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يــا
مـن
إليـه
صـبوتي
تنسـب
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مــا
لــي
عـن
مـذهبكم
مـذهب
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إن
قـرر
النـاس
هـواي
غيركـم
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فلســـت
أرضــاه
وإن
ذهبــوا
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إن
عـبرت
لي
الروض
ريح
الصبا
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فإنهــا
عــن
صــبوتي
تعــرب
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إن
غنـت
الورقـاء
فـي
غصـنها
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فلحنهــا
عــن
وَلَهِــي
معــرب
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إن
طمــع
العـاذل
فـي
سـلوتي
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فإنمــــا
أســـتاذه
أشـــعب
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إن
خضـعت
فـي
دمعي
فدعني
وَقُلْ
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هــذا
الـذي
فـي
خوضـه
يلعـب
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إن
حــدت
البـارق
عـن
صـبوتي
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فصــــدقوه
فهـــو
لا
يكـــذب
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فــإنه
وافــى
إلــى
مهجــتي
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مســتجدياً
مــن
نارهـا
يطلـب
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فراعــه
ف
ضــوء
لهيــب
بهـا
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ففـــر
عنهــا
فرعــاً
يرعــب
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ضـرائباً
لـي
في
الهوى
قد
أتت
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فصــارت
الأمثــال
بــي
تضـرب
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فيــا
خليلــيَّ
أمــا
منكمــا
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مــن
يسـعد
الصـب
بمـا
يطلـب
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يســأل
إن
جـاوز
وادي
النقـا
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عــن
جيـرة
فـي
سـوحه
طنبـوا
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محــاذراً
أعيــن
عيــن
بهــا
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تنفــذ
فــي
القلـب
ولا
تحجـب
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حشاشــة
القلــب
حشــيش
لهـا
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ومــدمع
العيــن
لهــا
مشـرب
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قـد
مـر
لـي
دهـر
بهـا
حالياً
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والــبين
عنــا
نــائم
مغـرب
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ونحـــن
فــي
روض
وصــال
فلا
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نخــش
مــن
الــبين
ولا
نرهـب
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كنــا
علــى
حـل
يسـر
الهـوى
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والــدهر
فيمـا
نشـتهي
يـدأب
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فهـــب
ريــح
للنــوى
عاصــف
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مــن
بعـده
روض
اللقـا
مجـدب
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فليــت
شــعري
والمنــى
ضـلة
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هـل
بعـدنا
روض
اللقـا
مخصـب
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مــا
للنــوى
عنــدي
إلا
يــد
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بهــا
جزيــل
الشـكر
يسـتوجب
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فكــم
بــه
لاقيــت
مـن
فاضـل
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إلــى
معــاليه
العلـى
تنسـب
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مــن
عــالم
بحـر
ومـن
نـاظم
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ونـــاثر
للـــدر
إذ
يكتـــب
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ولا
كإســـماعيل
مـــن
أصــحب
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صـــفاته
كالشـــمس
لا
تحجــب
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مــن
خصـني
بـالود
غـذ
عمنـي
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إحســـانه
المتصـــل
الأطيــب
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يـا
مفـرداً
ضـجت
لسـان
الثنا
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فــي
جـامع
الفضـل
لـه
تخطـب
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تحســبني
أنســى
أخـاك
الـذي
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بــــالعلم
والأداب
يســـتجلب
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وأنتســى
الأيــام
فــي
صـعدة
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ســـقى
رباهـــا
مطــر
صــيِّب
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إذ
كنت
أجني
من
ثمارها
اللقا
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مــن
روض
أدابــك
مــا
يعجـب
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دونــك
نظمـاً
فـي
قصـور
غـدت
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أبيــاته
مــا
مثلهــا
يكتـب
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مــاذا
بـه
غيـر
ثنـائي
لكـم
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فهــو
بــه
لا
غيــر
يســتعذب
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واعـذر
فـتى
صارت
سهام
النوى
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ترميــه
مـا
عنهـا
لـه
مهـرب
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وادع
لــه
فـي
كـل
حـال
عسـى
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بفضــلكم
يقضــي
لـه
المـأرب
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لا
برحـــت
مرفوعـــة
نحــوكم
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تحيـــتي
وهـــي
بــه
تعــرب
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وابــق
ودم
فـي
نعمـة
سـالماً
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ينيلــك
الرحمــن
مــا
تطلـب
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