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يـا
خليلاً
لـم
أكـن
عنه
خلي
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وفــؤاديَ
فـي
هـواه
مبتلـي
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إننـي
مـذ
غبت
عنكم
لم
يزل
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شخصـك
الباهي
لدى
قلبي
جلي
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يـا
سـقى
اللـه
أويقاتٍ
مضت
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معكـمُ
فـي
خيـر
ذاك
المنزلِ
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وبــبيت
الـدين
أيـام
لنـا
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أفتــديها
بـأهبلي
إذ
تلـي
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يـا
رعـى
اللـه
ثنيّـاتٍ
بها
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قـد
زهـت
فـي
كـل
روض
خضـلِ
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حلــلٌ
بــاهت
بتحــدٍ
وسـمت
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فـي
علاهـا
يالهـا
مـن
حلـلِ
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كيـف
لـم
يخضـع
لها
كل
حمى
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وبشـير
السـعد
فيهـا
ينجلي
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مـا
بهـا
عيبٌ
سوى
من
زارها
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يسـلو
عـن
أوطـانه
والطلـلِ
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وأنــا
ممــن
ســلا
أوطـانه
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عنـدما
قـد
زرتهـا
في
أملي
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غيـر
إنـي
لـو
ترانـي
وأنا
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بالمغيريّـــة
ذات
الوحـــلِ
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كـم
بهـا
مـن
زالقٍ
أو
واقعٍ
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مرتمــى
فـي
حيهـا
كالجمـلِ
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أو
ترانـي
طامسـاً
في
طينها
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وعصــاي
فـي
يـدي
كالمنجـلِ
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خلـت
أنـي
صـانع
الفخار
أو
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راعيــاً
للشــاة
أو
للإبــلِ
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لا
تسـل
عـن
سـمع
أقوالٍ
بدت
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للمعنّــى
مثـل
ريـح
الشـمّلِ
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وينــادوني
تقـدم
يـا
فـتىً
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نحــو
حــربٍ
لا
ديـبِ
واعجـلِ
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وكـذا
الـدخان
مـذ
عـمّ
بنا
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ضــيّق
النفـس
وأبكـى
مقلـي
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ونقيـر
الـدلف
فـي
هاماتنا
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كــدفوفٍ
نقــرت
فــي
جــزلِ
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ونفيـخ
الريـح
مـن
أبوابنا
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فـي
صـفيرٍ
فـاق
صوت
البلبلِ
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فكأنّــا
قـد
صـبغنا
وجهنـا
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زعفرانـاً
أو
نقيـع
الحنظـلِ
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أو
حشـونا
الجفن
من
دخاننا
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مـروداً
مـن
كحـل
حب
الفلفلِ
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حبــذا
أثوابنــا
منقوشــةً
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صـاغها
الدلف
بأنواع
الحلي
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كلمــا
كفكفـت
عينـاً
سـجمت
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قـال
دخـان
من
النار
أهطلي
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كيـف
لا
والسـقف
نادى
هابطاً
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ودّعـوا
الأحبـاب
قبل
المرحل
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وتـــرى
أخشــابه
مكســورةً
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ناشــدتنا
كــل
بيــتٍ
عطـلِ
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إنمـا
لـي
شـرفٌ
يشـفي
الأسى
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وكــذا
ينفـي
عظيـم
الوجـلِ
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ببشير
المجد
ذي
الفضل
الذي
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قـد
حبانـا
كـل
خيـر
مجـزلِ
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الأميـر
المرتضـى
رب
النـدى
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مــن
بريّــاهُ
شـفاء
العلـلِ
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حيــث
إنـي
كـل
صـبح
ومسـا
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فــايزٌ
مــن
كفــهِ
بالقبـلِ
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لا
أبـالي
من
أسا
الدهر
ولا
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مـن
تـداني
كـل
خطـبٍ
مشـكلِ
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خلّــد
اللــه
لنــا
أيـامه
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فــي
هنــاءٍ
وســرورٍ
مقبـلِ
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