|
لمرســل
الصــدغ
فــي
خــديه
آيـات
|
قــــامت
بتصـــديق
دعـــواه
الأدلات
|
|
وللعـــذارى
حـــديث
صـــح
مســنده
|
إذ
خرجتــه
عــن
الخــد
الروايــات
|
|
وللجيـــــش
هلال
تـــــم
نيـــــره
|
لمـــا
أحـــاطته
للأصـــداغ
هــالات
|
|
وللثنايــــا
عــــذيب
لاح
بـــارقه
|
يـا
مـن
رأى
الـبرق
تبديه
الثنايات
|
|
وللحـــــواجب
نونــــات
معرقــــة
|
لهــا
مــن
خــال
ان
أعجمـت
نقطـات
|
|
وللــــواحظ
كـــرات
يفـــر
لهـــا
|
كـــذلك
الحـــرب
كـــرات
وفـــرات
|
|
وللمعـــاطف
أفنـــان
فنيــت
بهــا
|
وهكـــذا
الســمر
فيهــن
المنيــات
|
|
مليــك
حســن
تــراءى
فــوق
وجنتـه
|
ليـــل
وصـــبح
ونيـــران
وجنـــات
|
|
وافــت
إلينـا
بعـزم
الوسـل
مقلتـه
|
تـدعو
بـأي
حـال
فـي
الجفـن
فتـوات
|
|
بـايعته
بالحشـا
طـوع
الغـرام
فيـا
|
بشـراي
إن
صـح
لـي
فـي
العشق
بيعات
|
|
وصــرت
أرجــو
إهتــدا
قلـب
تضـلله
|
مـن
ثغـره
فـي
دجـى
الشعر
ابتسامات
|
|
أضـــلني
بثنايـــاه
ومـــن
عجـــب
|
إن
النجــوم
بــه
ترجــى
الهـدايات
|
|
مفضــض
الثغــر
فــي
دينـار
وجنتـه
|
يــا
كـم
بـدت
بعيـون
النـاس
حبّـات
|
|
مــن
ثغــره
متعـبي
بالعـدل
عنفنـي
|
فقلـت
دعنـي
فلـي
فـي
الثغـر
راحات
|
|
شــــهد
وراح
وسلســــال
وعنـــبرة
|
تفنـــد
عنهـــا
ثغـــور
لؤلؤيــات
|
|
عنهـا
الصـحاح
رواهـا
الجـوهري
فلا
|
ترتــب
فتلــك
الصــحاح
الجوهريـات
|
|
لـدن
المعـاطف
قاسـي
القلـب
قلت
له
|
مـا
فيـك
يـا
غصـن
كالغصن
انعطافات
|
|
كـــأنه
غصــن
بــان
حامــل
فلكــا
|
والبــدر
والشـمس
فـي
خـديه
زهـرات
|
|
أصــداغه
عطفــت
نحـو
الهـوى
كبـدي
|
ولـــم
أخــل
أنهــا
للعطــف
واوات
|
|
غصــن
يميــل
إلـى
الواشـي
ولا
عجـب
|
فللغصـــون
كمـــا
قــد
قيــل
ميلات
|
|
يـا
كـم
أمـالت
قسـيمات
الـدلال
وهل
|
الا
لكســـر
الحشــا
تلــك
الامــالات
|
|
وكــم
ثنــى
الفــات
الوصـل
معطفـه
|
فجئن
بـــالقطع
للأصـــداغ
همـــزات
|
|
مــا
كنــت
أعلـم
لـولا
سـحر
مقلتـه
|
أنّ
الجفــون
لهــا
كــالبيض
فتكـات
|
|
ولا
تحققـــت
لـــولا
ليـــن
قــامته
|
أن
القــدود
لهــا
كالســمر
رشـفات
|
|
مــا
صــال
أو
غـض
إلا
وارعـوت
خجلا
|
صــيد
الســرى
والظبـاء
الحاجريـات
|
|
ولا
انثنـى
أو
بـذا
إلا
لـه
واعـترفت
|
بــاللبن
والحســن
أقمــار
وبانـات
|
|
شــكل
تكــون
مــن
شــمس
ومـن
غصـن
|
لــذا
اســتدارت
لـه
الأقمـار
دارات
|
|
بـالروح
فـي
حبـه
قـامرت
حيـن
بـدا
|
مـن
وجهـه
فـي
ليـالي
الشـعر
قمرات
|
|
مضــرج
الخــد
لــدن
العطـف
تحسـبه
|
غصــنا
علتــه
مــن
الأزهــار
وردات
|
|
مكحـل
اللحـظ
صـافي
الجيـد
سـن
لنا
|
نهـــج
النفــار
وللغــزال
نفــرات
|
|
لــم
يلتفـت
لـي
بوصـف
مـن
محاسـنه
|
وللظبــاء
كمــا
قــالوا
التفاتـات
|
|
هلال
حســـن
علـــى
بانــات
معطفــه
|
لطـــائر
القلـــب
أنـــات
ورنــات
|
|
ان
مــاس
فالغصـن
بعـدوه
العـوج
أو
|
يلتــاح
فالشـمس
تعلوهـا
الخسـوفات
|
|
كــأنه
الــروض
تجلـوه
المحاسـن
أو
|
كـــأنه
البــدر
تبــديه
الكمــالات
|
|
ويلاه
مــن
ســحر
عينـه
الـتي
غزلـت
|
للصــب
ثوبــا
لــه
بالســقم
صـحات
|
|
تغـزوا
اقتـدارا
وترنـوا
عن
مخادعة
|
فهــي
العيــون
القويـات
الضـعيفات
|
|
جـــوارح
نصـــبت
أجفــان
مقلتهــا
|
علــى
انكســار
وللكســران
نصــبات
|
|
كواســـر
فتكــت
بــالقلب
إذ
وثــب
|
وللأســود
كمــا
قــد
قيــل
وثبــات
|
|
قــواهر
سـكنوا
مصـر
الحشـا
فحلـوا
|
أليــس
هــن
الحــوالي
القاهريــات
|
|
يـــا
أس
عارضــه
فــي
ورد
وجنتــه
|
هـل
زخرفـت
بـك
فـي
النيـران
جنـات
|
|
ويــا
ظــبى
لحظـه
فـي
غمـد
شـرفته
|
أمــا
أوتكــم
مــن
العشـاق
مهجـات
|
|
ويــا
قـتيلا
بسـيف
اللحـظ
زد
فرحـا
|
فللقتيـــل
بســيف
اللحــظ
فرحــات
|
|
ويــا
مــدير
الطلا
عنـي
إليـك
فلـي
|
بــدمع
عينــي
عـن
الصـهبا
صـبابات
|
|
لا
أشـــرب
الـــدمع
إلا
أن
تفنينــي
|
ورق
لهــا
فــي
ذرا
الأيـك
انتقـالات
|
|
طـورا
تنـوح
وطـوار
فـي
الأراك
لهـا
|
زجـــل
وســـجع
ونغمـــات
ونقــرات
|
|
مــن
كـل
أخطـب
مصـدوع
الفـؤاد
لـه
|
فــي
منــبر
الأيــك
صـدعات
وصـدحات
|
|
خطيــب
حــب
تــداعاه
الهــوى
فلـه
|
فـي
الليـل
نـوح
وفـي
الصـباح
أنات
|
|
تقمــص
الليــل
ثوبـا
وارتـدى
حللا
|
حيكــت
لهــا
بيــد
الأضـوا
ضـرارات
|
|
مكحــل
العيــن
مخضـوب
اليـدين
لـه
|
بالمســك
طــوق
وبالصــهبا
لثامـات
|
|
مــروع
القلــب
قــوام
علــى
قــدم
|
مفــرح
القلــب
أوهتــه
النياحــات
|
|
كـــأنه
عابـــد
فـــي
راس
صــومعة
|
لوقــع
تســبيحه
فـي
القلـب
نزعـات
|
|
أم
راهــب
فــي
أعــالي
ديـره
قلـق
|
لقــرع
ناقوســه
فــي
الليـل
رنـات
|
|
أو
ســامر
حبشــي
فــي
الـدجى
غـرد
|
علـى
لـه
فـي
أعـالي
الصـور
صـرخات
|
|
ألقــي
الســحاب
لــه
أذنـا
يسـمعه
|
حــتى
الســحاب
لــه
للطيـر
أنصـات
|
|
حيــث
الريــاض
لـه
مـن
زهـره
حمـم
|
ومـــن
ثمـــار
دواليـــه
ذؤابــات
|
|
وحيــث
ورق
الحمـى
فـي
القضـيب
قـد
|
صـدحت
وللقيـان
علـى
العيدان
صدحات
|
|
وحيــث
أوراق
أغصــان
النقــا
صـحف
|
لهــا
مــن
الطــل
أعشــار
وآيــات
|
|
وحيــث
طــي
النســيم
المــدلي
لـه
|
رســـائل
نشــرت
فيهــا
اللطافــات
|
|
وحيــث
بــان
اللـوى
بـانت
معـاطفه
|
كـــــأنهن
رمـــــاح
ســـــمهريات
|
|
وحيـث
غـدر
الربـا
انسـابت
جداولها
|
كـــــأنهن
ســـــيوف
مشـــــرفيات
|
|
وحيثمــا
الــورد
سـلطان
لـه
رفعـت
|
مــن
مونــق
الزهـر
شـطفات
ورايـات
|
|
وحيثمــا
النرجــس
المبهـوت
تحسـبه
|
صــــحاف
ورق
بــــالتبر
شمســــات
|
|
وحيـث
مبسـم
زهـر
اللـوز
قـد
لمعـت
|
بروقــه
إذ
بــدت
منهــا
ابتسـامات
|
|
وحيــث
سلسـال
هاتيـك
الميـاه
لهـا
|
بيـــــن
الخمـــــائل
دورات
وفتلات
|
|
وحيـث
عـرب
الحمـى
قـد
أرسلوا
مقلا
|
شـنت
بهـا
فـي
عقـول
النـاس
غـارات
|
|
تبســموا
ورنـوا
عجبـا
وقـد
خطـروا
|
فهـــن
زهـــر
وأغصـــان
وغـــادات
|
|
أرخــوا
ذوائبهــم
لمـا
بـدوا
فحلا
|
ســهدى
وقــد
أقمـرت
تلـك
الـدجنات
|
|
ومـا
شـهدت
شموسـا
فـي
الـدجى
طلعت
|
حـــتى
أحيلــت
عليهــن
الــذؤابات
|
|
ذوائب
صــار
لــي
مــن
ليلهـن
ومـن
|
صـــبح
المياســم
صــبحات
وغبقــات
|
|
لمــا
ســعت
خيلـت
لـي
أنهـا
لسـعت
|
مــا
تلــك
إلا
علـى
الكثبـان
حيـات
|
|
اســتودع
اللـه
فـي
أكنـافهم
قمـرا
|
لـــــه
الأضــــالع
أفلاك
وهــــالات
|
|
يـا
مـدعي
الحـب
قف
واسمع
حديث
شيح
|
لــه
علــى
طــرف
الأهــوا
اشـتمالات
|
|
أنــا
الــذي
اتبـع
العشـاق
شـرعته
|
وعنــه
قــد
ظهـرت
فـي
الحـب
حـالات
|
|
حـدث
عـن
البحـر
مـا
أبدت
جفوني
أو
|
أنقـل
عـن
النـار
من
تخفى
الحشاشات
|
|
لـي
فـي
لأسـى
والجـوى
أحـوال
متصـل
|
وفـــي
الهــوى
ومعــانيه
مقامــات
|
|
لا
عيــب
فــي
سـوى
أنـي
امـرؤ
غـزل
|
أهــوى
الجمــال
ولــي
فيـه
مقـالات
|
|
وأعشـق
الحسـن
فـي
كـل
الـذوات
ولي
|
فــي
كامــل
السـر
والمعنـى
مقـالات
|
|
كـم
بـاللوى
والطلا
والعطـف
مـر
لنا
|
بيـن
النقـا
والحمـى
والبـان
أوقات
|
|
وكـم
بلثـم
الثنايـا
والخـدود
مضـى
|
فــي
الإبريقيـن
وفـي
نعمـان
ميقـات
|
|
ســقيا
لتلـك
اللـويلات
الـتي
سـلفت
|
كأنهــا
فــوق
خــد
الــدهر
شـامات
|
|
لمــا
حلــت
صــغرت
فاسـعظمت
فلـذا
|
أقــول
يــا
حبــذا
تلــك
اللـويلات
|
|
قـد
ألحـق
الـدهر
بالماضـي
حلاوتهـا
|
كأنهــا
فــي
حواشـي
العمـر
غلطـات
|
|
مــرت
كـأن
لـم
تكـن
قضـيتها
حلمـا
|
مــا
تلــك
إلا
كمـا
قـالوا
مقامـات
|
|
يــا
ليلــة
السـفح
هلا
عـدت
ثانيـة
|
فــالعود
فيــه
لـذي
الأشـواق
لـذات
|
|
ويـا
نسـيم
الصـبا
هـل
شـمت
بارقـة
|
مــن
جـابن
الحـي
أهـدتها
الرسـالات
|
|
ويـا
مغـاني
اللـوى
هـل
تذكرين
وقد
|
غنـت
لنـا
فـي
ذرا
الأيـك
الحمامـات
|
|
ويـا
حمـام
الحمـى
كـرر
حـديثك
لـي
|
فلـــذة
الحـــب
أخبـــار
معــادات
|
|
ويـا
عريـف
النقـا
رقـوا
فقـد
لعبت
|
بصــبكم
فــي
حمـى
ليلـى
الصـبابات
|
|
مــتيم
لــو
بـراه
السـقم
ثـم
وفـى
|
منكـــم
ســـلام
لــوافته
الســلامات
|
|
ولـو
ثـوى
فـي
غيابـات
اللحـود
وقد
|
حييتمــــوه
لأحيتــــه
التحيــــات
|
|
يـا
حبـذا
زمـن
فـي
الشـعب
مـر
وقد
|
هبــت
علينــا
مـن
الـوادي
نسـيمات
|
|
وحبــذا
زمــن
الاحــرام
حيــث
حلـت
|
للمحرميــــن
بلبيـــك
المناجـــاة
|
|
وحبــذا
العيـش
فـي
أكنـاف
مكـة
إذ
|
طــابت
لنــا
بمنـى
والخيـف
سـاعات
|
|
وحبــذا
عرفــات
الخيــر
حيـث
همـت
|
بوابــل
العفــو
للعاصــي
ســحابات
|
|
وحبـــذا
حبــذا
فــي
طيبــة
زمــن
|
دارت
علينــا
بــه
للقــرب
كاســات
|
|
حيــث
الحـبيب
نـديم
والمقـام
حمـى
|
والــراح
فــي
كاسـها
نفـي
واثبـات
|
|
فشعشـعت
فـي
يـد
السـاقي
فقلـت
لـه
|
هـــذي
شـــموس
أنــارت
أو
ســلافات
|
|
مصـــونة
حجـــب
الأبصـــار
نيرهــا
|
أمــا
تـرى
الشـمس
صـانتها
الأشـعات
|
|
صــهباء
لـم
تصـحب
الأحـزان
شـاربها
|
لــو
مســها
الصـلد
مسـته
المسـرات
|
|
راح
تريــــح
مـــن
الآلام
نشـــأتها
|
كأنمــــا
هــــي
للأرواح
راحــــات
|
|
تحجبـــت
بســـنا
الأرواح
صـــورتها
|
عــن
العقــول
فأبــدتها
اللطافـات
|
|
بكــر
أرت
كــل
شــيء
فـي
مظاهرهـا
|
كأنمــــا
هـــي
للأشـــياء
مـــرآة
|
|
قـالوا
هـي
الروح
قلت
الروح
تعشقها
|
وكيــف
لا
ولهــا
منهــا
امتــدادات
|
|
قـالوا
هـي
العقل
قلت
العقل
يخدمها
|
وكـــم
عليهـــا
لواليهــا
ولايــات
|
|
قـالوا
هي
النور
قلت
النور
ما
صنعت
|
منهــا
زجاجاتهــا
الغـر
النفيسـات
|
|
قـالوا
هـي
النار
قلت
النار
تطفئها
|
بالمـا
وهـذي
لهـا
بالمـا
استعارات
|
|
قــالوا
هــي
قلــت
المـاء
برقعهـا
|
وكـــم
لهـــا
نســـجت
منهــا
غلالات
|
|
قـالوا
هي
الكون
قلت
بالكون
نشأتها
|
وكــم
لهـا
فـي
وجـود
الكـون
آيـات
|
|
قـالوا
هي
اللوح
قلت
اللوح
قد
رسمت
|
فيـــه
لأســـمائها
طـــرق
خفيـــات
|
|
قـالوا
هـي
الفلـك
الـدوار
قلت
لهم
|
يــا
كـم
عليـه
لهـا
منهـا
إحاطـات
|
|
قـالوا
هـديت
هـي
الكرسـي
قلـت
لهم
|
لنــور
مصــاحبها
الكرســي
مشــكاة
|
|
قـالوا
هـي
الفلك
الأعلى
المحيط
فقل
|
يــا
مـا
عليـه
لهـا
منهـا
احاطـات
|
|
قـالوا
هـي
العرش
قلت
العرش
مركزها
|
وكـــم
لهــا
بأعــاليه
اســتواءات
|
|
قـالوا
فصـفها
فقلـت
الوصف
يعجز
عن
|
إدراك
مــا
قصــرت
عنــه
العبـارات
|
|
قـالوا
ففيـم
تـرى
حسـنا
فقلـت
لهم
|
فــي
كــل
شــيء
تـراءت
وهـي
مـرآة
|
|
فلـــو
علــى
أكمــة
دارت
لأبصــرها
|
فـي
الكـون
وانكشـفت
عنـه
العمايات
|
|
ولــو
إلــى
مقعـد
زفـت
لقـام
علـى
|
الأقــدام
يســعى
ولـم
تقعـده
آفـات
|
|
ولـو
علـى
الصـم
يتلـى
حـزب
سورتها
|
لأســـــمعتهم
معانيهـــــا
التلاوات
|
|
ولــو
إلــى
أخـرس
ألقـوا
صـحيفتها
|
للـذ
فـي
السـمع
مـن
فحـواه
نغمـات
|
|
ولــو
علــى
دنــف
هبــت
نســيمتها
|
لأبرأتـــه
ولـــم
تســـقمه
عاهــات
|
|
بهـــا
لآدم
هــب
العفــو
وارتفعــت
|
بهــا
لإدريــس
فـي
العليـا
مقامـات
|
|
وألبســت
شــيت
مــن
أثوابهـا
حللا
|
كمــا
بنــوح
بهــا
صــحت
إجابــات
|
|
وألحقــت
صــالحا
بالصــالحين
وكـم
|
أهــدت
لهــود
حروفــا
هــن
آيــات
|
|
وخصصــت
لــوط
بالتأييــد
وانتشـرت
|
علــى
الخليــل
بهـا
للصـدق
رايـات
|
|
وللذبيـــح
أبـــانت
رشــده
فنجــا
|
وكــم
بهــا
اســتحق
حفتـه
عنايـات
|
|
وآنســت
يوســفا
فـي
الجـب
واتضـحت
|
بهـــا
لعيقــوب
هاتيــك
الإشــارات
|
|
وقــد
ألانــت
لــداود
الحديـد
كمـا
|
بهـــا
لســـليمان
خصـــته
ولايــات
|
|
وأنقــذت
يونســا
لمــا
أنـاب
وكـم
|
بهـا
لـذي
الكفـل
قـد
عـدت
كرامـات
|
|
وقـد
هـدي
اليسـع
الزاكـي
بها
ولكم
|
بهــا
للقمــان
قــد
صــحت
مقـالاتن
|
|
وشــاهد
الخضـر
معناهـا
فهـام
وكـم
|
بهــا
أبيــح
لـذي
القرنيـن
خيـرات
|
|
وكــم
تزكــى
بمعناهــا
شـعيب
كمـا
|
لــذت
لموســى
بهـا
تلـك
المناجـاة
|
|
وأيّــدت
يوشــعا
بالشــمس
وارتفعـت
|
عـــن
العزيــز
وهــارون
الملامــات
|
|
ونــول
إليـاس
ومـن
راوونهـا
قـدحا
|
بـــه
لأيــوب
قــد
وافــت
ســعادات
|
|
وبشـــرت
زكريـــا
الحصـــور
وكــم
|
وكـم
قـامت
لعيسى
بها
إذ
شاء
أموات
|
|
وللحـــبيب
تجلـــى
وجههــا
فبــدت
|
للشـــكر
منـــه
ركوعــات
وســجدات
|
|
محمــد
أحمــد
خيــر
الأنــام
ومــن
|
خصــته
فــي
الـذكر
أوصـاف
شـريفات
|
|
طـه
أبـو
القاسـم
المختـار
من
شرفت
|
بــه
البســيطة
والســبع
الســموات
|
|
الحاشـر
العـاقب
الماحي
الذيب
محيت
|
عــن
الــورى
بمواضــيه
الغوايــات
|
|
الفاتـح
الخـاتم
الطهـر
الـذي
ختمت
|
بـــه
النبـــوءة
فضــلا
والرســالات
|
|
الظـاهر
البـاطن
النـور
الـذي
بهرت
|
أنــواره
فــانجلت
عنــا
العمايـات
|
|
الأكـرم
الرحمـة
العظمـى
الـذي
رحمت
|
بـــه
البريـــة
أحيـــاء
وأمــوات
|
|
الأحلـم
العـروة
الـوثقى
الـذي
عظمت
|
بـــه
المقامــات
فضــلا
والمقــالات
|
|
روح
العـــوالم
مبــد
روح
نقطتهــا
|
نجــم
الهـدى
نشـأت
منـه
السـعادات
|
|
إكسـير
كنـز
المعـالي
عنـد
جوهرهـا
|
فمجـــده
الـــدر
والأكــوان
لبــات
|
|
ذات
الجمــال
جمــال
الـذات
عنصـره
|
مصــباح
نــور
لـه
الجثمـان
مشـكاه
|
|
نـــور
الجلال
جلال
النـــور
طينتــه
|
يـا
كـم
سـقتها
مـن
التسـنين
فيضات
|
|
عيــن
الكمـال
كمـال
العيـن
جـوهره
|
فـرد
لـذا
لـم
تكـن
فيـه
انقسـامات
|
|
أزج
أبلــج
أقنــى
الأنـف
قـد
بسـمت
|
منـه
عـن
اللؤلـؤ
الرطـب
الثنايـات
|
|
محبــب
الثغــر
حلـو
الشـكل
منطقـه
|
عنــه
الفصــاحة
تــروى
والبلاغــات
|
|
مضــرج
الخــد
لــدن
القــد
تحسـبه
|
غصــــنا
تفتـــح
فـــي
أعلاه
وردات
|
|
أر
أشــب
ســاجي
الطــرف
لـو
فرضـت
|
ملاحـــه
مـــا
تعـــدته
الملاحـــات
|
|
أشـم
أحـرى
شـريف
النفـس
قـد
خضـعت
|
لــترب
أفعــاله
الشــم
الرفيعــات
|
|
عبــل
الــذراع
نــدي
الكـف
ملتفـت
|
عـن
جيـد
ظـبي
خلـت
منـه
التفاتـات
|
|
ضــخم
الكـرادس
رحـب
الصـدر
منعطـف
|
عـن
عطـف
بـان
زهـت
منـه
انعطافـات
|
|
زاهـي
الجـبين
سـواء
الصـدر
تعضـده
|
حلاوة
مزجـــــــت
فيهــــــا
طلاوات
|
|
مكمــل
الـذات
زاكـي
النفـس
معتـدل
|
زكــت
بمعنــى
حلاه
النفــس
والـذات
|
|
لا
حســــن
إلا
ومنـــه
يســـتمد
ولا
|
بــدر
فللبــدر
بالشــمس
امتـدادات
|
|
كــأنه
الشــمس
تعلــوه
الجلالـة
أو
|
كـــأنه
البــدر
تبــديه
الكمــالات
|
|
خلاصـة
الحـق
خيـر
الخلـق
مـن
شـهدت
|
لـــه
الوحــوش
وحيتــه
الجمــادات
|
|
لــولاه
لــم
تكــن
الـدنيا
وضـرتها
|
لـــولاه
لــم
تــك
نيــران
وجنــات
|
|
لــولاه
لـم
تسـر
فـي
الآفـاق
داجنـة
|
لـولاه
لـم
تـزه
فـي
الأرض
النباتـات
|
|
لـولاه
مـا
لمعـت
فـي
الغيـم
بارقـة
|
لــولاه
لـم
تسـكب
القطـر
النباتـات
|
|
لــولاه
مــا
طلعــت
فينــا
شموســه
|
لــولاه
مــا
انكشــفت
عنـا
الضـلالات
|
|
لــولاه
مــا
كــان
نجــم
لا
ولا
فلـك
|
ولا
وهــــاد
ولا
غــــور
وأكمــــات
|
|
ولا
أنـــــاس
ولا
جــــن
ولا
ملــــك
|
ولا
ســــــماء
ولا
أرض
وأنبــــــات
|
|
ولا
صــــباح
ولا
ليــــل
ولا
ســــحر
|
ولا
شــــموس
وأقمــــار
وروضــــات
|
|
ولا
حــــروف
ولا
لــــوح
ولا
قلــــم
|
ولا
معــــان
ولا
لفــــظ
وأصــــوات
|
|
ولا
صـــــلاة
ولا
صــــوم
ولا
نســــك
|
ولا
زكــــاة
ولا
محــــو
وإثبــــات
|
|
فـاق
الـورى
فـي
مقامات
الكمال
وكم
|
بـدت
لـه
فـي
مجـاري
السـبق
غايـات
|
|
تجمعــت
فيــه
أوصـاف
الجمـال
كمـا
|
تفرقـــت
فـــي
معــانيه
الكمــالات
|
|
أراده
اللـــه
محبوبـــا
لحضـــرته
|
فكــــــان
ذاك
وللّــــــه
الإرادات
|
|
دعــاه
فــي
ليلـة
المعـراج
خـالقه
|
لحضـــرة
حضــرت
فيهــا
الســعادات
|
|
وسـار
مـن
فرشـه
فـوق
الـبراق
إلـى
|
عـــرش
أحــاطته
للبــارى
عنايــات
|
|
وأم
بالرســـل
والأملاك
ثـــم
رقـــى
|
مرقــى
لـه
العـز
والتأييـد
مرقـاة
|
|
وصــار
مخترقــا
حجــب
الجلال
إلــى
|
أن
شـــرفته
يــا
عبــدي
الإضــافات
|
|
وكــان
قــاب
أو
أدنـى
حيـن
خـاطبه
|
فــي
مشــهد
رفعــت
عنـه
الحجابـات
|
|
وشــاهد
اللـه
جهـرا
واصـطفاه
بمـا
|
لــم
تحـو
تعـبير
معنـاه
العبـارات
|
|
وخصـــه
بـــأمور
ليـــس
يحصـــرها
|
عــد
ولــو
كــثرت
فيهـا
الحسـابات
|
|
نـاداه
سـل
تعـط
أو
قـل
يستمع
كرما
|
واشــفع
فلـولاك
لـم
تـرج
الشـفاعات
|
|
وعــاد
فــي
ليــل
مســراه
لمضـجعه
|
والأفــق
لــم
تنكشـف
عنـه
الـدجنات
|
|
مــن
هـزّ
إيـواه
كسـرى
عنـد
مولـده
|
مـــن
الســرور
وللفروحــات
هــزات
|
|
ومــاء
ســاوة
لـم
ينضـب
سـوى
جـزع
|
إذ
لـم
تسـل
منـه
فـي
البطحا
وديات
|
|
ونــار
فــارس
لــم
يخمــد
تلهبهـا
|
حــتى
رمـت
جنهـا
الشـهب
المبيـدات
|
|
يـا
كـم
بـه
بشـر
الكهـان
وارتقبوا
|
بــزوغ
نجــم
لنــا
منــه
انفعـالات
|
|
فهـو
الشـفيع
الحـبيب
المصطفى
كرما
|
مـن
لـم
تحـد
عـن
معـاليه
السيادات
|
|
وهـو
الـذي
كـان
قبل
الكون
فاحر
به
|
بدايـــة
حصــرت
فيهــا
النهايــات
|
|
وهــو
الـذي
أمـن
الجـاني
وروع
مـن
|
خطــت
عليــه
مــن
اللـه
الشـقاوات
|
|
وهو
السراج
المنير
المستضاء
به
لذا
|
ك
زيــــح
بــــه
ظلـــم
وظلمـــات
|
|
وهــو
الـذي
سـبحت
فـي
وسـط
راحتـه
|
صــم
الحصــى
ولــه
قـد
درت
الشـاة
|
|
وهـو
الـذي
مـا
مشـى
فـي
حرهـا
جرة
|
إلا
وقتـــه
مــن
الرمضــا
غمامــات
|
|
وهـو
الـذي
أنبـع
السلسـال
مـن
يده
|
وكــم
بــه
خرقــت
للخيــر
عــادات
|
|
وهــو
الــذي
أبـرأ
الأعمـى
بنفثتـه
|
وكـم
بهـا
شـفيت
فـي
الخلـق
عاهـات
|
|
وهـو
الـذي
عـاد
جلال
الغـاب
في
يده
|
ســيفا
تقــط
بــه
للكفــر
هامــات
|
|
وهـو
الذي
استنطق
العجمي
وحن
له
ال
|
جــذع
اليســير
وجــاءته
السـحابات
|
|
أعــاد
ملــح
أجــاج
المـا
بنفثتـه
|
عـذبا
سـواغا
لـه
فـي
الشـرب
لـذات
|
|
وأوقــف
الشـمس
يـوم
الأربعـاء
كمـا
|
قــد
ردهـا
حيـن
أقصـتها
المـوارات
|
|
وأنقــذ
الظبيـة
الغـراء
حيـن
شـكت
|
مــا
أضــرمته
بأحشــائها
الحبـالات
|
|
وردّ
شــق
خــبيب
كيــف
كــان
وفــي
|
راح
ابــن
عفــراء
للمرتـاب
راحـات
|
|
فـي
الكتـب
والصـحف
والألـواح
لاح
له
|
أمـــر
غريـــب
وأحـــوال
بــديعات
|
|
وفـي
الصـبا
والحيـا
والانشـقاق
وفي
|
الأســرار
وفـي
الغـار
آيـات
جليـات
|
|
وفـي
البعيـر
وفـي
المولـود
معتـبر
|
لمهنّـــد
لـــم
تشـــككه
الخيــالات
|
|
وفــي
الـذراع
وشـاة
الـذئب
مسـتند
|
لمخـــبر
نقلـــت
عنــه
الروايــات
|
|
وفـي
الكـثيب
وفـي
در
العنـاق
وفـي
|
شــــاة
أم
معبـــد
أســـرار
جليلات
|
|
وفـــي
قتــادة
والعرجــون
معتمــد
|
لمبصــر
عنــه
لــم
تخــف
الإشـارات
|
|
وفـي
الصـواع
وفضـل
الـزاد
ما
خرقت
|
فيـــه
عـــوائد
وانكفــت
مجاعــات
|
|
وفــي
مــراودة
الشــم
الجبـال
لـه
|
وفـــي
الكنـــوز
لـــذي
الأرا
أدلات
|
|
وفـي
ركانـة
مـا
لـم
يخـف
عنـك
وفي
|
أهـل
القليـب
وقـد
بـاءوا
اعتبارات
|
|
وقصـــة
الضـــب
والصــياد
دامغــة
|
لـــراس
كــل
جحــود
فيــه
إعنــات
|
|
وفــي
ولادتــه
مــا
قـد
قضـى
عجبـا
|
لمــن
لــه
ظهــرت
تلــك
العلامــات
|
|
وفـــي
حليمــة
إذ
جــاءت
لترضــعه
|
وأم
أيمـــن
قـــد
بــانت
إمــارات
|
|
وفــي
خديجــة
والزهــراء
ووالـدها
|
وفــي
البنيــن
وفــي
الأزواج
آيـات
|
|
وفــي
حنيــن
وفــي
بـدر
وفـي
أحـد
|
وفـــي
مريســـيع
أحــوال
عظيمــات
|
|
وفــي
قريظــة
والأحــزاب
كـم
ظهـرت
|
وفــي
تبــوك
لــه
بالفتــح
حــالات
|
|
وفـي
الحضـير
ويـوم
الطـائف
انتصرت
|
أعلامــــه
وانجلـــت
للكفـــر
ليلات
|
|
وفـي
الوفـود
خصوصـا
بنـت
حـاتم
ما
|
قضــت
بــه
عجبــا
تلــك
الوفـودات
|
|
سـهم
نضـا
في
سما
الهيجا
بشموس
ظبا
|
لهــــا
الجمـــاجم
أفلاك
مـــدارات
|
|
قــامت
لمبعثــه
الـدنيا
علـى
قـدم
|
وانهـــد
للشــرك
أركــان
وأبيــات
|
|
وكــم
بــه
صــلحت
واللــه
مفســدة
|
وكــم
بــه
كشــفت
واللــه
أزمــات
|
|
وكــم
بــه
خــذلت
للشــرك
صــائبة
|
وكــم
بــه
أيــدت
للــدين
دعــوات
|
|
وكــم
بــه
طــويت
للزيــغ
مرتبــة
|
وكـــم
بــه
نشــرت
للحــق
رايــات
|
|
أي
النــبيئين
لمـا
إن
قضـوا
قضـيت
|
وآيــة
لــم
تــزل
فهــي
المنيـرات
|
|
يبلــي
الزمــان
ولا
تبلــى
مآثرهـا
|
فهـي
البـواقي
الجديـدات
العديـدات
|
|
أقــــام
للــــدين
آراء
مقومــــة
|
لشــبهها
فــي
مجـاري
الهـدي
جـولات
|
|
وأمــن
الأرض
بعــد
الخــوف
فاتسـعت
|
حــتى
تلاعــب
فيهـا
الـذئب
والشـاة
|
|
إن
طـال
أو
جـال
فـي
يومي
ندى
وردى
|
فالنــاس
أكيــاس
والأغمــاد
هامـات
|
|
أو
عبــس
الحـرب
وافـى
وهـو
مبتسـم
|
يــولي
المكافـات
والـدنيا
مكافـات
|
|
مـا
أرعـدت
فـي
سـما
الهيجا
بوارقه
|
إلا
همــت
بالــدما
منهـا
الجراحـات
|
|
ولا
اسـتغاث
العـدا
في
النقع
من
ظمإ
|
إلا
ســـقتهم
عزاليهـــا
الرزيـــات
|
|
رمـت
أعـادي
الهـدى
عـن
قـوس
عزمته
|
ســـهام
رأي
لهــا
فيهــم
غصــابات
|
|
وأعمـل
السـيف
فيهـم
فاغتـدوا
جزرا
|
فــي
كــل
جارحــة
منهــم
جراحــات
|
|
حـاقت
بهـم
سـيئات
المكـر
إذ
مكروا
|
لــذاك
ضــاقت
بهــم
بيــد
فسـيحات
|
|
لبيضــــه
وأيــــاديه
إذا
عملـــت
|
يــوم
النـدى
والـردى
محـو
وإثبـات
|
|
هـي
المواضـي
فـإن
جردتهـا
انقلبـت
|
حــروف
جــزم
لهــا
بالفتـح
نصـبات
|
|
وهـــي
الــبروق
إذا
مــا
شــيمتها
|
تنهــل
منهــا
الأمــاني
والمنيــات
|
|
ليـث
يقـود
إلـى
الهيجـا
ليـوث
وغى
|
صـارت
لهـم
بالظبـا
والسـمر
غابـات
|
|
مـن
كـل
شـهم
إذا
تبـدو
الكمـاة
له
|
ينقــض
كالنســر
تــدعوه
الفريسـات
|
|
لا
يرتضــون
ســوى
ديــن
الإلــه
ولا
|
يخشــون
إن
أحيلــت
للكفــر
غيطـات
|
|
فهـم
هـم
مـا
هـم
إن
رمـت
تسـأل
عن
|
أوصــافهم
فهــم
الشــهب
المنيـرات
|
|
المــانعون
بـبيض
الهنـد
يـوم
وغـى
|
حمـى
أولـي
الـدين
إن
تغشـان
غارات
|
|
والمعجمــون
حـروف
الجسـم
إن
كتبـت
|
رمـــاحهم
صــحفا
فيهــا
البليــات
|
|
والملبســون
ثيــاب
الــذل
كـل
كـم
|
صــبت
عليهــم
لهــم
بيــض
عربــات
|
|
الســادة
الصـيد
مـن
أنبـا
بوصـفهم
|
نــص
الكتــاب
فهــم
صــيد
وسـادات
|
|
رجـال
صـدق
وفـوا
اللـه
مـا
عهـدوا
|
فهــم
أولـوا
الحـق
أحيـاء
وأمـوات
|
|
أشــــدة
رحمـــاء
طيبـــون
لهـــم
|
فــي
الــذكر
واللــه
أوصـاف
جميلات
|
|
شـــم
كمـــاة
دعــاة
أبحــر
ســحب
|
صــيد
صــدور
حمــاة
الحـرب
قـادات
|
|
زهـــر
هـــداة
عيـــون
أنجــم
درر
|
غــر
كــرام
ســراة
الحــي
ســادات
|
|
سـادوا
بصـحبة
مـن
سـاد
الورى
ونمت
|
بهــم
لــذا
الفخـر
أنسـاب
عريقـات
|
|
مـن
مثـل
شيخ
التقى
الصديق
من
صدقت
|
ألفــــاظه
ومعــــانيه
الجليـــات
|
|
أو
مثـل
نجم
الهدى
الفاروق
من
فرقت
|
منــه
الشــياطين
واعــتزت
ديانـات
|
|
أو
مثـل
عثمـان
ذي
النورين
من
شهدت
|
فـي
الـدار
أحـواله
الغـر
النفيسات
|
|
أو
مثـل
حيـدر
بـاب
العلـم
من
عظمت
|
فـي
الخلـق
أوصـافه
الزهـر
المنيات
|
|
أو
مثــل
عميـه
أو
سـبطيه
فـي
شـرف
|
وكيـــف
وهـــم
منـــه
امتـــدادات
|
|
أو
مثــل
أزواجــه
أو
مثــل
عـترته
|
هيهــات
أيــن
الــدراري
والـدجنات
|
|
أو
مثــل
أصــحابه
والتـابعين
وقـد
|
سـمت
بهـم
فـي
سـما
العليـا
مقامات
|
|
يـا
غـافلا
لـم
يفـق
مـن
سـكر
غفلته
|
نبــــه
حجــــاك
فللغفلات
حســـرات
|
|
ويـا
نؤومـا
عـن
الأمـر
المـراد
أفق
|
مـــن
المنـــام
فللنـــوام
هبــات
|
|
ويـا
ضـليلا
عـن
النهـج
القـويم
أما
|
هــــدتك
للمقصــــد
الأســـنى
دلالات
|
|
ويــا
طريــدا
أرى
الخــذلان
يقعـده
|
أمـــا
أقامتــك
للتوفيــق
عزمــات
|
|
ويــا
حريصـا
علـى
الأمـوال
يجمعهـا
|
خفـــض
عليـــك
فللمــال
انتقــالات
|
|
ليــس
البعيـد
الـذي
أقصـته
ثروتـه
|
بـــل
البعيــد
الــذي
أقصــته
زلات
|
|
لا
تطمئن
لـــدنيا
قابلتـــك
بمـــا
|
تريــد
منهــا
فللــدنيا
انقلابــات
|
|
هــي
الغــرور
فلا
تــأمن
كواســرها
|
فقـــد
فرســن
وللصــيد
افتراســات
|
|
مــاذا
الركــون
لـدار
رسـمها
خـرب
|
وللـــدرى
فـــي
مجاريـــك
مجــالات
|
|
دار
مــتى
أضــحكت
أبكــى
تقلبهــا
|
وهكـــذا
الــدهر
تــارات
وتــارات
|
|
إلـى
مـتى
أنـت
يـا
مغـرور
تمرح
في
|
مهـــامه
نصـــبت
فيهــا
الحبــالات
|
|
كيــف
المقــام
بــوكر
طيـر
حـادثه
|
لــه
إلــى
الركــن
عـودات
وروحـات
|
|
أمـا
تـرى
الشـيب
قـد
أبـدت
عساكره
|
طلائعـــــا
قــــدمتهن
المنبــــات
|
|
هــو
النــذير
فحـاذر
أن
يغـرك
مـا
|
يلهيـــك
عنـــه
فللآجـــال
ميقــات
|
|
فراجـع
العقـل
وارم
الجهـل
عـن
عرض
|
ففــي
النهـى
لـذوي
الأهـوا
نهايـات
|
|
وارجـع
إلـى
الله
واجبرما
أضعت
وتب
|
ففــي
المتــاب
مــن
الآثـام
منجـاة
|
|
وقف
على
الباب
واذر
الدمع
واصف
وسل
|
بالهاشــــمس
توفيــــك
الإجابـــات
|
|
فهـو
الشـفيع
إذا
ضـاق
المقـام
لـم
|
تنجــع
مقــام
ولــم
تنفــع
مقـالات
|
|
جــبر
الكسـي
مجيـر
المتسـتجير
بـه
|
غــوث
الطريــد
إذا
أقصــته
نكبـات
|
|
عــز
الحقيــر
مجيـب
السـائلين
لـه
|
كنــز
الفقيــر
إذا
أعيتــه
فاقـات
|
|
مـا
رامنـي
الـدهر
خسفا
واستغثت
به
|
إلا
نجــــوت
ووافتنــــي
مــــبرات
|
|
ولا
عصــاني
زمــاني
والتجــأت
لــه
|
غلا
أطــــاع
وحفتنــــي
عنايــــات
|
|
ولا
تكـــاثف
ســقمي
واحتميــت
بــه
|
إ
لاشــــفيت
وعمتنـــي
المعافـــاة
|
|
فهــو
الكريــم
الـذي
يممـت
سـاحته
|
فيممتنــــي
أيـــاديه
الكريمـــات
|
|
وهــو
الجـواد
الـذي
مـا
أمـه
لهـف
|
إلا
وجـــادته
مــن
جــدواه
مزنــات
|
|
وهــو
البشـير
الـذي
مـا
أم
وجهتـه
|
ذو
حــــزن
إلا
وأمتـــه
المســـرّات
|
|
وجهــت
وجــه
مــديحي
نحــو
وجهتـه
|
فصــح
لــي
منــه
جاهــات
ووجهــات
|
|
ذو
الجــود
كــم
راش
مـداحا
وطـوقه
|
فلا
يـــزال
لـــه
بالشــكر
ســجعات
|
|
خــدمته
بمديــح
كــي
أجــاز
وهــل
|
إلا
علـــى
مــدحه
ترجــى
الإجــازات
|
|
ومــن
يـرى
المـدح
فـي
طـه
تجـارته
|
يفــز
بربــح
بــه
تزكـو
التجـارات
|
|
عمــت
أيــاديه
كـل
المـادحين
وكـم
|
وفــت
لهــم
مــن
أيــاديه
مجـازات
|
|
أمـا
تـرى
كعـب
إذ
أنشـا
سـعاد
وفى
|
مرقــى
الكــرام
وعمتـه
السـعادات
|
|
كــذاكَ
حســان
فـي
عـدن
رقـى
غرفـا
|
بالمــدح
فيــه
وحفتــه
العنايــات
|
|
فحســـب
مملــوكه
جهــد
اســتطاعته
|
وأن
يكـــون
لــه
فيــه
امتــداحات
|
|
حاشــا
مكــارمه
أن
يقــص
ذا
مــدح
|
لــه
علـى
البـاب
بالتطفيـل
وقفـات
|
|
أو
يرجــع
المــدح
كلا
مــن
عطيتــه
|
وهــو
الــذي
ترتجـى
منـه
العطيـات
|
|
ومـا
عسـى
يبلـغ
المـداح
فيـه
وقـد
|
جــاءت
بمــدحته
فــي
الـذكر
آيـات
|
|
لكــن
تطفلــت
فـي
مـدحي
عنـه
ومـا
|
خــاب
امــرؤ
يممتــه
منــه
مـدحات
|
|
ومنــذ
أعملــت
فــي
أوصـافه
فكـري
|
هبــت
علــيّ
بهــا
للعفــو
نســمات
|
|
فقــام
عنــي
لســان
الحــب
يشـكره
|
بالمــدح
والشــكر
للنعمـا
وقايـات
|
|
بشـراك
يـا
مـن
غـدا
فـي
حبه
كلفها
|
أن
قــد
أحاطتــك
للمــولى
رعايـات
|
|
وليهنكـم
يـا
بنـي
الأمـداح
أن
لكـم
|
بــــه
أعــــدّ
عطيــــات
ســـريات
|
|
يـا
أكـرم
الخلق
يا
أوفى
الورى
صلة
|
حســبي
امتــداح
آثــارته
المحبـات
|
|
أو
ليتنـي
فـي
الكـرى
رحبا
أمنت
به
|
ممـــا
أخـــوفه
والخيـــر
عــادات
|
|
يـا
أعظـم
النـاس
قـدراً
مشـتكي
كمد
|
عـــدته
دونـــك
حاجـــات
مجيحــات
|
|
يـا
أصـبح
النـاس
وجهـا
عج
علي
بما
|
أرجــو
فقــد
سـودت
وجهـي
الخطيـات
|
|
يـا
أجـود
النـاس
كفـا
جـد
علي
فلي
|
علــى
شــفاعتك
العظمــا
اعتمـادات
|
|
يـا
أرأف
النـاس
قلبـا
مـن
إليّ
فلي
|
قلــب
عرتــه
لعصــياني
القســاوات
|
|
يـا
أوسـع
الرسـل
جاهـا
إننـي
دنـف
|
قــــــد
أوبقتنــــــي
أوزار
وزلات
|
|
أنــا
الغريـب
الـذي
أقصـاه
مؤنسـه
|
أنــا
الكئيــب
الـذي
سـاءته
حـالات
|
|
أنــا
الضــليل
إلــي
حـارت
أدلتـه
|
أنــا
العليــل
الـذي
أعيتـه
صـحات
|
|
مـا
حيلتي
وما
اعتذاري
إن
سئلت
وقد
|
أحنـــت
ضـــلوعي
آثـــام
عظيمــات
|
|
أم
كيـف
حـالي
ولـم
أحتـل
لمنقلـبي
|
مــا
شــاء
كــان
وللــه
المشـيئات
|
|
لكـــن
ظنــي
جميــل
بــالإله
ومــن
|
يحســـن
الظــن
تكنفــه
الرعايــات
|
|
يـا
أرحـم
الراحميـن
العفـو
من
لغو
|
لـم
يـرو
عنـه
لـداعي
الخيـر
إنصات
|
|
يـا
أرحـم
الراحميـن
العفـو
من
لعم
|
قــد
زحزحتـه
عـن
الرشـد
الغوايـات
|
|
يـا
ألطـف
اللطفا
ألطف
بي
فقد
رشقت
|
ســهام
وزر
لهـا
فـي
القلـب
فتكـات
|
|
يا
أحلم
الحلما
أكشف
ما
اعترى
بصري
|
فقــد
تــوالت
علــى
لحظـي
غشـاوات
|
|
يـا
أكـرم
الكرما
اختم
بالرضا
عملي
|
فقــد
تـوالت
علـى
هلكـي
الجنايـات
|
|
يــا
رب
واكلا
أميـر
المـؤمنين
أبـا
|
عمـرو
الرضـا
مـن
بـه
ترعى
الخلافات
|
|
واعضـده
بالنصـر
والفتح
المبين
وجد
|
لــه
بجــدوى
بهـا
تـولى
الكرامـات
|
|
واحرسـه
مـن
حاسـديه
وارحـم
حـوزته
|
وكــن
لــه
إن
دحــت
للخطـب
سـاعات
|
|
وحـط
معـانيه
مـن
عيـن
الكمـال
فقد
|
تجمعـــت
للمعـــالي
فيــه
أشــتات
|
|
واحفـظ
بـه
شـرعه
الإسـلام
واحـم
بـه
|
ســرح
الخلافــة
أن
تغشــاه
غــارات
|
|
ليصـــبح
الـــدين
تجلــوه
اســرته
|
ويغتــدي
الملــك
تعلـوه
المهابـات
|
|
وصـن
حمـى
عبـدك
المسـعود
وارع
لـه
|
ولايـــة
صـــدرت
عنهـــا
الولايــات
|
|
واســعده
واسـعد
بـه
واصـلح
رعيتـه
|
وأولـــه
مــا
ب
ترجــى
الســعادات
|
|
والبسـه
ثـوب
البهـا
والعز
واجر
به
|
ســحاب
جــود
بــه
تحيــا
البريـات
|
|
والطـف
بـه
واعـف
عنـه
وأتـه
كرمـا
|
مواهبــا
أودعــت
فيهــا
العبـارات
|
|
واخلــف
علــى
خلــوف
وأتــه
مننـا
|
لا
مــن
تبــديه
فيهــا
الإمتنانــات
|
|
واغفـر
لـه
واقـض
عنـه
دينـه
وأفـض
|
عليــه
ســحبا
بهــا
للخيــر
سـحات
|
|
وامنـن
بعـود
إلى
القبر
الشريف
عسى
|
تقضــي
بــه
فــي
حمـى
طـه
لبانـات
|
|
واحفــظ
بنــي
وســامح
والـدي
وعـز
|
ز
المســــلمين
فللإســــلام
عـــزّات
|
|
والطـف
بأشـياخي
الزهـر
الهداة
وجد
|
بــالعفو
عنهــم
فللأشــياخ
حرمــات
|
|
وصـل
تـترى
علـى
المختـار
مـا
طلعت
|
شـمس
الضـحى
وانجلـت
عنهـا
الدجنات
|
|
ووال
ســـحب
الرضـــا
للآل
تكرمـــة
|
والصـحب
مـا
غـردت
فـي
البان
ورقات
|