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ســـلام
عظيــم
مــن
عظيــم
تفــردا
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مـن
اللـه
رب
العـالمين
الـذي
هـدى
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إلــى
الشـيخ
ذاك
المرعشـيِّ
حبيبنـا
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ومــن
نــال
فضـلاً
حيـن
سـُمِّي
محمـدا
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إليـه
تحيـاتي
علـى
البعـد
لـم
تزل
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تصـــافح
محرابــاً
لــديه
ومســجدا
|
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وتســبح
فـي
بحـر
مـن
العلـم
سـبحة
|
لــه
لا
غــدير
حيــث
كــان
مؤيــدا
|
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وقــد
جمـع
الإنسـان
فـي
ضـمن
خلقـه
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جميــع
تنـاويع
الوجـود
الـذي
بـدا
|
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إلــى
أبــد
الآبـاد
مـن
غيـر
غايـة
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وإن
كـان
فـي
خلـق
جديـد
لقـد
غـدا
|
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ومـــا
المــوت
إلا
نقلــة
وفنــاؤه
|
ملابـــسُ
قــربٍ
لــم
يــزل
متجــددا
|
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لـه
فـي
ذرى
العلـم
القـديم
حقيقـة
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أتـى
خـبراً
عنهـا
هنـا
وهـي
مبتـدا
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وأنزلــه
قــد
قــال
ربــي
بعلمــه
|
وردّاه
فــي
كــل
الملابــس
فارتــدى
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محبـاً
لـه
إذ
كـان
كنـزاً
قـد
اختفى
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فـــأذكره
منـــه
وأدنــى
وأبعــدا
|
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ومـــا
هــو
إلا
أمــره
ســر
خلقــه
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يـــبين
ويخفـــي
مطلقــاً
ومقيــدا
|
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ونحــن
التقــادير
الـتي
هـو
عـالم
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بهـا
وهـو
عنـا
فـي
الغيـوب
توحـدا
|
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فلـم
نـدر
منـه
غيـر
ما
نحن
فيه
من
|
معــانٍ
ومحســوس
ومــا
خلقُنـا
سـدى
|
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هــو
اللــه
لا
عقــل
لـه
مـدرك
ولا
|
يحيــط
بــه
علمــاً
ســواه
مؤبــدا
|
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ولكننـــا
بــالغيب
نــؤمن
لا
بمــا
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لـدينا
مـن
المعنـى
الذي
طاب
موردا
|
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تبــارك
رحمانـاً
علـى
عرشـه
اسـتوى
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كمـا
هـو
يـدري
والذي
قد
درى
اعتدى
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ونحــن
لــه
الأفعــال
يفعلنـا
مـتى
|
أراد
فنــدري
فعلــه
اليـوم
لا
غـدا
|
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ونســـلم
إخلاصـــاً
إليــه
نفوســنا
|
مطيعيــن
إمــا
للنجــاة
أو
الـردى
|
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ولا
حكــم
فينــا
للعقــول
ولا
لمــا
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تحـــدِّده
كـــل
العقـــول
تحـــددا
|
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وإيماننـــا
بالمرســـلين
جميعهــم
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وبالأنبيـا
طـراً
أولـي
الفضل
والندى
|
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وبالخـاتم
المـاحي
الـذي
ثبتـت
لـه
|
مراتــب
فضــل
أرغمـت
سـائر
العـدا
|
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محمــدٍ
الــداعي
إلـى
الحـق
والـذي
|
أتانــا
بــأنوار
الشــريعة
مرشـدا
|
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لـــه
ولهــم
صــلى
الإلــه
مســلماً
|
مــع
الآل
والأصــحاب
مـا
طـائر
شـدا
|
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وبعــد
فمــن
عبــد
الغنــي
رسـالة
|
إليــك
أتــت
تتلــو
ســلاماً
مـرددا
|
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وتكشــف
عــن
ســر
الغــدير
لأهلــه
|
وعــن
سـبْح
أهـل
اللـه
فيـه
تـوددا
|
|
وعــن
كــونه
بحــراً
بلا
ســاحل
لـه
|
ومــن
وجــد
الـزاد
الكـثير
تـزودا
|
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فثــق
بـودادي
يـا
ابـن
ودي
فـإنني
|
أحــب
الإمــام
المســتقيم
الموحـدا
|
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ألا
إنهــا
الأكــوان
أجمعهــا
بــدت
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بخيــر
وشـر
طبـق
مـا
العلـم
حـددا
|
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وذاك
قـــديم
كلـــه
وهـــو
حــادث
|
لــدينا
وعلــم
اللــه
لـن
يـترددا
|
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فـإن
سـلم
الإنسـان
يسـلم
ولـم
يجـد
|
علــى
القـدر
المحتـوم
منـه
تنكـدا
|
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وإن
يعـترض
كـان
اعتراضـاً
على
الذي
|
لــه
الخلـق
والأمـر
اللـذان
تأكـدا
|
|
وكــن
حاكيـاً
للأمـر
والنهـي
مخلصـاً
|
لربــك
وارفــع
عــن
تحكمـك
اليـدا
|
|
ولا
تتعــــرض
للتقــــادير
إنهـــا
|
مــراد
الـذي
أشـقى
قـديماً
وأسـعدا
|
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علـــى
مقتضـــى
أســمائه
وصــفاته
|
يضـل
ويهـدي
مـن
يشـاء
علـى
المـدى
|
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ومــا
الأمــر
بــالمعروف
إلا
حكايـة
|
عـن
اللـه
لا
عـن
نفـس
من
سمع
الندا
|
|
كـــذلك
إنكـــار
المنــاكر
كلهــا
|
حكايــة
عبــد
عــن
شــريعة
أحمـدا
|
|
وليـــس
عليـــه
الإمتثــال
وإنمــا
|
علــى
كــل
عبــد
فيــه
أن
يتعبـدا
|
|
غــديرك
يــا
هــذا
كمثــل
غـديرنا
|
بــه
حشــرات
ليــس
تحصــى
تعــددا
|
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نـرى
جـوهراً
فيـه
وطـوراً
نـرى
حصـاً
|
وطــوراً
نــرى
مـاءً
وروثـاً
وجلمـدا
|
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ولكنهـــا
الأقـــدار
أمـــر
محتــم
|
نعيـــم
جنـــان
أو
جحيــم
توقــدا
|
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ومــا
قـدر
مثلـي
أن
يكـون
معارضـاً
|
لـــذلك
يبغـــي
غيـــره
متعمـــدا
|
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هــم
النـاس
إمـا
صـالحاً
عنـد
ربـه
|
تقـــدر
قـــدما
أو
تقــدر
مفســدا
|
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فكــن
آمـراً
بـالخير
لا
تقصـدِ
أمـرَأً
|
وفـي
النهـي
عـن
شـر
فدع
عنك
مقصدا
|
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كمــا
فعــل
القـرآن
والسـنة
الـتي
|
أتـت
فـي
عمـوم
النـاس
نرويه
مسندا
|
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وحــرر
عليـك
الأمـر
والنهـي
تاركـاً
|
لغيــرك
يســتوفي
وعيــداً
وموعــدا
|
|
وكـــن
رجلاً
يبغـــي
خويصــة
نفســه
|
عسـى
أن
تـوافي
فـي
الجنـان
مخلـدا
|
|
ولا
تشــتغل
بالنــاس
عمـن
يـراك
إن
|
غفلــت
بــأمر
عنـه
لـم
تـر
منجـدا
|
|
وكــن
ذاكــراً
بالفعـل
ربـك
دائمـاً
|
تراقبــه
فــي
فعلــه
لــك
ســرمدا
|
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ومنـــي
صـــلاة
اللــه
ثــم
ســلامه
|
على
المصطفى
المختار
من
جاء
بالهدى
|
|
وآلٍ
وصــحبٍ
مـا
بـدا
الفجـر
مشـرقاً
|
ومــا
طــائر
فــوق
الأراكــة
غـرّدا
|