|
لشــاهد
الــدمع
بالتجريـح
تعـديل
|
ومــا
لجفنـي
يحلـو
النـوم
تعسـيل
|
|
وللهــوى
حــاكم
قــاض
علــي
قضـى
|
ومــا
بـه
قـد
قضـى
واللـه
مقبـول
|
|
قضـى
بسـفك
دمـي
فـي
الحـب
محتكما
|
أمــا
درى
أنــه
عــن
ذاك
مســؤول
|
|
يـا
ليـت
لـو
صـانه
كيمـا
اشـاهده
|
وهــل
يصــان
دم
فـي
الحـب
مطلـول
|
|
يـا
نفـس
دينـي
بدين
الحب
واجتنبي
|
مـا
زخرفتـه
علـى
السـمع
الأقاويـل
|
|
ولازمــي
الصــدق
والإخلاص
فيـه
تـري
|
هــديا
بــه
ســفهت
تلـك
الأباطيـل
|
|
فـالحب
بالصـب
أولـى
والغـرام
لـه
|
أهـــل
تحاشــيهم
فيــه
التضــالل
|
|
رضـوا
وراضـوا
نفوسـا
لم
تمل
لسوى
|
معنــى
لإجمـاله
فـي
الحسـن
تفصـيل
|
|
هـي
النفـوس
النفيسـات
الـتي
شرفت
|
أن
تســتنيب
لمـا
تـدعو
التخابيـل
|
|
وارحمتـــاه
لصـــب
جســـمه
دنــف
|
ودمعـــه
مطلــق
والقلــب
مكبــول
|
|
لا
يسـتطيع
اصـطبارا
وهـو
فـي
قلـق
|
ولا
يطيـــق
ســـلواً
وهــو
متبــول
|
|
مشــتّت
البــال
لا
يـأوي
لـذي
سـكن
|
ولا
يميـــل
لرســـم
فيــه
تعطيــل
|
|
كأنمـــا
قلبــه
بالنــار
منبعــث
|
ودمعــه
الصــب
بالطوفــان
موصـول
|
|
مـا
تمسك
الدمع
جفناه
التي
انبجست
|
إلا
كمــا
يمســك
المـاء
الغرابيـل
|
|
دمــع
شـكوت
لـه
نـاري
فقـال
ومـا
|
أغنــي
وأمـري
كمـا
عـاينت
مهمـول
|
|
يــا
أهـل
ودّي
وأحبـابي
ومـن
بهـم
|
طـاب
السـماع
ولـذا
القـال
والقيل
|
|
أنتــم
حيــاتي
وإيناســي
ومطلـبي
|
وأنتــم
القصـد
والمـأمول
والسـول
|
|
غبتـم
فغـابت
تماثيـل
الجمـال
ولو
|
لحتـم
لقمـات
بكـم
تلـك
التماثيـل
|
|
وكيــف
أكحـل
جفنـي
بالمنـام
ومـا
|
مســافة
البعـد
فيمـا
بيننـا
ميـل
|
|
ميلـوا
بعطـف
علـى
مضـناكم
وصـلوا
|
حبـل
آتصـالي
فـأنتم
أغصـن
ميلـوا
|
|
يـا
بارقـا
مـن
ثنيـات
العقيق
أضا
|
كيمــا
يحـاكي
ثغـورا
حشـوها
كـول
|
|
لا
تطمعـــن
بـــأمر
ليــس
تــدركه
|
إن
الثغــور
إليهـا
ينتهـي
القيـل
|
|
حتــام
أكتــم
والأشـواق
تحـبر
عـن
|
مطــوبي
ســر
لــه
بالعقـل
تعقيـل
|
|
شـربت
كـاس
الهـوى
صـرفا
فأسـكرني
|
وكيــف
يصــحو
مـع
الإسـكار
مثمـول
|
|
وعــاذل
جــاء
يلحــاني
فقلـت
لـه
|
دعنــي
وشــأني
فـإني
عنـك
مشـغول
|
|
عــذبت
قلــبي
بســجيل
الملام
فقـل
|
وأحــر
قلــب
تلظــت
فيــه
ســجيل
|
|
بـالله
أقصـر
إذا
مـا
رمـت
تعذلني
|
ولا
تطــل
فحــديث
العــذل
مملــول
|
|
خفـض
فمـا
دمعـك
المنهـل
مـن
مقلي
|
ولا
حشــاك
بنــار
الوجــد
مشــعول
|
|
ولا
تشــبب
بألحــان
الحجــاز
فمـا
|
حبــل
آدكــارك
بــالمحبوب
موصـول
|
|
وكيــف
أصــغي
لعـذل
والفـؤاد
شـج
|
والســمع
فـي
صـمم
والعقـل
مـذهول
|
|
فلا
تثقــل
بلـوم
فـي
الحـبيب
فلـي
|
بــاللوم
والحــب
تخفيــف
وتثقيـل
|
|
وليـت
عـذلي
فـدعني
وانعـزل
أبـدا
|
فكـــل
وال
كمـــا
وليــت
معــزول
|
|
يــا
مـن
يخـرب
قلـبي
وهـو
سـاكنه
|
مــن
ذا
يخــرب
ربعـا
وهـو
مـأهول
|
|
هـل
عنـدنا
ناضـرك
القتـال
معرفـة
|
بـــأنني
فيــه
بالأحيــاء
مقتــول
|
|
وهــل
لعنــبر
ذيــاك
اللمـى
خـبر
|
إن
الــدموع
الــتي
أجريتهـا
لـول
|
|
أم
للشـــغور
شــعور
إننــي
دنــف
|
أرعـى
الـدياجي
التي
في
عرضها
طول
|
|
لا
تنصــبن
بــإغراء
العــدا
كبـدي
|
واكســر
جنـاح
عـذولي
فهـو
معـذول
|
|
ناشـدتك
اللـه
يـا
بـدر
علـى
فنـن
|
لــه
مــن
الحســن
تفريـع
وتأصـيل
|
|
أأنـت
بـاق
علـى
الميثـاق
أم
نقضت
|
عهودنـــا
وأمحــت
تلــك
العهــود
|
|
موضـوع
سـهدي
ودمعـي
إن
أمـرت
بـه
|
يــا
نــاظري
فعلــى
عينـي
محمـول
|
|
علــل
بوعــد
ولا
تبخـل
بطيـف
كـرى
|
وخـــل
عمــري
تقضــيه
التعاليــل
|
|
ويلاه
مــن
ســاحر
الأجفــان
وجنتـه
|
فــي
العيـن
عـدل
والأحتنـاء
سـجيل
|
|
إسـتخدمت
عينيـه
الأرواح
حيـن
بـدا
|
فــي
منـزل
الجفـن
للأهـداب
تنزيـل
|
|
أقسـمت
بالسـحر
مـن
عينـه
حين
رنا
|
أن
المهنــد
فــي
جفنيــه
مســلول
|
|
وبالضــحى
مــن
محيــاه
أو
كــدقي
|
إن
القتيــل
بســيف
اللحـظ
مقبـول
|
|
فهـــل
لجرحـــي
آس
عنــد
نظرتــه
|
وهـل
لميـت
الهـوى
فـي
الخد
تقبيل
|
|
غصــن
تمنطـق
بالسـر
البـديع
وقـد
|
علتـــه
مــن
ورد
خــديه
أكاليــل
|
|
إمــام
حســن
وفــي
محـراب
حـاجبه
|
يــا
مـا
أضـت
مـن
محيـاه
قناديـل
|
|
للآم
ســـالفه
فـــي
لــوح
وجنتــه
|
خـــط
ســعيد
بــه
للصــب
تعليــل
|
|
وللعــذار
حــروف
بالبهــار
ســمت
|
فـــي
وجنــتيه
فمنقــوط
ومشــكول
|
|
لا
غــروا
إن
ســلب
الألبـاب
ناضـره
|
فـــإنه
ناضــره
بالســحر
مكحــول
|
|
شـــيب
ثغـــر
وفــي
ورديّ
وجنتــه
|
تخطيــط
ىــس
وفــي
عينيـه
تكحيـل
|
|
بـــديع
شــكل
لصــدغيه
وعارضــيه
|
توليـــد
حســن
وتتميــم
وتكميــل
|
|
تجــانس
الحسـن
فـي
تكـوين
صـورته
|
فقـــده
عاســـل
والثغــر
معســول
|
|
وطــابق
الوصــف
فيـه
كنـت
هيـأته
|
بــالفرق
مرتفــع
والفــرع
مسـبول
|
|
مبلبــل
الصـدغ
قـد
فـاحت
عوارضـه
|
لأن
ريحانهـــا
المخضـــر
مبلـــول
|
|
ورق
مــاء
الحيـا
فـي
نـار
وجنتـه
|
لنـــه
الـــورد
بالشــيم
مجبــول
|
|
بـدر
عـن
الطـرف
نـاء
وهـو
منزلـه
|
لكــن
قلــبي
بــه
والــه
مــأهول
|
|
عـي
رشـادا
إذ
مـا
همـت
فيـه
كمـا
|
رشــدي
إذ
أرمـت
أن
أسـلوه
تضـليل
|
|
عــذلت
فيــه
وعــذل
الصــب
متضـح
|
وعاشـــق
الحــب
معــذور
ومعــذول
|
|
يـا
عـاذلي
إن
مـر
العـدل
فيه
حلا
|
لمـــا
أعيــد
وللتكريــر
تعســيل
|
|
كـرر
علـى
مسـمعي
ذكـر
الحبيب
قلي
|
علـى
العويـل
لفقـد
الـذكر
تعويـل
|
|
ولا
تقصـــر
فــإن
القــول
أطيبــه
|
عــن
الحــبيب
حــديث
فيـه
تطويـل
|
|
بحـــق
عينيــه
إلا
عــدت
مبتــدرا
|
لمعهـــد
فيــه
للمحبــول
تمثيــل
|
|
ولا
تخـــف
صــدّه
إن
عــدت
ثانيــة
|
فــالعود
أحمــد
والإقبــال
مـأمول
|
|
فــإن
رأيــت
حبيـبي
واجتمعـت
بـه
|
فســله
عــن
مسـتهام
عـاله
الغـول
|
|
وإن
رايــت
انيسـاطا
فاسـتلم
يـدهُ
|
عنــي
وســلم
ســلاما
فيــه
تبجيـل
|
|
وإن
رأيـت
انقباضـا
فاعـد
عن
خبري
|
ولا
تعــرض
ففــي
التعريــض
تنكيـل
|
|
واضـرب
عن
الذكر
صفحا
وارجيه
فعسى
|
يرثــي
لمـن
جسـمه
بالسـقم
مهـزول
|
|
ولا
تكــن
آيســا
مــن
روح
رحمتــه
|
فربمــا
أعقــب
التعســير
تســهيل
|
|
أفــديه
مـن
شـاذن
فـي
طـي
نـاظره
|
صــيد
ضــوار
لهـا
مـن
هـديه
غيـل
|
|
لا
أختشــي
فيــه
مـن
عـذل
يفنـذني
|
فلحشـــا
بعليــل
الشــوق
تعليــل
|
|
وكيـف
أخشـى
صـروف
الحادثـات
ولـي
|
بمـــدح
أحمـــد
تنــويه
وتنويــل
|
|
شـخص
هـو
الجـوهر
الفرد
الذي
جمعت
|
فيــه
المعــاني
فمفعــول
ومنقـول
|
|
أزج
أبلــج
ســاجي
اللحــظ
مبتسـم
|
عــن
سلسـبيل
وعـن
مسـك
وعـو
لـول
|
|
أغــر
أزهــر
أقنــى
الأنـف
قـامته
|
فيهــا
انعطـاف
وفـي
خـديه
تسـهيل
|
|
مـبرؤ
القـول
صـافي
القلـب
طـاهره
|
لأنـــه
بـــزلال
الخلـــد
مغســـول
|
|
مكمـل
الـذات
رحـب
الراحـتين
فـتى
|
لــه
فــؤاد
علـى
الخيـرات
مجبـول
|
|
أنشــأه
مــولاه
مــن
نــور
وقـدمه
|
كـــأنه
غـــرة
والخلـــق
تحجيــل
|
|
متـــــوج
بلال
المجــــد
متشــــح
|
مـــؤزر
بـــردا
الفخـــر
مشــمول
|
|
أوفـى
النـبيين
مبدا
الرسل
خاتمهم
|
أليــس
منــه
لهــم
بــدء
وتكميـل
|
|
إن
كـان
عيسـى
أعـاد
الميت
منتعشا
|
فكـــم
لطــه
حــي
ميــت
ومقتــول
|
|
أو
كـان
موسـى
أري
الطوفان
منغلقا
|
فقــد
أري
البـدر
طـه
وهـو
مفصـول
|
|
أو
قـد
جرى
النيل
في
مصر
ليوسف
كم
|
بيــن
الأصـابع
منـه
قـد
جـرى
نيـل
|
|
أو
كـان
داوود
قـد
لان
الحديـد
لـه
|
لكــي
تكــون
لنــا
منــه
سـرابيل
|
|
فالجلـد
عـاد
بكـف
المصـطفى
كرمـا
|
عضــبا
حديـدا
بـه
للمهـام
تجويـل
|
|
أو
عـادت
النـار
بـرد
للخليـل
فكم
|
طفــي
بطــه
لهيــب
فيــه
تشــعيل
|
|
أو
فـي
السـفين
علا
نـوح
فأحمـد
قد
|
علا
علـــى
مرتقـــى
عنــه
تنزيــل
|
|
لـم
يـؤت
منهـم
رسـول
معجـز
أبـدا
|
إلا
أتـــاه
بــأزكى
منــه
جبريــل
|
|
وكلهــم
أصــبحوا
فـي
بحـره
نقطـا
|
أو
زهــر
أفـق
لـه
بالشـمس
تهليـل
|
|
وعنــه
يـرون
مـا
نـالوه
مـن
شـرف
|
بمجمــــل
فيــــه
للأرى
تفاصـــيل
|
|
فبــالبراق
لــه
والحــوض
تقدمــة
|
وبــاللواء
لــه
والتــاج
تفضــيل
|
|
وبالشــفاعة
فــي
المخلـوق
قاطبـة
|
لــه
مقــام
لــه
بالحمــد
تأثيـل
|
|
علا
ارتفاعـا
علـى
كـل
العبـاد
علا
|
وهــل
تــرى
فاضــلا
يعلـوه
مفضـول
|
|
بـــه
لآدم
هــب
العفــو
وانتســبت
|
لشـيته
فـي
سـما
العليـا
الأراجيـل
|
|
ونـال
إدريـس
فـي
العليـا
به
رتبا
|
كمـا
لنـوح
بـه
فـي
الفلـك
تحويـل
|
|
وفــاز
هــود
بـه
مـن
عـاده
وبـدت
|
لصــالح
مــن
صـميم
الصـخر
شـمليل
|
|
وصــين
لــوط
بـه
مـن
قـومه
وطفـى
|
جمـــرا
أعـــد
لإبراهيــم
مشــعول
|
|
وللذبيـــح
بـــه
فـــوز
وتكرمــة
|
كمــا
لإســحاق
مــن
جـدوال
تحصـيل
|
|
وقـد
شـفي
باسـمه
يعقـول
مـن
ضـرر
|
كمــا
ليوســف
مــن
أيـديه
تنويـل
|
|
ونــال
الأســباط
منــه
كـل
منقبـة
|
بهــا
لموســى
كليـم
اللـه
تكميـل
|
|
وامتـاز
هـارون
بالقربـان
منه
كما
|
بــه
للقمــان
فـي
القـرآن
تعـديل
|
|
وللفـتى
يوشـع
فـي
الأفـق
قـد
وقفت
|
شــمس
النهــار
لأمــر
فيـه
تعجيـل
|
|
وملــك
الأرض
ذو
القرنيــن
ثـم
بـه
|
للخضـر
إجمـال
مـا
تبـدي
التفاصيل
|
|
وقــد
أنـال
شـعيبا
مـا
أراد
كمـا
|
بـــه
لـــداود
انطــاعت
ســرابيل
|
|
وســـخرت
لســليمان
الريــاح
بــه
|
والإنــس
والجـن
والعنقـاء
والفيـل
|
|
وقـد
أجيـب
بـه
ذو
الكفـل
حين
دعا
|
لأنـــه
بحلـــى
معنـــاه
مكفـــول
|
|
وباسـمه
فـاز
ذو
النون
التقي
ونجا
|
مـن
بطـن
حـوت
لـه
في
البحر
توغيل
|
|
وباسـمه
طـار
إليـاس
وصـار
مـن
ال
|
أملاك
حيــث
جنــاح
العــز
مســدول
|
|
وباســمه
لاذ
أيــوب
الرضــا
فشـفى
|
مـن
ضـر
جسـم
لـه
فـي
العظم
تنخيل
|
|
وباسـمه
اليسـع
الـبر
التجـى
فنجا
|
وللعزيـــز
بــذاك
الإســم
تمثيــل
|
|
وباســـمه
زكريــا
اســتغاث
فلــم
|
يرهـب
لنشـر
لـه
فـي
العضـو
تفصيل
|
|
وكــم
ليحيــى
بــه
فـي
جنـة
صـلة
|
وكــم
لعيســى
بــه
نســك
وتبتيـل
|
|
بســره
افتتــح
العليــاء
خــالقه
|
والكــون
فـي
ظلـم
الإعـدام
مقفـول
|
|
وكـل
مـا
صـاغ
مـن
كـون
فعنـه
نشا
|
لأنـــه
علـــة
والكـــون
معلـــول
|
|
وباســمه
قــرن
اللـه
اسـمه
فزكـا
|
فضــلا
علــى
كـل
خلـق
فيـه
تفضـيل
|
|
وخصـــّه
بمعـــان
ليـــس
يحصــرها
|
قــول
ولــو
كــثرت
فيـه
الأقاويـل
|
|
ضـــروب
أوصــافه
جلــت
دوائرهــا
|
عــن
بســط
قــول
ترويـه
الأفاعيـل
|
|
أقــام
للملـة
السـمحاء
سـماء
علا
|
لشــهبها
فـي
بـروج
السـعد
تنقيـل
|
|
وشــاد
للـدين
أركانـا
فطـاق
بهـا
|
وفــد
لـه
فـي
يميـن
اللـه
تقبيـل
|
|
عــزت
بــه
ملـة
الإسـلام
حيـن
حمـى
|
عصـابة
الـدين
أن
يغثـا
لهـا
غـول
|
|
فأضــحت
الســنة
البيضــاء
سـاحبة
|
ذيــل
أزدهـاء
لـه
بـالفخر
تـذبيل
|
|
يـا
كـم
بـه
بشـر
الكهان
وارتقبوا
|
ظهــور
شــكل
لــه
بالحسـن
تشـكيل
|
|
وكــم
بأوصـافه
الأصـنام
قـد
نطقـت
|
كمــا
بــه
أنبـأ
الحـر
البهاليـل
|
|
نــارت
بمولــده
الأكـوان
إذ
خمـدت
|
نــارٌ
لكســرى
بـه
الإشـراك
مشـعول
|
|
وانشـق
مـن
خـوفه
الإيـوان
وارعظدت
|
فــرائص
الفـرس
إذ
نـاداهم
زولـوا
|
|
وغـاص
إذ
فـاض
ليـل
الرجس
وانبجست
|
عيــن
لهــا
بشـعاع
النـور
تكحيـل
|
|
ومــاء
سـاوة
لـم
ينضـب
سـوى
جـزع
|
إذ
لـم
يسـل
منـه
فـي
بطـائحه
نيل
|
|
وعـــاينت
أمــه
بصــرى
ولاح
لهــا
|
حلـــيّ
حــق
بــه
للــزور
تعطيــل
|
|
لـولاه
لـم
تخلـق
الـدنيا
وسـكانها
|
ولا
المعــــاد
ولا
عـــدن
وســـجيل
|
|
بـــالعلم
مــتزر
بــالحلم
متشــح
|
للحـــق
مرتقـــب
بــالحق
مشــغول
|
|
لـو
لـم
تصـن
حـرم
البطـاح
حرمتـه
|
مــا
رد
أبرهــة
عنهــا
ولا
الفيـل
|
|
جـاءوا
بكيـد
لهـدم
البيت
افنقلوا
|
علــى
الوجــوه
كعصـف
وهـو
مـأكول
|
|
ترميهـــم
صـــم
أحجـــار
مســومة
|
بالنــار
ترســلها
طيــر
أبابيــل
|
|
كلا
ولــو
لــم
تمـس
الـزاد
راحتـه
|
لــم
يـوف
بـالجيش
مشـروب
ومـأكول
|
|
نعـم
ولـو
لـم
يحز
خصل
السباق
لما
|
حـــدا
بمســراه
ميكــال
وجبريــل
|
|
نعـم
ولـو
لـم
ينـر
في
الأفق
طالعه
|
مــا
كــان
بـالزهر
للأفـاق
إكليـل
|
|
علـى
البراق
إلى
السبع
الطباق
علا
|
لمســتوى
فيــه
للمحبــوب
تحويــل
|
|
وأم
بالرســـــل
والأملاك
قاطبــــة
|
فــي
مشــهد
فيــه
تكريـم
وتبجيـل
|
|
ونــال
سـهم
علا
فـي
المجـد
قرطسـه
|
عــن
قــاب
قوسـين
ترحيـب
وتاهيـل
|
|
دنـــا
لـــه
فتــدلى
ثــم
خصصــّه
|
بــرؤة
لــم
ينلهــا
قبــل
مقبـول
|
|
وفــي
مقـام
الهنـا
والبسـط
دللـه
|
وللحــبيب
كمــا
قــد
قيـل
تـدليل
|
|
وشـاهد
اللـه
جهـرا
واصـطفاه
بمـا
|
لـم
يحـوه
قـال
أو
يـوفي
بـه
قيـل
|
|
حيـث
الحمـى
مرتـع
والـورد
منهمـر
|
والشــمل
مجتمــع
الشــمس
تخييــل
|
|
أحيـــا
الظلام
بتنزيـــل
يرتلـــه
|
وللتهجــــد
ترتيــــب
وتنزيــــل
|
|
وشــد
للصــم
كشــحا
ناعمـا
وطـوى
|
تحـت
الصـفا
باطنـا
مـا
فيه
تحويل
|
|
ولـــو
أراد
كنــوز
الأرض
لتفتحــت
|
ولــم
يغيــب
منهــا
عنــه
محصـول
|
|
لكنـه
جـل
قـدرا
أن
يميـل
لمـا
في
|
ه
عـــن
الحـــق
تســويف
وتســويل
|
|
مســتيقظ
القلـب
إن
نـامت
محـاجره
|
لــم
يعـتريه
إذا
مـا
قـام
تغفيـل
|
|
بلمســه
الشــاة
درت
وهــي
حائلـة
|
فبــالله
مــن
حليــب
فيـه
ترسـيل
|
|
والضــب
خــاطبه
بالصــدق
معترفـا
|
وكــان
فــي
نقطــه
للــه
تبتيــل
|
|
والفحـــل
ذل
لــه
طوعــا
وكلمــه
|
وكــان
فحلا
لــه
بالبــاس
تفحيــل
|
|
ورد
لحــظ
فــديك
كيــف
كـان
كمـا
|
أعــاد
شــق
خــبيب
وهــو
مفصــول
|
|
ورد
كــف
ابـن
عفـرا
بعـدما
قطعـت
|
بتفــل
ريــق
بــه
للملــح
تعسـيل
|
|
وأوقـف
الشـمس
يـوم
الأربعـاء
إلـى
|
أن
وفـت
العيـر
مـا
قـد
صرف
القيل
|
|
وأنقـذ
الجمـل
الشـاكي
عنـاه
لمـا
|
أضــــر
بــــه
جــــوع
وتنقيـــل
|
|
والظـل
مال
إليه
حين
غودر
في
السر
|
مضـا
وقـد
حـاز
عنـد
القـوم
تقبيل
|
|
والشـمس
أرجعهـا
بعـد
المغيـب
كما
|
لبتـه
لمـا
دعـا
الـبيض
البعاليـل
|
|
والغــدق
لبـاه
مـا
أن
دعـاه
كمـا
|
لبتـه
لمـا
دعـا
الـبيض
البعاليـل
|
|
والجـذع
حـن
لـه
إذ
غـاب
عنـه
كما
|
حنــت
لتلحيــن
شـاديها
المثاكيـل
|
|
فـي
الصـحف
والكتب
والألواح
بان
له
|
ديــنٌ
قــويم
بــه
الزيــغ
تبطيـل
|
|
وفــي
الــذراع
ودر
العنـز
معتـبر
|
لمبصـــر
لــم
تشــككه
التماحيــل
|
|
وفـي
الحصـى
والعصـا
والـدب
مستند
|
لناقـــل
رويـــت
عنــه
الأقاويــل
|
|
وفـي
الصـبا
والحيـا
والانشـقاق
له
|
وجـــه
بـــديع
وترفيــه
وترفيــل
|
|
وفـي
الحمـار
وفـي
العضـبا
ودلدله
|
أدلـــة
لـــن
توهيهــا
التعالــل
|
|
وفـي
الوليـدة
والـوادي
وغـار
حرا
|
ســر
خفــيّ
بــه
الإظهــار
موصــول
|
|
وفـي
الحفيـر
وفـي
مـد
الكثيثب
له
|
دليــل
صـدق
لـو
أن
الصـدق
مـدلول
|
|
وفــي
قتـادة
والعرجـون
كـم
ظهـرت
|
مظــاهر
ليــس
تخفيهــا
التحاييـل
|
|
وفــي
الغزالــة
والصــياد
معتمـد
|
لمهتـــد
لــم
تجــاذبه
التضــليل
|
|
وقصــة
الفتــح
والأصــنام
دامغــة
|
لــرأس
كــل
كفــور
فيــه
تمحيــل
|
|
وفــي
ثـبير
وفـي
ثـور
وغـار
حـرا
|
نصـــر
وفتـــح
وتأييــد
وتاثيــل
|
|
بـاض
الحمـام
وحـاك
العنكبـوت
على
|
غــار
عليــه
لســتر
اللـه
تجليـل
|
|
وفيــه
قــد
قـال
تأنيبـا
لصـاحبه
|
لا
تحزنـــن
فوعــد
اللــه
مفعــول
|
|
كفالــة
اللــه
صــانته
كفايتهــا
|
وهــل
ينــاوي
فـتى
بـالله
مكفـول
|
|
وفــي
سـواقة
إذ
سـاح
الجـواد
بـه
|
هــدي
لبــاغي
نجــاة
وهـو
موصـول
|
|
وحالـة
الـذئب
والراعـي
كم
ابتهرت
|
بهــا
عقــول
لهـا
بالشـرك
تخييـل
|
|
وفــي
انقلاب
العصـا
سـيفا
براحتـه
|
خــذلان
بـاغ
وبـاغي
البغـي
مخـذول
|
|
فــي
ســفينة
والضــرغام
أيّ
نبــا
|
لــم
يعــترض
متنــهُ
نسـخ
وتأويـل
|
|
وفــي
المـوالي
وفـي
أزواجـه
خـبر
|
بـــه
الأقاويــل
صــحن
والأفاعيــل
|
|
وفــي
الصــحابة
والأتبـاع
أيّ
هـدى
|
لتـــائه
شـــأنه
حـــلّ
وترحيـــل
|
|
وف
اللعيــن
أبــي
جهــل
وشــيعته
|
أمــر
عجــاب
بـه
قـد
جـاء
جبريـل
|
|
وفــي
حنيــن
وفـي
بـدر
وفـي
أحـد
|
غبطــال
مــا
مـوّهت
تلـك
الأباطيـل
|
|
وفــي
قريظــة
والأحـزاب
كـم
ظهـرت
|
وفـــي
هــوازن
للهــادي
أفاعيــل
|
|
وفـي
مـر
يسـيع
كـم
ألقـت
صـوارمه
|
مــن
مفصــل
فيـه
للطغيـان
تأصـيل
|
|
وفــي
تبـوك
ومـا
أدراك
كـم
رسـمت
|
فـي
صـفحة
النقـع
للقاضـي
تسـاجيل
|
|
مــا
زال
يملأ
مــن
عيـن
ومـن
أثـر
|
عيـن
الزمـان
الـتي
مـا
شـقها
ميل
|
|
حـتى
أقـام
لأهـل
الـدين
رسـم
هـدى
|
عليـــه
للحكــم
بإيجــاب
تســجيل
|
|
يـا
أمـة
المصـطفى
طه
أبشروا
فلكم
|
مـــن
مشــرب
الإصــطفاري
وتنهيــل
|
|
وليكفيكم
شرفا
ما
في
الدهر
إن
لكم
|
بأشــرف
المرسـلين
العـز
و
الطـول
|
|
طولـوا
وصـولوا
فـأنتم
أمـة
رجحـت
|
عــن
غيرهــا
شـرفا
فليهنكـم
طـول
|
|
ألسـتم
خيـر
مـن
لـبى
لا
رسـول
هدى
|
وافــى
علــى
يــده
للحــق
تنزيـل
|
|
وافـــاكم
بكتـــاب
معجــز
عجــزت
|
عـن
وصـفه
العـرب
السـن
المقاويـل
|
|
ذكــر
مـن
اللـه
فـي
مكنـونه
حكـم
|
محكمــــات
وتحريــــم
وتحليــــل
|
|
فـي
ضـمنه
علـم
ما
قد
كان
قبل
وما
|
يكـون
بعـد
وهـل
فـي
الحـق
تخييـل
|
|
وفيـــه
جمـــع
وتفريــق
وتســوية
|
وبســـط
عـــذر
وتهويــل
وتســهيل
|
|
لا
يخلـق
الـدهر
مـن
جلبـاب
معجـزه
|
ولـــن
تفــي
بمعــانيه
الأقاويــل
|
|
بــه
دعــا
للهــدى
هـاد
فأنقـذنا
|
مـن
قعـر
بحـر
لـه
بـالزيغ
تهويـل
|
|
بالنصـر
رأيتـه
السـوداء
قـد
عقدت
|
والفتـح
فـي
الـبيض
منقـوط
ومشكول
|
|
فبالـدماء
وجنـة
الهنـدي
فـي
ضـرج
|
وبالســويد
لطــرف
الرمــح
تكحيـل
|
|
هــذا
يقبــل
منــه
وجنــة
خجلــت
|
وذا
يغــازل
طرفــا
منــه
مكحــول
|
|
يـا
كـم
شـفى
سقما
أعيا
الطيب
وكم
|
داوى
نكايــة
جــرح
فيــه
تــدميل
|
|
وكـم
كفـى
صـائلا
حـد
النصـال
وكـم
|
أغنـى
فقيـراً
لـه
فـي
الأرض
تجويـل
|
|
وكــم
وقتــه
هجيـر
الشـمس
سـائرة
|
لهـــا
حنـــوّ
وإتحـــاف
وتضــليل
|
|
ينـدى
حيـاء
إذا
تهمـي
يـداه
نـدى
|
كأنهــا
روضــة
يجــري
بهــا
نيـل
|
|
وافــى
فــروض
أرض
الشــرق
نـائله
|
واخصــر
منـه
بـأرض
الغـرب
ممحـول
|
|
يمــم
علاه
ففيــه
الشــمل
مجتمــع
|
والوقــف
مفــترق
والجمــع
مشـمول
|
|
فللأعـــادي
وللأصـــحاب
مــن
يــده
|
يــــومي
نــــدى
وردى
وتنكيــــل
|
|
فســيله
للنـدى
فـي
الربـع
مبتـذل
|
وســيفه
للعـدا
فـي
النقـع
مسـلول
|
|
ومـن
قلـوب
العـدا
عـن
قـوس
فكرته
|
بســهم
رأي
لــه
بالنجــح
تنصــيل
|
|
وأعمـل
السـيف
فـي
أعنـاقهم
فلـذا
|
بـادوا
وفاعـل
فعـل
البغـي
مفعـول
|
|
لمــا
أحســّوه
فـروا
جـافلين
نعـم
|
وللنعـــام
إمــام
الأســد
تجفيــل
|
|
يقــود
خيلا
كأمثــال
الريـاح
لهـا
|
ســـير
ووخـــد
وأســراع
وتنقيــل
|
|
كأنمــا
بالثريــا
ألجمــت
ولهــا
|
مـــن
الأهلـــة
أســـراج
وتنعيــل
|
|
فـــأدهم
بــرداء
الليــل
مشــتمل
|
لــه
الضــحى
غـرة
والفحـر
تحجيـل
|
|
نهــد
عريــض
طويـل
الجيـد
مجتمـع
|
ضـافي
التليـل
حديـد
القـرن
ذهلول
|
|
رحـب
اللبـان
غليـظ
السـاق
مرتقـع
|
طلـق
العنـان
بعـدي
الشـأو
معـدول
|
|
يقصــر
الــبرق
عنـه
والريـاح
إذا
|
ما
قالت
الخيل
يا
حرب
الوغى
جولوا
|
|
وأشــهب
فــي
غـدير
الصـبح
منغمـس
|
وأصـــفر
بمــذاب
التــبر
مغســول
|
|
وأحضـــر
بحلــى
الريحــان
متشــح
|
وأحمـــر
بــرداء
الــورد
مشــمول
|
|
وكــل
حــرف
صــلخدات
لهــا
عنــق
|
مهمـــا
تســير
وإرفــال
وتــدميل
|
|
عوجــاء
جســرا
فـي
أخفاقهـا
سـعة
|
فــي
ظهرهـا
قصـر
فـي
جيـدها
طـول
|
|
قــوداء
كرمــاء
فـي
عرنيهـا
شـمم
|
كــم
خلفــت
أممــا
إذ
أمهـا
ميـل
|
|
غيــر
أنــه
مبلــغ
حرفـاء
عانسـة
|
كأنهـــا
عنــدما
تنســاب
عســقول
|
|
عينـــاء
وجنــاء
شــملال
شــمرذلة
|
عصــباء
ورقـاء
رأس
النـوق
شـمليل
|
|
تفلـي
بمشـط
الخطـا
فود
الفلاة
وكن
|
لهــا
علـى
الأرض
إن
نـوخت
أكاليـل
|
|
لا
تعـرف
الأيـن
مهمـا
أزمعـت
سـفرا
|
ولا
تــدق
الحصــى
منهــا
الخلاخيـل
|
|
كأنهــا
ســهم
رام
مطلقــا
حنقــا
|
أو
صـارم
فـي
يـد
الرعديـد
مسـلول
|
|
أو
قطـر
غيـم
ترامـى
أو
شـهاب
دجى
|
أو
لمــع
بـرق
أو
الطوفـان
مهطـول
|
|
تســنّموها
رجــال
بويعــوا
فشـروا
|
مـــا
أمّلـــوه
فتعجيــل
وتأجيــل
|
|
ليـوث
حـرب
إذا
هـاج
الـوغى
ورغـا
|
غيـوث
سـلم
إذا
قـال
الـوغى
قيلوا
|
|
مســددون
إذا
اعــوج
القنـا
ورأوا
|
رأيَ
التطـــاعين
لا
عــزل
ولا
ميــل
|
|
الطـاعمون
لمـا
أبـدى
اليسـار
لهم
|
الطــاعنون
لمــا
أخفـى
السـرابيل
|
|
بكــل
أسـمر
لـدن
القـد
فيـه
علـى
|
لدونــة
القــد
للهيجــاء
تحميــل
|
|
كـــأنه
لاضــطراب
العطــف
مبتهــل
|
مــن
الــدماء
مـداما
فهـو
مثمـول
|
|
قــد
ثقفــت
غمـرات
الحـرب
أكعبـه
|
فطعنـــه
بــالكلا
النحــر
موصــول
|
|
وكــل
أبيــض
بســام
الفرقــد
لـه
|
أن
عبّـس
القـرن
فـي
الأوصـال
تفصيل
|
|
جــرى
الفرقــد
بــه
دارا
فزّينــه
|
فلـــم
يكـــن
لحلاه
فيــه
تعطيــل
|
|
كســته
رونقهـا
شـمس
الضـحى
فزهـا
|
كــأنه
جــدول
فــي
الـروض
مصـقول
|
|
مهنّـــد
ناحــل
الجثمــان
يــبرئه
|
مـن
علـة
السـل
فـي
الأعنـاق
تنقيل
|
|
هــم
معشــر
كلمــا
حفـوا
بمعـترك
|
تـرى
أسـودا
لهـا
مـن
سـمرها
غيـل
|
|
ألخــاذلون
بنصــر
اللــه
كـل
غـو
|
مـــن
الطغــاة
فمنصــور
ومخــذول
|
|
الجـازمون
برفـع
الـدين
إذ
نصـبوا
|
بيــض
الصــفاح
فموصــول
ومفصــول
|
|
المهملــون
بنقــط
السـمر
كـل
كـم
|
مـــن
الغــواة
فمنقــوط
ومهمــول
|
|
ألمنصـفون
إذا
مـا
الخصـم
ما
طلهم
|
نقـــد
الجلاد
فمنصـــوب
وممطـــول
|
|
ألمــانعون
ببــذل
النفـس
حـوزتهم
|
مــن
ســرح
عــاد
فممنـوع
ومبـذول
|
|
ألمقبلــون
علــى
الأخــرى
بـتركهم
|
دار
الفنـــا
فمـــتروك
ومقبـــول
|
|
ألعاقـدون
إذا
حلـوا
الحبـا
علمـا
|
يلجـــى
إليــه
فمعقــود
ومحلــول
|
|
تلقــى
الـرؤوس
مواضـيهم
فترفعهـا
|
ســمر
الغــوالي
فمطــروح
ومحمـول
|
|
ألجــاعلون
لخــط
البغـي
إن
عضـلت
|
أدواؤه
حــد
الســيف
فيــه
تحليـل
|
|
كأنمــا
احتملــت
أســيافهم
فلهـا
|
يــوم
الـوغى
بـدم
الأبطـال
تعسـيل
|
|
هــم
أنجــم
أوقـد
الرحمـن
نـورهم
|
فكيــــف
يطفئه
بهــــت
مخاذيـــل
|
|
تفـتر
منهـم
ثغـور
المجـد
عـن
درر
|
لكونهــا
فـي
بحـار
الفضـل
تاصـيل
|
|
أنبـاء
أم
العلا
لـو
لـم
يجيـء
بهم
|
لـم
تـزك
أصـلا
ولـم
يـذكر
لها
جيل
|
|
هــم
الضــراغم
شـد
اللـه
وطـأتهم
|
فمـا
بهـم
عـن
مقـام
الحـرب
تهليل
|
|
مــن
ذا
يقـاومهم
أو
مـن
ينـاظرهم
|
وهــم
هـم
الشـم
والبـض
البهاليـل
|
|
أم
كيــف
يحكــون
والرحمـن
فضـلهم
|
بالمصــطفى
ولهــم
بالفتـح
تفضـيل
|
|
فهــم
علــى
مركــز
الافـاق
ألويـة
|
ولهـم
علـى
مفـرق
العليـاء
إكليـل
|
|
هــداهم
للهــدى
هــاد
بـه
أنصـحت
|
سـبل
الهـدى
واجلـت
عنها
المخابيل
|
|
ذو
المعجزات
التي
عنها
الورى
عجزت
|
وليـــس
يحصـــرها
قــال
ولا
قيــل
|
|
فهــي
النجــوم
لصــب
فيــه
متبـع
|
وهــي
الرجــوم
لخــب
فيـه
تمحيـل
|
|
هـو
الحـبيب
الـذي
لا
بـد
منـه
وقل
|
هـو
الشـفيع
الـذي
مـا
عنـه
تحويل
|
|
وهـو
الشـهيد
الرؤوف
البر
من
شهدت
|
بصـــدق
مبعثــه
الغــر
الأناجيــل
|
|
وهـو
الكريـم
على
الله
الكريم
فما
|
شـئتم
فقولـوا
إذا
أطنبتـم
قولـوا
|
|
فمبـدأ
القـول
فيـه
لا
انتهـاء
لـه
|
وغايــة
العلـم
فيـه
أنـه
السـلول
|
|
عـــز
المثيـــل
فلا
نــد
يمــاثله
|
وهــل
يماثــل
بــدر
التـم
قنـديل
|
|
أو
هــل
يشـابه
راس
الطيـر
طـائره
|
أو
يعــادل
عنقــا
مغــرب
الفيــل
|
|
قــد
تـم
خلقـا
وأخلاقـا
فقـل
قمـر
|
علــى
قضــيب
لــه
بـالزهر
تكليـل
|
|
لا
حســـن
إلا
ومنـــه
يســـتمد
ولا
|
جمـــال
إلا
وعــن
معنــاه
منقــول
|
|
مـا
فـوق
الـدهر
لـي
سهما
ولذت
به
|
إلا
وقتنــي
مــن
البــاري
سـرابيل
|
|
ولا
تنكبـــت
دهــري
واســتغث
بــه
|
إلا
وأقبــل
مــا
لــي
فيـه
تأميـل
|
|
فهــو
الكريـم
الـذي
يممـت
سـاحته
|
فـــأمّني
منـــه
إقبــال
وتنويــل
|
|
ومــن
يلــذ
يحمــى
طــه
يعـزّ
وإن
|
يعــدو
عليــه
عــدو
فهــو
مخـذول
|
|
حســبي
بــه
جنــة
للـدهر
أرصـدها
|
مهمـا
سـطا
وأشـحى
عـن
نـابه
غـول
|
|
حاشــاه
أن
يمنـع
الراجـي
مـواهبه
|
وفـــرده
للـــذي
يرجــوه
مبــذول
|
|
أو
لا
يكـون
شـفيعا
فـي
آمـرئي
وجل
|
لـه
علـى
فضـله
فـي
الحشـر
تعويـل
|
|
أو
يخزنـي
بعـدما
في
النوم
رحب
بي
|
وهــو
الــذي
بشـره
بـالبر
موصـول
|
|
أم
كيـف
أظمـأ
وأسـقاني
علـى
ظمـإ
|
مــاء
بــه
ظمــأ
الأحشــاء
مبلـول
|
|
أم
كيــف
أقصــى
وللجنـات
أدخلنـي
|
مــع
صــحبه
وهــم
الغـر
الأفاضـيل
|
|
فهـي
المـرائي
الـتي
ما
وصفها
كذب
|
وأننــي
فــي
غــد
عنهــا
لســؤول
|
|
لقــوله
مـن
رآنـي
كـأن
مـا
شـهدت
|
عينــاه
حقــا
وقـول
الحـق
مقبـول
|
|
فهـو
الشـفيع
إذا
طـال
الوقوف
ولم
|
ينفــع
مقــال
ولـم
تنجـع
أفاعيـل
|
|
حيـث
الحجـال
طـائر
والشـمس
دانية
|
والنــار
صــائلة
والصــبر
مفلـول
|
|
تـؤمه
الخلـق
يرجـون
الشـفاعة
مـن
|
هــول
لمعظمــه
فـي
القلـب
تهويـل
|
|
مـن
بعـدما
ييأسـوا
مـن
غيره
ولهم
|
بالــدمع
والحــزن
ترسـيل
وتشـكيل
|
|
وكــل
شــخص
يرجــى
مخلصــا
حسـنا
|
مـن
الحسـاب
الـذي
فـي
عرضـه
طـول
|
|
فيصــرخون
جميعــا
يــا
محمـد
قـم
|
واشــفع
لنـا
فلـك
الإقبـال
مبـذول
|
|
فعنــد
ذاك
يقــول
الهاشــمي
نعـم
|
أنـا
لهـا
وفـي
لـي
والحـق
معمـول
|
|
ويغتـدي
نحـو
سـاق
العـرش
مبتـدرا
|
ويبتـــدي
بســـجود
فيــه
تبتيــل
|
|
ويسـأل
الـرب
فـي
فصـل
القضـا
وله
|
حمـــد
وشـــكر
وتكــبير
وتهليــل
|
|
فيجتــبي
وينــادي
يــا
محمـد
قـم
|
فــاليوم
فيـه
إليـك
الأمـر
موكـول
|
|
أنـت
الحـبيب
فقـل
أسـمع
وسل
لتنل
|
واشــفع
تشـفع
فعنـدي
أنـت
مقبـول
|
|
مـن
ذا
يضـاهيه
أو
مـن
ذا
يسـاجله
|
وهـو
الرجاء
والمنى
والقصد
والسول
|
|
وحـق
عينيـه
والـذكر
الحكيـم
ومـا
|
حـــوى
زبـــور
وتــوراة
وإنجيــل
|
|
لـــه
أن
الأفلاك
والأرضــين
قاطبــة
|
درج
عريـــض
لــه
بالمــد
تطويــل
|
|
وكــل
مــا
جــرى
أوســح
مـن
أفـق
|
حـبر
لـه
فـي
بيـاض
الـدرج
تكحيـل
|
|
والنبـت
أقلام
والمخلـوق
تكتـب
مـا
|
لــم
يحــو
محملــه
ســر
وتفصــيل
|
|
لمـا
حـووا
عشـر
معنـاه
الذي
نطقت
|
بـــه
عقـــود
وإســـراء
وتنزيــل
|
|
وكيـف
يحـوي
الحيـا
حسـبان
ذي
نظر
|
أم
كيـف
يحصـى
الحصـى
عـد
وتجميـل
|
|
أو
هـل
يـوفى
بـذرع
الكـون
ذراعـه
|
أم
تضـبط
البحـر
بالكيـل
المكاييل
|
|
أم
يحصـر
الحـرف
سـر
الكـون
أجمعه
|
أم
هـل
يفـي
بجميـع
القـول
تفعيـل
|
|
الأمــر
أعظــم
مــن
عقــل
يكيفــه
|
وكيــف
يعقــل
مـن
بـالعجز
معقـول
|
|
فحســب
مملــوكه
جهــد
اســتطاعته
|
وأن
يكــون
لــه
فــي
مــدحه
قيـل
|
|
ومـا
يفـي
مـدح
مثلـي
فـي
علاه
وقد
|
حبـــاه
بالمــدح
قــرآن
وإنجيــل
|
|
لكــن
تطفلــت
بالأمــداح
مفتقــرا
|
وللفقيــر
علــى
الأبــواب
تطفيــل
|
|
وقــد
حنيـت
علـى
الأعتـاب
ألثمهـا
|
وللحقيــر
علــى
الأعتــاب
تقبيــل
|
|
وبــان
عجــزي
ولا
بـدع
فقـد
سـفرت
|
لنــا
سـعاد
فقلـبي
اليـوم
متبـول
|
|
ولاح
لــي
مـن
معـاني
كعـب
صـورتها
|
كعــب
ســعيد
علـى
الأعنـاق
محمـول
|
|
وكــم
لكعــب
يــد
بيضــاء
سـابقة
|
لنـا
بهـا
فـي
بيـوت
المـدح
تنقيل
|
|
فيهـن
كعبـا
بمـا
قـد
نـال
منزلـة
|
فـي
الخلـد
مربعهـا
بالفضـل
مأهول
|
|
وليغــن
حســان
بالتأييــد
أنّ
لـه
|
مــا
ليــس
يعلـوه
تغييـر
وتبـديل
|
|
يـا
صـفوة
اللـه
مـا
مـدحي
بمبتدع
|
كلا
ولا
وصـــفك
المعلـــوم
مجهــول
|
|
أليـس
مـدحك
وافـى
فـي
النساء
وفي
|
ىــي
القتــال
وفــي
حــم
تنزيــل
|
|
يا
أكرم
العرب
يا
أزكى
الورى
حسبا
|
يـا
أشـرف
الرسل
يا
من
قاله
القيل
|
|
حسـبي
انقطـاعي
وأمـداحي
وتسـميتي
|
يـا
خيـر
مـن
أمـه
النوق
المراسيل
|
|
أنـت
الشـفيع
فكـن
لي
حين
ينزل
بي
|
مـن
عـالم
الغيـب
أمـر
فيـه
تنكيل
|
|
وانظــر
إلــي
بعيـن
الـبر
تكرمـة
|
وامنــن
علــي
فمنـك
المـن
مـأمول
|
|
وجــد
علــي
بمـا
أوتيـت
مـن
كـرم
|
إن
الكريــم
علــى
الإكـرام
مجبـول
|
|
يـا
رب
وانصر
لوا
الإسلام
واحم
حماي
|
رســم
الهدايــة
أن
يعـروه
تبطيـل
|
|
وارفـع
منـار
مقامـات
التقـى
فيـه
|
للزيــغ
والبغــي
تنكيــس
وتعطيـل
|
|
واحـرس
مقـام
أميـر
المـؤمنين
فكم
|
لنـــا
بنعمــاه
تنويــل
وتمويــل
|
|
واحفـظ
بـه
الـدين
والدنيا
ووق
به
|
مســارح
الملــك
أن
يغتالهـا
غـول
|
|
وامحــق
بأســيافه
أعنــاق
حســده
|
وانصــره
نصـرا
بـه
للفتـح
تكميـل
|
|
وألبسـه
درعـا
حصـينا
واحـم
حوزته
|
مــن
كـل
عـاد
لـه
بالكيـد
تمحيـل
|
|
وصـن
حمـى
عبـدك
المسـعود
وأوف
له
|
ولايــة
العهــد
إن
الوعــد
مفعـول
|
|
والطـف
بـه
واعـف
عنـه
واوله
مننا
|
لا
مـــن
فيهـــا
لا
نقــص
وتبــديل
|
|
وجــازه
بجميــل
يــوم
يكشــف
عـن
|
ســاق
لهــول
بــه
للعقــل
تعقيـل
|
|
وانصـر
حمـاة
الهـدى
مـن
كل
طائفة
|
واخـذل
بهـم
كـل
بـاغ
فيـه
تختيـل
|
|
واغفـر
لأشـياخي
الزهـر
الهداة
وجد
|
بالصـفح
عنهـم
فـإن
الصـفح
مـأمول
|
|
وعامــل
المسـلمين
المـؤمنين
بمـا
|
يرجــونه
مــن
نعيــم
فيـه
تخويـل
|
|
واختــم
بخيـر
وسـامح
والـدي
وكـن
|
لابـن
الخلـوف
فمـا
لـي
عنـك
تحويل
|
|
واحسـن
خلاصـي
فـإني
يـا
منـى
أملي
|
بــاللهو
والزهــو
موثـوق
وموصـول
|
|
وصــن
بنــي
وإخــواني
وعـج
كرمـا
|
بـالعفو
عنـي
فلـي
في
العفو
تأويل
|
|
ووف
دينــي
وعامــل
بالرضـا
فعسـى
|
أعطـى
بنيـل
الرضا
في
العرض
توصيل
|
|
وصــل
تــترى
علــى
طــه
وشــيعته
|
مــا
حــررت
فـي
معـانيه
الأقاويـل
|
|
ووال
ســـحب
الرضـــا
للآل
تكرمــة
|
مـا
لـذ
فـي
السـمع
للقـرآن
ترتيل
|