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اللــه
جــارك
إنَّ
دمعــيَ
جـاري
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يــا
مــوحشَ
الأوطــان
والأوطـار
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لمـا
سـكنت
مـن
الـتراب
حديقـة
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فاضــت
عليــك
العيـنُ
بالأنهـار
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شـتان
مـا
حـالي
وحالـك
أنت
في
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غـرفِ
الجنـان
ومهجـتي
في
النار
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خـفّ
النجا
بك
يا
بنيّ
إلى
السرى
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فســـبقتني
وثقلـــتُ
بــالأوزار
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ليـت
الرّدى
إذ
لم
يدعك
أهاب
بي
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حــتى
نــدوم
معـاً
علـى
مضـمار
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ليـت
القضـا
الجـاري
تمهل
وِرده
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حــتى
حســبت
عــواقب
الإصــدار
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مــا
كنـت
إلا
مثـل
لمحـة
بـارق
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ولــى
وأغــرى
الجفـن
بالإمطـار
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أبكيـك
مـا
بكـت
الحمامُ
هديلها
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وأحــنّ
مــا
حنـت
إلـى
الأوكـار
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أبكــي
بمحمــرِّ
الـدّموع
وإنمـا
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تبكــي
العيـون
نظيرهـا
بنضـار
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قــالوا
صـغيراً
قلـت
إنَّ
وربمـا
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كـانت
بـه
الحسـرات
غيـر
صـغار
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وأحـقّ
بـالأحزان
مـاض
لـم
يسـيء
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بيــــدٍ
ولا
لســـنٍ
ول
إضـــمار
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نـائي
اللقـا
وحماه
أقرب
مطرحاً
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يــا
بعــد
مجتمـع
وقـرب
مـزار
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لهفــي
لغصــن
راقنــي
بنبـاته
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لــو
أمهلتــه
الــتربُ
للإثمـار
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لهفــي
لجــوهرةٍ
خفــت
فكـأنني
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حجبتهــا
مــن
أدمعــي
ببحــار
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لهفــي
لسـار
حـار
فيـه
تجلـدي
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وا
حيرتــي
بــالكوكب
الســيَّار
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سـكن
الـثرى
فكـأنه
سـكن
الحشا
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مـن
فـرط
مـا
شـغلت
بـه
أفكاري
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أعــزِز
علـيّ
بـأن
ضـيف
مسـامعي
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لـم
يحـظَ
مـن
ذاك
اللسان
بقاري
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أعـزز
علـيّ
بـأن
رحلـت
ولم
تخض
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أقــدام
فكــرك
أبحــر
الأشـعار
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أعـزز
علـيّ
بأن
رفقت
على
الردى
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وعليــك
مــن
دمعـي
كـدّر
نثـار
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أبنــيّ
إن
تكــسَ
الـتراب
فـإنه
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غايــات
أجمعنــا
وليــس
بعـار
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مـا
فـي
زمانـك
مـا
يسـّر
مؤملاً
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فـاذهب
كمـا
ذهب
الخيال
الساري
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لــو
أن
أخبــاري
إليـك
توصـلت
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لبكيـتَ
فـي
الجنـات
مـن
أخباري
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أحــزان
مــدّكرٍ
ووحشــةُ
مفــردٍ
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ومقـــام
مضـــيعة
وذلّ
جـــوار
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أبنـيّ
إنـي
قـد
كنزتك
في
الثرى
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فــانفع
أبــاك
بسـاعة
الإقتـار
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أبنــيّ
قــد
وقفـت
علـيّ
حـوادثٌ
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فــوقفنَ
مــن
طلــل
علـى
آثـار
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ومضـى
البياض
من
الحياة
وطيبها
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لكنهــا
أبقتــه
فــوق
عــذاري
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نـمْ
وادعـاً
فلقـد
تقـرح
نـاظري
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ســهراً
ونــامت
أعيــنُ
السـمار
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أرعـى
الـدّجى
وكـأنَّ
ذيـل
ظلامـه
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متشــبثٌ
بــالنجم
فــي
مســمار
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خلـع
الصـباح
علـى
المجرة
سجفه
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أم
قســمت
شــمس
النهـار
دراري
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أم
غـاب
مـع
طفـل
أخيـرُ
دجنـتي
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لا
كوكـــبي
فيهــا
ولا
أســحاري
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تبًّـا
لعاديـةِ
الزمان
على
الفتى
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فلقـد
حـذرت
ومـا
أفـاد
حـذاري
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وحـويت
دينـاراً
لوجهـك
فـانتحى
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صــرف
الزمـان
فـراح
بالـدينار
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أبنـيّ
إن
تبعـد
فـإنَّ
مدى
اللقا
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بينــي
وبينــك
مســرِعُ
التيـار
|
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إن
تسـقني
فـي
الحشر
شربة
كوثرٍ
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فلقــد
ســقتك
مــدامعي
بغـزار
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كيـف
الحيـاة
وقـد
دفنت
جوانحي
|
مــا
بيــن
أنجـادٍ
إلـى
أغـوار
|
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وحــوى
نــبيّ
تـراب
مصـر
وجلـق
|
كــالغيم
مرتكنــاً
علـى
أقمـار
|
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طرقـت
علـى
تلـك
النفـوس
طوارق
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وطـرت
علـى
تلـك
الجسـوم
طواري
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وبـدت
لـدى
البيـدا
مطي
قبورهم
|
علمـــاً
بــأنهمُ
علــى
أســفار
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قسـماً
بمـن
جعـل
الفنـاء
مسافة
|
إنــا
علــى
خطــرٍ
مـن
الأخطـار
|
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قــل
للــذين
تقــدمت
أمثـالهم
|
أيــن
الفــرار
ولات
حيـن
فـرار
|
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مــا
بيــن
أشـهبَ
للظلام
معـاود
|
ركضــاً
وأدهــم
للــدجى
كــرار
|
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يطـأ
الصـغير
ومـن
يعمـر
يلتحق
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وعليــه
مــن
شـيبٍ
كنقـع
غبـار
|
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مـالي
وعتـب
الشـهب
في
تقديرها
|
ولقــد
تصــاب
الشـهب
بالأقـدار
|
|
لا
عقـرب
الفلك
اللسوب
من
الردى
|
ينجـو
ولا
أسـد
الـبروج
الضـاري
|
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يرمــي
الهلال
بقوســه
أرواحنـا
|
ولقــد
يصــاب
القـوس
بالأوتـار
|
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كتـب
الفنـاء
علـى
الشواهد
حجة
|
غنيــت
عــن
الإقــرار
والإنكـار
|
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فلتظهـر
الفطـن
الثـواقب
عجزها
|
فظهـــوره
ســـر
مــن
الأســرار
|
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وليصـــطبر
متفجـــع
فلربمـــا
|
فقــد
المنــى
ومثوبـة
الصـبَّار
|
|
أين
الملوك
الرافلون
إلى
العلى
|
عــثروا
إلـى
الأجـداث
أيّ
عثـار
|
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كـانوا
جبـالاً
لا
تـرام
فأصـبحوا
|
بيــد
الـردى
حفنـات
تـربٍ
هـار
|
|
أيـنَ
الكمـاةُ
إذ
العجاجة
أظلمت
|
قـدَحوا
القسـيّ
وناضـلوا
بشـرار
|
|
سـلموا
على
عطب
الوغى
ودجى
بهم
|
داجـي
المنـون
إلـى
محـل
بـوار
|
|
أيـن
الأصـاغر
فـي
المهود
كأنما
|
ضــمت
كمائمهــا
علــى
أزهــار
|
|
خلـط
الحمـام
عظـامهم
ولحـومهم
|
حــتى
تســاوى
الــدّرّ
بالأحجـار
|
|
فلئن
صـبرت
ففـي
الأولـى
متصـبرٌ
|
ولئن
بــدا
جزعــي
فعـن
أعـذار
|
|
درّت
عليــك
مـن
الغمـام
مراضـعٌ
|
وتكنفتــك
مــن
النجــوم
جـوار
|
|
تسـقي
ثـراك
وليـس
ذاك
بنـافعي
|
لكـــن
أغــالط
مهجــتي
وأداري
|