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ليـتَ
شـعري
أهكـذا
نحـنُ
نمضـي
|
فــي
عُبــابٍ
إلـى
شـواطئَ
غُمْـضِ
|
|
ونخـوضُ
الزمـانَ
فـي
جُنْـحِ
ليـلٍ
|
أبــديٍّ
يُضــني
النفـوسَ
ويُنضـي
|
|
وضـفافُ
الحيـاةِ
ترمقهـا
العـي
|
نُ
فبعــضٌ
يمــرُّ
فـي
إثـر
بعـضِ
|
|
دون
أنْ
نملـك
الرجـوعَ
إلـى
ما
|
فــات
منهــا
ولا
الرسـوَّ
بـأرضِ
|
|
حـدثي
القلـبَ
يـا
بحيرةُ
ما
لي
|
لا
أرى
أولفيــرَ
فــوق
ضــفافكْ
|
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أوشــك
العــامُ
أن
يمـرّ
وهـذا
|
موعــدٌ
للقــاء
فــي
مصــطافكْ
|
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صـخرةَ
العهـد
ويـكِ
هأنـذا
عـد
|
تُ
فمــاذا
لــديكِ
عـن
أضـيافكْ
|
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عـدتُ
وحـدي
أرعَـى
الضفاف
بعينٍ
|
سـفكتْ
دمعَهـا
الليالي
السوافكْ
|
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كنــتِ
بـالأمسِ
تهـدرين
كمـا
أنْ
|
تِ
هــديراً
يهــزُّ
قلـبَ
السـكونِ
|
|
وضـــفافٍ
أمواجهــا
يتــداعين
|
علــى
هــذه
الصــخور
الجــونِ
|
|
والنسـيمُ
العليـل
يـدفع
وهْنـاً
|
زَبَــدَ
المـوج
للرُّبـى
والحـزونِ
|
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ملقيــاً
رغوَهــا
علـى
قـدميها
|
ليّــنَ
المــسِّ
مســتحبَّ
الأنيــنِ
|
|
أتُــرى
تــذكرينَ
ليلــةَ
كنــا
|
منـكِ
فـوق
الأمـواج
بين
الضفافِ
|
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وســـرى
زورقٌ
بنـــا
يتهــادى
|
تحـت
جنـح
الـدجى
وسترِ
العفافِ
|
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فـي
سـكونٍ
فليـس
نسـمعُ
فوق
الْ
|
مَـــوج
إلا
أغـــانيَ
المجــدافِ
|
|
تتلاقـى
علـى
الرُّبـى
والحـوافي
|
بأناشـــيدِ
موجـــكِ
العـــزَّافِ
|
|
وعلـــى
حيــن
غــرةٍ
رنَّ
صــوتٌ
|
لـــم
يُعَـــوَّدْ
ســماعَه
إنســيُّ
|
|
هبــط
الشــاطئَ
الطــروبَ
فمـا
|
يُســـمعُ
فيــه
للهاتفــات
دويُّ
|
|
وإذا
الليـلُ
سـاهمٌ
سـكنَ
النـو
|
ء
إليــــه
وأنصـــتَ
اللجـــيُّ
|
|
يتلقـى
عـن
نبـأةِ
الصـوت
نجوى
|
كلمـــاتٍ
ألقـــى
بهــنَّ
نجــيُّ
|
|
يـا
زمانـاً
يمـرُّ
كـالطير
مهلاً
|
طــائر
أنـتَ
ويـك
قِـفْ
طيرانـكْ
|
|
أهنـاءَ
السـاعات
تجـري
وتعـدو
|
نـا
عطاشـاً
فقـفْ
بنـا
جريانـكْ
|
|
ويـكَ
دَعْنـا
نمـرحْ
بأجمـلِ
أيـا
|
مٍ
ونلقـى
مـن
بعـد
خـوفٍ
أمانكْ
|
|
وإذا
نحــن
لَـذَّةَ
العيـش
ذقنـا
|
هــا
ومـرَّت
بنـا
فَـدُرْ
دورانـكْ
|
|
بيـد
أنَّ
الشـقاءَ
قـد
غمـر
الأر
|
ضَ
وفــاضَ
الوجـودُ
بالتاعسـينا
|
|
كلهــم
ضــارعٌ
إليــك
يرجِّيــك
|
فأسـرع
أسـرعْ
إلـى
الضـارعينا
|
|
وافــترس
مُشـقيات
أيـامهم
وامْ
|
ضِ
رحــىً
تطحـن
الشـقاء
طحونـا
|
|
رحمـةً
فـاذكر
النفـوسَ
الحزانى
|
وانـسَ
يـا
دهرُ
أنفس
الناعمينا
|
|
عبثــاً
أنشــدُ
البقــاءَ
لعهـدٍ
|
يَفْلِــتُ
اليـومَ
مـن
يـدي
ويفـرُّ
|
|
وســويعاتِ
غبطــةٍ
مــا
أراهـا
|
ووشــيكاً
مــا
تنقضــي
وتمــرُّ
|
|
وأنـادي
يـا
ليلـة
الوصـل
قرّى
|
إن
بعــد
السـُّرى
يطيـب
المقـرُّ
|
|
أســـفاً
للصــِّبا
وغــرِّ
ليــالٍ
|
ليــس
يُبقـي
علـى
صـباهنَّ
فجـرُ
|
|
فلنحــبَّ
الغــداة
ولنحـي
حُبَّـا
|
ولنكـنْ
فـي
الحيـاةِ
بعضاً
لبعضِ
|
|
ولنســارعْ
فنقتفـي
إثـرَ
سـاعا
|
تٍ
فقـد
تـؤذنُ
النـوى
بالتقضـِّي
|
|
إننـا
فـي
الحيـاةِ
في
عُرْضِ
بحرٍ
|
ليـس
نُلقـي
المرسـاةَ
فيه
بأرضِ
|
|
مــا
بــه
مرفــأ
يَـبينُ
ولكـنْ
|
نحـن
نمضـي
فـي
لجِّـه
وهو
يمضي
|
|
أكـذا
أنـتَ
أيهـا
الزمـن
الحا
|
قــدُ
تغتــال
نشــوة
اللحظـاتِ
|
|
حيـث
يُزجـي
لنـا
السعادَةَ
أموا
|
جــاً
مـن
الحـبِّ
زاخـرُ
اللجـاتِ
|
|
أكـذا
أنـت
ذاهـبٌ
بليـالي
الص
|
صــَفوِ
عنــا
ســريعةَ
الخطـواتِ
|
|
أكـــذا
تنقضـــي
حلاوةُ
نعمــا
|
هـا
كمـا
ينقضـي
شـقاءُ
الحياةِ
|
|
كيــف
حـدِّثْ
أغالهـا
منـك
صـرفٌ
|
فـي
أبيـدِ
الزَّمـانِ
حيـث
طواها
|
|
ويـك
قـل
لـي
أليـسَ
نملك
يوماً
|
أن
نراهــا
أمـا
تـبينُ
خطاهـا
|
|
أتراهــا
ولَّــتْ
جميعــاً
ولمـا
|
تبــقَ
حــتى
آثارُهــا
أتراهـا
|
|
أو
ذاك
الدهر
الذي
افتنَّ
في
صو
|
غِ
صـباها
هـو
الـذي
قـد
محاها
|
|
أيْ
أبيـدَ
الزمـانَ
والعدمَ
العا
|
تــي
غريقيـن
فـي
سـكونٍ
وصـمتِ
|
|
أيْ
عميـقَ
اللجـات
مـاذا
بأيـا
|
م
صــبانا
مــاذا
بهــن
صـنعتِ
|
|
حـدثيني
أمـا
تعيـدين
مـا
مـن
|
ســكراتِ
الغـرامِ
منـا
اختطفـتِ
|
|
أو
مــا
تُطلقينهـا
مـن
ديـاجي
|
كِ
أمــا
تبعثينهــا
بعـد
مـوتِ
|
|
أنـتِ
يـا
هـذه
البحيـرةُ
مـاذا
|
يكتــمُ
المــوجُ
فيـك
والشـطآنُ
|
|
أيهــا
الغابــةُ
الظليلـةُ
رُدِّي
|
أنـت
يا
من
أبقى
عليها
الزمانُ
|
|
وهــو
يسـتطيعُ
أن
يُجـدَّكِ
حسـنا
|
إحفظـــي
لا
أصــابك
النســيانُ
|
|
قــلَّ
حفظــاً
أن
تــذكري
ليلـةً
|
مــرَّتْ
وأنـتِ
الطبيعـةُ
الحسـَّانُ
|
|
ليكُـنْ
منـك
يـا
بحيـرةُ
مـا
لجَّ
|
بـك
الصـمتُ
أو
جنـون
اصـطخابكْ
|
|
فــي
مغانيــكِ
حاليـاتٍ
تـراءى
|
ضــاحكاتٍ
علــى
ســفوح
هضـابكْ
|
|
فـي
مـروج
الصـنوبر
الحوِّ
تهفو
|
ســابغاتِ
الأليـاف
حـول
شـعابكْ
|
|
فـي
نتـوءِ
الصخور
مشرفة
الأعنا
|
قِ
بيضــاً
تطــلُّ
فــوق
عبابــكْ
|
|
وليكـن
فـي
العبـاب
يهدر
أموا
|
جـاً
علـى
شـاطئيك
مثـل
الرعودِ
|
|
فـي
انتحابِ
الرياح
تعول
في
ال
|
وِديـان
إعـوال
قلـبيَ
المفـؤودِ
|
|
فـي
صـدى
الجـدولِ
الموقّـع
أنّا
|
تِ
حشــاهُ
بالجنــدلِ
الجلمــودِ
|
|
فـي
شـذاكِ
السـريِّ
ينشقُ
منه
ال
|
قلــب
ريَّــا
فردوسـه
المفقـودِ
|
|
وليكـنْ
فـي
النسـيم
ما
هبَّ
سار
|
يـهِ
يجـوبُ
الشـطآن
نحـوكِ
جوبا
|
|
فـي
جـبين
النجمِ
اللجينيِّ
يُلقي
|
فِضـَّةَ
الضـوءِ
فـي
مياهـك
ذوبـا
|
|
وليكـنْ
فـي
شـتيتِ
ما
تسمع
الأذ
|
نُ
وفيمــا
نـراهُ
عينـاً
وقلبـا
|
|
ليكـنْ
هـاتفٌ
مـن
الصـوتِ
يتلـو
|
قــد
أحبَّـا
وأخلصـا
مـا
أحبـا
|