|
مــاذا
تريـد
مـن
الـدنيا
تعانيهـا
|
أمــا
تــرى
كيـف
تفنيهـا
عواديهـا
|
|
غــداوة
مــا
وفـت
عهـداً
وإن
وعـدت
|
خــانت
وإن
سـالمت
فـالحرب
توريهـا
|
|
مـــا
خالصــتك
وإن
لانــت
ملامســها
|
ولا
اطمـــأن
إلــى
صــدق
مصــافيها
|
|
ســـحر
ومكـــر
وأحــزان
نضــارتها
|
فاحــذر
إذا
خالسـت
مكـراً
وتمويهـا
|
|
وانفــر
فــديتك
عنهــا
أنهـا
فتـن
|
وإن
دعتـــك
وإن
زانـــت
دعاويهــا
|
|
كذابـــة
فـــي
دعاويهــا
منافقــة
|
والشــاهدات
علــى
قــولي
معانيهـا
|
|
تريــك
حســناً
وتحـت
الحسـن
مهلكـة
|
يــا
عاشـقيها
أمـا
بـانت
مسـاويها
|
|
نســعى
إليهــا
علـى
علـم
بسـيرتها
|
ونســــتقر
وإن
ســـاءت
مســـاعيها
|
|
أم
عقـــــوق
وبئس
الأم
تحضـــــننا
|
علــى
غــذاء
ســموم
مــن
أفاعيهـا
|
|
بئس
القـــرار
ولا
ننفـــك
نألفهــا
|
مـا
أعجـب
النفـس
تهـوى
من
يعاديها
|
|
تنــافس
النــاس
فيهـا
وهـي
سـاحرة
|
بهـــم
وهمهــم
أن
يهلكــوا
فيهــا
|
|
يجنــون
منهـا
علـى
مقـدار
شـهوتهم
|
ومــا
جنــوه
ذعــاف
مــن
مجانيهـا
|
|
مــن
الـذي
لـم
ترعـه
مـن
طوارقهـا
|
وأي
نفــس
مــن
البلــوى
تفاديهــا
|
|
كــل
البريــة
موتــور
لمــا
فتكـت
|
لا
ثــار
يؤخــذ
لا
أنصــار
تكفيهــا
|
|
تروعهـــم
روعـــة
للحســن
مدهشــة
|
وهــي
الحبــائل
تبــديها
وتخفيهـا
|
|
مـا
أغفـل
النـاس
فيهـا
عن
معائبها
|
وإنمـــا
راقهـــم
منهــا
ملاهيهــا
|
|
وللبصـــائر
حكـــم
فـــي
تقلبهــا
|
بـــأن
عيشـــتها
فيهــا
ســترديها
|
|
غـــول
تغـــول
أشـــكالاً
حقيقتهــا
|
مكــراً
ولا
يرعــوي
عنهــا
مـدانيها
|
|
نجــري
إلــى
غايـة
فيهـا
فتصـرعنا
|
لا
بــد
مـن
صـرع
جـار
فـي
مجاريهـا
|
|
وإن
داراً
إلــــى
حـــد
نصـــاحبها
|
مــن
أحــزم
الأمـر
إنـا
لا
نصـافيها
|
|
أنــيَّ
نصــافي
الـتي
آباءنـا
طحنـت
|
والآن
تطحننــا
الانيــاب
فــي
فيهـا
|
|
أنســـتقر
علـــى
لهـــو
بلا
ثقـــة
|
ولا
أمــــان
ولا
نفــــس
تعافيهـــا
|
|
مـا
سـالمت
مـن
نـأى
عنهـا
وحاربها
|
ولا
تســـالم
قطعــاً
مــن
يــداجيها
|
|
لا
ترحــم
الطفـل
تـردى
عنـه
والـده
|
ولا
الثكــالى
ولــو
ســالت
مآقيهـا
|
|
لـم
تهـدء
الـدور
مـن
نـوح
وصـارخة
|
ولا
المقــابر
مــن
مســتودع
فيهــا
|
|
نمـــر
بــالطرق
والايتــام
تملأهــا
|
ولا
نفكـــر
فيمـــن
كــان
يؤويهــا
|
|
ونرســل
الطــرف
والأبــواب
مغلقــة
|
والــدور
فارغــة
والــدهر
يبليهـا
|
|
أيــن
الــذين
غنــوا
فيهـا
مقرهـم
|
أظنهــم
فــي
طبــاق
الأرض
تطويهــا
|
|
أيــن
الــذين
عهــدنا
أيـن
مكثهـم
|
أيــن
القـرون
لمـن
تبقـى
مغانيهـا
|
|
أيــن
الحميــم
الـذي
كنـا
نخـالطه
|
أيـــن
الأحبــة
نبكيهــا
ونرثيهــا
|
|
أيـن
الملـوك
ومـن
كـانت
تطـوف
بها
|
أو
مــن
ينازعهــا
أو
مـن
يـداريها
|
|
أيـن
الأباعـد
أيـن
الجـار
مـا
فعلت
|
بهــم
بنـات
الليـالي
فـي
تقاضـيها
|
|
لـو
أمكـن
القـوم
نطـق
كـان
نطقهـم
|
ريــب
المنـون
جـرت
فينـا
عواديهـا
|
|
عظــامهم
نخــرت
بــل
حـال
حائلهـا
|
تربـا
لـدى
الريـح
تـذروها
عوافيها
|
|
لا
شــبر
فــي
الأرض
إلا
مــن
رفـاتهم
|
فخــل
رجلــك
رفقــاً
فــي
مواطيهـا
|
|
نبنـي
القصـور
وذاك
الطيـن
مـن
جسد
|
بــال
ونحــرث
أرضــاً
مزقـوا
فيهـا
|
|
عواتـــق
النــاس
لا
ترتــاح
آونــة
|
مــن
النعــوش
ولا
يرتــاح
ناعيهــا
|
|
مــا
بيــن
غـارة
صـبح
تحـت
ممسـية
|
يراقــب
النــاس
إذ
نـادى
مناديهـا
|
|
تغــدو
وتمســي
علـى
الأرواح
حاصـدة
|
لا
ينتهـي
الحصـد
أو
تفنـى
بواقيهـا
|
|
ونحــن
فــي
أثرهــم
ننحـو
مصـيرهم
|
وجوعــة
اللحــد
تــدعونا
ونقريهـا
|
|
والعيـــن
جامــدة
والنفــس
لاهيــة
|
والــزاد
ذنـب
إلـى
عقـبى
نوافيهـا
|
|
ونهمــة
النفـس
فيمـا
تشـتهيه
طغـت
|
علـــى
الأزمـــة
والآمــال
تطغيهــا
|
|
مــا
هكـذا
عمـل
الأكيَـاس
فـانتبهوا
|
مـــن
غفلـــة
وعمايــات
نواتيهــا
|
|
حقـــاً
ولا
ســلك
الأبــرار
مســلكها
|
سـاروا
خماصـاً
مـن
الدنيا
وما
فيها
|
|
شـدوا
الحيـازيم
صـبراً
عـن
زخارفها
|
إذ
كــل
مـا
زخـترفته
مـن
مخازيهـا
|
|
لا
تحســن
الظــن
فيهــا
أنهـا
ملئت
|
غــدراً
ولا
تتبعوهــا
فــي
دعاويهـا
|
|
فــالكيس
الحـر
مـن
يقـوى
بعفوتهـا
|
علــى
الســلوك
إلــى
دار
تنافيهـا
|
|
تــدعو
حــذاراً
وتزهـو
مـن
ملابسـها
|
تـــذللاً
لجهـــول
ليـــس
يـــدريها
|
|
والمـــدركون
لمعناهـــا
رأوا
أجلاً
|
ينعـى
الركـون
إليهـا
فـي
دواهيهـا
|
|
فشــمروا
الـذيل
واسـتاقوا
نفوسـهم
|
ســوق
القلاص
ســراعاً
عــن
مراعيهـا
|
|
تعرضـــت
لهــم
فاستبصــروا
جنفــا
|
عنهــا
سـوى
بلغـة
فـي
ربهـم
فيهـا
|
|
مــاذا
يريــدون
منهـا
وهـي
شـاهرة
|
ســـيف
الملاحــم
لا
ترثــي
لأهليهــا
|
|
دســـت
شـــباك
هلاك
تحــت
زخرفهــا
|
فمــا
تــورط
فيهــا
غيــر
باغيهـا
|
|
تخفـي
الدسـائس
خـدعاً
فـي
بشاشـتها
|
لكنـــه
بـــان
للابصـــار
خافيهــا
|
|
لـم
ينـج
منهـا
سوى
المستبصرين
بها
|
ولا
توهـــق
فيهـــا
غيــر
غاويهــا
|
|
تــأثلوا
صــالح
الأعمـال
وامتثلـوا
|
بغضـاً
ولـم
يسـتقيموا
نحـو
تاليهـا
|
|
وكـــان
مــن
شــأنهم
أن
لا
تغرهــم
|
نضــارة
حشــوها
الحيــات
تغريهــا
|
|
فـروا
إلـى
اللّـه
مـن
دنيا
تجارتها
|
خســـر
وغـــم
وآفـــات
تصـــاليها
|
|
رأوا
يقينــاً
بــأن
اللّــه
حقرهــا
|
فنابــذوها
ولــم
يصــغوا
لـداعيها
|
|
وحـاربوا
النفـس
والشيطان
واجتنبوا
|
ذل
الحيـــاة
لــري
مــن
ســواقيها
|
|
تلكــم
همــوم
رجــال
نحــو
ضـرتها
|
ليســت
غضــارة
دنيــاهم
تناويهــا
|
|
أزكــى
بضــاعتهم
منهــا
قنــاعتهم
|
علــى
الكفــاء
وأن
تبقــى
لأهليهـا
|
|
تلــك
البضــاعة
لا
الأمـوال
تجمعهـا
|
وعــن
قريــب
إلـى
الـوراث
تلقيهـا
|
|
تشــقى
بمكســبها
والخصــم
يأكلهـا
|
صــفواً
يمتــع
نفســاً
مــا
يمنيهـا
|
|
دفنـت
مـن
بعـد
اخـراج
الـدفين
لهم
|
وصـــار
دفنـــك
للأعــداء
ترفيهــا
|
|
وصـرت
فـي
القـبر
مرهونـاً
بمأثمهـا
|
وفــات
نفســك
فـي
العقـبى
تلافيهـا
|
|
أعـدد
جوابـك
فـي
حيـن
الحسـاب
إذا
|
نوقشــت
كيـف
أتـت
أو
كيـف
تجريهـا
|
|
مــا
تبتغــي
مـن
حطـام
أصـله
تعـب
|
والمنتهــى
حســرة
لا
حــد
يقصــيها
|
|
كــم
تخـزن
المـال
لا
تعطـى
حقـائقه
|
تلــك
المخــازن
ملأى
مــن
مكاويهـا
|
|
مــاذا
تريــد
بجمــر
عشــت
تركمـه
|
جحيمــه
باشــتداد
الحــرص
تـذكيها
|
|
هلا
نجـــوت
ســليماً
مــن
معاطبهــا
|
فـالنفس
ميسـور
هـذا
العيـش
يكفيها
|
|
قــرص
وطمــر
وشــكر
فهــي
مملكــة
|
عظيمـــة
ملــك
كســرى
لا
يوازيهــا
|
|
هــي
الســلامة
لا
كــي
الجبـاه
بمـا
|
كنـــزت
لا
تتـــوخى
فيــه
تنزيهــا
|
|
ارفــق
بنفســك
لا
تقــوى
علـى
سـقر
|
وافـزع
إلـى
اللّـه
مـن
ذنب
سيخزيها
|
|
ارحــم
عظامــك
أن
تصــلى
بزفرتهـا
|
وخــز
البعوضــة
لـو
فكـرت
يؤذيهـا
|
|
ألا
يهولــك
مــا
قــدمت
مــن
خطــأ
|
إن
الــذنوب
ديــون
ســوف
توفيهــا
|
|
بـادر
إلـى
توبـة
تمحـو
الذنوب
بها
|
فمــا
ســوى
أوبــة
الاخلاص
ماحيهــا
|
|
بــادر
لأوبــة
نفــس
كلمــا
أدكـرت
|
قبــح
الخطيئة
نـار
الخـوف
تشـويها
|
|
وحقــق
الصــبر
واعـزم
عـزم
مصـطبر
|
فـي
حربـك
النفـس
تغنيهـا
وتطويهـا
|
|
واركب
مطايا
الليالي
في
العبادة
لا
|
تنــم
علـى
غفلـة
المغـرور
تقضـيها
|
|
لطالمـــا
شـــحنتها
منــك
منقصــة
|
شــغلاً
بــدنياك
عـن
عقـبى
سـتنهيها
|
|
يمــر
عمــرك
لا
حســنى
بهــا
رمــق
|
تجــديك
نفعــاً
ولا
شــنعاء
تنفيهـا
|
|
ولا
هـــوى
يعقــب
الأهــوال
تــدفعه
|
ولا
مراشــــد
تأتيهـــا
وتحويهـــا
|
|
تمضـي
لياليـك
صـفراً
منـك
مـن
حسـن
|
وبالفظـــائع
والحوبـــات
تزجيهــا
|
|
جلال
ربــــك
لا
تخشــــى
وســــطوته
|
وأخــذة
العــدل
حتمـاً
أنـت
لاقيهـا
|
|
لزمـــت
فعـــل
معاصـــيه
برحمتــه
|
أنعمــة
اللّــه
بــالكفران
تجزيهـا
|
|
تغــذوك
نعمــاه
يــا
بطـال
ناميـة
|
بغيــر
حولــك
فضــلاً
منــه
يوليهـا
|
|
وأنــت
تقــوى
مليــاً
فــي
مسـاخطه
|
بنعمـــة
منــه
لا
مخلــوق
يحصــيها
|
|
فــافرغ
الــدمع
إن
الــذنب
منطبـق
|
يـا
غمـة
ليـس
غيـر
التـوب
يجليهـا
|
|
مــن
مقلــة
ملأ
العصــيان
ســاحتها
|
دعهــا
مــن
الخـوف
منصـباً
عزاليـا
|
|
عســاك
تغســل
أدرانـا
بهـا
اتسـخت
|
صــحيفة
طالمــا
اســودت
نواحيهــا
|
|
وانــدب
حياتــك
فالحــدباء
باركـة
|
بعتبــة
البــاب
لا
تــردى
براقيهـا
|
|
حــامت
عليـك
المنايـا
وهـي
واقعـة
|
كيـف
الأمـان
ورأس
الـروح
فـي
فيهـا
|
|
لا
تبعــد
المــوت
وارقبــه
بـاهبته
|
واهبــة
المــوت
بــالتقوى
توفيهـا
|
|
خـذ
فسـحة
العمـر
مـن
أيـدي
بطالته
|
إن
الأمـــاني
والتســـويف
يرديهــا
|
|
إن
المنيـــة
لا
تقـــدير
يمنعهـــا
|
لهــا
جيـاد
إلـى
الغايـات
تجريهـا
|
|
الوالــدين
ونسـل
الظهـر
قـد
أخـذت
|
وأنــت
مــن
فعلهـا
فيهـم
تفاديهـا
|
|
كــم
قـد
دفنـت
وكـم
ترجـو
لتـدفنه
|
وأنـــت
نفســـك
بالآمــال
تغريهــا
|
|
كلا
ســـتهجم
عنــد
الحــد
غايتهــا
|
فليــس
يفــديك
شــاكيها
وباكيهــا
|
|
فكـر
إذا
قعقعـت
فـي
الصـدر
حشـرجة
|
هـل
أنـت
بالمـال
تلك
الحال
تكفيها
|
|
والــروح
تنسـاب
مـن
أقصـى
اكنتهـا
|
والعيــن
شاخصــة
والكــرب
يعميهـا
|
|
ملقــى
صــريعاً
وعزرائيــل
ينزعهـا
|
وغصــة
النــزع
والحلقــوم
تلويهـا
|
|
تلــك
المصــارع
لا
تــوقى
بمقــدرة
|
ولا
يحــــاول
أن
يـــوقى
ملاقيهـــا
|
|
لا
بــد
منهــا
ولا
أحكــام
تكشــفها
|
وإنمــا
الشـأن
فـي
إحسـان
تاليهـا
|
|
قــد
بيــن
اللّـه
للتقـوى
مراشـدها
|
لـم
يخـف
عنـك
هـداها
مـن
مناهيهـا
|
|
فـاثبت
علـى
خطـة
التقـوى
تفز
أبداً
|
لا
تلــق
نفســك
تهـوي
فـي
مهاويهـا
|
|
لا
تســـتخفنك
الـــدنيا
بزهرتهـــا
|
فاخســر
النـاس
فـي
أخـراه
هاويهـا
|
|
فقــد
تــبين
منهــا
فــوز
تاركهـا
|
كمــا
تــبين
منهــا
خســر
غاويهـا
|
|
وارغـب
إلـى
اللّـه
فـي
إحسان
خاتمة
|
تلقـى
بهـا
اللّـه
والرضـوان
يؤتيها
|
|
فإنمــا
بـالخواتيم
الأمـور
عسـى
ال
|
رب
الكريــم
بفضــل
منــه
يســديها
|