|
ريـــب
المنــون
مقــارض
الأعمــار
|
وحياتنــا
تعــدو
إلــى
المضــمار
|
|
والنفــس
تلهـو
فـوق
تيـار
الـردى
|
يــا
ليتهــا
حــذرت
مــن
التيـار
|
|
قــرت
علــى
رنــق
وزخــرف
باطــل
|
مثــل
القــرار
علــى
شــفير
هـار
|
|
مـاذا
يغـر
المـرء
مـن
محيـاه
فـي
|
دنيـــاه
وهـــي
قــرارة
الأكــدار
|
|
يتســاقط
المغــرور
فــي
لهواتهـا
|
تفريــــه
بالأنيــــاب
والاظفـــار
|
|
كشـــفت
ســرائرها
ونــادت
جهــرة
|
بعيوبهـــا
فـــي
ســائر
الأعصــار
|
|
لــم
يبـق
شـيء
مـن
شـئون
صـروفها
|
فــي
نحــت
أثلتنــا
علـى
الاضـمار
|
|
نفقــت
تجارتهــا
ومـا
بـاعت
علـى
|
غـــرر
ولا
كـــذبت
علــى
التجــار
|
|
يتهــافت
العمــار
فــي
هلكاتهــا
|
فعــل
الفــراش
علـى
لهيـب
النـار
|
|
تجــري
إلــى
شـهواتها
سـعياً
علـى
|
أنقــاض
مــا
هــدمت
مــن
الأعمـار
|
|
نصــبت
حبالتهــا
وأنــذرت
الـردى
|
وكأننـــا
صـــمم
عـــن
الانـــذار
|
|
صـدعت
بمـا
جبلـت
عليـه
ولـم
تـدع
|
ذكــــرى
ولا
عظــــة
وراء
ســـتار
|
|
شــر
الغــرور
سـكون
ذي
بصـر
إلـى
|
عيــــش
تمزقـــه
يـــد
الأخطـــار
|
|
عـــبر
تلونهــا
الصــروف
وأنفــس
|
تفنــــى
وآثـــار
علـــى
آثـــار
|
|
هـــل
زاد
عيشـــك
ذرة
عــن
هــذه
|
لـو
كنـت
فـي
الـدنيا
على
استبصار
|
|
هلا
اعتــبرت
وفــي
حياتــك
عــبرة
|
ممـــا
تصـــرفه
يـــد
المقـــدار
|
|
لا
تســـتمر
لـــك
الســلامة
لمحــة
|
وغـــوائل
الأيــام
فــي
اســتمرار
|
|
مـا
بالنـا
نبكـي
الفقيـد
ونحن
من
|
حــب
الــذي
أرداه
فــي
اســتهتار
|
|
شـغف
النفـوس
بمـا
يراقبـه
الفنـا
|
أثـــر
الهـــوى
ومحبــة
الأوطــار
|
|
جســر
المنــون
أمـام
وجهـك
عـابر
|
ولســـوف
تعـــبره
مـــع
الســفار
|
|
شـــمر
لتعـــبره
مخفـــا
ســالماً
|
مــن
ثقــل
مــا
أوقـرت
مـن
أوزار
|
|
ليــس
العظــات
بمــا
يقـول
مـذكر
|
مثـــل
العظــات
بمصــرع
الأعمــار
|
|
كـم
للمنـون
لـو
اعتبرنـا
مـن
يـد
|
فـــي
ســـلبها
الأرواح
بالتــذكار
|
|
مـا
الحـزن
الفتنـا
لمقصـود
الردى
|
يغتـــال
فــي
الايــراد
والأصــدار
|
|
أتــرى
يجــد
الـبين
فينـا
هـازلاً
|
ويريحنــــا
بمصــــارع
الأخيـــار
|
|
كلا
ولكــــن
الحيــــاة
بهيمــــة
|
تجـــري
عليهـــا
مديــة
الجــزار
|
|
خلقــت
لمــا
خلقـت
لـه
مـن
حكمـة
|
وتعـــود
تتبـــع
دعــوة
الجبــار
|
|
مزمومــة
نيــر
القضــاء
يقودهــا
|
مربوبــــة
لمشــــيئة
المختـــار
|
|
كتــب
البقــاء
لنفســه
مســتأثراً
|
بإماتــــة
الأحيــــاء
والأنشـــار
|
|
وإذا
اعتـبرت
حياتـك
الـدنيا
تجـد
|
أن
الحيــــاة
مظنــــة
الأعـــذار
|
|
مــا
بيــن
معركــة
وأخـرى
يبتغـي
|
أملاً
لباقيــــــة
ذوو
الأبصـــــار
|
|
لــو
كـان
يشـترك
البقـاء
لغـادرت
|
غيـــل
المنيـــة
أنفــس
الأبــرار
|
|
يـا
صـرعة
المـوت
انتقـرت
خيارنـا
|
وتركـــت
أمتنـــا
بغيـــر
خيــار
|
|
ناهيــك
مـن
إطفـاء
أنـوار
الهـدى
|
غشــى
الظلام
وضــل
فيــه
الســاري
|
|
ناهيــك
مـن
اعـدام
أحبـار
التقـى
|
فالــــدين
لا
يبقـــى
بلا
أحبـــار
|
|
ناهيــك
مــن
قعـص
السـراة
فـإنهم
|
ســـور
لــدين
المصــطفى
وســواري
|
|
ناهيـك
مـن
هلـك
الكـرام
فمـا
بقي
|
رســم
الكــرام
ولا
حمــاة
الجــار
|
|
ويلاه
أوحشــت
الــديار
مــن
الألـى
|
كــــانوا
خلائف
ســـنة
المختـــار
|
|
أو
كلمـــا
نجمـــت
فضــيلة
ســيد
|
قـــدرتها
وتـــراً
مـــن
الأوتــار
|
|
أســـرعت
فــي
الأغــواث
والأقطــاب
|
والاعلام
والابـــــدال
والأخيـــــار
|
|
مهلاً
فمـــا
أبقيـــت
ثـــم
بقيــة
|
نــزح
القطيــن
وجــف
روض
الــدار
|
|
مــا
زلــت
تعتقريــن
كــل
أعزتـي
|
فـــالجو
خــاو
والــديار
عــواري
|
|
أفقــدتني
شــهب
الفضــائل
كلهــم
|
ويلاه
مـــن
شــهبي
ومــن
أقمــاري
|
|
ويلاه
أيـــن
ســـماؤها
ونجومهـــا
|
وشموســها
ذهبــوا
كــأمس
الجـاري
|
|
مـــن
كـــل
أروع
لـــوذعي
كامــل
|
يهـــتر
عرفــاً
كالقنــا
الخطــار
|
|
عمــد
الديانــة
قطبهــا
قوامهــا
|
ســـحب
المكــارم
أبحــر
الأنــوار
|
|
تتلألأ
الأكــــوان
مـــن
عرفـــانهم
|
كالشــــمس
تملأ
هيكـــل
الأقطـــار
|
|
أنضـــاهم
التســـبيح
والترتيـــل
|
والتهجيــد
بيــن
جوانــح
الأسـحار
|
|
خبـــت
إذا
جـــن
الظلام
رايتهـــم
|
طــاروا
إلــى
الملكــوت
بالأسـرار
|
|
غــر
إذا
ســجد
الظلام
علـى
الفضـا
|
ســجدوا
علــى
الثفنــات
كالأحجـار
|
|
قطــع
النحيــب
صــدورهم
وكأنمــا
|
وضــعوا
الســحائب
موضــع
الأشـفار
|
|
قربـــانهم
أرواحهـــم
ونعيمهـــم
|
دأب
علـــى
الســـبحات
والاذكـــار
|
|
حصـروا
الشـريعة
والحقيقـة
والمعا
|
رف
والكمـــال
بـــأنفس
الأطهـــار
|
|
فهـــم
غيــاث
الكائنــات
وســرهم
|
مـــدد
النفــوس
ومنبــع
الأنــوار
|
|
نقلتهــم
الآجــال
مــن
درا
الفنـا
|
وتبـــؤوا
ســعداء
عقــبى
الــدار
|
|
ســلكوا
بمحيــاهم
وبعــد
ممـاتهم
|
إذ
وفقــــوا
بمســـالك
الأبـــرار
|
|
درجــوا
وأصــبحت
العـراص
عقيبهـم
|
مـــن
فقـــدهم
مغـــبرة
الآثـــار
|
|
يــا
مــوت
أفنيـت
الأعـزة
فاقتصـد
|
إن
كنـــت
ترحــم
عــبرة
الأحــرار
|
|
بـــأولئك
الأبــرار
كنــت
معــززاً
|
بـــأولئك
الأبــرار
كنــت
أبــاري
|
|
أزرى
إذا
ضـــاق
الخنــاق
بحــادث
|
وهــم
إذا
انطمــس
الطريـق
منـاري
|
|
يـا
مـوت
وقعـت
فيهـم
سـلب
الهنـا
|
وأقــــامني
للنـــوح
والتـــذكار
|
|
تــرك
الحمــام
النـوح
إذ
نـاوحته
|
واســتبردت
كبــدي
لهيــب
النــار
|
|
لـــم
أســلهم
حــتى
رزئت
بصــدعة
|
أخـــذت
بقيـــة
ســـالف
الأكــدار
|
|
أخـذت
بكظـم
الـدين
وانتحـت
السما
|
فبكــت
لهــا
بالمــدمع
المــدرار
|
|
واســـتأثرت
بقلــوب
حــزب
محمــد
|
للّــــه
فجعــــة
ذاك
الاســـتئثار
|
|
مـا
الهـول
فـي
يوم
النشور
أشد
من
|
هـــول
النعـــى
بســـيد
الأبــرار
|
|
العـالم
القطـب
المجـدد
عمـدة
الع
|
لمـــاء
طـــراً
كعبـــة
الأســـرار
|
|
ليـث
المعـارك
مربـع
الفضـل
الـذي
|
رفـــع
المنــار
ولات
حيــن
منــار
|
|
غـــوث
البســيطة
معلــم
الــدنيا
|
أبــيّ
الضـيم
مولانـا
عزيـز
الجـار
|
|
حــــامي
حمـــى
الاســـلام
حجتـــه
|
مــع
الــدين
سـيف
الملـة
البتـار
|
|
بحـر
المعـارف
والكمـال
مسـدد
الأ
|
عمـــال
فـــي
الاقبــال
والادبــار
|
|
الســـالمي
أبـــي
محمــد
المنــي
|
ف
الـذكر
طـود
المجـد
بـدر
الساري
|
|
تمضــي
وترســلها
العــراك
مروعـة
|
والليـــل
داج
والـــذئاب
ضــواري
|
|
مهلاً
همــام
الاســتقامة
مــا
الـذي
|
غــادرت
مــن
هــول
ومــن
اذعــار
|
|
قومتهــــا
فتقــــوت
فهجرتهــــا
|
يــا
هجــرة
طــالت
علــى
السـفار
|
|
ارجــع
إليهــا
حيــث
قـل
حماتهـا
|
ارجــع
فــديتك
يــا
غريـب
الـدار
|
|
ارجــع
إلــى
الاســلام
تمــم
نصـره
|
فـــالعز
تحـــت
عــزائم
الأنصــار
|
|
ارجـــع
فــإن
الاســتقامة
أرملــت
|
ارحــم
يتيمــك
وهـو
ديـن
البـاري
|
|
ارجــع
تشــاهد
كيــف
دمـع
السـيف
|
والعســـــال
والأقلام
والأســـــفار
|
|
ارجــع
ومــا
ظنــي
بأنــك
مشــتر
|
بجـــوار
ربـــك
جـــبرة
الأشــرار
|
|
أدعـــوك
للجلــى
وأنــت
عظيمهــا
|
عهــدي
وأنــت
لهــا
شـديد
الغـار
|
|
أدعــوك
للأمــر
الــذي
تــدعى
لـه
|
شـــيم
الرجـــال
وهمــة
الأحــرار
|
|
أدعــوك
للخــط
الــذي
أعيـا
علـى
|
رأي
الفحـــول
وانفـــذ
الأنظـــار
|
|
أدعـوك
إذ
فرغـت
يـدي
مـن
كـل
مـن
|
يـــدعى
لنائبـــة
وحفـــظ
ذمــار
|
|
أدعــوك
إن
كنــت
السـميع
لـدعوتي
|
لخطابــــة
التبشـــير
والأنـــذار
|
|
أدعــوك
للحـرب
العـوان
وكنـت
فـي
|
لهواتهـــا
تكفــي
كفــاء
الغــار
|
|
أدعـــوك
للقـــرآن
تكشـــف
ســره
|
وتـــبين
منـــه
غــوامض
الأســرار
|
|
أدعـوك
للسـنن
المنيـرة
إنهـا
افت
|
قـــرت
مقاصـــدها
إلــى
الأبصــار
|
|
أدعـــوك
للاجمـــاع
والأحكــام
وال
|
أديـــان
والتـــذكير
والتـــذكار
|
|
هيهــات
يــا
أسـفاه
لا
رجعـى
وقـد
|
جثمـــت
عليـــك
صــحائف
الأحجــار
|
|
يســـون
بالآثـــار
بعــد
صــحابها
|
ومثـــار
حزنـــي
فيـــك
بالآثــار
|
|
يـا
طلعـة
الشـمس
استري
عنا
الضيا
|
وخــذي
الحــداد
مشــارق
الأنــوار
|
|
ســفران
إن
هــديا
لرشــد
ارشــدا
|
مــن
فجعــتي
قلــبي
لغيــر
وقـار
|
|
كنـت
النصـير
كـان
لـي
صـبر
الحصا
|
فأصــبت
فــي
صــبري
وفـي
أنصـاري
|
|
أقــدرت
لــي
جلـداً
يقـاوم
نكبـتي
|
فـــاليوم
لا
جلـــدي
ولا
أقـــداري
|
|
ناهيــك
مـن
جلـدي
يقينـي
بالرضـا
|
والســخط
فــي
أن
المقــدر
جــاري
|
|
وبـأن
هـذا
المـرء
عرضـة
طـارف
ال
|
حـــدثان
تحـــت
مخــالب
الأقــدار
|
|
مــا
غـاض
مـن
عينـي
رأيـت
عـديله
|
مــن
طــرف
داجيــة
وطــرف
نهــار
|
|
لــم
تصــغ
نادبــة
لندبـة
جارهـا
|
هــي
تســتعد
لندبــة
فــي
الـدار
|
|
ســـول
لنفســك
أن
تعيــش
معمــراً
|
لكنــــه
أمــــد
إلـــى
مضـــمار
|
|
تلــك
المصــائب
مــدركات
صــيدها
|
ســيان
فــي
فــر
وفــي
اســتقرار
|
|
أمعنــت
فـي
هـذي
الصـروف
بصـيرتي
|
وســـبرت
مــا
تقضــيه
بالمســبار
|
|
فرأيـت
بـرد
العيـش
احسـان
العـزا
|
والاطمنانــة
تحــت
حكــم
البــاري
|
|
يــا
مــن
أذاب
الصـخر
حـر
مصـابه
|
مـــن
ذا
تركــت
لدولــة
الأحــرار
|
|
وزعــت
بيـن
الـدين
والـوطن
الأسـى
|
توزيعــك
الطاعــات
فــي
الأطــوار
|
|
ودعــوت
فــي
الاســلام
دعـوة
مخلـص
|
ثــابت
إليــك
بهــا
ذوو
الأبصــار
|
|
ثـــابت
إليـــك
عصـــائب
وهــبيه
|
مــن
أســد
ذي
يمــن
وأســد
نـزار
|
|
عشقوا
المنايا
واستماتوا
في
الهدى
|
مــن
قبــل
صــفين
ويــوم
الــدار
|
|
حنيــت
ضــلوعهم
علـى
جمـر
الغضـى
|
مـــن
حــب
ربهــم
وخــوف
النــار
|
|
غضـــبوا
لربهـــم
فشـــدوا
شــدة
|
متكـــاتفين
علـــى
هـــدى
عمــار
|
|
ملأ
اليقيــن
صــدورهم
فاستصــغروا
|
عنـــد
اليقيــن
عظــائم
الأخطــار
|
|
لعـــزائم
الأعيـــان
فيهـــم
وازع
|
دينـــاً
وحاشــاهم
لــزوم
العــار
|
|
بــاعوا
لمرضــاة
الالــه
نفوســهم
|
اربــح
بــبيعتهم
ونعــم
الشــاري
|
|
ورضــوا
لأعبــاء
الخلافــة
كفأهــا
|
ســـبط
النجــاد
موفــق
الأنظــار
|
|
فلــك
الجلالــة
والنبالـة
والتقـى
|
يبــدي
المحيــا
عــن
ضـياء
نهـار
|
|
ورث
المهنــا
وابــن
كعــب
وارثـاً
|
والصـــلت
مــن
أجــداده
الأطهــار
|
|
أخــذ
الامامــة
كــابراً
عـن
كـابر
|
أخـــذ
الثمــار
جــواهر
الأشــجار
|
|
عرفتــه
عاهلهــا
ومفــرق
تاجهــا
|
ولطالمـــا
لغبـــت
مــن
الانكــار
|
|
عـــاذت
بــه
فأعاذهــا
وأقامهــا
|
عمريــــة
الميـــزان
والمعيـــار
|
|
رقبتـــه
حـــتى
أمكنتهــا
نظــرة
|
أزليـــة
مـــن
نجمـــه
الســـيار
|
|
فاقتادهــا
عزمــاً
وحزمــاً
آتيــا
|
بمعـــاجز
طمســـت
عـــن
الأبصــار
|
|
زهـــراء
بيــن
الســالمي
وســالم
|
نشـــأت
وبيــن
حماتهــا
الأخيــار
|
|
لـم
تـوف
حـق
الشـكر
حـتى
استرجعت
|
صـــبراً
بفقــد
الصــابر
الشــكار
|
|
صـــبراً
إمــام
المســلمين
فــإنه
|
حكــم
علــى
كــل
البريــة
جــاري
|
|
صـبراً
فعنـك
الصـبر
والتأسـاء
يـؤ
|
خــذ
بــل
وكــل
فضــائل
الأحــرار
|
|
مــا
دامـت
الـدنيا
علـى
أحـد
ولا
|
دامـــت
علــى
الســراء
والأضــرار
|
|
عاريــــة
هــــذي
النفـــوس
ولازم
|
أن
يســـترد
العـــدل
كــل
معــار
|
|
ومـــواهب
الأيـــام
حـــرص
كلهــا
|
إذ
ســـوف
تنزعهــا
بغيــر
خيــار
|
|
ولــبئس
عيــش
ريثمــا
اســتحليته
|
كـــرت
عليـــه
غـــارة
الأغيـــار
|
|
لا
يســـتقر
لـــه
اللـــبيب
لأنــه
|
وقفــت
شــَعوبُ
لــه
ببــاب
الـدار
|
|
رأت
البصــائر
مــا
يعـاقب
عيشـنا
|
فــالرأي
أن
نحيــا
علـى
استبصـار
|
|
يـا
شـعر
أجمـل
فـي
الرثاء
فإن
لي
|
قلبـــاً
مـــن
الأحــزان
كالأعشــار
|
|
هــل
زاد
فــي
الخنسـاء
إلا
كربهـا
|
شــــعر
تـــردده
ولبـــس
صـــدار
|
|
يـا
صـبر
إن
قـر
الأحبـة
فـي
الثرى
|
فـــأثبت
لـــدي
ولا
تمــل
قــراري
|
|
لا
خــل
إلا
الصــبر
بعــد
فراقهــم
|
إن
لـــم
يزلـــه
نــازل
الأقــدار
|
|
رحـــم
الالـــه
أحبـــة
غــادرتهم
|
ولزمـــت
صـــحبة
دهــري
الغــدار
|
|
مـا
كـان
فـي
أملـي
التخلـف
بعدهم
|
والعيــش
فــي
الأشــجان
والتـذكار
|
|
لكنـــه
الحـــدثان
يطلــب
وقتــه
|
ومنيـــة
تـــأتي
علـــى
مقـــدار
|
|
عرجـوا
عـن
الدنيا
وأعرج
في
الهوى
|
شـــتان
بيـــن
قرارهــم
وقــراري
|
|
تبكيهـم
الحسـنى
إلـى
مـن
أحسـنوا
|
ويضــاحكون
الحــور
فــي
الأجبــار
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آليـــت
لا
أنفـــك
أنــدب
أثرهــم
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مـــا
دام
تــذرف
أعيــن
الأحجــار
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آســي
وأجــرح
مــا
تكــن
خـواطري
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بنــــوازع
الأحــــزان
والأكـــدار
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مــددي
بهــم
وشـفاء
قلـبي
ذكرهـم
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وبحبهــــم
يطفـــى
لهيـــب
أواري
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بحيـــاتهم
وممـــاتهم
أســـرارهم
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تـــوحي
مواهبهــا
إلــى
أســراري
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درجــوا
وجــاء
الســالمي
عقيبهـم
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يحيــي
الرســوم
بســيبه
المـدرار
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حـــتى
تــدافعت
الريــاض
نضــارة
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بالســـنة
الزهـــراء
لا
الأزهـــار
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حتـم
المصـير
لـه
إلـى
دار
البقـا
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ولنعــــم
دار
بــــدلت
مـــن
دار
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حيــا
الالــه
ضــريحه
بـالروح
وال
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ريحــــان
بالآصــــال
والابكــــار
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يــا
عـام
لا
يبعـد
فقيـد
الـدين
ط
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لاع
الثنايــــا
معقـــد
الاكبـــار
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حـــزن
علــى
حــزن
وهــول
مــدهش
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يمضــي
المــدى
والغـم
فـي
تكـرار
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يــا
عــام
لا
عــادت
لبطشـك
عـودة
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كافيـــك
منهـــا
بطشــة
الجبــار
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ارحــم
عيــال
اللّــه
قـد
حزبتهـم
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أخطـــار
ملتهـــم
علـــى
أخطــار
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يــا
عــام
أزهقــت
الديانـة
خطـة
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كالنـــــار
ذات
ذوائب
وشـــــرار
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أطفــأت
أزهــر
كــوكب
ملأ
الفضــا
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ضــــوءاً
وجئت
بظلمـــة
الأكـــدار
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ختمــت
لــه
الحســنى
ووافـى
ربـه
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متقبلاً
لمزيـــــــة
الأطهـــــــار
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عفــا
عــن
الــدنيا
خميصـاً
بطنـه
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منهـا
سـوى
مـا
كـان
سـهم
البـاري
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يــا
مــن
أجــاب
الـدعوتين
لربـه
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لـــم
لا
تلـــبي
دعــوتي
وجــواري
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لمعاهـــد
الاســـلام
بعـــدك
رنــة
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وعهــود
فضــلك
كــالنجوم
ســواري
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قدســت
مــن
غــوث
وقــدس
مشــهداً
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غبطتـــه
فيـــك
عــوالم
الأنــوار
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شــط
المـزار
مـع
الحيـاة
وويلتـا
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بعــد
الممــات
مـتى
يكـون
مـزاري
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ومــن
الســعادة
أن
أمــرغ
جبهـتي
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بعــبير
تلــك
التربــة
المعطــار
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يـــا
وافــد
الرحمــن
أيّ
كرامــة
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لقيـــت
فـــي
عـــدن
وأيّ
جـــوار
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بمنــازل
الشــهداء
ترتــع
آمنــاً
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حـــتى
رضـــيت
لخوفنــا
الكــرار
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حلقـــت
للطاعـــات
خطفــة
طــائر
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فحللـــت
مســـرح
جعفــر
الطيــار
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بعــت
الحيــاة
فنلـت
أربـح
بيعـة
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لكنهـــا
رجعـــت
لنـــا
بخســـار
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للّــه
مــا
سـنة
لـك
البشـرى
بهـا
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ولنــا
بهــا
كالنــار
فـي
اعصـار
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تأريخهـا
مـا
طـال
مـا
لحـب
الردى
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الصــبر
أحــرى
يـا
أولـى
الأبصـار
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