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هــذه
جــزوى
وهاتيـكَ
رُباهـا
|
فتمســك
بشــذى
طيــب
شـراها
|
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وانشــقِ
الارواحَ
مـن
قيصـومِها
|
وتلـقَّ
النشـرَ
مـن
وادي
طواها
|
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يـا
رعـى
اللَـه
مغـاني
حـاجرٍ
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بغوانيهـا
عـن
الحُسـنِ
غناهـا
|
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هــي
أرضٌ
فــي
سـما
أرجائِهـا
|
مرحـاً
تختـالُ
بـالتيه
ظباهـا
|
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وبرقــي
اللــوى
مــن
عالــج
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جيــرةٌ
الحـاظُهم
مـاضٍ
شـباها
|
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ضــربوا
فــوقَ
تلاعِ
المنحنــى
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كلّــه
قـد
رفعَـت
فـوقَ
سـهاما
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وأســالوا
مــن
عقيـق
ادمعـا
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نظمـوا
بـالجزع
منثـورَ
بُكاها
|
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مـا
علـى
العاشقِ
أن
شطّ
النوى
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لــو
بكـى
آرام
نجـدٍ
ونعاهـا
|
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أو
علــى
ذي
ولــهٍ
مــن
حـرجٍ
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لـو
تلا
فـي
ليلـهِ
واهـاً
وآها
|
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لـو
ترانـي
يـومَ
سـارت
عيسُهُم
|
أقـرُع
السـِنَّ
عليهـم
والشفاها
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وجعلــتُ
القلـبَ
منـي
والحشـا
|
أرضَ
تلـك
العيـس
حتماً
برِضاها
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وعلــى
الاكــوارِ
ملنـا
طربـا
|
مـن
غـرام
لحشـى
القلبِ
حشاها
|
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يـا
غـواني
الجَزع
لي
في
حيكم
|
كبــدٌ
حــرى
بكـم
زادَ
جواهـا
|
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مــن
لقلـبي
مـن
هـوى
غانيـةٍ
|
بسـيوفِ
الهنـدِ
تهـزو
مقلتاها
|
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شــمسُ
حســنٍ
ان
تــوّلت
سـحرَةَ
|
فـي
مغـاني
حسـنها
تاه
فتاها
|
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أو
تبــدى
مـن
ديـاجي
شـعرها
|
عنبر
الفرع
غشى
الدنيا
دجاها
|
|
أو
أمــاطت
عــن
ذرى
جبهتهـا
|
برقـع
الحسـن
تلـت
آي
ضـحاها
|
|
أو
تخطّـــت
تتهـــادى
مرحــا
|
فصـوابي
ضـاع
فـي
مشـي
خطاها
|
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جـالَ
مـاءُ
الحسـنِ
فـي
وجنتها
|
فبــدا
راووقــه
مـن
شـفتاها
|
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يــا
لأحشــائي
مــن
جفوتهــا
|
لـو
طفـى
حرَّ
الجوى
بردُ
لماها
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بــالتثني
قــد
حكـت
قامتُهـا
|
سـدرة
الحسـنِ
وهـذا
منتهاهـا
|
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وبمهــوى
القــرطِ
مـن
ليتِّهـا
|
عـالمُ
الأرواحِ
قـد
هـبَّ
هواهـا
|
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وعلـــى
عرنينهـــا
شـــرذمةٌ
|
كـل
عـالي
الانف
بالعينِ
شراها
|
|
نـصّ
قاضـي
الحسـنِ
فـي
مقلتها
|
حيـث
شكل
الصاد
والنونِ
حواها
|
|
لسـتُ
انسـى
جمـع
شملى
في
مها
|
ارضِ
نجـرانَ
فيـا
طـولَ
نواهـا
|
|
لبقايــا
رســمها
فـي
مهجـتي
|
خطـة
كـرّ
الليـالي
مـا
محاها
|
|
يـا
عـذولا
فـي
الهوى
دع
فتيةً
|
تنــدبُ
الأيــامَ
أيـامَ
صـباها
|
|
حيــث
غصـن
القـدّ
منـي
نـاظرٌ
|
مـن
صـفا
صفوتهِ
يسقي
المياها
|
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فانقضـت
تلـك
الليـالي
ومضـت
|
مـع
ذاك
العصـرِ
أيـامُ
صـفاها
|
|
نشـأةٌ
مـن
سـُكرها
قلـبي
صـحا
|
وانتشـى
مـن
كـفّ
يحيى
بنداها
|
|
ملــك
أدنــى
مبــادي
فضــله
|
لأيـادي
النـاسِ
كـانت
منتهاها
|
|
كتبــت
فـي
جبهـةِ
الكـونِ
لـه
|
آيُ
مجــدٍ
منطـقُ
الطيـرُ
تلاهـا
|
|
ذهنــه
الوقــادُ
فــي
شـعلتهِ
|
ظلمــاتُ
الشــكِ
بـالحق
جلاهـا
|
|
كـم
لـه
بيـن
الـورى
مـن
حكمٍ
|
ومعـانٍ
فـي
المعالي
لن
تضاهى
|
|
وســهامُ
الــرأي
مــن
فكرتـهِ
|
قـد
أصـابت
غـرض
القصد
رماها
|
|
طــابقت
آراؤه
حكــمَ
القضــا
|
وكـذا
الاذهـانُ
ان
زاد
نُهاهـا
|
|
وإذا
الــدهرُ
ثنايــاه
بــدت
|
غضـبا
كـان
عليهـا
ابـنَ
جلاها
|
|
وإذا
الحــرب
علــت
أوداجُهـا
|
سـدَّ
فـي
ضـم
اللهى
فتح
لهاها
|
|
وإذا
صــادم
يـومَ
الضـربِ
فـي
|
صـارمِ
العـزمِ
أعـاديه
سـباها
|
|
وإذا
مــا
أعربــت
مـن
فتحـه
|
معجمـاتُ
الطعـنِ
للفتـكِ
نحاها
|
|
وإذا
درات
رحــــى
أكرومـــةٍ
|
للنـدى
كـان
لهـا
قطـبُ
رحاها
|
|
إن
ميــزان
العلـى
مـن
قسـطه
|
رجحــت
فــي
راحـتيهِ
كفتاهـا
|
|
فـي
سـماءِ
المجدِ
الواحُ
العلى
|
قـد
رقاهـا
ومـع
الحفظِ
قراها
|
|
نيــــرّ
أيــــامهُ
مشــــرقةٌ
|
فالضـحى
يحسـدُ
اشـراقَ
مسـاها
|
|
طــودُ
عــزٍّ
لاذت
الخضــرا
بـه
|
فحماهــا
وحمــى
حـولَ
حماهـا
|
|
فـي
ميـادينِ
العلـى
لـو
ركضت
|
خيلـهُ
لـم
تسـتمع
قـولَ
لغاها
|
|
مشـتري
الآسـاد
فـي
نقد
الظبا
|
فلـذا
قيـل
لهـا
أسـدُ
شـراها
|
|
وبــه
الملــكُ
بــدا
ناجــذهُ
|
وبـه
العليـاءُ
قـرّت
مقلتاهـا
|
|
ذو
أيــادٍ
لــو
حكتهـا
أبحـرٌ
|
أصـبح
الـدرُّ
بـديلاً
عـن
حصاها
|
|
لـم
أقُـم
فـي
شـكرهِ
لو
أن
لي
|
كـلُّ
عضـوٍ
في
أداء
المدح
فاها
|
|
وأخيــهِ
اســعدُ
الجــدِّ
فــتى
|
بــأبيه
ختــمَ
النجـلُ
إباهـا
|
|
شــبَها
فــي
نعتــه
أن
تـدّعي
|
السـنُ
الوصـافِ
سـلّت
من
قفاها
|
|
طــرُقُ
المجــدِ
أعِــدّت
لهمــا
|
كـابراً
عـن
كـابرٍ
قـد
ورثاها
|
|
قبسـوا
مـن
رونـقِ
النعمانِ
ما
|
لـو
أصـاب
الشمسَ
لازدادَ
ضياها
|
|
أعنــي
نعمــانَ
الـذي
طينتـهُ
|
عُجِنـت
فـي
الأصلِ
من
ماءِ
سماها
|
|
ورثــوا
عنــه
مقامــات
علـى
|
مـن
سـواهم
كان
صعباً
مرتقاها
|
|
بـــأبيهم
ان
تعــالى
جــدهم
|
فـــأبوه
منـــذر
أم
قراهــا
|
|
دولـــة
فــي
كفــه
مربوطــة
|
بــذرى
الأفلاك
اطنــابُ
علاهــا
|
|
أيهـا
الدسـتورُ
خـذ
مـن
خادمٍ
|
مدحـةً
يسـتوقفُ
الطـرفَ
سـناها
|
|
قــد
أتــت
رايتهــا
منصـوبةً
|
وبـك
المـدحُ
عـن
الكسرِ
وقاها
|
|
انهــا
جــوهرةٌ
الفضـلِ
الـتي
|
منطقـي
مـن
بحرِ
جدواك
اتقاها
|
|
مــدحُك
العــالي
غلا
مقــدارهُ
|
نـال
مـن
يُعنـى
به
عزاً
وجاها
|
|
لسـتُ
أحصـي
عشـر
معشـار
الذي
|
حزتـهُ
والزهـرُ
لم
أبلغ
ذراها
|
|
فاقبـل
العـذر
وعامـل
بالرضى
|
ان
روحـي
فـي
مراضـيك
غناهـا
|
|
دمــتَ
للتوفيـقِ
والنصـرِ
معـا
|
مـن
جهـات
الستِّ
تلقاهُم
تُجاها
|