|
خـذوا
بجميل
الصبر
وارضوا
وسلموا
|
فـــإن
فنــاء
العــالمين
محتــم
|
|
رضــا
بقضــاء
اللّــه
أن
حياتنـا
|
علـى
السـخط
منـا
والرضـا
تتصـرم
|
|
وإن
حيــــاة
تقتضـــيها
منيـــة
|
ركـــون
إليهـــا
غفلــة
وتــوهم
|
|
ألهــوا
ومخبـوء
المنايـا
حبـائل
|
وأرواحنــا
فيهــا
وقــوع
وحــوم
|
|
تناهشــنا
الآجــال
لا
نرعـوي
لهـا
|
وتخبطنــا
البأسـاء
فيهـا
وننعـم
|
|
ســكوناً
إليهـا
والمقـابر
تمتلـي
|
وتخلــو
بيــوت
الراحليـن
وتهـدم
|
|
نمـر
على
الأحداث
والقوم
في
الثرى
|
همـوداً
فيـا
أحبابنـا
كيـف
أنتمو
|
|
وهيهـات
مـا
عنـد
القطيـن
ابانـة
|
ســوى
أنهـم
صـاروا
عظامـاً
تهشـم
|
|
ثـووا
لا
يمـل
الـدود
طـول
ثوائهم
|
وملهــم
الأهلــون
ســاعة
أسـلموا
|
|
تسـاوى
ملـوك
الأرض
في
مضجع
البلى
|
وغيرهــم
مــا
ثــم
أدنـى
وأعظـم
|
|
سـيرجع
رب
التـاج
فـي
الرمس
جيفة
|
وإن
عــاش
كــبراً
أنفــه
يتــورم
|
|
تبــاذخ
مغبوطــاً
علـى
عـرش
عـزه
|
وعمــا
قليــل
سـوف
يعلـوه
منسـم
|
|
تطيـر
السـوافي
الرائحـات
رفـاته
|
علــى
عرشــه
منــه
غبــار
مقتـم
|
|
ومـا
امتـاز
من
أضحى
رفاتاً
مفتتاً
|
مليـــك
يحيــا
أو
حمــار
يكــدم
|
|
أتختلــب
الأطمــاع
عقــبى
كهــذه
|
ويـا
رب
سـلم
بعـده
الخطـب
أجسـم
|
|
يمــر
بنــا
ركــب
ويتلـوه
غيـره
|
ويســبقه
ركـب
وفـي
الأرض
أقحمـوا
|
|
تنعــم
فــي
ميراثهـم
غيـر
كاسـب
|
وعمـــا
قليــل
يقعــص
المتنعــم
|
|
أينسـى
بنـو
الـدنيا
مصارع
أهلها
|
وفــي
كــل
قلــب
للمنيــة
ميسـم
|
|
بنـــون
وآبـــاء
لــدينا
أعــزة
|
ندســــهم
فـــي
الأرض
لا
نتخـــرم
|
|
كأنــا
لهــذ
الأرض
ديــن
ودأبهـا
|
غريــم
علــى
كـثر
الوفـا
يتظلـم
|
|
تضــلعت
الارمـاس
مـن
أكـل
لحمنـا
|
ومـا
برحـت
غرثـى
إلى
اللحم
تقرم
|
|
ومــــا
هــــذه
الأرواح
إلا
ودائع
|
ســيأخذها
مســتودع
ليــس
يظلــم
|
|
وقــد
أنـذرتنا
صـرعة
بعـد
صـرعة
|
وفقـــد
أخيـــر
قبلـــه
متقــدم
|
|
تــدافعنا
الآمــال
فيهــا
كأننـا
|
هبــاء
عليـه
عاصـف
الريـح
يحكـم
|
|
ألا
نرعــوي
والنـاب
يصـرف
فوقنـا
|
فهــذا
علــى
خــوف
وذلــك
يقصـم
|
|
كـأن
المنايـا
حسـبنا
مـن
تصـرفت
|
بهــم
وكــأن
الظفـر
منهـا
مقلـم
|
|
وليسـت
لعمـر
اللّـه
عنـد
حـدودها
|
بتاركــــة
عيشــــاً
ولا
يتصـــرم
|
|
تــرى
أي
صـفو
لـم
يكـدره
صـرفها
|
وأي
شــراب
لــم
يمــازجه
علقــم
|
|
أنلزمهــا
البقيــا
وتلــك
قضـية
|
علـى
الرغـم
منها
حكمها
ليس
يلزم
|
|
ونفلــت
منهــا
والحيــاة
سـفينة
|
مخرقــة
الألــواح
بــالموج
تحطـم
|
|
تمزقنــا
الغــارات
مـن
أم
قشـعم
|
ومــا
حــدث
تبقــي
عليـه
وقشـعم
|
|
مـتى
تفـرغ
الآذان
مـن
صـوت
نـائح
|
وقعقــة
تحــت
الــتراقي
تهمهــم
|
|
وينشــف
دمــع
مــن
سـوافح
دمعـه
|
ويـــبرد
قلـــب
بالأســى
يتضــرم
|
|
مـتى
تحسـر
الأكتـاف
مـن
نعش
هالك
|
رواحــل
مـن
أثقالهـا
ليـس
تـرزم
|
|
قوافـل
تمتـار
النفـوس
إلى
الفلا
|
الا
هـــذه
الأبشـــار
للأرض
مطعــم
|
|
أرونـي
خيـام
الحـي
مـن
حيث
طنبت
|
أليــس
ضــمير
الأرض
ذاك
المخيــم
|
|
ولســنا
تأخرنــا
معـافين
بعـدهم
|
ولكنـــه
عمـــر
مـــداه
يتمـــم
|
|
تــــوفتهم
آجـــالهم
وبـــأثرهم
|
نسـير
إلـى
حيـث
اسـتقروا
سـنقدم
|
|
أخـو
الحزم
من
لا
يستقر
إلى
الهوى
|
ومـن
نصـب
العقـبى
لعينيـه
أحـزم
|
|
ومــا
نضـرة
الـدنيا
تـروق
لكيـس
|
ونحــن
نراهــا
بــالبلى
تتخــرم
|
|
يســالمها
المغـرور
منهـا
بزخـرف
|
وهيهــات
لـم
تسـلم
ولا
هـو
يسـلم
|
|
ومــن
عجــب
بـرد
الصـدور
وداعـة
|
وقــد
أيقنــت
أن
المنيــة
تهجـم
|
|
لكلـــم
نـــدي
بــالتفرق
موعــد
|
وللحتــف
رمـح
فـي
الصـدور
مقـوم
|
|
ولــو
أن
نفسـاً
وادعتهـا
منونهـا
|
ولكنــــــه
لا
زرع
إلا
سيصـــــرم
|
|
لقـد
أنـذر
الـداعي
رصـيداً
مشوكاً
|
ونحــن
كأنــا
بالنــذارة
نحلــم
|
|
حـذار
بيانـاً
أيهـا
النـاس
إننـا
|
علــى
شـدة
الايقـان
بـالخوف
نـوم
|
|
ولـو
لـم
يكـن
غير
النوادب
مؤلماً
|
علــى
ميتمــي
أطفالهــا
تتــألم
|
|
ولا
نفــس
إلا
تنطــوي
فــوق
حسـرة
|
ولا
قلـــب
إلا
بانفطـــار
مســـمم
|
|
لا
جفــل
ذولــب
إلــى
جنـب
رشـده
|
وتـــارك
دار
بالمعـــاول
تهــدم
|
|
ونعنــى
بهــا
لا
تعترينــا
سـآمة
|
وعاملهــا
مـن
فتكهـا
ليـس
يسـأم
|
|
أعنــد
رجــال
الاســتقامة
إنهــم
|
أصـيبوا
بقطـب
المسـلمين
وأيتموا
|
|
وإن
قصــمت
ظهــر
المكـارم
نكبـة
|
سيمضـي
عليهـا
الـدهر
تفري
وتفصم
|
|
ومـا
يومهـا
الآتـي
بهـا
رد
مأتما
|
ولكـن
مـا
يـأتي
مـن
الـدهر
مأتم
|
|
غداة
نعى
الناعي
إلى
الناس
راشداً
|
أحقــاً
نعيــت
الفضــل
أم
تتـوهم
|
|
نعـم
راعنـي
نـدب
السـماء
وأهلها
|
وأركــان
عــرش
المجـد
إذ
تتحطـم
|
|
وضــجة
بيـت
الفضـل
إذ
خـر
سـقفه
|
وهــدة
طــود
الجــود
إذ
يتهــدم
|
|
صــباحك
يـا
نـاعي
المـرزء
سـيىء
|
ويومـــك
منحــوس
وطيــرك
أشــأم
|
|
بعثـت
إلـى
الألبـاب
حزنـاً
مؤبـداً
|
وأوقــدت
نــاراً
دأبهــا
تتضــرم
|
|
أحقــاً
عميـد
الـدين
لاقـى
حمـامه
|
فــإني
أرى
نفــس
الهــدى
تتلـدم
|
|
أحقــاً
عمــاد
الاســتقامة
أصـبحت
|
بــه
اعوجيــات
مـن
الـبين
ترسـم
|
|
أحقــاً
ملاك
الفضــل
أودى
فتلكــم
|
يميــن
الجـد
أشـلاء
والكـف
أجـذم
|
|
أحقـاً
منـار
العلـم
أسـقطه
الردى
|
كــأن
سـقوط
العلـم
للحتـف
مغنـم
|
|
أحقـاً
إمـام
الزهـد
عارضـه
الفنا
|
فهـل
أنـف
دنيانـا
من
الزهد
يرغم
|
|
أحقــاً
ســحاب
الـبر
أقلـع
نـوؤه
|
فهــل
يتــأتى
بعــد
للـبر
موسـم
|
|
أحقــاً
جميـل
الصـنع
كفـت
يمينـه
|
وكــانت
هـي
الطـولى
تـبر
وتنعـم
|
|
أحقــاً
بهاتيــك
المعاهــد
غمــة
|
مــن
الحـزن
إذ
واراه
لحـد
مغمـم
|
|
فواحربــا
والحــزن
يسـفح
عـبرتي
|
قضـى
نحبـه
الـبر
الكريـم
المعظم
|
|
تقضــت
بــه
أيـامه
الـبيض
كلهـا
|
أيــاديه
أمطــار
ونــاديه
معلـم
|
|
تقضــت
بــه
أيــامه
مـن
جمالهـا
|
تنـــور
منهـــا
نيـــر
متجســـم
|
|
ومـا
المـرء
إلا
راكـب
يطلب
المدى
|
ولا
بـــد
يومـــاً
عمــره
يتجــرم
|
|
رويـداً
لقـد
آنسـت
فـي
الأرض
رجفة
|
تـرى
أن
قلـب
الأرض
كالنـاس
يـألم
|
|
عــزاء
رجــال
الاســتقامة
أنهــا
|
مصـيبة
ديـن
مـا
بقـي
الدهر
تعظم
|
|
فكـــل
ســرور
إذ
ألمــت
مســاءة
|
وكــل
حميــد
العيــش
عيـش
مـذمم
|
|
فيـا
ثلمـة
للـدين
والفضـل
مالها
|
ســداد
ولا
إذ
يقـدم
الـدهر
تقـدم
|
|
حنانيــك
للأبـرار
يـا
مـوت
برهـة
|
وهيهـات
ليسـت
قسـوة
المـوت
ترحم
|
|
تسـارع
فـي
الأخيـار
تمحـو
وجودهم
|
ويـا
ليـت
ما
تمحموه
بالمثل
يرقم
|
|
ومـا
معتـب
المفجـوع
منـك
بنـافع
|
لأنــت
قضــاء
صــبه
اللّــه
مـبرم
|
|
قضـى
اللّـه
إن
الحـي
يجـري
لغاية
|
فمـــا
ثـــم
تــأخير
ولا
متقــدم
|
|
مـتى
يـدرك
الاعتـاب
مستعتب
الردى
|
لـــه
عزمـــة
صــدق
ورأى
مصــمم
|
|
مكـر
همـوز
النـاب
مـا
طـاش
سهمه
|
ولا
هـــو
فـــي
كراتــه
متلعثــم
|
|
تقــادم
عهــد
بــالمنون
وفعلهـا
|
وجاســت
خلال
الــدار
تـذر
وتهشـم
|
|
إذا
أرســلت
ســهماً
لتقصـد
مقتلاً
|
تلتـه
إلـى
المرمـاة
بالرغم
أسهم
|
|
تخلـف
دعـس
الحـي
عنهـم
فأخلـدوا
|
لغــبراء
يعلــوهم
صــفيح
مــردم
|
|
وليـس
بنـا
فـي
المـوت
صرخة
ثاكل
|
وقلـــب
يـــتيم
بالأســى
يتجــرم
|
|
ولـو
كـان
يجـدي
هالكـاً
ندب
فاقد
|
لسـان
مكـان
الـدمع
من
غربه
الدم
|
|
طحـى
حـدثنا
الـدهر
للفضـل
هضـبة
|
وكـانت
بهـا
هضـب
المكـارم
تـدعم
|
|
لـك
اللّه
ريب
الدهر
يستنزف
البقا
|
فلا
نفـــس
إلا
بالفنـــاء
ســترجم
|
|
ولا
غـرو
أن
تسـتنزف
الصـبر
نكبـة
|
ويقصــر
مــن
تطراقهــا
المتعـزم
|
|
غـداة
تـداعى
الطـود
في
سمك
مجده
|
وطــارت
بـه
حـدباء
عوجـاء
صـيلم
|
|
تهـادته
أكتـاف
الرجـال
ولو
دروا
|
لكــان
حقيقــاً
أن
تهـاداه
أنجـم
|
|
إلـى
حفـرة
ضـمت
مـن
الجـود
بحره
|
رويـداً
هـو
البحـر
المحيـط
يدمدم
|
|
فمـا
عجب
أن
تحبس
الشمس
في
الثرى
|
فتعتقــب
الأيــام
والجــو
مظلــم
|
|
هنـاك
اقشـعر
الـروض
واغـبر
جلده
|
وذلـــك
روض
النعمـــة
المتســوم
|
|
مــدى
الـدهر
لا
ينفـك
حـزن
مـبرح
|
عليــك
وتسـكاب
مـن
الـدمع
مسـجم
|
|
مـآل
اليتـامى
في
الملمات
من
ترى
|
تركـت
لهـم
إذ
أزمـة
الـدهر
تأزم
|
|
فــديناك
بــالأرواح
ضـاعت
حفـائظ
|
تحفــى
بهــا
معروفــك
المتنســم
|
|
تـردى
بغـاة
الخيـر
بعـدك
بالأسـى
|
فواجــدهم
مــن
بعـد
فقـدك
معـدم
|
|
ومـا
دفنـوا
نفس
امرىء
منك
وحدها
|
ولكــن
نفــوس
فــي
ضـريحك
تـردم
|
|
وكنــت
الجنـاب
المسـتراد
لمسـنت
|
وروضـــك
مخضـــر
وبحــرك
خضــرم
|
|
فجــف
نضــير
الـروض
واربـد
جـوه
|
وغاضــت
بحــور
طاميــات
غطمطــم
|
|
وقــد
كنـت
درءاً
للحـوادث
مـوئلاً
|
إذا
جـاش
منهـا
الكـارث
المتهجـم
|
|
وكنــت
لحاجـات
المسـاكين
ركنهـا
|
فمــن
لهمـو
والركـن
عنهـم
مهـدم
|
|
وكنــت
مــع
الاكـدار
صـفواً
مهنئاً
|
رواؤك
ممـــدود
وكأســـك
مفعـــم
|
|
ومــا
ضـاعت
الآمـال
عنـدك
والـذي
|
نـويت
ولـم
يقـدر
مـن
الخير
أعظم
|
|
كـأن
الـورى
الارحـام
لسـت
تضيعها
|
علـى
أسـوة
فـي
الوصـل
بـر
ومجرم
|
|
يعيــش
بــك
الهلاك
بيــن
فواضــل
|
دقائقهـا
مـن
أكـرم
الفضـل
أكـرم
|
|
غزيـر
مجـاري
المـاء
لا
مـن
غزارة
|
وفضــلك
فيـه
أزهـر
الـوجه
مبسـم
|
|
وكنــت
كفــال
الحـق
حصـناً
لأهلـه
|
همومـــك
فيــه
والأهــم
المقــدم
|
|
فــدا
لـك
نفسـي
إذ
تجـود
بمهجـة
|
إلــى
يــد
خيـر
الراحميـن
تسـلم
|
|
حييـت
علـى
الحسـنى
ثمـانين
حجـة
|
رياضــاً
نضــيرات
جناهـا
التكـرم
|
|
فمــا
بـرح
الايمـان
فيهـا
ملازمـاً
|
لقلبــك
والاحســان
يربــو
ويعظـم
|
|
ولمــا
دعــاك
اللّـه
لـبيت
أمـره
|
فأصـبحت
جـار
اللّـه
والجـار
يكرم
|
|
وعيشـك
فـي
الـدنيا
حميـداً
مسدداً
|
فلقيــت
عمــراً
بالســعادة
يختـم
|
|
مضــيت
وخلفــت
الكآبــة
والأســى
|
مجـــددة
آثـــاره
ليـــس
تطســم
|
|
يظــل
جليــد
القلـب
منـه
مولهـاً
|
بـه
ظـاهر
التأسـاء
والحـزن
مبهم
|
|
لئن
هــدمت
محيـاك
قاصـمة
الـردى
|
فمجــدك
يبقــى
شــامخاً
لا
يهــدم
|
|
علـى
سـورة
فـي
المجـد
قـر
أساسه
|
لــه
شــرف
فـوق
السـماكين
ينجـم
|
|
فنيــت
وأبقيــت
المحامـد
أنجمـا
|
لســان
ثنــائي
عـن
مـداهن
مفحـم
|
|
تبــدلت
بالــدنيا
مقامـاً
مقدسـاً
|
هنيئاً
لــك
الحــظ
الـذي
لا
يصـرم
|
|
تصـاعدت
بيـن
الحلـو
والمر
جاهداً
|
إلــى
اللّــه
مـن
آفاقهـا
تتـبرم
|
|
هنئتــك
ولـم
نهنـأ
لفقـدك
لمحـة
|
علــى
كــل
كبــد
قرحـة
لا
تمرهـم
|
|
فيـا
ابـن
سـليم
إن
تباعدت
سالماً
|
فلا
قلــب
مــن
بـرح
عقيبـك
يسـلم
|
|
تركـت
صـدور
النـاس
ترمـي
شرارها
|
إلا
كــل
نــار
بالشــرارة
ترجــم
|
|
وليـس
الغيـوث
الصيد
للحزن
وحدهم
|
ولكـن
بهـذا
الكـون
للحـزن
منجـم
|
|
فقـد
كنـت
غوثـاً
تمطر
الكون
رحمة
|
بـل
الغوث
في
الابدال
بل
أنت
أقدم
|
|
فيـا
سـيد
الابـدال
مـن
أنـت
تارك
|
يخلــص
مــن
ســوء
ويجـزي
ويرحـم
|
|
مـتى
تطـرق
البلـوى
تصـدى
لكبحها
|
أو
اعـوج
أمـر
النـاس
فهو
المقوم
|
|
لقـد
أوحـش
الربـع
الأنيـس
وأصبحت
|
معـالم
أهـل
الحـق
لـم
يبـق
معلم
|
|
فواحربــا
قطــب
الكمـال
وردتهـا
|
شـريعة
حتـف
عنـدها
العمـر
يحسـم
|
|
وقفـت
عليهـا
نيـر
الصـحف
وافـراً
|
مـن
الـزاد
طهـر
العـرض
مما
يذمم
|
|
فأقــدمت
وفـداً
فـي
مقـام
كرامـة
|
تــروح
وتغــدو
بالبشــائر
تنعـم
|
|
مـتى
نتعـزى
منـك
أو
يقلـع
البكا
|
ورمســك
فــي
وسـط
القلـوب
مخيـم
|
|
أبعــدك
شــيخ
المســلمين
سـلونا
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بشــيء
وســلوان
العزيــز
محــرم
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كـأن
شـواظاً
فـي
الجوانـح
سـاطعاً
|
إذا
قلــت
قـد
خـف
التوقـد
يحجـم
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فـديتك
وجـه
الـدهر
بـالحزن
كاسف
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وفـي
الـوجه
عما
في
الضمير
مترجم
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لقـد
كنـت
مصـباح
الـورى
لرشادهم
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فقـد
طفىـء
المصباح
عنهم
فاظلموا
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فـوا
أسـفاه
المـس
قـد
كنـت
كعبة
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يمينــك
كــالركن
المبـارك
تلثـم
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يطــوف
بـك
العـافون
جـم
رجـاؤهم
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وناديــك
مســعاهم
وجــودك
زمـزم
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فأصــبحت
مرثيــاً
رهينــة
حفــرة
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عليــك
سـفي
الريـح
تمحـو
وترسـم
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كفـى
حزنـاً
لـولا
التأسـي
بمن
مضى
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ومـــا
هــو
آت
بالفنــاء
محكــم
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تفـرق
عـزم
النفـس
عـن
كرم
العزا
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وامثــل
أمريــك
التعــزي
وأكـرم
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إذا
قلـت
إنـي
أجمـع
الصبر
مجملاً
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بـدا
لـي
جميـع
الصـبر
جمع
سيهزم
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عرانـا
مـن
الـدنيا
خـداع
ممـاكر
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فنـبرح
فـي
أنقـاض
مـا
هـي
تهـدم
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ومــا
عزبـت
عـن
فهمنـا
نكباتهـا
|
بلـى
غطـت
الأهـواء
مـا
نحـن
نفهم
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وتوهمنــا
البقيـا
بصـالح
عيشـها
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وقــد
طحـن
الأجيـال
هـذا
التـوهم
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مــتى
أظمأتنـا
أوردتنـا
سـرابها
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وإن
كــان
مــاء
فهــو
ورد
مسـمم
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علـى
مثـل
هـذا
الفتـك
قر
قرارنا
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والبابنـا
بالهتـك
والهلـك
تحكـم
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وفـي
مثـل
هـذا
القبح
نعشق
وجهها
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فكــل
بمــا
يهــواه
منهـا
مـتيم
|
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علـى
أنهـا
إن
أحسـنت
قيـد
لمحـة
|
سـتأتي
بأكـدار
لـذا
العيـش
تلهم
|
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حــرام
عليهــا
صــبحة
لا
تخونهـا
|
وحتــم
عليهــا
أن
تطــول
فتهشـم
|
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تلاهــي
بنـي
الاسـنان
حـتى
تلمهـم
|
إلــى
حفــر
لا
يتقيهــا
التحــزم
|
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يظــن
غريـر
النفـس
حقـاً
غرورهـا
|
وســوف
يــبين
الحـق
سـاعة
ينـدم
|
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ومـا
أنتـج
استبصـارنا
غير
تركها
|
كمــا
يــترك
الأخبـاث
مـن
يتكـرم
|
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تـرى
حـدثنا
الـدهر
تبلـى
صـروفه
|
ولـم
يبـل
فـي
الدنيا
فصيح
وأعجم
|
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أبـا
الفضل
لا
ينسى
لك
الفضل
نعمة
|
خـدمت
لـه
فـاليوم
بالحمـد
تخـدم
|
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علــى
أسـف
أرثيـك
والـدمع
هامـل
|
وقلـــبي
محــروق
وذهنــي
مكلــم
|
|
تجسـم
مـا
تعطـي
مـن
الفضل
جوهراً
|
فكــل
رثــائي
الجــوهر
المتجسـم
|
|
عسى
جبر
هذا
الكسر
في
العقب
الذي
|
تركـت
ففـرع
المجـد
يزكـو
ويكـرم
|
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وفـي
الخمسة
الأقمار
أنجالك
انتهت
|
ظنــون
حســان
يقتضــيها
التوسـم
|
|
سـقتهم
أفـاويق
النجابـة
فارتووا
|
وزانتهــم
أعراقهــم
حيـث
يممـوا
|
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رمـى
بهـم
القـرآن
فـي
بحـر
نوره
|
فكـــل
بـــآداب
الكتــاب
مســوم
|
|
لهــم
درجـات
فـي
الجميـل
رفيعـة
|
وهــذا
بتوفيــق
مـن
اللّـه
يقسـم
|
|
لهــم
عنصــر
مــا
دنسـته
غميضـة
|
فــأخلاقهم
مــن
ذلـك
الأصـل
تنجـم
|
|
إذا
طــاب
أصـل
لازم
الطيـب
فرعـه
|
ألـم
تـر
أن
النـد
بـالطيب
ينسـم
|
|
هنيئاً
لكــم
يــا
آل
راشـد
أنكـم
|
شـربتم
علـى
محـض
التقـى
وأكلتمو
|
|
لكــم
أســوة
فـي
فضـلكم
بـأبيكم
|
حــق
عليكــم
حيـث
أقـدم
أقـدموا
|
|
لهــم
سـنن
فـي
الصـالحين
منيـرة
|
زواك
متينــات
العـرى
ليـس
تفصـم
|
|
ومـا
مات
من
أبقى
من
الذكر
مثلها
|
فكونـوا
عليهـا
بـارك
اللّـه
فيكم
|
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لعلكــم
يــا
صـفوة
المجـد
بعـده
|
لـــه
خلـــف
بالاســـتقامة
قيــم
|
|
إلـى
السـلف
الأخيـار
سيرته
انتهت
|
وذلــك
أزكـى
مـا
مـن
الأرث
حزتـم
|
|
فلا
زال
للاســـلام
فيكـــم
بقيـــة
|
لكـم
مـدد
التسـديد
يسـدى
ويُلحـم
|
|
عليكـم
جميـل
الصـبر
وهـو
عزيمـة
|
علـى
العبـد
أما
الخطب
يجسم
يَجسمُ
|
|
تنـالوا
عظيـم
الأجـر
منـه
وإنمـا
|
بحسـب
مقـام
الصـابر
الأجـرُ
يعظـم
|
|
لِكِــلّ
مــن
الأعمــار
حـد
ومنتهـى
|
ورجـع
إلـى
الباقي
الذي
ليسَ
يعدم
|
|
فلا
أســف
يغنــي
إذا
فــاتَ
فـائتٌ
|
ولكـن
علـى
التسـليم
والصبر
نُرحَمُ
|
|
أليــسَ
يقينــاً
مــا
بقلـب
سـَلامَة
|
لكـــل
نصـــيبين
مصــاب
ومقســم
|
|
فلا
عيـن
لـم
تسـفح
من
الدمع
عَبرةً
|
ولا
صـــدر
إلا
بالفجـــائع
يحطــم
|
|
أخـا
الحـزم
لا
تنـدب
سـواك
وإنما
|
لَحينــك
تجــري
ثـم
تكبـو
فتعـدم
|
|
فكفكـف
دمـوع
العين
واجعَل
مياهها
|
طهـوراً
لـذنب
فـي
الصـحيفة
يُرقَـمُ
|
|
ووارِ
حمــى
الأحــزان
ممـا
جنيتـه
|
فــــدونك
إلا
أن
تتـــوبَ
جهنـــمُ
|
|
إذا
لـم
تجـد
مما
قضى
اللّه
واقياً
|
فلا
بُـدَّ
أن
ترضـى
بمـا
اللّـه
يحكم
|
|
أعزيكــم
عنــي
وعــن
كــل
مُسـْلمٍ
|
وأنتـم
بحسـن
الصـبر
أولـى
وأعلَمُ
|
|
سـقى
اللّـه
رمسـاً
حلـه
صـوب
رَحمةٍ
|
وأســكنه
الفــردوس
فيمــن
يُنعَّـمُ
|