|
عـش
مـا
تشـاء
وراقـب
فجعـة
الأجـل
|
سينقضـي
العمـر
فـي
بطـء
وفـي
عجل
|
|
تلهــو
بتصــويرك
الآمــال
مغتبطـاً
|
وبيـن
جنبيـك
مـا
يلهـي
عـن
الأمـل
|
|
تناقلتـــك
ليـــال
غيــر
راجعــة
|
ومــا
تجاهــك
يــوم
غيــر
منتقـل
|
|
مــاذا
يغــرك
مـن
دنيـا
نضـارتها
|
نهـب
المنـون
ومجراهـا
إلـى
الزلل
|
|
قــالوا
دسائسـها
فـي
طـي
زخرفهـا
|
وقلـت
قـد
صـرحت
بالسـم
فـي
العسل
|
|
لـم
تخـف
عيبـاً
ولـم
تأخـذ
مخالسة
|
ولا
الهنــاء
بهــا
إلا
علــى
علــل
|
|
هـل
فـي
مصـارع
أجيـال
بهـم
فتكـت
|
عــذر
المحيـل
عليهـا
شـنعة
الأمـل
|
|
فمــا
التهـافت
منـا
فـي
مهالكهـا
|
جهـــل
بمـــاض
ولا
علــم
بمقتبــل
|
|
مــا
باينتــك
عواديهــا
مصــادقة
|
ولــم
تعاهـدك
أمنـاً
غـارة
الغيـل
|
|
رأي
الركــون
إلــى
آفاتهــا
سـفه
|
وصــفوها
بيــن
نــابي
مهلـك
جلـل
|
|
مـا
شـأن
صـولاتها
البقيـا
على
أحد
|
وإنمــا
أجــل
يتلــو
خطــى
أجــل
|
|
بئس
القــرارة
أهنــى
عيشـها
رنـق
|
ينتــابه
الحتــف
بالابكـار
والأصـل
|
|
انجــاز
ايعــاده
بــالموت
منتظـر
|
والقـول
عـن
مقتضـاها
غيـر
مفتعـل
|
|
مـا
أصدق
العلم
بالغدر
المشوب
بها
|
واكـذب
الظـن
فـي
التغريـر
والأمـل
|
|
خسيســة
الطبــع
بالأكــدار
طافحـة
|
ختالــة
تخلــب
الألبــاب
بالحيــل
|
|
لا
تســتقيم
لريعــان
الشــباب
ولا
|
لـرائع
الشـيب
منهـا
لحظـة
الجـذل
|
|
تضــيع
عمــر
بنيهــا
تحـت
غرتهـم
|
بهــا
وحاصــلهم
منهــا
علـى
دغـل
|
|
تــزال
تنبــت
نفســاً
ثـم
تأكلهـا
|
وإنمـــا
يحـــرث
الحــراث
للأكــل
|
|
تســعى
جنائزهــا
بجــرا
حقائبهـا
|
ممـا
انتهبـن
بحـرب
الصـبح
والطفل
|
|
مــا
بيــن
صـادرة
فـي
وجـه
واردة
|
ينتبــن
فــل
بقايــا
غـارة
الأجـل
|
|
مـا
بالنـا
ومطايـا
المـوت
تنقلنا
|
نلهـو
بمـا
قيـل
إن
العز
في
النقل
|
|
إن
الملاط
الــذي
نبنــي
البلاط
بـه
|
رفــات
مــن
نقلــت
بالأعصــر
الأول
|
|
لـو
كـان
تقـديرنا
تخليـد
قاطنهـا
|
لأوجـب
العقـل
أن
تلقـى
علـى
العلل
|
|
فكيــف
وهــي
حيــاة
لا
عتـاد
بهـا
|
مغمومــة
بالشـقا
والويـل
والهبـل
|
|
أضــحية
الحتــف
لا
ترجــو
مغـادرة
|
والأرض
تبلــع
والجـزار
فـي
العمـل
|
|
كــم
زفــرة
لنعـي
مـا
أذنـت
لهـا
|
ولا
مشـــفعة
مـــن
صـــارخ
صـــحل
|
|
زمــازم
المــوت
فـي
الأذان
صـادعة
|
لكــن
إلـى
فبـب
الألبـاب
لـن
تصـل
|
|
يــا
رب
ناديــة
مــا
جـف
مـدمعها
|
وعينهـا
فـي
نظـام
الحلـي
والحلـل
|
|
حــتى
مــتى
نحـن
والآجـال
تحفزنـا
|
والجــد
والهـزل
منـا
تـابع
الأمـل
|
|
نــرى
مصــارع
قــوم
جــل
فقــدهم
|
كفقـدنا
فـي
الملاهـي
صـالح
العمـل
|
|
نفنـي
الـدموع
ونرثـي
مـن
نظـن
به
|
ومالنــا
برثــاء
الرشـد
مـن
شـغل
|
|
كأننــا
فــي
أمــان
مـن
مصـارعهم
|
أو
المنايـا
عـن
الأحيـاء
فـي
كسـل
|
|
كلا
ولكنهــم
صــاروا
لنــا
فرطــاً
|
والركــب
مرتحــل
فـي
اثـر
مرتحـل
|
|
ومــن
تكــن
هـذه
السـاعات
أنيقـة
|
قضـى
المسـافة
لـم
يملـل
ولـم
تطل
|
|
فقـدت
نفسـي
فخلـت
الـدمع
سال
بها
|
والعهـد
بـالنفس
قبل
اليوم
لم
تسل
|
|
وليــس
بــدعا
إذا
ذابــت
بفادحـة
|
ذابـت
عليهـا
صـخور
السـهل
والجبل
|
|
حمـت
لنـا
حـزرة
لـم
تبـق
مـن
خلد
|
بغيـــر
خالــدة
الأحــزان
منفعــل
|
|
مـا
كنـت
أحسـب
أن
أحيـا
وأدركهـا
|
يــداً
تقلــد
جيـد
المجـد
بالعطـل
|
|
أبكــت
ســماء
وأرضـاً
وهـي
ضـاحكة
|
علــى
السـلامة
إن
طـالت
ولـم
تطـل
|
|
وليتهــا
حيــث
أبكــت
كـل
كائنـة
|
رقــت
بقلــب
مـن
التهويـل
منـذهل
|
|
مـاذا
نحـاول
مـن
ريـب
المنون
إذا
|
قلنـا
حنانيـك
أو
سـيري
علـى
مهـل
|
|
أبعــد
مــا
طحنــت
أجيـال
أولنـا
|
يبقـى
الأواخـر
فـي
البقيا
على
أمل
|
|
أم
بعـد
اعجالهـا
الأبـرار
تنسـفهم
|
نسـف
الزعـازع
ننهاهـا
عـن
العجـل
|
|
هيهــات
يرقــأ
دمـع
مـن
مصـائبهم
|
أو
يصـبح
الكـون
منهـم
مقفر
الطلل
|
|
أمــا
تراهـا
سـهاماً
تنتحـى
كبـداً
|
مقروحـــة
وجراحــاً
غيــر
منــدمل
|
|
لا
تـــترك
الجـــرح
الأريــث
تنكئه
|
ولا
تســـعر
قلبـــاً
غيــر
مشــتعل
|
|
نقــارع
النفـس
والشـيطان
ينصـرها
|
ومالنــا
بقــراع
المـوت
مـن
حيـل
|
|
فـي
كـل
نـاد
نـداء
المـوت
مصـطخب
|
وكـــل
دار
بهــا
دور
مــن
الأجــل
|
|
فلا
تؤســـس
صـــبراً
غيــر
معتقــر
|
ولا
نـــدافع
صــبراً
غيــر
معتقــل
|
|
لـو
دافـع
الصـبر
حزنـاً
ثـم
اذهبه
|
لكنــت
بيـن
رجـال
الصـبر
كالجبـل
|
|
لكـن
مـن
الخطـب
خطـب
لـو
يقـاومه
|
صـبر
الجليـد
انثنى
بالدحض
والفشل
|
|
فقــدت
كفـل
اصـطبار
كـان
يكفلنـي
|
فــي
النائبـات
فخـان
الآن
مكتفلـي
|
|
فليـس
بعـد
مصـاب
الـدين
مـن
طمـع
|
فـي
الصـبر
أو
جـزع
بالصـبر
منعزل
|
|
يـا
نـاعي
الدين
هل
أبصرت
من
بقيت
|
فيــه
بقيــة
رشــد
غيــر
منــذهل
|
|
غــادرت
فـي
أنفـس
الأكـوان
حشـرجة
|
فـإن
قضـى
الكـون
فاستسلم
ولا
تسلم
|
|
لا
غــرو
إن
فاضــت
الأكــوان
آسـفة
|
لفقــد
فــرد
علـى
الأكـوان
مشـتمل
|
|
يـا
نـاعي
الغـوث
هـل
لاقيت
من
خلف
|
ممــن
نعيــت
وهـل
قـدرت
مـن
مثـل
|
|
يـا
ناعيـاً
سـيد
الأبـرار
هـل
تركت
|
بـاللّه
فينا
المنايا
اليوم
من
بدل
|
|
يـا
نـاعي
القطـب
من
ذا
قام
موقفه
|
فصــار
قطـب
مـدار
العلـم
والعمـل
|
|
نعيــت
فـرداً
أم
الـدنيا
بأجمعهـا
|
إنـــي
أحــس
بــدهش
شــامل
جلــل
|
|
إنـــي
أحــس
بــدهش
غــم
كــاربه
|
حــتى
الملائك
حــتى
بــرزخ
الرسـل
|
|
تنعـى
ابـن
يوسـف
فتح
السالكين
وخ
|
تـم
الواصـلين
مربـي
الأنفـس
الكمل
|
|
محمـــداً
مـــدد
الأمــداد
روحهــم
|
مــروع
النفــس
أن
يعمـل
وإن
يقـل
|
|
مقــدس
الشــرفين
المطعـم
الجفلـى
|
كـافي
الكفـاة
المرجـى
طاهر
الخلل
|
|
مـــرزء
الأرض
خلاهـــا
وحــل
بهــا
|
لــك
السـلامة
لـم
تحلـل
ولـم
تحـل
|
|
نعــم
حللــت
قلوبـاً
لا
تـزال
بهـا
|
فـأين
أنـت
وفـي
الألبـاب
لـم
تـزل
|
|
بـل
أنـت
فـي
الرفرف
الأعلى
وغبطته
|
فـي
البشر
والروح
والريحان
والجذل
|
|
لقيــت
وعــدك
مــن
حســنى
مخلـدة
|
ونحـن
للفقـد
فـي
الأحـزان
والوجـل
|
|
يـا
خيـر
من
حل
في
الدنيا
ليصلحها
|
مـن
ذا
تركـت
لهـا
يـا
خيـر
منتقل
|
|
ناصــحت
ربــك
فــي
تعزيــز
ملتـه
|
فلتنصـح
اليـوم
نـدباً
خيـرة
الملل
|
|
قـد
كنـت
رحمـة
هـذا
الكـون
تنفعه
|
خليفــة
قائمــاً
عـن
خـاتم
الرسـل
|
|
هلا
رحمـــت
قلوبـــاً
ذاب
معظمهــا
|
حزنـاً
عليـك
وقـد
سـالت
مـن
المقل
|
|
فــاجبر
مصــابك
فينـا
إننـا
بشـر
|
فينـا
افتقـار
إلـى
أنفـاس
كل
ولي
|
|
جـــردت
نفســـك
للاســـلام
تخــدمه
|
فــي
جــد
محتســب
للهــول
محتمـل
|
|
تقــارع
الزيــغ
والأنــوار
بارقـة
|
وأنـت
فـي
نجـدة
والخصـم
فـي
فشـل
|
|
كــم
حجــة
بسـطت
بالبطـل
أيـديها
|
صـدعت
بـالحق
فيهـا
فهـي
فـي
شـلل
|
|
كــم
مشـكل
أعجـز
الأفكـار
جئت
بـه
|
صـديعة
الفجـر
نـوراً
واضـح
السـبل
|
|
كــم
معضــل
كشــفته
منــك
معرفـة
|
ذات
انبســاط
بنــور
اللّـه
مشـتعل
|
|
كـم
قـاطع
فـي
سـبيل
اللّـه
يمنعها
|
رميتـــه
بشـــهاب
منـــك
مخــتزل
|
|
كـــم
جاهــل
ملأت
ضــوءاً
بصــيرته
|
بصــيرة
لـك
تـدعى
الشـمس
بالحمـل
|
|
شـمس
المعـارف
يـا
سـلطانها
كسـفت
|
كســوف
شمســك
عـن
صـبح
وعـن
طفـل
|
|
والاســـتقامة
فــي
كســر
مزلزلــة
|
يـا
جـابر
الكسر
أدركها
على
الزلل
|
|
تمضـي
وتـترك
هـذا
الـدين
فـي
جزع
|
والأرض
مظلمــة
والــدهر
فــي
خبـل
|
|
مــن
للحنيفــة
يــا
قيامهـا
علـم
|
يهـدي
إليهـا
ومـن
يحمـي
من
الغيل
|
|
مــن
للشـريعة
قـد
قـامت
قيامتهـا
|
ومــن
يســدد
منهــا
موضـع
الخلـل
|
|
قـد
كنـت
فيهـا
مكان
الروح
في
جسد
|
وقمـت
فيهـا
مقـام
السيف
في
الخلل
|
|
مــن
للطريقـة
مـن
يصـفي
مشـاربها
|
للســالكين
كــؤوس
العــل
والنهـل
|
|
قــد
كنـت
حاديهـا
تحـدو
ركائبهـا
|
بنغمـــة
لحنتهــا
زمــرة
الرســل
|
|
رجعــت
صــوتك
فاشــتقات
معاهـدها
|
فـاليوم
تصـغي
لمـن
يـا
حادي
الابل
|
|
يــا
ذا
العلـوم
اللـدنيات
موهبـة
|
هل
أنت
في
الرمس
أم
في
حبرة
النزل
|
|
خلفــت
علمــك
فينـا
أم
رحلـت
بـه
|
إنــي
أشــاهد
نــوراً
غيـر
منتقـل
|
|
نعــم
تعقــب
نــور
أنــت
مشــعله
|
ونـور
وجهـك
فـي
الفـردوس
كالشـعل
|
|
تلـك
العلـوم
الـتي
أوعيـت
جوهرها
|
فلبــا
بحـب
جمـال
اللّـه
فـي
شـغل
|
|
مـا
زلـت
تسـبح
فـي
القرآن
ملتقطاً
|
در
المعــارف
لـم
تضـجر
ولـم
تحـل
|
|
حــتى
ملأت
مــراد
العقــل
معرفــة
|
ممــدودة
الفيـض
حـتى
لحظـة
الأجـل
|
|
وفــزت
بالســنة
الزهـراء
محتويـاً
|
علــى
الاشـارات
والتفصـيل
والجمـل
|
|
وجئت
بالــدين
والأحكــام
مكتشــفاً
|
للنقـل
والعقـل
كشـفاً
غيـر
ذي
دخل
|
|
مســتنبطاً
أوجــه
التأويـل
راسـخة
|
علــى
النصـوص
مصـونات
عـن
الزلـل
|
|
مــن
الكــواكب
فـي
عـد
وفـي
شـرف
|
وفــي
ارتفــاع
واشـراق
وفـي
مثـل
|
|
مـا
فاتـك
العمـر
لكـن
نقلـة
حتمت
|
إلــى
مقــر
وعمــر
غيــر
منتقــل
|
|
ولا
انفصـلت
عـن
الـدنيا
وقـد
وصلت
|
لــك
المعــارف
محيـا
غيـر
منفصـل
|
|
ولا
اعــتزلت
عــن
الـدنيا
لضـرتها
|
إلا
وأنــت
عــن
الــدنيا
بمعــتزل
|
|
تركــت
زخرفهــا
للغــافلين
ولــم
|
تحفـل
بهـا
فـي
مضيق
العيش
والغفل
|
|
عاملتهــا
بمــراد
اللّــه
منحرفـاً
|
إلــى
نصــيبك
مـن
عقبـاك
بالعمـل
|
|
فمــا
تقيلــت
منهــا
قـدر
أنملـة
|
ولا
أدخــرت
ســوى
الحسـنى
لمقتبـل
|
|
ولا
نظـــرت
إلــى
فتــان
رونقهــا
|
إلا
بمـا
تنظـر
المحتـال
فـي
الحيل
|
|
ولــم
تصــدك
عــن
علــم
ولا
عمــل
|
ولا
ســــرور
ولا
ســــم
ولا
عســــل
|
|
يـا
طـائراً
طـار
مـا
أضـفى
قوادمه
|
نجــوت
مــن
قفـص
فـي
حكـم
محتبـل
|
|
وقفــت
للّــه
مـن
دنيـاك
فـي
عطـل
|
فلتســرح
الآن
بيـن
الحلـي
والحلـل
|
|
أجهــدت
نفسـك
فـي
مرضـاة
خالقهـا
|
يـا
مجهـد
النفـس
اربـح
رحمة
الأزل
|
|
اربــح
فــديتك
مــا
قـدمت
مـوجبه
|
نعـم
البضـاعة
لـم
تـوزن
ولـم
تكل
|
|
أحمــد
سـراك
فقـد
أصـبحت
أن
يـداً
|
قـد
بـاركت
فيـك
لا
تكـدي
ولـم
تزل
|
|
أحمــد
ســراك
فقـد
طـالت
متـاعبه
|
وقــد
حللــت
خيـام
الحـي
فاعتقـل
|
|
قمــت
خيــراً
فلــم
تعـدم
جـوائزه
|
إن
الجــوائز
عقــبى
صـالح
العمـل
|
|
أوقـدت
نفسـك
فـي
المحـراب
مشتعلاً
|
فأســرع
الآن
نحــو
الكـوثر
اغتسـل
|
|
أوقــدتها
بالرجـا
والخـوف
معتجلاً
|
يـا
بـرد
اللّـه
مثوى
الواقد
العجل
|
|
تنحـو
المقامـات
والزلفـى
بمسلكها
|
وقــد
وصـلت
ولـولا
الجـد
لـم
تصـل
|
|
نلـت
الكرامـات
لـم
تصـدعك
منتهـا
|
عـن
الشـهود
ولـم
تعجـب
ولـم
تمـل
|
|
إن
الكرامـــات
أوثـــان
لمشــتغل
|
بهــا
عــن
اللّـه
أو
مكـر
بمشـتغل
|
|
مـا
فاتـك
الفهـم
من
مولاك
إذ
سفرت
|
لــك
الــدقائق
أن
يعمـل
وأن
ينـل
|
|
وكـــل
موهبـــة
قـــدرت
موقعهــا
|
بالشــكر
للّـه
فـي
حـزن
وفـي
جـذل
|
|
وصــبرك
الصــبر
لا
تنحــل
عروتــه
|
عنــد
البلاء
ولا
يــدنو
مـن
الفشـل
|
|
همـا
مقامـان
كنـت
العـدل
بينهمـا
|
توفيهمـا
الحـق
لـم
تبطـر
ولم
تبل
|
|
حصـرت
مـا
عنـد
أربـاب
القلوب
فما
|
مقـــام
حالــك
إلا
دولــة
الــدول
|
|
يـا
مـن
أفـات
فؤادي
الرشد
من
حزن
|
عليـه
أصـلحه
لـي
يـا
شـافي
العلل
|
|
لا
غـرو
أن
تشـفي
الألبـاب
مـن
مـرض
|
بســر
قلــب
بنــور
اللّــه
مشـتعل
|
|
أعطيــت
قلبـاً
بحـب
اللّـه
ممتزجـاً
|
لــه
التصــرف
فــي
فعــل
ومنفعـل
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فــي
قبضــة
الحـب
يطـويه
وينشـره
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فالسـر
في
الحب
لا
في
الشكل
والعضل
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أرســل
فــديتك
روحـاً
شـاملاً
أملـي
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مـن
سـر
روحـك
واجمـع
لـي
به
شملي
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فــإن
أرواح
أهــل
اللّــه
فاعلــة
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بقــوة
الحــق
لا
بالحــل
والنقــل
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لهـا
الكرامـة
فـي
الكـونين
موصلة
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فـي
القبـض
والبسـط
وصلاً
غير
منبتل
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مـا
كـان
رأيك
في
الدنيا
وقد
فقدت
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أسـرار
يمنـك
مثـل
العـارض
الهطـل
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رعيتهـــا
ووصــايا
اللّــه
آونــة
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فـانظر
رعايـاك
قـد
هامت
مع
الهمل
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خلفتهــا
ووصــايا
اللّــه
ثاكلــة
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والفضـل
والعلـم
والاسـلام
فـي
وجـل
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مــتى
أهــديء
قلــبي
مــن
تسـعره
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ورنـــة
الملأ
الأعلــى
علــى
زجــل
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يــا
حــاملي
نعشــه
مهلاً
بمحملكـم
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كيـف
احتملتـم
رزايا
الرحلة
الجلل
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تـدرون
مـن
تحمـل
الأكتـاف
ما
حملت
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مــن
بعـده
هـذه
الأكـوان
مـن
ثقـل
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سـيروا
رويـداً
فكـل
العـالمين
بـه
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دفــن
العـوالم
لا
يقضـى
علـى
عجـل
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ذروه
للأمـــر
بــالمعروف
محتســباً
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للنهـي
عـن
منكـر
قـد
عـم
كالظلـل
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ذروه
للعلــم
يجليــه
فقــد
سـقطت
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بنـا
الجهالـة
فـي
الآبـار
والـدغل
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ذروه
يقطــع
أعنــاق
الشـقاق
فمـا
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نحـن
البقيـة
غيـر
العصـبة
العـزل
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ذروه
يرجــم
شــيطان
النفـاق
فمـا
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أبقــى
مريـداً
رجيمـاً
غيـر
منجـدل
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ذروه
تبكـــي
عليــه
كــل
مكرمــة
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فإنهــا
بعــده
تحيــا
علــى
ثكـل
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ذروه
أبكــي
عليـه
مـا
حييـت
فـإن
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أمـت
بكـى
فـي
البلـى
عظمي
بلا
مقل
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ليـت
البكـاء
أفـاد
الحـي
ما
فقدت
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عينـــاه
لكنـــه
فقـــد
بلا
أمــل
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يـا
راحلاً
عـن
بنـي
الاسـلام
تـاركهم
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وللكآبـــة
فعــل
الســيف
والأســل
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ودع
معاهـــدك
الزهــراء
إن
بهــا
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غمـاً
لـو
احتـل
غمـر
البحر
لم
يسل
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ودع
رجالــك
قــد
بــانت
عقــولهم
|
إن
راجـع
العقـل
مـن
توديـع
مرتحل
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ودع
تصــانيفك
الحـق
المـبين
فقـد
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صــار
المـداد
حـداداً
غيـر
منفتـل
|
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فوامصـــاباه
إن
ودعـــت
مــرتحلاً
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ومـــا
وراءك
للاســـلام
مــن
بــدل
|
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لفــوك
فــي
كفـن
مـاذا
تريـد
بـه
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وأنـت
مـن
نـور
حـب
اللّـه
فـي
حلل
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وأودعــوك
ترابــاً
لــو
تفـوز
بـه
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حــور
الجنــان
لأفنتـه
مـن
القبـل
|
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مـاذا
الرثـاء
وفـي
القـرآن
صادعة
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تثنــي
علــى
آخــر
الأبـرار
والأول
|
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إلا
شــجياً
عقيــب
الظعــن
ينـدبهم
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ومقلــة
أوقفـت
دمعـاً
علـى
الطلـل
|
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ومـــا
رثيتــك
تــذكاراً
لمحمــدة
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خلـدت
حمـداً
وإن
كـان
الزمـان
بلي
|
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ســقى
الالــه
ربـوع
الـزاب
مـاطرة
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مــن
رحمـة
اللّـه
بالابكـار
والأصـل
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وباشـــرتك
هبــات
اللّــه
دائبــة
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بعــارض
مــن
عظيـم
الفضـل
منهطـل
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وروح
اللّــه
بالرضــوان
روحـك
فـي
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منــازل
القــرب
والاسـعاد
والنـزل
|
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وواصـل
الـروح
والريحـان
ذاتـك
في
|
أزكــى
ســلام
مــن
الرحمـن
منهمـل
|
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ونســأل
اللّــه
غفرانـاً
ننـال
بـه
|
رضــوانه
فـي
جـوار
اللّـه
والرسـل
|
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نشــكو
إليــك
ولـي
اللّـه
وحـدتنا
|
وعيشــنا
بيـن
غـل
الـدهر
والكبـل
|
|
اللّـه
اللّـه
يـا
أهـل
القلـوب
ففي
|
قلــوبكم
نظــر
الرحمــن
فـي
الأزل
|
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لا
تتركونــا
مــع
الأهـوال
إن
لكـم
|
نصـراً
مـن
اللّـه
وحيـاً
غيـر
منخذل
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خــذوا
بأيــد
قصــار
أنهـا
بكمـو
|
تطـول
وانتشـلونا
مـن
هـوى
الفشـل
|
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توجهــوا
لجمــال
اللّـه
وانتـدبوا
|
للغـوث
يـا
أوليـاء
اللّـه
فـي
عجل
|
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أيــن
انتصــاركم
والملـة
انطمسـت
|
والأمــة
التبطــت
فــي
فـخ
مهتبـل
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صــلى
الالــه
علـى
أرواحكـم
وسـقى
|
أجــدائكم
رحمــة
بـالرائث
الهمـل
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