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ليـالي
أبلـى
مـن
همـومي
وجـددي
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لـك
الأمـر
لا
تقـوى
علـى
رده
يدي
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فمــا
أرتجــي
والأربعـون
تصـرمت
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ولا
عيــش
إلا
ينتهـي
حيـث
يبتـدي
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ســكت
ســكوتاً
لا
يريـك
امتـداده
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فلا
خـاطري
بـاق
ولا
الشـعر
مسعدي
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ولا
فــيّ
مــن
روح
الشـباب
بقيـة
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ولســت
بمشــتاق
ولســت
بموجــد
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حزنـت
علـى
الماضـي
ضلالاً
ومن
يعش
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كمـا
عشـت
لـم
يحـزن
ولـم
يتجلد
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ومــالي
منــه
خـاطر
غيـر
أننـي
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عــدلت
فلــم
أفتـك
ولـم
أتعبـد
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سـقى
اللـه
دارات
القرافـة
ديمة
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تــرق
علــى
قــوم
هنالــك
هجـد
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تعـــود
كــل
بؤســها
ونعيمهــا
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وعشــنا
علــى
بـؤس
ولـم
نتعـود
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أحـن
إلـى
تلك
المراقد
في
الثرى
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ولـو
أسـتطيع
اليوم
لاخترت
مرقدي
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فــأنزلت
جســمي
منــزلاً
لا
يملـه
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يكــون
بعيــداً
عـن
أعـاد
وحسـد
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ومـا
يتمنـى
الحـر
فـي
ظـل
عيشة
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تمـــر
لأحـــرار
وتحلــو
لأعبــد
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لقــد
اتعبتنــي
والمتـاعب
جمـة
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ميسـرة
يـومي
بيـن
أمسـي
والغـد
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ألمــاً
يئن
أن
يســتريح
مجاهــد
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ألمـاً
يئن
أن
يبلغ
المنهل
الصدى
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تزهـدت
فـي
وصـل
المعالي
جميعها
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ومــن
يطلبهــا
كــأطلابي
يزهــد
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وبــت
تسـاوت
فـي
فـؤادي
مناهـج
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تــؤدي
لخفــض
أو
تــؤدي
لسـؤدد
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وأنــي
فــي
بيــت
صــغير
مهـدم
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كــأني
فــي
قصــر
كــبير
مشـيد
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عفـا
اللـه
عـن
قوم
أتاني
غدرهم
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فــرب
مسـيء
لـم
يسـء
عـن
تعمـد
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وكــم
مـن
نفـوس
يسـتطيل
ضـلالها
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ولكـم
مـتى
مـا
تبصر
النور
تهتد
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نزعـت
مـن
الآمـال
باليـأس
عائداً
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فـإن
تـدنني
منها
اللبانات
أبعد
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فلا
ترتعــي
منــي
بقلــب
معــذب
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ولا
تنجلــي
منــي
لطــرف
مســهد
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فيـا
ريح
إن
يعصف
بي
الشجو
سكني
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ويـا
غيـث
إن
يضرمني
الوجد
أخمد
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ويا
ساكنات
الطير
في
دولة
الدجى
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أرى
أن
دعـاك
الصـبح
أن
لا
تغردي
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لـــدي
شـــكايات
وأنــت
شــجية
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فــإن
تســتطيبها
لشـجوك
أنشـدي
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ولا
تحسـبي
التقليـد
يـذهب
حسنها
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فكـم
حسـنات
قـد
أتـت
مـن
مقلـد
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تركـت
الغنـى
لا
عـاجزاً
عـن
طلابه
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وأنزلـت
نفسـي
مـن
منـازل
محتدي
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وهــذي
بحمـد
اللـه
منـي
بـراءة
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فيـا
أفـق
سجلها
ويا
أنجم
أشهدي
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