|
طــاب
روضــي
وأثمـرت
أشـجاري
|
فأعيــدي
الغنـاء
يـا
أطيـاري
|
|
يـا
بنـات
الربيـع
جـددن
شجوي
|
وأعــنّ
الصــبا
علــى
أوطـاري
|
|
مصر
أرضي
والنيل
نهري
وهذا
ال
|
قصـــر
داري
وكــل
قصــر
داري
|
|
أنـا
شمس
في
مشرق
الحسن
والمل
|
ك
وللعاشــقين
نــوري
ونــاري
|
|
أتهــادى
بيــن
الغصـون
فتنـآ
|
د
وتغضـــي
نـــواظر
الأزهــار
|
|
والنسيم
العليل
في
الرضو
يستش
|
فـي
بلثـم
الـثرى
علـى
آثـاري
|
|
مســتمداً
منــه
شــذاً
معطـاراً
|
نافخــاً
فيـه
مـن
شـذاً
معطـار
|
|
وأكـف
الأوراق
تنـثر
لـي
الـدر
|
م
فأمشـي
علـى
غـوالي
النثـار
|
|
وتظــل
السـماء
تحسـد
وجـه
ال
|
أرض
أنــي
ســحبت
فضــل
إزاري
|
|
فهـي
ترنـو
بـأعين
الليل
حسري
|
وهــي
تبكــي
بــأدمع
الأسـحار
|
|
إيـه
يـا
صـبح
هـل
أتيـت
بخير
|
طــال
رعـبي
مـن
سـيء
الأخبـار
|
|
أتــرى
أنـت
رائعـي
بعـد
أمـن
|
ومـــديلي
مــن
عــزة
لصــغار
|
|
إن
الليـــل
مــن
غلائه
الســو
|
د
لســتراً
مــن
أحكـم
الأسـتار
|
|
ومحيــاك
فــي
تباشـيره
الغـر
|
م
مـــذيع
غـــوامض
الأســـرار
|
|
هــدأت
شــرة
الشـبيبة
واللـي
|
ل
وقـد
عـاد
حيـن
عـدت
وقـاري
|
|
أكـذا
ينقضـي
مـع
الصـفو
ليلي
|
ومــع
الهــم
يســتجد
نهــاري
|
|
إن
عمــراً
مقســماً
بيــن
ملـك
|
وغــــرام
لأتعــــب
الأعمـــار
|
|
لـي
فـي
دولـة
القلـوب
احتكام
|
هــو
فــي
نجــوة
مــن
الأوزار
|
|
علقـت
بـي
رغـم
الحوادث
والده
|
ر
وذاقـت
انسـي
وذاقـت
نفـاري
|
|
تتلظــى
ولــو
أشــاء
لــذابت
|
غيــر
أنـي
حبسـت
عنهـا
أواري
|
|
كـره
النـاس
لي
الفناء
فأبقوا
|
شــبهي
فــي
هياكـل
مـن
نضـار
|
|
وأبـوا
أن
تكـون
أشـكال
حسـني
|
مثلــت
فــي
الصـخور
والأحجـار
|
|
أكرمــوني
فـي
حاضـري
وأحبـوا
|
لـي
بقـاء
التكريـم
في
الأدهار
|
|
ونزيــل
القبــور
مهمـا
يكـرم
|
فـي
احتقار
والقبر
دار
احتقار
|
|
عجبــاً
قــرت
الرعيــة
فـي
أم
|
نـي
ولكـن
مـا
قـر
فيـه
قراري
|
|
وأفــاد
الملــوك
فـي
دول
الأر
|
ض
اقتـداري
ولم
يفدني
اقتداري
|
|
وفككــت
الإســار
عـن
كـل
عـان
|
ثــم
أصــبحت
لا
يفــك
إســاري
|
|
مـا
لهـذا
الصـبا
يزيـد
جماحاً
|
وقصــارى
الصــبا
إلـى
أقصـار
|
|
أبـداً
أجتلـي
الصفاء
إذا
استج
|
لـت
عيـوني
صـفاء
هذي
البراري
|
|
ولقــد
أنظــر
البحـار
فـأزدا
|
د
أضـطراباً
مـن
اضطراب
البحار
|
|
هائجــات
فــي
لجهــا
مائجـات
|
كالتحــام
الأقــدار
بالأقــدار
|
|
تضــرب
الشــط
ثـم
ترتـد
عنـه
|
كارتـداد
الخميـس
دون
الحصـار
|
|
وكــأن
الفضــاء
مــرآة
نفسـي
|
وكـــأني
أرى
بـــه
أفكـــاري
|
|
كـم
مقـام
هنـاك
تطلبـه
النـف
|
س
أشــتياقاً
وكـم
شـفير
هـاري
|
|
مـــع
جـــد
مســيره
لارتفــاع
|
وشــــباب
مصـــيره
لانحـــدار
|
|
ليـت
شـعري
مـاذا
أعد
لي
الده
|
ر
مـن
الويـل
بين
هذي
الصواري
|
|
تـتراءى
مثـل
الردينيـة
السـم
|
ر
تثنـــى
فــي
جحفــل
جــرار
|
|
سـاريات
بيـن
الشـبيهين
من
أف
|
ق
ومــاء
لــم
تكتحــل
بغبـار
|
|
مشــرقات
النجـوم
فـي
دول
الأف
|
لاك
مــاذا
يثنيـك
دون
السـرار
|
|
قـد
هـوى
من
سمائه
القمر
الطا
|
لـــع
هــذي
قيامــة
الأقمــار
|
|
ملأ
الكــون
حيـن
أسـفر
واسـتع
|
لـى
وكـان
المحـاق
فـي
الأسفار
|
|
وكــذا
النيـرات
تبـدو
وتخفـى
|
كالحبـاب
الطـافي
بكأس
العقار
|
|
لهــف
نفســي
علـى
حيـاء
وفـيّ
|
بزهــا
طائعــاً
لرعــي
ذمـاري
|
|
فـي
حشـاء
نـار
من
الوجد
ليست
|
مــن
وقــود
جــزل
وزنـد
واري
|
|
رام
إطفاءهـا
فلـم
يلـق
ما
يط
|
فئهــا
غيــر
ســيفه
البتــار
|
|
فجرى
النصل
في
الحشاشة
جري
ال
|
ســيل
دراً
فــي
دافـع
التيـار
|
|
يـا
قلـوب
العشـاق
مالـك
حيرى
|
المنايـــا
كــثيرة
فاختــاري
|
|
بلغـوا
الغاشـم
الذي
رام
حربي
|
فتخطــــى
ديـــاره
لـــدياري
|
|
أنــا
لا
اســتطيب
ملكــاً
بـذل
|
أنــا
لا
أســتلذ
عيشــاً
بعـار
|
|
ولئن
غـــــالني
بلا
أنصــــار
|
فســـألقى
الــردى
بلا
أنصــار
|
|
ســلبته
ســوالب
الحــب
خـدناً
|
لا
بــــذى
خدعـــة
ولا
غـــدار
|
|
حــث
أســطوله
وأقبــل
يســعى
|
فــي
جبـال
علـى
جبـال
جـواري
|
|
وتــراءت
أنـوار
ملكـي
لعينـي
|
ه
فلــم
تبصــرا
مــن
الأنـوار
|
|
حســـن
اســـكندرية
المتبــدي
|
نـاب
عـن
حسـن
رومـة
المتواري
|
|
وإذا
أســـهم
بغيــر
انتظــار
|
وإذا
غـــــارة
بلا
إنـــــذار
|
|
كــان
جبــار
معشـر
فتـولى
ال
|
لحـــظ
إذلال
ذلـــك
الجبـــار
|
|
نبـذ
الصـولجان
والصـارم
العض
|
ب
هيامـــاً
بدملـــج
وســـوار
|
|
يبتغـي
مـا
ابتغـاه
صـاحبه
أم
|
س
وهيهـــات
وصــمة
التكــرار
|
|
يضـمر
الحـب
ثـم
يبـدي
صـدوداً
|
رب
ســــر
يـــذاع
بالأضـــمار
|
|
أيهـا
الـدهر
كـم
تطيف
عليّ
ال
|
كــأس
جــاوزت
غايــة
الإسـكار
|
|
هيئي
يــا
أمــاه
مجلـس
أنسـي
|
وأعـدي
الصـبوح
لـي
يـا
جواري
|
|
ولتقــم
هــذه
القيـان
وتشـدو
|
مطربــات
ضـرباً
علـى
القيثـار
|
|
فعســـى
نغمــة
تــروح
روحــي
|
إن
روحـــي
ترتـــاح
للأوتــار
|
|
ليقـم
بيـن
اكـؤس
الـراح
عرشي
|
ثابتــاً
أســه
رفيــع
المنـار
|
|
حـــاملاً
فـــوقه
رواء
شـــباب
|
طيــب
المجتنــى
وغـض
البهـار
|
|
ولتضــيء
فـي
ظلام
نفسـي
نجـوم
|
مشــرقات
مـن
الحبـاب
الصـغار
|
|
كلآل
علـــى
الســـموط
تبـــدت
|
أو
دمـوع
علـى
خـدود
العـذاري
|
|
هـان
عندي
أن
أخلع
الهم
والتا
|
ج
جميعــاً
إذا
خلعــت
عــذاري
|
|
أضـجرتني
سياسـة
النـاس
حينـاً
|
ولئن
دام
دام
لـــي
اضـــجاري
|
|
والــذي
هــامت
البريــة
فيـه
|
زخـــرف
مـــن
تصــلف
وفخــار
|
|
أيهــا
التـاج
مـا
لبسـتك
إلا
|
وبرأســـي
بقيــة
مــن
خمــار
|
|
فوداعـاً
يـا
مجلسـاً
كنـت
شمساً
|
أتجلــى
فيــه
علــى
الحضــار
|
|
قــد
ســلا
كـل
مـن
أحـب
بحـبي
|
وتلهــى
عــن
جــاره
بجــواري
|
|
وانتهـت
دولـة
الشـباب
كأن
لم
|
تـك
كـانت
لـم
تبـق
مـن
تذكار
|
|
وفـراق
الأحبـاب
إن
صـدق
الحـب
|
م
ســـبيل
لمنـــزل
الأنتحــار
|
|
فــزت
يـا
قيصـر
ولكـن
بمـاذا
|
لا
بـــدار
نعمـــت
أو
ديـــار
|