|
مـا
لقلبي
سلوى
لمن
باللقا
منّ
|
|
وســقاني
هــواه
صـافية
الـدنّ
|
|
أو
يلقـى
الهـوان
قلبي
وإن
أنّ
|
|
لا
وحـقِّ
الجمـال
مـا
ذل
مـن
أن
|
ت
مليـك
الجلال
فـي
الـدهر
عزُّهْ
|
|
غــرس
نعمـاك
فـاق
فضـلا
ومنّـا
|
|
وهـو
بالنصـر
لـم
يـزل
مطمئنا
|
|
لا
يهـاب
الـردى
إذا
الليل
جنّا
|
|
لا
ولا
يتقـــي
العــداة
وأنّــى
|
يختشــيهم
وســوح
نصـرك
حـرزُهْ
|
|
جــذبتنا
إليــك
نفحــة
رنــدِ
|
|
وحمانــا
ســيفٌ
صـقيلُ
الفرنـدِ
|
|
أَفَأُغْتَـــالُ
والعنايــة
جنــدي
|
|
مـن
يشـاني
ذويـك
لا
ريـب
عندي
|
أن
أســـيافك
الرقــاق
تحــزُّهْ
|
|
نحـن
قـوم
لنـا
الجمـال
تبـدّى
|
|
هالــك
كــل
مـن
علينـا
تعـدّى
|
|
حــافر
الـبئر
فيـه
ذاك
تـردّى
|
|
لا
يغــر
العــدوَّ
بُــرْدٌ
تــردّا
|
هُ
وعِطــفٌ
بيــن
الأنــام
يهـزُّهْ
|
|
لا
تقـل
مـن
بغـى
عليك
استداما
|
|
سـوف
يأتي
الضيا
فيمحو
الظلاما
|
|
مــن
يـراه
نجـا
رأى
الأوهامـا
|
|
فهي
كالزرع
في
المبادي
إذا
ما
|
جـاء
وقـت
الحصـاد
أُحكـمَ
جـزُّهْ
|
|
إن
بيــت
الهــدى
عظيـم
ثنـاءٍ
|
|
كــن
بــه
واثقـاً
بغيـر
عنـاءٍ
|
|
وإذا
رمــت
تحتمــي
بالتجــاءٍ
|
|
فـالزم
البـاب
خاضـعا
في
رجاءٍ
|
لأنــاسٍ
لهــم
مـن
السـر
رمـزُهْ
|
|
تلــك
ســاداتنا
كـرام
المحـلِّ
|
|
آل
بيــت
الصـدّيق
سـر
التملـي
|
|
ليتنـي
لـو
دنيـت
منـه
ومن
لي
|
|
فهمــو
دائمــاً
بيـوت
التجلـي
|
وهمــو
معــدن
التحلـي
وكنـزُهُ
|