|
ومولعـــة
بــاتلافي
وهلكــي
|
تحـاول
بارتكـاب
الوزر
هتكي
|
|
شـكوت
لهـا
وحـق
لـي
التشكي
|
إليــك
عـن
يـا
نفسـي
إليـك
|
|
فمـا
لـك
مـا
يقابل
ما
عليك
|
|
مـن
الأيـام
كـم
سـودت
صـحفا
|
تعـذر
أن
يفيهـا
النقل
وصفا
|
|
تخـذت
أوامـر
الأسـواء
الفـا
|
فهــل
أمَّـارة
بالسـوء
يلفـى
|
|
لـديها
بعـض
مـا
يلفـى
لديك
|
|
وثقـت
وهـل
أخـو
ثقـة
يعـوَّل
|
عليــك
وظهـره
بـالوزر
حمـل
|
|
وإنــك
لا
بلغــت
منـي
مؤمَّـل
|
بتهلكـة
لقـد
ألقيـت
مني
ال
|
|
ذي
ألقيـــت
آه
مــن
يــديك
|
|
وحــرِّ
تأســفي
وأوار
حزنــي
|
تعـذر
أن
يبـوح
بمـاء
عينـي
|
|
وقــولي
ألـف
آه
ليـس
يغنـي
|
فمــا
أدري
أقــولي
آه
منـي
|
|
يـــبرَّد
غلــتي
أم
آه
منــك
|
|
ثكلتــك
إن
لهـوك
غيـر
مجـد
|
وليــس
بمرشــد
لسـبيل
رشـد
|
|
وإنــك
تعلميــن
بغيـر
عـود
|
مضـى
عصـر
الصـبا
كزمان
ورد
|
|
ولـم
يبـق
عـدمتك
غيـر
شـوك
|
|
غرسـت
معاصـيا
فجنيـت
إنمـا
|
بـه
اسـتوجبت
تأنيبـا
ولوما
|
|
لقـد
أمضـيت
بالأسـواء
ختمـا
|
الــم
يــان
لـك
الاقلاع
عمـا
|
|
يصـك
بسـوء
مـا
أجرمـت
صـكي
|
|
كـثير
العمـر
فـات
إلى
سبيل
|
ومــا
أبقـاه
آذن
فـي
رحيـل
|
|
وإذ
لـم
يبـق
منـه
سوى
قليل
|
تعـالي
ويـك
نكـثر
مـن
عليل
|
|
وتعديـد
علـى
مـا
فـات
ويـك
|
|
ولـي
حوبـاء
منهـا
نلت
حوبا
|
كـبيرا
للجـرائم
صـار
كوبـا
|
|
ألـم
ترنـي
صـباحا
أو
غروبا
|
أعــدِّد
كــل
آونــة
ذنوبــا
|
|
عليهــا
كلمــا
عـدَّدت
أبكـي
|
|
أسـرَّ
مـآثمي
مـا
بيـن
صـحبي
|
ويعلـم
مـا
يسـر
القلـب
ربي
|
|
وأظهـر
مـا
أكتـم
فيـه
عيبي
|
ويسـتر
بالريـاء
نفـاق
قلبي
|
|
لسـاني
يـا
لسـتر
فيـه
هتكي
|
|
تضـاعف
باحتمـال
الوزر
ضعفي
|
وفـي
كيـل
المـآثم
لـي
توفي
|
|
أأملــك
راحـتي
عنهـا
بكفـي
|
ولــي
نفــس
تعرضـِّني
لحتفـي
|
|
وتعرضـني
علـى
تبعـات
هلكـي
|
|
تحـــذرني
مشـــافهة
بلاهــا
|
ويعطفنـي
الغـرور
إلى
هواها
|
|
بأيـدي
البطـش
فض
الله
فاها
|
سـفاها
كـم
تناشـدني
شـفاها
|
|
حـذار
حـذار
مـن
بطشي
وفتكي
|
|
شـكوت
لربهـا
مـا
صـح
عنهـا
|
ولا
تنفــك
تــأمرني
وانهــي
|
|
ويعلـم
مـن
إليـه
الأمر
منهى
|
أنا
ما
عشت
أشكو
الضيم
منها
|
|
فلا
عاشـت
ومنـي
الضـيم
تشكي
|
|
تلاقينــي
بــوجه
مــن
سـرور
|
وألقاهــا
بنــوع
مـن
حبـور
|
|
كلانــا
دائبيــن
إلـى
غـرور
|
فــإن
قابلتهـا
يومـا
بـزور
|
|
تقـــابلني
مغالطــة
بافــك
|
|
يـدي
مـا
قـد
جنته
عليَّ
يكفي
|
بخسـراني
ونطـق
فمـي
بزيفـي
|
|
فهــا
أنــا
رهــن
كـل
خسـف
|
فلا
عمــا
يشــين
أكــف
كفـي
|
|
ولا
فيمــا
يزيــن
أفـك
فكـي
|
|
ولكنـي
أقـول
علـى
التـوالي
|
وعلـم
اللـه
يغنـي
عن
سؤالي
|
|
أأخشـى
مـن
وقـوعي
فـي
ضلالي
|
وإنـي
والعليـم
بكنـه
حـالي
|
|
ومـن
عـن
دركـه
قـد
كلَّ
دركي
|
|
ومــن
عنـه
تضـاءل
كـة
فكـر
|
ومنـه
مـا
أحـاط
ببعـض
خـبر
|
|
ومــن
وحــدته
بخلــوص
ســرَّ
|
لئن
دلســت
كفرانــا
بشــكر
|
|
فمــا
دنســت
أيمانـا
بشـرك
|
|
بــآل
محمــد
ســرا
وجهــرا
|
وثقت
فلم
أخف
في
الحشر
وزرا
|
|
ولـم
أحـذر
لصرف
الدهر
مكرا
|
ومـن
يـك
حب
أهل
البيت
ذخرا
|
|
لـه
ينجـو
غـدا
مـن
غيـر
شك
|
|
سـفير
ولائهـم
فـي
يـوم
حشـر
|
نجــاة
للغريــق
ببحــر
وزر
|
|
فهـل
أخشـى
عـواقب
كـل
أمـر
|
وهــم
للمختشـى
غرقـا
ببحـر
|
|
تلاطــم
بالـذنوب
عظيـم
فلـك
|
|
وهـم
حـرم
لمـن
يـأوى
إليـه
|
ومســتند
لمــن
يلفـى
لـديه
|
|
أتـــوقعه
ضـــلالته
بـــتيه
|
وهــم
فـرج
لمـن
سـدت
عليـه
|
|
منافــذ
أوقعتــه
بكـل
ضـنك
|
|
وهـم
سـبب
الوصـول
إلى
مقام
|
بـــه
لمقصـــر
أي
الــتزام
|
|
وهــم
لعــديم
حـام
مستضـام
|
نصــال
مناضــل
ونبــال
رام
|
|
وقضــب
مضــارب
وسـيوف
بتـك
|
|
أئمــة
حكمــة
وملــوك
عـدل
|
أروعــة
مفخــر
ونجـار
فضـل
|
|
بحــور
مكــارم
وسـيول
نيـل
|
ليــوث
ملاحــم
وغيــوث
محـل
|
|
وحــــزب
ملائك
وولاة
ملــــك
|
|
ســلالة
نــور
حــق
مســتبين
|
وعــترة
أنــزع
شــثن
بطيـن
|
|
فهـم
مـن
غيـر
شـك
عـن
يقين
|
فــروع
بنــوة
وأصــول
ديـن
|
|
وفتيــة
طاعــة
ورجـال
نسـك
|
|
فراقــد
ســودد
ومنـار
رشـد
|
رواعــد
بــارق
وبـروق
رعـد
|
|
ســماء
عــوارف
وبـروج
مجـد
|
شــموس
معــارف
وبـدور
سـعد
|
|
وأنجــم
رفعـة
مـن
ذات
حبـك
|
|
لهـم
فـي
الحـرب
مشرقة
كشمس
|
مواقـــع
لا
نحــددها
بحــدس
|
|
ومنهـا
فـي
القليب
بغير
لبس
|
ببـدر
قـد
أعادوا
عبد
الشمس
|
|
كشــمس
العصـر
جانحـة
لـدلك
|
|
وهــم
ســحب
النــدى
رجــاء
|
بســلم
والضـياغم
فـي
لقـاء
|
|
فكـم
كشـفوا
لحـق
مـن
غطـاء
|
وكم
في
الحرب
صانوا
من
دماء
|
|
أعــدتها
بنــو
حــرب
لسـفك
|
|
ثلاثــا
طلقـوا
دنيـا
لقوهـا
|
تليــق
لآل
صــخر
فارتضــوها
|
|
نـأوا
عنهـا
أولئك
إذ
أتوها
|
وقـد
تركـوا
لهم
دنيا
رأوها
|
|
بهــم
أحـرى
فسـاموها
لـترك
|
|
أليـس
بحبهـم
ينجـو
المقصـر
|
أجـل
ولـذنبه
الرحمـن
يغفـر
|
|
وصـح
تـواترا
والـذكر
مخـبر
|
سـواهم
أهـل
بيـت
لـم
يطهـر
|
|
مـن
الرجـس
الالـه
ولـم
يـزك
|
|
أتعجـب
إن
بكيـت
لضـحك
قـوم
|
أبــت
الا
قتــال
أبـاة
ضـيم
|
|
بأجفــان
جفاهــا
طيـب
نـوم
|
ســأبكيهم
إلـى
ميقـات
يـوم
|
|
يزيـد
علـى
يزيـد
فيـه
ضحكي
|
|
فلسـت
بمـدرك
في
الحشر
أمنا
|
ولا
متــوطن
الفــردوس
مغنـى
|
|
إذا
لـم
أخـزه
فـي
كـل
معنى
|
وألعنـه
ليـوم
الـدين
لعنـا
|
|
يشــارك
روحــه
بأشــرِّ
شـبك
|
|
أفــرق
أدمعـي
وتـرا
وشـفعا
|
علـى
آل
البتـول
الطهر
جمعا
|
|
لمشـهدهم
مـتى
شـاهدت
ربعـا
|
أصــعد
زفرتـي
فتصـوب
دمعـا
|
|
يخلـص
باتقـاد
الوجـد
سـبكي
|
|
وأســعر
لاعـج
الاشـجان
وقـدا
|
بلــى
ولرزئهـم
أزداد
وجـدا
|
|
مـن
بنـد
السـلو
أحـلَّ
عقـدا
|
وأنـثر
مـن
عقيق
الدمع
عقدا
|
|
فــانظم
نعتهــم
منـه
بسـلك
|
|
يــروق
لنـاظر
منـه
انتظـام
|
يــروق
لسـامع
منـه
انسـجام
|
|
ومثــل
الـودق
ينـثره
غمـام
|
عليهــم
مــن
مـواليهم
سـلام
|
|
مـع
الصـلوات
يحبـك
أي
حبـك
|
|
ولـم
تـبرج
ولا
برحـت
لـديهم
|
بحرمــة
جــدهم
وبوالــديهم
|
|
تحيــة
ربهــم
تهـدي
اليهـم
|
مـدى
الأيـام
مـا
ناحت
عليهم
|
|
مطوقــة
علــى
عــذبات
أيـك
|
|
ومـا
نـثرت
فـرائد
من
رثائي
|
ومــا
نظمــت
قلائد
مـن
ولائي
|
|
ومـا
سـاحت
سـوافح
من
بكائي
|
ومـا
فـاحت
نوافـج
من
ثنائي
|
|
علــى
حضــرتهم
بختـام
مسـك
|