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اللّــه
أكــبر
فـاز
المجـد
واغتبطـا
|
وأسـفر
البشـر
فـي
الأكـوان
وانبسـطا
|
|
بدولـــة
لا
يــزال
المجــد
يشــرطها
|
علــى
الزمــان
فوافــاه
بمـا
شـرطا
|
|
هــب
الزمــان
مســيئاً
عامــداً
ألَـهُ
|
أن
يمنــع
المجــد
مـن
احسـنه
غلطـا
|
|
وهــــب
مراغمـــة
الأيـــام
آبيـــة
|
إلا
اعتقــال
العلـى
مـا
بـاله
نشـطا
|
|
لا
بـل
هـو
المجـد
أعلـى
اللّـه
صولته
|
أنحـى
علـى
الـدهر
حتى
ابتز
ما
غمطا
|
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ســيعلم
الحــي
مـاذا
المجـد
فـاعله
|
أو
ينثنـي
لاغـترار
الـدهر
قـد
كشـطا
|
|
إرادة
الملــــك
القيـــوم
مـــوردة
|
علــى
الصــروف
بمـا
لا
تشـتهي
خططـا
|
|
لا
تــوزع
الفكــر
فيمـا
لا
تقـوم
بـه
|
إلا
المقــادير
والــزم
جانبـاً
وسـطا
|
|
أمـا
تـرى
الـدهر
يسـعى
حيـث
تأخـذه
|
كـــأنه
يتلافـــى
منــه
مــا
فرطــا
|
|
ويــح
الزمــان
تغشــت
عينــه
ســنة
|
فهــب
للمجــد
يرضــيه
وقــد
ســخطا
|
|
أليــس
صـعباً
علـى
ريـب
الزمـان
ولا
|
يبغـــي
دواهيـــه
ســعياً
ومغتبطــا
|
|
نـــوم
الحـــوادث
لا
طبــع
ولا
ملــل
|
بــل
مقتضــى
درج
الأزمـات
قـد
شـحطا
|
|
ليعــل
ذا
المجــد
ولتعظــم
مصـادره
|
فقــد
تصــدى
لــه
مــولاه
حيـن
سـطا
|
|
ومـــا
تصـــدى
لأمـــر
فــات
همتــه
|
كــل
المفــاخر
كــانت
عنــده
فرطـا
|
|
لكنــه
فــي
مقــام
لــو
تقــوم
بـه
|
مـن
دونـه
السـبعة
السـيارة
انخرطـا
|
|
فقـــام
بالملــك
والأقــدار
تنصــره
|
مـن
السـموات
والـدنيا
لمـا
اشـترطا
|
|
ومــــا
تشعشـــع
مـــن
لألاء
غرتـــه
|
يحكـــي
بيــاض
أيــاديه
إذا
بســطا
|
|
إذا
تصـــدر
فــي
دســت
الجلال
شــهد
|
نـا
البـدر
بالفلـك
الـدوار
قد
هبطا
|
|
فهــــزت
الأرض
بشــــراها
وهيبتـــه
|
كــأن
بــالأرض
مــا
بالسـيف
مخترطـا
|
|
ومــن
تكــون
لــه
الأقــدار
مســعدة
|
صــار
الزمــان
بمـا
يقضـيه
مرتبطـا
|
|
أقــول
للمجــد
ذا
مــن
كنـت
ترقبـه
|
لعــروة
الــدين
أوفــى
عـروة
وسـطا
|
|
هــذا
الــذي
أشــرقت
نـوراً
منـاقبه
|
أظنـــه
لنثـــار
الشـــهب
ملتقطــا
|
|
مــن
يشـفع
العـدل
والاحسـان
منـه
ال
|
يــه
للمفــرط
فــي
عصــيانه
فرطــا
|
|
مــن
عنــده
الســيف
براقـاً
كشـيمته
|
قـد
حـالفته
المنايـا
حيثمـا
اخترطا
|
|
نصـــل
مـــن
النــور
إلا
أن
شــفرته
|
نــار
تســابق
ريـح
المـوت
إن
معطـا
|
|
كـــأن
كـــل
حيــاة
للعــدا
ثبتــت
|
بــاذنه
أن
تمنــى
قبضــها
انبســطا
|
|
أو
كــان
يعلــم
أن
الكفــر
لقمـة
ح
|
ديــه
إذا
مــا
تمنــى
سـرطها
سـرطا
|
|
مــا
جردتــه
المنايــا
دون
صـولتها
|
الا
تمشـــى
إلـــى
ازعاجهــا
وخطــا
|
|
ينقــض
بيــن
لهــام
البهــم
صـاعقة
|
لـو
صـادفته
الجبـال
الشـم
مـا
وهطا
|
|
تلاد
أســـد
الشـــرى
أيــديهم
لجــج
|
قلامـــس
الأرض
صــارت
عنــدها
نقطــا
|
|
ومــا
علـى
الـدهر
مـن
آثـار
مفخـرة
|
ومكرمـــات
فآثـــار
لهـــم
وخطـــى
|
|
مضــوا
وحشــو
الليـالي
خلفهـم
شـرف
|
ومعجـــزات
وحلـــم
شـــامل
وســـطا
|
|
يقضـون
قسـراً
علـى
ريـب
الزمـان
ولا
|
يقضــي
عليهــم
وإن
وفــى
وإن
قسـطا
|
|
قـوم
يحيطـون
بـالمعروف
لـو
طلـب
ال
|
حيـاة
مـن
فضـلهم
مـن
مـات
مـا
قنطا
|
|
ولــو
عــدلنا
بشــيء
مــن
منـاقبهم
|
شــهب
النجـوم
لقـد
قلنـا
إذا
شـططا
|
|
مــن
الألـى
شـمخت
فـي
المجـد
همتهـم
|
مراتــب
الشــهب
عــدوها
لهـم
خططـا
|
|
قـد
أظهـر
اللّـه
نوراً
كان
في
أزل
ال
|
أزال
فــي
علمــه
المخــزون
منضـبطا
|
|
نــــور
توقــــد
الا
أنـــه
بشـــر
|
لعــز
إجلالــه
بــدر
الســما
ســقطا
|
|
أتــى
بمــا
بهــر
الأيــام
مـن
كـرم
|
فأصــبح
الــدهر
فـي
معنـاه
مختبطـا
|
|
لــو
شــاء
أن
يهـب
الـدنيا
لسـائله
|
أعطــاه
واعتقــد
التقصـير
والغلطـا
|
|
مــرزء
وســع
الــدنيا
بمــا
حملــت
|
عــدلاً
وعلمــاً
وحلمــاً
وافـراً
وعطـا
|
|
مثــل
اليــراع
بضـوء
النـار
محـترق
|
تــرى
الملــوك
علــى
كرســيه
خبطـا
|
|
مـــن
المســـوات
ممـــدود
بعاصــمة
|
تحمـــى
وقاصــمة
تــردى
إذا
ســخطا
|
|
وافـــى
الخلافــة
والأكــوان
شاخصــة
|
والأرض
بــؤس
وشــيب
الـدهر
قـد
خطـا
|
|
فــآنس
الكــون
مــا
يرجــو
ولا
عجـب
|
وأصــبح
الــدهر
طفلاً
بعـد
مـا
شـمطا
|
|
ومــن
يكــن
حـوله
بـاللّه
قـام
فمـا
|
يــؤوده
أنــي
يــرد
الكـون
مغتبطـا
|
|
رعــى
ذمــامين
مــن
حلـم
ومـن
كـرم
|
فكـــان
حفظهمــا
بالــدين
مختلطــا
|
|
وهـــو
الملـــي
بمعـــروف
يســـد
م
|
سـد
الغيـث
يحيي
موات
الدهر
لو
قحطا
|
|
كـذا
علـي
المزايـا
لو
رعى
الفلك
ال
|
أعلـى
رأى
الشـأن
من
حسن
العلى
نمطا
|
|
هـو
العظيـم
الـذي
لـو
شـاء
طوح
بال
|
دنيـا
ولـو
شـاء
ربـط
المشـتري
ربطا
|
|
يا
ابن
الملوك
العوادي
البسل
منصبهم
|
صــميم
قحطـان
يـا
مـن
للعلـى
نشـطا
|
|
يـا
نخبـة
اللّـه
للاسـلام
يـا
حمـد
ال
|
المعمور
يا
ابن
ثويني
المبدع
الخططا
|
|
يـا
ابـن
المليـك
الـذي
من
عزه
وهنت
|
صـعب
الليـالي
ولـم
تـدرك
لـه
نبطـا
|
|
خــذ
جــوهراً
آيــة
الكرســي
تنظمـه
|
أرســلته
شــافعاً
عنــي
لمــا
فرطـا
|
|
عـــز
الشــفيع
فمــا
عــزت
مشــفعة
|
فـي
التـائبين
إلى
ذي
العرش
بعد
خطا
|
|
أرســـلتها
رائداً
عنـــي
ومنتجعـــاً
|
غيــوث
حلمـك
فاصـفح
وانبـذ
السـخطا
|
|
لا
زال
مجـــدك
محفوظـــاً
بحيطتهـــا
|
وقهرهـــا
حاطمــاً
للخصــم
مختبطــا
|