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ان
تسـلني
اخـا
التصـابي
فشرحي
|
مـن
مصـابي
لقـد
غـدا
مسـتطيلا
|
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حــادثٌ
مـن
عجـايب
الـدهر
خطـبٌ
|
بــات
فيــه
لسـان
وصـفي
كليلا
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عنــدما
زرت
بلــدتي
بعـد
حيـن
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طـال
والـدهر
كـان
عنـي
غفـولا
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واغتنمــت
ايتلاف
قــومي
وصـحبي
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بالغــاً
فــي
لقـاهم
المـأمولا
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مجتليــاًّ
مـا
بينهـم
كـاس
صـفوٍ
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وائتنـاس
قـد
رحـت
منـه
ثمـولا
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حســبي
اللـه
حيـث
لـم
ادر
الا
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والهيـاج
المريـع
قـدّ
بـي
ليلا
|
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والبلا
حـــاق
والمدينــة
ضــّجّت
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والقضـا
قـد
اثـار
نـوراًّ
مهولا
|
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والجنــود
الـذين
قـد
خلـت
كلا
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منهـم
فـي
شراسـة
الطبـع
غـولا
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هيَّجــوا
فتنـةً
إلـى
الجـوّ
عجَّـت
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وانتشــت
بغتــةً
فـالفت
خمـولا
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واســتقر
البلا
علــى
كــل
شـخصٍ
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عنـد
أهـل
الحمـى
غـدا
مجهـولا
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ليـت
لـو
كنـت
يـا
خليلي
تراني
|
كيــف
امســيت
حــايراً
مـذهولا
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مختبيّــــا
بمعــــزل
مســـتقل
|
قــد
توّسـدت
فيـه
عرضـاً
وطـولا
|
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فاحتســبت
هنــاك
مـاواي
لحـداً
|
حيــث
أنـي
عـددت
ذاتـي
قـتيلا
|
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ظاننـــاً
أننــي
بــه
اتــوارى
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عـن
جنـود
حكوا
القرود
الفحولا
|
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لا
وعينيــك
بــل
تعنـوا
لكبسـي
|
حيــث
مـا
كنـت
خافيـاً
معـزولا
|
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واســتدلوا
علــي
مــن
امـرءّاةٍ
|
ذات
عهــر
كــانت
لهـم
دالـولا
|
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فانتهضـــت
متعمــداً
ملتقــاهم
|
هاتفــاً
مــن
تحيــرّي
لا
حــولا
|
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قلــت
مـا
هـذه
الرزيـة
قـالوا
|
امــر
مـولى
علا
علـى
كـل
مـولا
|
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جــاء
فــي
سـجن
كـل
بـرّيّ
جنـسٍ
|
يحـرث
الأرض
ثـم
يرعـى
العجـولا
|
|
قلــت
تـالله
مـا
انـا
رب
حـرث
|
لا
ولا
قــد
فلحــت
عمـري
حقـولا
|
|
بـل
ولا
قـد
بـذرت
فيهـا
حبوبـاً
|
لا
ولا
قــد
جنيــت
منهـا
بقـولا
|
|
بــل
أنــا
شــاعرٌ
حقيـرٌ
فقيـرٌ
|
انظـم
الشـعر
محسـناً
فيـه
قولا
|
|
أطنـب
المـدح
في
الموالي
وارجو
|
منهـم
الرفـد
والعطـاء
الجزيلا
|
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فـانثنى
بعضـهم
وقـد
قال
لي
قم
|
واسـعَ
للسـجن
واتركـن
الفضـولا
|
|
قلـت
سـمعاً
وسـرت
حيث
استشاروا
|
خايضـاً
فـي
الظلام
تلـك
الوحولا
|
|
فانتهينــا
حــتى
لــديوان
والٍ
|
حــاز
بيـن
الـولاة
قـدراً
جليلا
|
|
ويزدهــي
فــي
منــاقب
مـع
خلالٍ
|
قـد
دعتـه
إلـى
المعـالي
خليلا
|
|
فــانتحى
نحــو
نجـدتي
رب
فضـلٍ
|
سـيد
فـي
المقـام
أضـحى
نـبيلا
|
|
نعـم
قـاض
علـى
القضـاة
تسـامى
|
ذروةً
بـــل
وفـــاقهم
تفضــيلا
|
|
خلـد
اللـه
اجـره
حيـث
مـا
قـد
|
ردّ
عنـــي
القضـــاء
ردًّا
جميلا
|
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حينمــا
قـال
إن
ذا
مـن
أهـالي
|
حيّنـا
ثـم
قـدى
أقـام
الـدليلا
|
|
هكــذا
المفــتى
المعظـم
قـدراً
|
ثــم
والقاســم
الشـريف
اصـولا
|
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كلهـــــم
تصــــدّوا
لعــــوني
|
فاســتحقوا
المديــح
والتبجيلا
|
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واكتفـى
الحـاكم
الحليم
بما
قد
|
علَّلــــو
واحســــنوا
التعليلا
|
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واسـتمالوه
حـتى
قـد
قال
لي
سر
|
واحتظيــتُ
مــن
كفـه
التقـبيلا
|
|
وارتجعــــتُ
بخفــــةٍ
ونشـــاطٍ
|
نحـو
بيـتٍ
قـد
كنـت
فيـهِ
نزيلا
|
|
وابتــدرتُ
فــي
دعــاءي
لقــاضٍ
|
بـــتّ
لــولاه
مســجناً
معقــولا
|
|
واعتمـدت
الخـروج
مـن
دار
جـورٍ
|
شـمت
فيهـا
ما
قد
احار
العقولا
|
|
وانثنيــت
مســتعطفاً
مـن
تـولى
|
أمرهــا
ان
يــرق
لـي
مسـتميلا
|
|
ثـــم
يعفــو
ويرحمــنّ
عجــوزاً
|
صــيرته
الهمــوم
هرمـاً
كهـولا
|
|
فاتقى
الله
بي
وقد
قال
لي
ارحل
|
حيثمـا
شـئت
ان
اثـرت
الـرحيلا
|
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فــانجلت
غمــتي
فقلــت
لقلـبي
|
قـل
لـك
البشر
والهنا
يا
نقولا
|
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فــانتهجت
السـرى
وجـديت
فـوراً
|
حيــث
أعطيــت
للثنــاء
سـبيلا
|
|
فابتـدى
ان
يصـدّ
عزمي
ابن
اختي
|
قـــايلاً
لا
تقـــرّب
المســتحيلا
|
|
ولا
وتــالله
لسـت
أدعـوك
تمضـي
|
بــل
ولا
ارتضــي
بــذاك
قبـولا
|
|
دعـك
يـا
خـال
عنـدنا
كـي
نقضّي
|
مـا
ينـافي
ذاك
الاسـى
والهـولا
|
|
قلـــت
لا
شــك
أن
فيــك
اختلالاً
|
حيثمــا
أنــت
تســتخف
الثقيلا
|
|
ويــك
أن
الالــه
نــادى
بعتقـي
|
فـــاعتقّني
ولا
تكـــن
بهلــولا
|
|
خلنــي
اطــوي
الفيـافي
واعـدو
|
فـي
الصـحاري
واكتفـي
التكبيلا
|
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واصـطفيت
المسـير
مـن
دار
سـجن
|
مســـتخيراً
بــذاك
ربــاًّ
جليلا
|
|
وانفصــلتُ
عــن
المقـام
وقلـبي
|
ذاكــراً
فيــه
ذلــك
الاحبــولا
|
|
والعزيــز
القـدير
واسـى
بعـونٍ
|
فيــه
قـد
نلـت
للـديار
وصـولا
|
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وابتــدأتُ
ابــثّ
حمــداً
وشـكراً
|
مســتديماً
لــه
مديــداً
جـزيلا
|
|
راجيــاً
منــه
رحمـةً
ثـم
عفـواً
|
ثــم
لطفــاً
يعــمّ
عبـداً
ذليلا
|
|
قـد
حكـى
قصـة
طـوى
مـذ
رواهـا
|
مسـهب
الشـرح
واسـتخار
القليلا
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