتمـــزق
فيهــم
|
لمـن
أربـى
الأقصـى
وأسـنى
ذخـائري
|
|
يـرق
لـي
الأحبـاب
إذا
مسـني
الضنى
|
وتشـمت
بـي
الحسـاد
بيـن
العشـائر
|
|
وإن
لمشــغول
عــن
النــاس
بالـذي
|
أقاســي
بمحبـوبي
سـويجي
النـواظر
|
|
وأعــذر
عــذالي
ومــن
لامنـي
علـى
|
هـوى
ام
عمـر
ونـور
قلـبي
ونـاظري
|
|
لحرمــانهم
عــن
حبهــا
وشــهودها
|
وعـن
علـم
مـا
تحت
النقاب
السوائر
|
|
رعـى
اللَـه
مـن
هـام
الفؤاد
بحبها
|
بديعـــة
حســـن
مخبــل
للزواهــر
|
|
عزيـزة
وصـف
حـار
فيـه
أولو
النهى
|
مـن
العـارفين
أهل
الهدى
والبصائر
|
|
بـه
هـامت
الأرواح
فـي
حـال
كونهـا
|
مجـــردة
عــن
كــل
جســم
وخــاطر
|
|
ومــن
بعــده
لمـا
حـدتها
بـذكرها
|
حــداه
المطايـا
للربـوع
العـوامر
|
|
ومهمــا
ســرت
مــن
حيهــا
سـحرية
|
مــن
النســمات
الطيبـات
العـواطر
|
|
ومهمـا
سـرى
بـرق
الحمـى
فـي
دجنة
|
وغنــت
علـى
الأغصـان
ورق
الطـوائر
|
|
شــهدت
معــاني
حســنها
وجمالهــا
|
بروحـي
وقلـبي
تحـت
جنـح
الـدياجر
|
|
وســـامرتها
فـــي
خلــوة
أنســية
|
بـــألطف
أســـمار
وخيــر
مســامر
|
|
ولــذلي
التقــؤريب
منهـا
وأشـرقت
|
علــى
بــاطني
أنوارهـا
وظـواهرري
|
|
ويــا
طالمــا
قبلتهـا
والتزمتهـا
|
وقـد
هجعـت
عيـن
الرقيـب
المـدابر
|
|
كـــأن
أويقــات
النــزول
بحيهــا
|
معجلــة
مــن
جنــة
فــي
المصـائر
|
|
وللَــه
مـا
أحلـى
الوقـوف
بسـوحها
|
وأطيبــه
مــا
بيـن
تلـك
المشـاعر
|
|
بـوادي
خليل
اللَه
ذي
الخير
والوفا
|
أبـي
الرسـل
إبراهيـم
تـاج
الأكابر
|
|
وقبلـة
أهـل
الـدين
مـن
كـل
شاسـع
|
ودان
إليهـــا
فهــي
أم
الحضــائر
|
|
وطلسـم
سـر
الـذات
رمـز
بـه
اهتدى
|
إليهـا
رجـال
الحـق
مـن
كـل
نـاظر
|
|
ومـن
هـا
هنـا
جـذب
القلوب
وميلها
|
ومنــه
مطـر
الـروح
مـن
كـل
طـائر
|
|
ومهبـــط
إمـــدادات
كــل
رقيقــة
|
بأسـرار
علـم
الـذات
لأهـل
السرائر
|
|
إلــى
الحجـر
الميمـون
زاد
تشـوقي
|
وكــان
بـه
أنـس
الفـؤاد
المجـاور
|
|
بـه
المعهـد
والميثاق
يشهد
بالوفى
|
لكــل
وفــىً
مخلــص
القلــب
طـاهر
|
|
وملـــتزم
نجــح
المطــالب
عنــده
|
وحجـر
البعـدى
منـه
فاضـت
محـاجري
|
|
وزمزمهــا
راح
الكـرم
ومرهـم
الـس
|
قــام
بــه
تــبري
كلـوم
الضـمائر
|
|
وإن
مقامــاً
بالمقــام
ألــذ
فــي
|
فــؤادي
وأحلـى
مـن
ورود
البشـائر
|
|
صـفا
بصـفاها
العيـش
مـن
كـل
شائب
|
وراق
بفيــض
الــواردات
الغــوامر
|
|
بمروتهـــا
تمريـــن
كــل
حقيقــة
|
بمشـــهد
حـــق
لا
يـــرام
بقاصــر
|
|
بأجيادهــا
جــادت
ســحائب
رحمــة
|
علــى
كــل
ذي
قلــبٍ
منيـبٍ
وحاضـر
|
|
وتقتبــس
الأنـوار
مـن
بـي
قبيسـها
|
فهـــو
يراعيهـــا
بقلــبٍ
ونــاظر
|
|
بعــامر
شـعب
الصـادقين
عمـارة
ال
|
قلــوب
بغيــاضٍ
مــن
الفَضـل
غـامر
|
|
وفـــي
عرفــات
كــل
ذنــبٍ
مكفَّــرٍ
|
ومغتفـــرٍ
منـــا
برحمـــة
غــافر
|
|
وقفنــا
بهــا
والحمـد
للَـه
ربنـا
|
وشــكراً
لــه
إن
المزيــد
لشــاكر
|
|
عشـية
وافـى
الوفـد
مـن
كـل
وجهـة
|
وفــج
وهــم
مــا
بيـن
داع
وذاكـر
|
|
وراجٍ
وبـــاك
مـــن
مخافــة
ربــه
|
بفــائض
دمــعٍ
كالســحاب
المـواطر
|
|
وفـي
الوفـد
كـم
عبـدٌ
منيـبٌ
لربـه
|
وكــم
مخبــتٍ
كــم
خاشــع
متصـاغر
|
|
وذي
دعـــوةٍ
مســـموعةٍ
مســـتجابةٍ
|
مـن
الأوليـا
أهـل
الصـفا
والسرائر
|
|
وللَــه
كــم
مـن
نظـرة
كـم
عواطـف
|
وكــــم
نفحـــةٍ
للإلـــه
غـــوامر
|
|
وإنــا
لنرجــو
عفــوه
أن
يعمنــا
|
ويشــمل
منــا
مـن
كـل
بـر
وفـاجر
|
|
أفضــنا
علـى
الزلفـا
بمزدلفاتهـا
|
ومشــعرها
أكــرم
بهـا
مـن
شـعائر
|
|
وجئنــا
منـي
فـي
خيـر
كـل
صـبيحة
|
لرمــي
إلـى
وجـه
العـدو
المجـاهر
|
|
وحلــق
وإهــداء
الــذبائح
قربــة
|
إلـى
اللَـه
والمرفوع
تقوى
الضمائر
|
|
وبتنـا
بهـا
تلـك
الليالي
ويا
لها
|
ليـالي
لقـد
طـابت
بطيـب
النـزاور
|
|
ألا
يـا
ليـالي
الخـف
عـودي
واسعدي
|
لكــي
يحيــى
منـي
كـل
ميـت
ودائر
|
|
وعـدنا
إلـى
الـبيت
العـتيق
بنفرةٍ
|
مباركـــةٍ
مســـتعجلاً
مثـــل
آخــر
|
|
فيـا
كعبـة
الحسن
البديع
الذي
غدا
|
بهــا
كـل
صـب
وإلـه
القلـب
حـائر
|
|
ويـا
مركـز
الأسـرار
والنور
والبها
|
ولطــف
جمــالٍ
راقٍ
فــي
كـل
نـاظر
|
|
نحــن
إليــك
المؤمنــون
قلــوبهم
|
وأرواحهــم
مــن
وارد
مثــل
صـادر
|
|
بعــدت
بجسـمي
عنـك
والقلـب
حاضـر
|
لــديك
وإنــي
بعـد
ذا
غيـر
صـابر
|
|
ولـم
يـك
بعـدي
عنـك
زهـداً
وخيـرةً
|
ولكــن
بعــدي
للشــئون
العــواذر
|
|
ويـا
مكـة
الغـراء
يـا
بهجة
الدنا
|
ويــا
مفخــراً
مســتوعباً
للمفـاخر
|
|
عســـى
عــودةٌ
للمســتهام
ورجعــة
|
إليــك
لتقبيــل
الــثىر
والمـآثر
|
|
أرجــى
ولــي
ظــنٌ
جميــل
بخـالقي
|
وإن
الرجـا
فـي
اللَـه
أسنى
ذخائري
|
|
ولمــا
أتينــا
بالمناسـك
وانفضـت
|
وذلــك
فضــل
مــن
كريــم
وقــادر
|
|
حثثنـا
المطايـا
قاصـدين
زيارة
ال
|
حــبيب
رسـول
اللَـه
شـمس
الظهـائر
|
|
وسـرنا
بهـا
نطـوي
الفيـافي
محبـة
|
وشـوقاً
إلـى
تلـك
القبـاب
البواهر
|
|
فلمـــا
بلغنــا
طيبــة
وربوعهــا
|
شـممنا
شـذى
يـزري
بعـرف
العنـابر
|
|
وأشــرقت
الأنــوار
مــن
كـل
جـانب
|
ولاح
السـنا
مـن
خيـر
كـل
المقـابر
|
|
مـع
الفجـر
وافينا
المدينة
طاب
من
|
صــباح
علينــا
بالســعادة
ســافر
|
|
إلــى
مســجد
المختـار
ثـم
لروضـة
|
بهـا
مـن
جنـان
الخلد
خير
المصائر
|
|
إلـى
حجـرة
الهـادي
البشـير
وقبره
|
وثــم
تقــر
العيــن
مـن
كـل
زائر
|
|
وقفنــا
وســلمنا
علـى
خيـر
مرسـل
|
وخيــر
نــبي
مــا
لـه
مـن
منـاظر
|
|
فــرد
علينــا
وهــو
حــي
وحاضــر
|
فشـــرف
مــن
حــيٍّ
كريــمٍ
وحاضــر
|
|
زيـــارته
فـــوز
ونجـــح
ومغنــم
|
لأهــل
القلـوب
المخلصـات
الظـواهر
|
|
بها
يحصل
المطلوب
في
الدين
والدنا
|
ويننــدفع
المرهـرب
مـن
كـل
ضـائر
|
|
بهـــا
كــل
خيــر
عاجــل
ومؤجــل
|
ينــال
بفضـل
اللَـه
فـانهض
وبـادر
|
|
وإيــاك
والتســويف
والكسـل
الـذي
|
بــه
يبتلــي
كـم
مـن
غـبي
وخاسـر
|
|
فإنــك
لا
تجــزي
نبيــك
يــا
فـتى
|
ولـو
جئتـك
سـعياً
علـى
العين
سائر
|
|
قبـورك
مـن
قـبر
حـوى
سـيد
الـورى
|
وسـامي
الذرى
بحر
البحور
والزواخر
|
|
نـبي
الهـدى
بحر
الندى
مجلي
الصدى
|
مبيـد
العـدا
مـن
كـل
غـاوٍ
وغـادر
|
|
مزيـل
الـردى
ماضـل
عبـد
به
اهتدى
|
بعيــد
المــدى
للحــق
داع
وآمــر
|
|
إمـام
لـه
التقـديم
فـي
كـل
مـوطن
|
وصــدر
علـى
الإطلاق
مـن
غيـر
حاصـر
|
|
لـه
تتبـع
الرسـل
الكـرام
وتقتفـي
|
لآثـــاره
فــي
وردهــا
والمصــادر
|
|
نبــــوته
كــــانت
وآدم
طينــــة
|
وفيـه
انتهـت
غايـات
تلـك
الدوائر
|
|
هــو
الســاس
والــرأس
للأمــر
كـل
|
بـــأولهم
يـــدعى
لـــذلك
وآخــر
|
|
وتحـت
لـواء
الرسـل
يمشـون
فـي
غد
|
وناهيــك
مــن
جــاهٍ
عريـضٍ
وبـاهر
|
|
وفيــه
عليــه
اللَــه
صــلى
ودائع
|
مــن
اليسـر
لا
تـروي
خلال
الـدفائر
|
|
ولكنهــــا
مكتومــــةً
ومصــــانةً
|
لــدى
العـارفين
الأوليـاء
الأكـابر
|
|
وموروثــــة
مخصوصــــة
بضـــنائن
|
لربــك
مـن
أهـل
التقـى
والسـرائر
|
|
محمــد
المحمـود
فـي
الأرض
والسـما
|
بأوصـــاف
حمـــد
طيـــب
متكــاثر
|
|
وأحمــدهم
للَــه
فــي
كــل
مــوطن
|
وأشــكرهم
فــي
يســره
والمعاســر
|
|
وأعلــم
خلــق
اللَــه
بـاللَه
ربـه
|
وأخشــاهم
للَــه
مــن
غيــر
نـاكر
|
|
وأطـــوعهم
للَـــه
أعبـــدهم
لــه
|
وأقــومهم
بــالحق
بيــن
المعاشـر
|
|
هـو
القـائم
السـاجد
في
غسق
الدجى
|
فســل
ورم
الأقـدام
عـن
خيـر
صـابر
|
|
هـو
الزاهـد
الملقـى
لـدنياه
خلفه
|
هـو
المجـتزي
منهـا
بـزاد
المسافر
|
|
وباذلهــا
جــواداً
بهــا
وســماحة
|
بكــف
نــداها
كالســحاب
المـواطر
|
|
ورد
مفاتيـــح
الكنـــور
زهـــادة
|
ومـا
مـال
للـدنيا
الغـرور
بخـاطر
|
|
ومــن
ســغب
شــد
الحجـارة
طاويـاً
|
لأحشــــائه
الطيبـــات
الضـــوامر
|
|
فحمــــد
لـــرب
خصـــنا
بمحمـــد
|
وأخرجنـــا
مـــن
ظلمــة
وديــاجر
|
|
إلــى
نــور
إســلام
وعلــم
وحكمـة
|
ويمـــن
وإيمــان
وخيــر
الأوامــر
|
|
وطهرنــا
مــن
رجــز
كفــر
وخبثـه
|
وشــرك
وظلــم
واقتحــام
الكبـائر
|
|
أتــى
بكتـاب
اللَـه
يتلـوه
داعيـاً
|
إلـى
اللَـه
بالحسـنى
وخير
البشائر
|
|
وأيــد
بالآيــات
مــن
كــل
معجــزٍ
|
وبرهـــان
صــدقٍ
قــاطعٍ
للمعــاذر
|
|
فلـبى
رجـال
دعـوة
الحـق
فاهتـدوا
|
ونـالوا
المنـى
فـي
عاجـلٍ
وأواخـر
|
|
وأنكــر
أقــوام
وصــدوا
وأعرضـوا
|
فقـــومهم
بالمرهفـــات
البــواتر
|
|
وســار
إليهــم
بــالجيوش
وبعضـهم
|
ملائكــة
أكــر
بهــم
مــن
مــوازر
|
|
ومــا
زال
يغزوهــم
بكــل
كتيبــةٍ
|
مكرمــــةٍ
أنصـــارها
كالمهـــاجر
|
|
إلـى
أن
أجابوا
دعوة
الحق
فاهتدوا
|
وأســلم
منهــم
كــل
طــاغ
وكـافر
|
|
وأدخلهـم
فـي
الـدين
قهـراً
وعنـوةً
|
بحــد
المواضـي
والرمـاح
الشـواجر
|
|
لســطوته
تخشــى
الملــوك
وتتقــي
|
ومــن
بأسـه
خـافت
حمـاةُ
العشـائر
|
|
تسـير
الصـبا
والرعـب
شـهراً
بنصره
|
تزلزلهــم
مــن
قبــل
غـاز
وغـائر
|
|
فرايــــاته
معقــــودةً
وجنـــوده
|
مؤيــدة
بالنصــر
مــن
خيـر
ناصـر
|
|
وأخلاقــــه
محمــــودةٌ
وصــــفاته
|
وأعـــداؤه
مقهـــورةٌ
بالـــذوائر
|
|
وآيــــاته
مشــــهورةً
وشــــهيرةً
|
وظــاهرةٍ
مــا
بيــن
بــادٍ
وحاضـر
|
|
لــه
آيــة
المعــراج
وهـي
عظيمـةٌ
|
وكــم
آيـةٍ
لـم
يحصـها
حصـر
حاصـر
|
|
ودعـــوته
عـــم
الإلـــه
بحكمهــا
|
جميــع
البرايــا
مـن
قـديم
وآخـر
|
|
ومعجــزة
القـرآن
فـي
عظـم
شـأنها
|
مؤيـــدةٍ
حـــتى
قيــام
المحاشــر
|
|
وأقســـم
رب
العـــالمين
بعمـــره
|
فـأعظم
بهـا
مـن
مالـك
الملك
قادر
|
|
وفـي
الحشـر
حـوض
واللـوى
وقيـامه
|
لفصـل
القضـا
بعـد
اعتـذار
الأكابر
|
|
فيشــفع
مقبــول
الشـفاعة
والـورى
|
بجملتهــم
مــا
بيــن
بـاك
وحـائر
|
|
نــبي
الهـدى
لا
تنسـني
مـن
شـفاعةٍ
|
فـــإن
مســـيءٌ
مــذنبٌ
ذو
جــرائر
|
|
ألا
يــا
رسـول
اللَـه
عطفـاً
ورحمـة
|
لمســــترحم
مســـتنظر
للمبـــادر
|
|
ألا
يــا
حـبيب
اللَـه
غوثـاً
وغـارةً
|
لـــدى
كربــةٍ
مســودةٍ
كالــدياجر
|
|
ألا
يــا
خليــل
اللَـه
نجـدةَ
ماجـدٍ
|
كريــم
الســجايا
كاشـفاً
للمعاسـر
|
|
ألا
يــا
أميـن
اللَـه
أمنـاً
لخـائفٍ
|
أتــى
هاربـاً
مـن
ذنبـه
المتكـاثر
|
|
ألا
يـا
صـفي
اللَـه
قـم
بـي
فـإنني
|
بكــم
وإليكـم
يـا
شـريف
العناصـر
|
|
وسـيلتنا
العظمـى
إلى
اللَه
أنت
يا
|
ملاذ
الــورى
مــن
كـل
بـاد
وحاضـر
|
|
ويــاغوث
كــل
المســلمين
وغيثهـم
|
وعصــمتهم
مــن
كــل
خــوف
وضـائر
|
|
حمـى
اللَـه
أرض
حـل
فيها
ضريحك
ال
|
معظــم
يــا
تــاج
العلا
والمفـاخر
|
|
وحيــا
وأحيانــا
بتيســير
عــودة
|
إليهــا
علــى
حــال
جميـل
وسـادر
|
|
ليــبرد
حــر
بــالفؤاد
يـثيره
اش
|
تيـــاق
لقلـــبي
شــامل
ولظــاهر
|
|
وعـى
اللَـه
أوقاتـاً
بطيبـة
قد
خلت
|
وتــذكارها
مــازال
حشــر
سـرائري
|
|
يمثلهـــا
فكــري
فــاهتز
نحوهــا
|
بوجـــد
لطيـــف
أريحـــي
وقــاهر
|
|
إلـى
المصـطفى
المختـار
صـفوة
ربه
|
وصـــاحبه
الصــديق
خيــر
مــوازر
|
|
وفــاروقه
الـبر
التقـى
وبضـعة
ال
|
رســول
هــي
أم
الطيـبين
الزواهـر
|
|
وعثمـان
ذي
النـورين
مع
كل
من
حوى
|
بقيــع
النــدى
مـن
سـادة
وأكـابر
|
|
لا
تنـس
مولانـا
أبـا
الحسـن
الرضـي
|
وإن
كـان
لـم
يـدفن
بتلـك
المقابر
|
|
لمغنــى
قباهــا
والكئيــب
ورامـة
|
وأحــد
وســلع
والنقــل
والمــآثر
|
|
ســقاها
إلهــي
كــل
وابــل
رحمـةً
|
مـن
المعصـرات
المغـدقات
المـواطر
|
|
وأنبتهـــا
مــن
كــل
زوج
بثمــره
|
وأزهـــاره
تمتبــع
نفــس
ونــاظر
|
|
وللحرميـــن
الأكرميـــن
ســـؤالنا
|
مــن
اللَــه
أمنـاً
شـاملاً
للمظـاهر
|
|
وعافيــة
مــن
كــل
بــؤس
وفتنــةٍ
|
ورزقــاً
هنيــاً
واسـعاً
غيـر
قاصـر
|
|
وأن
يسـتقيم
الحـق
والـدين
فيهمـا
|
وتحيــا
مــن
الإسـلام
كـل
الـدوائر
|
|
وفـي
سـائر
الأقطـار
مـن
أهل
ديننا
|
وذلــك
فضــل
مــن
كريــم
وقــادر
|
|
إلـــه
رحيـــم
محســـن
متجـــاوز
|
علــى
كـل
بـر
فـي
الوجـود
وفـاجر
|
|
لــه
الحمـد
لا
نحصـي
ثنـاء
وشـكره
|
علــى
نعـم
لـم
يحصـها
حصـر
حاصـر
|
|
علـى
مـا
هـدانا
واحتبانـا
وخصـنا
|
وخولنـــا
فـــي
ظـــاهر
وســرائر
|
|
علـى
جلبـه
المحبـوب
مـن
كـل
نافع
|
علـى
دفعـه
المرهـوب
مـن
كـل
ضائر
|
|
علـى
المـن
والطول
الذي
لم
يزل
به
|
يعــود
علينــا
بالأيـادي
الغـوامر
|
|
علـى
لطفه
الجاري
الخفي
وتستره
ال
|
جميـــل
وفضـــل
فـــائض
متكــاثر
|
|
وبـــر
ومعـــروف
وخيـــر
موســـع
|
وجـــود
وإحســـان
عظيــم
ووافــر
|
|
فكــم
نعمـة
أسـدى
وكـم
محنـة
زوى
|
وكــم
كربــة
أجلــى
بســر
ظــاهر
|
|
وكــم
سـقم
عـافى
وكـم
معتـد
كفـى
|
ورد
بســـعي
خـــائب
غيــر
ظــافر
|
|
وكــم
حاسـد
يبغـي
العـوائل
كـاده
|
وأكبتــه
فــانكب
فــي
حـال
حاسـر
|
|
فلســت
بشــر
اللــه
ربـي
وخـالقي
|
أقــوم
علــى
إحســانه
المتــواتر
|
|
ولكننــي
بــالعجز
عــن
حـق
شـكره
|
مقــر
ولــو
شـمرت
فـي
سـعي
شـاكر
|
|
ولـو
كـان
لـي
عمـر
الـدنا
وقطعته
|
بأفضــل
شــكر
الشــاكرين
الأكـابر
|
|
وأضــعاف
أضــعاف
الجميـع
مضـاعفاً
|
بلا
أمـــد
يـــأتي
عليـــه
وآخــر
|
|
لمـا
قمـت
بالشـكر
الـذي
هـو
أهله
|
وكنـت
مـع
التشـمير
فـي
وصـف
قاصر
|
|
فكيــف
وإنــي
لسـت
فـي
حفـظ
حقـه
|
وفــي
شــكره
ىــت
بطــوفي
وحاضـر
|
|
وأســتغفر
اللَــه
العظيــم
لزلـتي
|
وعجــزي
وتقصــيري
وعظــم
جـرائري
|
|
وأســـأله
لطفــاً
وعونــاً
ورحمــةً
|
ولطفــاً
ويســراً
كاشــفاً
للمعاسـر
|
|
وللعفـو
والغفـران
والصـفح
أرتجـي
|
مـن
اللَـه
غفـار
الـذنوب
الكبـائر
|
|
فظنــي
جميــل
فــي
إلهـي
وخـالقي
|
وحسـبي
بـه
فـي
قابـل
التـوب
غافر
|
|
نوحـــده
ســـبحانه
وهـــو
واحــد
|
تقـــدس
عــن
مثــل
لــه
ومنــاظر
|
|
وليــس
لــه
فــي
ذاتــه
وصــفاته
|
شـريك
تعـالى
اللَـه
عـن
قـول
كافر
|
|
وجــل
عـن
التشـبيه
والكيـف
ربنـا
|
وعــن
كـل
مـا
يجـري
بـوهم
وخـاطر
|
|
وعــن
جهــةٍ
تحويــة
أو
زمــن
بـه
|
يحـــد
تعــالى
عــن
بــدو
وآخــر
|
|
عليــــم
وحـــي
قـــادر
متكلـــم
|
مريـــد
ســميع
مبصــر
بالمصــادر
|
|
أحـاط
بتحـت
التحـت
والفـوق
علمـه
|
ويعلـم
مـا
يبـدو
ومـا
في
الضمائر
|
|
وعــن
عــدم
أنشـا
العـوالم
كلهـا
|
بقــدرتها
فــأعظم
بقــدرة
قــادر
|
|
ولا
كـــائن
قـــد
أو
هـــو
كــائن
|
سـوي
بمـراد
اللَـه
مـن
غيـر
حاصـر
|
|
ويســمع
حــس
النمــل
عنـد
دبيبـه
|
ويعلـم
مـا
تحـت
البحـار
الزواخـر
|
|
وإن
كلام
اللَــــه
وصـــف
لـــذاته
|
وليـــس
بمخلـــوق
خلافــاً
لضــاغر
|
|
وأفعـــاله
فضـــل
وعــدل
وحكمــة
|
وليــــس
بظلام
وليــــس
بجــــائر
|
|
يــثيب
علــي
الطاعـات
فضـلاً
ومنـة
|
وتعـــذيبه
قســـط
لعــاص
وفــاجر
|
|
تســـبح
كـــل
الكائنــات
بحمــده
|
وتســجد
إعظـا
مـا
لـه
عـن
تصـاغر
|
|
فســبحانه
مــن
خــالق
مــا
أجلـه
|
وأعظمــه
منشــي
السـحاب
المـواطر
|
|
ومحيـي
بهـا
ميتـاً
مـن
الأرض
هامداً
|
ومنبتهــا
مــن
كــل
رطــب
ونـاطر
|
|
ورافــع
أطبــاق
الســموات
عــبرة
|
مزينهـــا
بـــالنيرات
الزواهـــر
|
|
ومجـرى
الريـاح
للـذاريات
بمايشـا
|
وممســك
فـي
جـو
الهـدى
كـل
طـائر
|
|
ومرســي
الأراضـي
بالجبـال
وفيهمـا
|
جميعــاً
مــن
الآيـات
يـا
رب
بـاهر
|
|
وفـي
البحـر
كـم
من
آيةٍ
حار
عندها
|
وســبح
إعظامــاً
لــه
كــل
نــاظر
|
|
بــه
الفلـك
تجـرى
شـاحنات
بـأمره
|
ولحــم
طــرى
مــن
نفيـس
الجـواهر
|
|
وفـي
الحيوانـات
العجـائب
فـاعتبر
|
وفكــر
وعــد
بـالطرف
خـاس
وحاسـر
|
|
وكـم
مـن
الجمـادات
الصـوامت
عبرة
|
لمعتــبر
مســتيقظ
القلــب
حاضــر
|
|
لقــد
ملأ
اللَــه
العــوالم
حكمــة
|
وأشــحنها
بالمتبــدعات
البــواهر
|
|
لينظــر
فيهـا
النـاظرون
فيعلمـوا
|
بهـا
قـدرة
المنشـئ
لهـا
خير
قادر
|
|
واســـتيقنوا
أن
لا
إلــه
وخالقــاً
|
سـوى
اللَـه
جـل
اللَـه
ربـي
وفاطري
|
|
وأشـــهد
أن
اللَـــه
لا
رب
غيـــره
|
إلـــه
عليـــم
عــالم
بالســرائر
|
|
مليــك
جميــع
العــالمين
عبيــده
|
وفــي
قهــره
مــن
صــاغر
وأكـابر
|
|
وقـــوف
علــى
أبــوابه
يرتجــونه
|
ويخشـــونه
عـــن
ذلـــة
وتصــاغر
|
|
وأشــهد
أن
اللَــه
أرســل
أحمــداً
|
إلـى
الخلـق
طـراً
بالهدى
والبصائر
|
|
فبلــغ
أمــر
اللَــه
تبليـغ
صـادق
|
اميــن
شــفيق
واسـع
الصـدر
صـابر
|
|
وجاهــد
فــي
الرحمــن
جــل
جلالـه
|
وشـــمر
حـــتى
رد
كـــل
مكـــابر
|
|
واشــهد
أن
المــوت
حــق
وكـل
مـا
|
أنـي
بعـده
مـن
بعث
من
في
المقابر
|
|
وحشـــر
وميـــزان
ونـــار
وجنــة
|
وجســر
وحــوض
طيــب
المـاء
عـاطر
|
|
لســيدنا
الهــادي
الشــفيع
محمـد
|
حميــد
المســاعي
كلهــا
والمـآثر
|
|
عليـــه
صـــلاة
تشــمل
الآل
بعــده
|
مــع
الصــحب
مـن
رب
كريـم
وغـافر
|