|
أطـوف
علـى
ذاتـي
بكاسـات
خمرتـي
|
وأسـتمع
الألحـان
فـي
حـان
حضـرتي
|
|
وأنفــخ
مزمــاري
وأصــغي
لصـوته
|
وأضــرب
دفــي
حيـن
ترقـص
قينـتي
|
|
وأنشــق
مـن
روضـي
نسـيم
حقـائقي
|
ويســرح
طرفـي
فـي
حـدائق
نشـأتي
|
|
وعنــدي
إلـى
رؤيـا
جمـالي
تشـوق
|
كــثير
ومـا
عشـقي
لغيـر
حقيقـتي
|
|
ويـالهف
أحشـاءي
علـى
حسـني
الذي
|
فـؤادي
بـه
صـب
ويـا
فـرط
لوعـتي
|
|
أحـن
إلـى
ذاتـي
صباحاً
وفي
المسا
|
وغايـة
قصـدي
فـي
العـوالم
رؤيتي
|
|
وقـد
وعـدتني
اليـوم
نفسي
بوصلها
|
غــداً
فمــتى
منـي
تقـوم
قيـامتي
|
|
وأرفــع
عـن
وجهـي
خمـاري
مجـرداً
|
ثيــابي
عـن
ذاتـي
وأهتـك
سـترتي
|
|
أبــى
الحــب
إلا
أن
أكـون
مولهـاً
|
بقلــب
علــى
طـول
النـوى
متفتـت
|
|
وشـــوق
كــثيرٌ
واصــطبار
ممنــع
|
وســـقم
وأشـــجان
علــي
شــديدة
|
|
وإنــي
لأرجـو
مـن
حقيقـتي
اللقـا
|
وأطلــب
منهــا
أن
أفــوز
بنظـرة
|
|
فلا
عجــب
أن
بحــت
بالسـر
للـورى
|
وعربـدت
فـي
هـذا
الوجـود
بسكرتي
|
|
وتهــت
بمحبــوبي
علـى
كـل
ناسـك
|
وغبـت
عـن
الأكـوان
بـل
عـن
هويتي
|
|
وعنــدي
انتظـار
كـل
يـوم
وليلـة
|
إلـى
رؤيـتي
بـل
كـل
وقـت
وسـاعة
|
|
ومــا
أنــا
إلا
مـن
أحـب
وإن
مـن
|
أحــب
أنــا
مـن
غيـر
شـك
وشـبهة
|
|
أردت
ظهـوري
لـي
ومـا
كنـت
خافياً
|
فطـورت
فـي
الأطـوار
مـن
كـل
صورة
|
|
وقـد
كنـت
قـدماً
في
عمى
ليس
فوقه
|
ولا
تحتــه
أيضــاً
هــواء
بوحــدة
|
|
وللقلــم
الأعلـى
تنزلـت
مـن
يـدي
|
وللــوح
حــتى
للــذوات
الكـثيرة
|
|
وقـد
كنـت
عرشـي
واسـتويت
علي
من
|
قـديم
زمـاني
فـي
الوجـود
برحمتي
|
|
ومنـه
إلـى
الكرسـي
تنزلت
بل
إلى
|
ســمواتي
السـبع
الطبـاق
العليـة
|
|
وطــورت
أملاكـي
فلـي
كنـت
عابـداً
|
وطــورت
أفلا
كــي
فـدارت
بقـدرتي
|
|
وعـدت
نجومـا
مشـرقات
علـى
الورى
|
أزيــد
ضــياء
فــي
ظلام
الدجنــة
|
|
وطــورت
شمسـاً
فـي
طلـوع
نهـاركم
|
ومـا
الليـل
إلا
مـن
نتـائج
غيبتي
|
|
وصــرت
هلالاً
تحســبون
الشـهور
بـي
|
وأجلـو
عليكـم
ضـوء
شـمس
الظهيرة
|
|
وقــد
صـرت
أيامـاً
لكـم
ولياليـاً
|
ودهـــراً
وســاعات
وكــل
دقيقــة
|
|
وطـورت
شـكل
الجان
في
الأرض
قبلكم
|
وجئت
لهـــم
رســـلاً
لإبلاغ
حجـــتي
|
|
وقــد
كنـت
تكـذيباً
لرسـلي
منهـم
|
فصــرت
لهــم
أوفــى
هلاك
ونقمــة
|
|
وفـي
كـل
أطـوار
الشـياطين
بينكم
|
ظهـــرت
بوســواس
لأصــحاب
شــقوة
|
|
وطـورت
فـي
شـكل
العناصـر
ثـم
في
|
مواليـدها
فـي
الأرض
تلـك
الثلاثـة
|
|
ففـي
معـدن
طـوراً
وطـوراً
ظهرت
في
|
نبــات
وحيــوان
لتتميــم
حكمـتي
|
|
وكنـت
رياحـاً
مـن
شـمال
ومـن
صبا
|
أهــب
فــأروى
عــن
حـديث
الأحبـة
|
|
وكنـت
بحـاراً
زاخـرات
علـى
المدى
|
تفيــض
فتبــدي
موجـة
بعـد
موجـة
|
|
وطــورت
أرضــا
ثـم
صـرت
جبالهـا
|
لإرســائها
فـوق
البحـار
المحيطـة
|
|
وإنـي
علـى
مـا
كنـت
فيه
ولم
أزل
|
ولـي
رتبـة
التنزيـه
أرفـع
رتبـة
|
|
ومــا
كــثرة
الأطـوار
منـي
غيـرت
|
صـــفاتي
ولا
ذاتــي
ولا
قــدر
ذرة
|
|
وهـل
أنـت
فـي
تخييـل
ذاتك
باطناً
|
تغيــرت
عمــا
كنـت
فـي
كـل
مـرة
|
|
فيجلـو
عليك
الفكر
ما
قد
أردت
من
|
زخــارف
أشــباح
هنــا
مســتحيلة
|
|
وذاك
كهــذا
غيـر
أن
الخيـال
مـع
|
تخيلـه
فـي
الغيـر
لا
فـي
الهويـة
|
|
ومــا
هــي
إلا
أنـت
لا
شـيء
ههنـا
|
ســواك
فحقــق
سـر
تلـك
الحقيقـة
|
|
وإيــاك
والتشـبيه
فـي
كـل
موضـع
|
تـوهمت
فيـه
الغيـر
وافطـن
للبسة
|
|
وخـذ
كـل
مـا
ألقـى
عليـك
منزهـاً
|
ولا
تخــش
عـاراً
إن
فهمـت
إشـارتي
|
|
وهـذا
الـذي
قـد
قلتـه
كلـه
أنـا
|
ظهــرت
بــه
لـي
قاصـداً
لنصـيحتي
|
|
ولمـا
انقضـت
أطـوار
ذاتي
بمقتضى
|
صـفاتي
وأسـماءي
العظـام
الجليلة
|
|
وتـم
التباسـي
بالـذي
أنـا
مظهـر
|
لــه
مــن
شـخوص
فصـلتها
إرادتـي
|
|
وسـويت
جسـم
الكـل
بـي
فهـو
قابل
|
لروحــي
وتفصـيلي
اسـتعد
لجملـتي
|
|
جمعــت
مــن
الأشــياء
طينــة
آدم
|
ومنهـا
إلـى
الكـل
الرقـائق
مـدت
|
|
وخمرتهــا
حــتى
تناســق
نشــؤها
|
وســويتها
حــتى
لنفخــي
اسـتعدت
|
|
ولمـا
اسـتتم
الأمـر
واستكمل
الذي
|
أردت
مــن
الأجمــال
فـي
البشـرية
|
|
ففـي
تلـك
مـن
روحي
نفخت
وقد
سرت
|
نسـائم
أمـري
فـي
ريـاض
الطبيعـة
|
|
فقمــت
ســميعاً
باصــراً
متكلمــاً
|
مريــداً
عليمــاً
ذا
حيـاة
وقـدرة
|
|
فلـم
يبـد
منـي
غيـر
مـا
هو
كائن
|
لــدي
وبــي
منــي
علــى
حكومـتي
|
|
فكنــت
كمــاء
لــونه
مـن
إنـائه
|
وكالشــمس
تبـدي
خضـرة
بالزجاجـة
|
|
وأســجدت
أملاكــي
بـأمري
لمظهـري
|
فكــان
ســجودي
لــي
وآدم
قبلـتي
|
|
ولمــا
أبــى
إبليــس
عـن
تكـبراً
|
ولـم
يـأت
لـي
من
بعد
أمري
بسجدة
|
|
عـن
الملا
الأعلـى
لـه
كنـت
مخرجـاً
|
وآب
بخســــران
وطـــرد
ولعنـــة
|
|
وأســكنته
فـي
الأرض
أظهـر
كامنـاً
|
بـه
مـن
شـقا
أصـحاب
قبضـة
يسرتي
|
|
وأظهــرت
فــي
ذاك
الملا
فضـل
آدم
|
وأنزلتــه
أعلــى
مقــام
بجنــتي
|
|
وأخرجـت
حـوا
منـه
فهـي
لـه
كمـا
|
هـو
الآن
لـي
مـن
حيث
وصفي
وصورتي
|
|
وعــن
بعــض
أشـجار
هنـاك
نهيتـه
|
ولـي
كـان
منـي
النهي
عني
لحكمتي
|
|
ولمـا
اقتضى
فعلي
لما
كنت
عنه
قد
|
نهيــت
كمــال
الصــورة
الآدميــة
|
|
أتيـــت
بأقســام
إلــي
موسوســاً
|
وأوقعــت
نفسـي
فـي
غـرور
وغفلـة
|
|
وذقــت
كمــا
ذاق
العـدو
تباعـدي
|
ومـا
الأكل
إلا
الفرق
والجمع
توبتي
|
|
وقــد
لاح
عصـياني
علـي
ومـذ
بـدت
|
طفقـــت
بــأوراق
أخصــف
ســوءتي
|
|
ومـن
بعـد
ذا
أهبطـت
للأرض
هيكلـي
|
وكنـت
بهـا
فـي
العـالمين
خليفتي
|
|
وســخرت
لــي
كـل
الوجـود
تفضـلاً
|
علــى
صـورتي
منـي
وأتممـت
منـتي
|
|
وعرفــت
مـا
بينـي
وبينـي
كلاهمـا
|
علــى
عرفــات
بعـد
طـول
التشـتت
|
|
فكـان
نكـاح
الأمر
في
الخلق
ظاهراً
|
بنـا
فـي
كلا
الشخصين
قبل
النتيجة
|
|
وأظهـرت
مـن
صـلبي
جميـع
مظـاهري
|
بصـــورة
ذر
للعهـــود
الوثيقــة
|
|
وأشــهدتهم
عنــي
ألســت
بربكــم
|
فقــالوا
بلـى
طـراً
بنفـس
مطيعـة
|
|
وأوهمتهــم
غيــراً
فـأنكر
بعضـهم
|
وأوفــي
بعهـدي
بعضـهم
مـع
لبسـة
|
|
وأول
أطـــواري
الكــاومن
أننــي
|
لآدم
شـــيئاً
كنــت
وهــو
عطيــتي
|
|
وطــورت
نوحــاً
جـاء
ينـذر
قـومه
|
وكنـت
لـه
التكـذيب
منهـم
ببعثتي
|
|
وألفـاً
سـوى
خمسـين
عاماً
لبثت
في
|
جمـاعتهم
أبغـي
لهـم
نشـر
دعـوتي
|
|
وهـم
يعبـدون
الغيـر
بل
يعبدونني
|
ولا
غيــر
لكـن
وهمهـم
هـو
سـترتي
|
|
ولمـا
أبـو
واسـتكبروا
كافرين
بي
|
دعــوت
عليهــم
واسـتجبت
لـدعوتي
|
|
وأرسـلت
طوفانـاً
عليهـم
فـأغرقوا
|
ولـم
ينـج
إلا
مـن
معـي
في
سفينتي
|
|
وطـورت
إدريسـاً
ولـي
كنـت
رافعـاً
|
مكانــاً
عليّــاً
فــي
أجـل
مكانـة
|
|
وطــورت
إبراهيـم
يـدعو
إلـيَّ
بـي
|
علـــى
قـــومه
آتيتــه
أي
حجــة
|
|
ومـذ
قـال
ذا
ربـي
لـه
كنت
كوكباً
|
كــذا
قمـراً
أيضـاً
وشمسـاً
بوجهـة
|
|
ولا
فــرق
إلا
بــالأفول
ألــم
تكـن
|
إذا
لا
أحـــب
الآفليـــن
مقــالتي
|
|
كمــا
قلـت
سـموهم
لقـوم
تعلقـوا
|
بمــا
قيَّـد
الإمكـان
مـن
مطلقيـتي
|
|
وجئت
إلـى
النمـرود
أدعـوه
للهدى
|
فلـم
يمتثـل
حـتى
ثـوى
بالبعوضـة
|
|
وأضــرم
لـي
نـاراً
وأرسـلني
بهـا
|
فعــادت
بــأمري
لــي
علـي
كجنـة
|
|
وقـد
كنـت
منـي
طالبـاً
أننـي
أرى
|
لحــق
يقينــي
كيـف
إحيـاء
ميتـة
|
|
فجــاء
جــوابي
لـي
بأربعـة
فخـذ
|
مـن
الطير
واجعل
في
العلا
كل
قطعة
|
|
ونــاديهمُ
يـأتين
سـعياً
وبعـد
ذا
|
فكــن
عالمــاً
لا
شـيء
إلا
بقـدرتي
|
|
وطــورت
إسـماعيل
لمـا
بلغـت
مـع
|
أبـي
السـعي
ذبحـي
قد
رأيت
بنومة
|
|
ونــاديت
لمــا
أسـلما
حيـن
تلَّـه
|
أصـدّقت
حـتى
كـان
بـالكبش
فـديتي
|
|
وطــورت
إسـحق
الغيـور
ولـم
تكـن
|
علـى
غيـر
تحريـم
الفـواحش
غيرتي
|
|
وطــورت
يعقوبــاً
بليــت
بيوســف
|
وأســلمني
حــبي
لــه
كــل
محنـة
|
|
وفرقــت
مـا
بينـي
زمانـاً
وبينـه
|
وواأسـفى
نـاديت
مـن
طـول
فرقـتي
|
|
وعينـاي
مـن
حـزن
قـد
ابيضّتا
وقد
|
مننـت
بجمـع
الشـمل
بعـد
التشـتت
|
|
ويوســـف
قــد
طــورت
زاد
ملاحــة
|
بـوجه
سـبى
كـل
الوجـوه
المليحـة
|
|
وبــالثمن
البخـس
اشـتراني
مشـتر
|
وفـي
الجب
ألقتني
من
الكيد
إخوتي
|
|
وقـد
عشـقت
حسـنى
زليخـاء
والهوى
|
أضــر
بهــا
حــتى
هممــت
وهمــت
|
|
وطــورت
هــوداً
كـان
يشـهد
قـومه
|
علــى
أنـه
مـن
شـركهم
ذو
بـراءة
|
|
ولوطـاً
لقـد
طـورت
أيضـاً
وصـالحاً
|
أتيــت
إلــى
قــومي
لإبلاغ
دعـوتي
|
|
فزاغـوا
وعـن
أمـري
عتوا
وتكبروا
|
وقــد
عقـروا
لمـا
عصـوني
نـاقتي
|
|
وطـورت
موسـى
ضـارب
البحر
بالعصا
|
وقــد
شــق
حـتى
قـومه
فيـه
مـرّت
|
|
وآنــس
نــاراً
مــن
جـوانب
طـوره
|
فـرام
ليـأتي
الأهـل
منهـا
بجـذوة
|
|
فنـال
الهـدى
فـي
شـكل
مقصده
وقد
|
تجلــى
لــه
مــن
مظهــر
الأحديـة
|
|
وقــد
حــاز
منــه
رؤيـة
بسـؤاله
|
ولكنهــا
الأطــواد
بالصــعق
دكـت
|
|
وعيســى
لقـد
طـورت
يـبرئ
أكمهـاً
|
وأبــرص
والأمــوات
يحيــي
بـدعوة
|
|
وأرسـلت
روحـي
طبـق
مـا
هو
عادتي
|
إلـى
الأم
حـتى
كـان
مظهـر
نفخـتي
|
|
وأظهـرت
مـا
قد
كان
في
الأب
مضمراً
|
وبينـــت
للأقــوام
ســر
الأمومــة
|
|
فضـلوا
وزاغـوا
عـن
مثـال
ضـربته
|
لفهــم
علـوم
فـي
الوجـود
دقيقـة
|
|
وقـالوا
بـأني
قـد
غـدوت
لـه
أباً
|
وقـد
خـص
مـن
دون
الـورى
ببنـوتي
|
|
وأيـن
الوجـودان
اللـذان
تباينـا
|
ومـــا
عـــزُّ
خلاق
كـــذلِّ
خليقــة
|
|
ومـن
بعـد
هـذا
جئت
في
طور
كل
ما
|
مضــى
مــن
رســول
أونــبيٍّ
لأمــة
|
|
وأصــبحت
فــي
شـكل
النـبي
محمـد
|
إلـى
الله
أدعو
الناس
في
أرض
مكة
|
|
فــآذتني
الأقـوام
بغيـاً
وحـاولوا
|
بــأفواههم
إطفــاء
نـور
النبـوة
|
|
وأظهــرت
ديـن
الحـق
بعـد
خفـائه
|
فأصــبحت
الكفـار
فـي
سـوء
حالـة
|
|
ونكسـت
أصـنام
الضـلال
وفـي
الورى
|
أزلـت
ظلام
الظلـم
مـن
فـرط
سطوتي
|
|
وطــورت
أصــحاباً
ومـن
هـو
تـابع
|
لهـم
بالهـدى
مثـل
الكـرام
الأئمة
|
|
ومـن
بعـد
ذا
مـا
زلت
أظهر
دائماً
|
علــى
أمـد
الأزمـان
فـي
كـل
هيئة
|
|
وطــورت
أهــوال
القيامـة
والـذي
|
يكـون
غـداً
فـي
يـوم
عرض
الخليقة
|
|
وإيـاك
مـن
قـولي
بـأن
تفهم
الذي
|
تــدين
بـه
الكفـار
بيـن
البريـة
|
|
فــإني
بريـء
مـن
حلـولٍ
رمـت
بـه
|
عقــول
تغــذت
بـالظنون
الخبيثـة
|
|
ومــا
بـانحلال
واتحـاد
أديـن
فـي
|
حيــاتي
وإن
دانتهمــا
شــرُّ
أمـة
|
|
وكــل
الــذي
أبـديته
لـك
ناظمـاً
|
فَمِـنْ
فـوق
أطـوار
العقول
السليمة
|
|
فـإن
كنـت
من
أهل
المعارف
لم
تلم
|
لأنـــك
تلقـــاه
بنفـــس
تزكـــت
|
|
وإن
كنـت
مطمـوس
البصـيرة
جامـداً
|
علـى
مـا
تـرى
مـن
صورة
بعد
صورة
|
|
فإنــك
معــذور
بقلــة
فهــم
مـا
|
أقــول
لضـعف
فـي
قـواك
الكليلـة
|
|
فواظب
على
التنزيه
وادأب
عليه
لا
|
تكــن
مــن
أنــاس
بالتشـبه
ضـلت
|
|
ودع
عنــك
تجسـيماً
ولا
تَـكُ
جـاهلاً
|
بأوصـاف
مـن
أبـداك
فـي
كـل
حالة
|