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علـى
توبـة
بـاللّه
هـل
أنت
عازم
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فكـل
الـذي
أسـلفت
عنـدي
جـرائم
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فشــمر
بعــزم
للمتــاب
فإنمــا
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على
قدر
أهل
العزم
تأتي
العزائم
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وإن
عظمـت
منـك
الجنايـات
إنهـا
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ستصـغر
فـي
عيـن
العظيم
العظائم
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سـيأتيك
مـن
مـولاك
مـا
هـو
أهله
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وتـأتي
علـى
قدر
الكرام
المكارم
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ويلقـاك
بالبشـرى
وتلقـاه
بعدها
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ووجهـــك
وضــاح
وثغــرك
باســم
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ونفسـك
صـنها
قبل
إلقائها
الردى
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فمــوج
الخطايــا
حولهـا
متلاطـم
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أتعــرض
عنهـا
غيـر
محتفـل
بهـا
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كأنـك
فـي
جفـن
الـردى
وهو
نائم
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علــى
أنـه
مسـتيقظ
لـك
فـانتبه
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وفــي
يـده
للقطـع
قطعـاً
صـوارم
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فلـو
كـان
هذا
الموت
فعلاً
مضارعاً
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مضـى
قبـل
أن
تلقى
عليه
الجوازم
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لكنهــــا
الآجــــال
لا
متـــأخر
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عليهـا
إذا
جـاءت
ولا
أنـت
قـادم
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ولا
بــد
منهــا
فاسـتعد
لجيشـها
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بجيـش
التقى
فهو
المعين
المقاوم
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وإن
التقــى
قسـمان
فعـل
أوامـر
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وتـرك
المنـاهي
إن
لـه
أنت
راسم
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هـي
الحسـنات
المشرقات
وكاتب
ال
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يميـن
لهـا
فـي
صـحف
فعلـك
راقم
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أو
السـيئات
السـود
يكتبها
الذي
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بيسـراك
فـانظر
مـا
به
أنت
سالم
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غـداً
ووجـوه
الخلـق
قسـمان
أبيض
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وآخــر
مثـل
الليـل
أسـود
قـاتم
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كــذا
صـحف
الأعمـال
قسـمان
آخـذ
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بيمنـاه
طـوبى
إذ
أتتـه
المغانم
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وآخــر
يعطــي
بالشــمال
كتـابه
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فيـدعو
ثبـوراً
ويلـه
وهـو
نـادم
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كــذا
كـم
الميـزان
قسـمان
كفـة
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تخـف
بمـا
فيهـا
وفيهـا
المـآثم
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ومـن
ثقلـت
منـه
المـوازين
حسبه
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ويـا
حبـذا
مـن
سـالم
وهـو
غانم
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وقسـمان
أهـل
الحشـر
ذلـك
ظـالم
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وآخــــر
مظلـــوم
لـــذاك
ملازم
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يطـــالبه
فيمــا
لــديه
وربــه
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بمـا
قـد
جنـاه
عـالم
وهـو
حاكم
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فيأخـذ
للمظلـوم
مـن
حسـنات
مـن
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غـدا
ظالمـاً
يـا
ويح
من
هو
ظالم
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فـإن
لـم
تكـن
ألقـى
عليه
ذنوبه
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وألقـاه
فـي
نار
الجزا
وهو
راغم
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وإن
دواويـــن
الـــذنوب
ثلاثــة
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تـرى
واحـداً
منها
مَحَتْها
المكارم
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واثنـان
مـا
للعفـو
فيهـن
مـدخل
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ولا
حــام
منــه
حـول
ذلـك
حـائم
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وذلــك
ديــوان
المظــالم
إنــه
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قصــاص
فتسـتوفى
هنـاك
المظـالم
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وديوان
أهل
الشرك
في
النار
أهله
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وليـــس
لهــم
إلا
الخلــود
يلازم
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فيــا
راحمــاً
للمـذنبين
سـواهم
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أَقِـلْ
عـثر
مـن
عـاثر
وهـو
نـادم
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جنـى
مـا
جنى
من
كل
ذنب
ولم
يزل
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ببحــر
الخطايـا
والمـآثم
عـائم
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ومـا
هـو
مـن
بعـد
الإِسـاءة
مقبل
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فهـل
قابـل
فـي
غـافر
لـي
راحـم
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فهـذا
مقـام
المسـتجير
أنـخ
بـه
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مطايـا
الخطايـا
تمح
عنك
المآثم
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وصــل
علـى
المختـار
والآل
بعـده
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فــإن
بهـا
حقـاً
تنـال
المغـانم
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