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إننـي
إن
أمـت
فمـا
أنا
ميتُ
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أنـا
حـي
بمـن
إليـه
اهتديتُ
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وأنـارت
مشـكاة
ذاتـي
بمصبا
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ح
علـومي
وفـي
الزجاجـة
زيتُ
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رمـت
مـن
رامنـي
بصـدق
وداد
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وإذا
مــا
دعــا
لــه
لـبيت
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ولروحـي
الحضـور
فـي
كـل
حي
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فيلــذ
التصــبيح
والتبنيـت
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إن
للـه
فـي
ابـن
آدم
ملكـاً
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لا
زوال
لــــه
ولا
تفــــويت
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ســر
ذات
بـه
الخلافـة
قـامت
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وعليــه
الأحيــاء
والتمـويت
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نظـري
فـي
ظـواهر
الكون
فخر
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والتفـاتي
إلـى
البواطن
صيت
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مـن
سـواه
افتقـرت
لما
تبدى
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لـي
جهـراً
حـتى
بـه
استغنيت
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ولعقلـــي
بســـره
تكميـــل
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ولقلـــبي
بـــأمره
تثــبيت
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إن
تــأملت
فــالجميع
معـان
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ولنطــق
الوجـود
هـم
تصـويت
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عطـس
الكون
بي
وقد
كنت
حمداً
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منـه
حـتى
لـه
أنـا
التشميت
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مـن
يزرنـي
يزر
أشعة
نور
ال
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مصــطفى
ضــمها
ضـريح
نحيـت
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وهـو
حـي
فـي
قـبر
جسـم
محب
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بغــذاء
الهــوى
لـه
تقـويت
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ولــه
قلـبي
المدينـة
كشـفاً
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أيـن
منهـا
بغـداد
أو
تكريت
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عالمـاً
كن
أو
طالباً
أو
محباً
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مثـل
ما
قال
تلق
ما
قد
لقيت
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لا
تكــن
رابعـاً
فتهلـك
جهلاً
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بالـذي
قـد
أمرت
أو
قد
نهيت
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يا
شبيهي
بصورة
الجسم
قد
أس
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معـت
حيـاً
لـو
أننـي
نـاديت
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ليـت
هـذا
البعيـد
منك
قريب
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ليـت
لـو
قربـت
بعيـدك
ليـت
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قـف
علـى
هـذه
الشـخوص
فإما
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ملـك
فـي
الثيـاب
أو
عفريـت
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وتجنــب
عــن
الحلـول
وحقـق
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كــل
شـيء
فـذاك
للحـق
بيـت
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وتأمـل
فـالفرق
بـالله
جمـع
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واجتمـاع
علـى
السـوى
تشتيت
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