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أنــا
عنـدي
أن
الشـهودَ
حجـابُ
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والتنــائي
ســيان
والإقــترابُ
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فـادخلوا
دار
صـبوتي
يا
ندامى
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واحــذروا
أن
يريبكــم
مرتـاب
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هـــذه
ملـــة
المفضـــل
طــه
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فـافهموا
إن
تكـن
لكـم
ألبـاب
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ما
عليكم
من
لفظها
العذب
فيها
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للــذي
ينكــر
المعـاني
عـذاب
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فهلمـوا
إلى
الحمى
وارفعوا
عن
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بـابه
السـتر
فهـو
نعـم
الباب
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واشـربوا
فضـلَ
خمرتي
من
إنائي
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وسـط
حـاني
يـا
أيهـا
الأحبـاب
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إنمــا
عنــدي
الشـراب
وغيـري
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عنــده
موضــع
الشــراب
سـراب
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أنــا
خمــار
ديرهــا
وكفـوفي
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هـــذه
عنــد
أهلهــا
أكــواب
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ورَهابينُهـــا
رعيَّـــةُ
حكمـــي
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كــل
داع
بــي
عنـدهم
مسـتجاب
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قـرب
الفجـر
فاشـربوا
بِكْـرَ
دَنٍّ
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مـا
علـى
وجههـا
سـواكم
نقـاب
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وارفعـوا
لـي
نفوسـكم
عن
كؤوس
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هـي
فيهـا
لكـم
يـورق
الشـراب
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هــي
بحــر
ومـا
سـواها
فمـوج
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وهــي
خمــر
والعـالمون
حبـاب
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قــام
شــماس
ديرهــا
يتمشــى
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وعليــه
مــن
نورهــا
أثــواب
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وجلتهــا
القســوسُ
بيـن
أنـاس
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عنــدهم
فــي
جمالهــا
أوصـاب
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فاحتسـَوها
مـا
بيـن
جنـك
وعود
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حيــث
راق
الصــبا
ورق
ربــاب
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ثــم
راحــوا
مجرديــن
سـكارى
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وتثنـــوا
معربــدين
فغــابوا
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خرجـوا
عـن
نفوسـهم
وعـن
الكو
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ن
وعــن
كـل
مـا
لهـم
يسـتطاب
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ثـم
عـن
ذلـك
الخـروج
فكـانوا
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صــوراً
للوجــود
فيهــا
انقلاب
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وهــم
الحـان
والـدنان
وكاسـا
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ت
الطلا
والـــديار
والأبـــواب
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وهــم
الفـوز
فـي
جنـان
نعيـم
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وســــواهم
جهنــــم
وعـــذاب
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طفِّحـوا
الكـأسَ
يا
سقاة
الحميَّا
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دار
مــن
فـرط
رقصـنا
الـدولاب
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وبأشــواقنا
الحمــائم
هــاجت
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فغنــاءٌ
علـى
الربـا
وانتحـاب
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والبرايــا
عـن
الحـبيب
سـؤال
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كلهـــم
حــائر
ونحــن
جــواب
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