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بـــاهت
بجمـــالٍ
منفــردِ
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ودلالٍ
بــــالأرواح
فــــدي
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غيـــداء
شــمس
محاســنها
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قـد
بزغـت
فـي
بـرج
الأسـدِ
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خـود
مـذ
هـام
القلـب
بها
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عـن
رشـد
هواهـا
لـم
يحـدِ
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تغـــزو
بلحـــاظٍ
فاتنــة
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وتصــول
بــتيهٍ
مــع
غيـدِ
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تفتــك
بالأســد
فقـد
كـذب
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مـن
قـال
الظبيـة
لـم
تصدِ
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خطــرت
تهــتز
فقلـت
لهـا
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اهلاً
بقوامـــكِ
ذي
الميــدِ
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روحـي
يـا
روح
ومـت
ولهـاً
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يـا
قلـب
وذوبـي
يـا
كبدي
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يـا
هنـد
بـدونك
لـم
اصـبُ
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عشــقاً
وبغيــرك
لـم
اشـدِ
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يــا
هنــد
ســلويّ
يفـداك
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والصـبر
قضـى
ومضـى
جلـدي
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لا
كـــان
غـــرامٌ
وهيــامٌ
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فيــك
لـم
ينـمٌ
ولـم
يـزدِ
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لــم
أنشــد
فيـك
منشـغفاً
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يــا
جمـرة
احشـاي
اتقـدي
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يـا
طرفـي
الساهر
ابك
دماً
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يـا
محلـول
جـواري
انعقـدِ
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جــودي
بالوصــل
ولا
تصـلي
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لمحبــك
بـل
بالوعـد
عـدي
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ان
جــاء
بشــير
منـك
بـه
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لــوهبت
الـروح
يـداً
بيـدِ
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قــولي
لعـذولي
يعـزل
عـن
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ذا
المعنـى
فلسـت
بمرتشـدِ
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يكفــف
عــن
نصـحي
وملامـي
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فالنصــح
بحبــك
لـم
يفـدِ
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ان
كـان
العـذل
بـه
دينـاً
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يــا
هنــد
فلسـت
بمعتقـدِ
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قلـــبي
بهـــواك
معــتزلٌ
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لا
أشــركه
مــن
بعـد
هـدي
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توحيــد
غرامــك
لـي
شـرفٌ
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والفضــل
إلـى
عبـد
الاحـدِ
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مـولىً
قـد
شـمخت
وارتفعـت
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عليـــاه
علــى
أعلا
عمــدِ
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نـــدبٌ
أوصـــاف
محامــدهِ
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تسـمو
وتفـوق
علـى
العـددِ
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مــا
امّ
نــداه
فــتىً
الاَّ
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وحظــي
بــالغوث
وبالمـددِ
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مـــا
فــاه
بلاء
لقاصــده
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مــا
اســمعَ
ســايله
لغـدِ
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يــا
لهفــة
ظمــآنٍ
ولــه
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لصــفا
مــورده
لــم
يـردِ
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افــديه
بروحــي
مـن
بطـلٍ
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ورعــاه
المـولى
مـن
اسـدِ
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بخطــوب
الــدهر
لـه
قلـبٌ
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قــد
فُصــّل
مـن
صـخرٍ
صـلدِ
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قــــرمٌ
قهـــارٌ
مقتـــدرٌ
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بــــازٌ
فتَّـــاكٌ
بالأســـدِ
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لا
تقصـــد
غيــر
مطــارمه
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فســـواه
ملاذاً
لــم
تجــدِ
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ان
ودّ
صــفا
أو
قـال
وفـي
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وكفــى
وشـفى
علـل
الكبـدِ
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قــد
حـاز
نقـى
وعلاه
رقـى
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وحمـــاه
وقــى
للمنطــردِ
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والقـــدر
علا
منـــه
وحلا
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والخُلــق
جلا
غيــم
الكمـدِ
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والمجـد
نمـا
والسـعد
سما
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والجـود
همـى
والكـف
نـدي
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والحسـن
زهـا
واللفـظ
شها
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والحـزم
نهـى
عـن
كـل
ردي
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مـولىً
كـم
حـاز
سـنا
وثنا
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ودنــا
بــالخير
لمبتعــدِ
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لاحيــه
لــوى
وذوى
وهــوى
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والجمـر
كـوى
قلـب
الحسـدِ
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يــا
نفــس
بـه
لا
تشـتبهي
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فـــالامن
بـــه
للمُرتعــدِ
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يـا
شـوق
تسـهب
فيـه
وطـل
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يـا
شـرح
هـواي
بـه
انسردِ
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خفقــت
بــالفخرة
رايتــه
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وعلـت
نعمـاه
علـى
الجلـدِ
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كــم
رامــت
اعـداه
حسـداً
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اخفــاض
لــواه
فلـم
تسـدِ
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يــا
قلــب
ترنــم
بهـواه
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وبحمــد
جميــل
ثنـاه
شـدِ
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وانشـد
بـابي
درويـش
وقـل
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يـا
عـذب
المنهـل
يا
سندي
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دم
واسلم
يا
ذا
الباز
وطل
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عمــراً
بهنــا
عيــشٍ
رغـدِ
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فــالترك
اتــاك
بمفــردةٍ
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قــد
نظمــت
مــن
درّ
نضـدِ
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داعٍ
لــك
فــي
حسـن
ختـامِ
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وســعودٍ
دام
إلــى
الابــدِ
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وجمـــــالٍ
ارّخ
وبهــــاءٍ
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محفــــوظ
بـــالهٍ
صـــمدِ
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