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تبـارك
اللـه
خـالق
الكرم
ال
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بــارع
مــن
حمـأة
ومـن
علـقِ
|
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مـاذا
رعينـاه
فـي
جنـاب
فتى
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كالبـدر
يجلـو
غواشـي
الغسـقِ
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أزمـــانه
كلهـــا
بنـــائله
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مثـل
زمـان
الربيـع
ذي
الأنـق
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أشهر
في
الناس
بالجميل
من
ال
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أبلــق
بيـن
الجيـاد
بـالبلق
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فـتىً
يرى
المجد
ما
أخلَّ
به
ال
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تمجيـد
كـالحق
غيـر
ذي
الطبق
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فيشــتري
عـالي
الثنـاء
ولـو
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أملـق
مـن
مـاله
سـوى
العُلَـق
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تلقـاه
كـالمربَع
المَريـع
إذا
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شـئت
وطـوراً
كـالمورد
الرفـق
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فراتــع
فيــه
غيــر
ذي
غصـص
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وكــارع
فيــه
غيــر
ذي
شـرق
|
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يكنى
أبا
الفضل
وهو
منتجع
ال
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فضـل
ومـا
قلـت
ذاك
عـن
ملـق
|
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وخيـر
مـا
يكتنـى
الرجـال
به
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كنيـــة
لا
نحلـــة
ولا
ســـَرق
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عبـد
المليك
المقلِّد
المنن
ال
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زهــر
قــديماً
معاقـدَ
الريـق
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يتخــذ
المــال
حيــن
يملكـه
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واقيـــة
كالــدروع
والــدرق
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مـن
آل
عبـاس
الكـرام
ذوي
ال
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ســؤدد
والفــائزين
بالســبق
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بحــر
بحــور
إذا
نزلــت
بـه
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أصــبحت
مــن
مــوجه
بمصـطفق
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يفهـــق
بالنــائلين
ســاجله
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عنــد
الســؤالين
أيَّمـا
فهـق
|
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منطلــق
الكــف
واللسـان
إذا
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ســـوئل
وامتيــح
أيَّ
منطلــق
|
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بنــائل
مــن
نـدى
وآخـر
مـن
|
علـــم
ففيــه
أتــم
مرتفــق
|
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يجــري
إلــى
كـل
غايـة
شـطط
|
لــم
تُلتَمـس
قبلـه
ولـم
تطـق
|
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كمـا
جـرى
الطـرف
غير
ذي
صكك
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يفـــلُّ
مــن
غربــه
ولا
طَــرق
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شــاهد
أعراقــه
الـتي
كرمـت
|
صــفاء
أخلاقــه
مــن
الرنــق
|
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أصـبح
مـن
فضـله
يحـلُّ
مـن
ال
|
أهــواء
طـراً
بملتقـى
الفـرق
|
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ظلنــا
لــديه
بمنــزل
خصــب
|
فــي
مَــرَع
تــارة
وفـي
غـدق
|
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يســمعنا
الشــدو
عنـده
غـرِدٌ
|
كالسـطر
في
المُسمعين
لا
اللَّحق
|
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يشـدو
فيحيـي
لنا
السرور
وإن
|
ألفـاه
ميتـاً
فـي
آخـر
الرمق
|
|
مــتى
يُقــدَّر
لمــن
ينــادمه
|
مصــــطبح
يتصـــل
بمغتبـــق
|
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يسـقي
النـدامى
فيشـربون
لـه
|
كشــرب
فرعــون
سـاعة
الغـرق
|
|
قــــديمه
مطـــرب
ومحـــدثه
|
فهــو
جديـد
الجديـد
والخَلِـق
|
|
مــا
عيبــه
غيــر
أنـه
رجـل
|
يـدعو
ذوي
حلمنـا
إلـى
النزق
|
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يقلـق
مـن
حسن
ما
يجيء
به
ال
|
زمِّيــت
بــل
يطمئن
ذو
القلـق
|
|
كنيتـــه
شــِقَّةُ
الســلامة
وال
|
ســلمِ
سـلامٌ
لتلـك
فـي
الشـقق
|
|
أبـو
سـليمان
ذو
الإصـابة
وال
|
إحسـان
وابـن
الملوك
لا
السوَق
|
|
يـا
حسـن
ذاك
الغنـاء
يشـفعه
|
هــدير
تلـك
الحمـائم
الحـزق
|
|
مــن
ذي
تلاويــن
وشــيُهُ
حسـن
|
ومــن
بهـم
الـدجى
ومـن
لهـق
|
|
ونحــن
نُسـقَى
شـراب
فـي
فجـر
|
ثنــاؤه
مــن
فــواكه
الرُّفَـق
|
|
لا
يمنــع
الــري
طـالبيه
ولا
|
يســقي
نـديماً
لـه
علـى
تـأق
|
|
وفّــــاه
قـــوّامه
قيـــامهمُ
|
وأنفقــــت
كفـــه
بلا
فـــرق
|
|
علـــى
دنــان
كأنهــا
جثــث
|
مـن
قـوم
عـاد
عظيمـة
الخلـق
|
|
فجـاء
شـيء
إذا
الـذباب
دنـا
|
منــه
دنـواً
دنـا
مـن
الزهـق
|
|
يلقـاك
فـي
رقـة
الشـراب
وفي
|
نشـر
الخزامـى
وصـفرة
الشـفق
|
|
ظــــاهره
ظــــاهر
يحرِّمُـــه
|
ومــا
علـى
شـاربيه
مـن
رهـق
|
|
لـــه
صـــريح
كـــأنه
ذهــب
|
ورغـــوة
كـــاللآلئ
الفلـــق
|
|
يختــال
فــي
منظــر
يزينــه
|
مــن
الرحيـق
العـتيق
مسـترق
|
|
تــديره
جونــة
تحــرّق
بــال
|
دلِّ
إذا
الــبيض
جُـدنَ
بـالرمق
|
|
سـوداء
لـم
تنتسب
إلى
برص
ال
|
شـــقر
ولا
كُلفـــة
ولا
بهـــق
|
|
ليسـت
مـن
العبـس
الأكف
ولا
ال
|
فلـح
الشـفاه
الخبـائث
العرق
|
|
بـل
مـن
بنـات
الملـوك
ناعمة
|
تنشــر
بالــدلِّ
ميِّــت
الشـبق
|
|
فــي
ليـن
سـمورة
تخيَّرهـا
ال
|
فــراء
أو
ليــن
جيـد
الـدلق
|
|
تـذكرك
المسـك
والغـوالي
وال
|
ســُكَّ
ذوات
النســيم
والعبــق
|
|
هيفــاء
زينــت
بخمـص
محتضـَنٍ
|
أوفــى
عليــه
نهــود
معتنـق
|
|
غصــن
مــن
الآبنـوس
أُلِّـفَ
مـن
|
مــــؤتَزَرٍ
معجـــب
ومنتطـــق
|
|
يهــتز
مـن
ناهـديه
فـي
ثمـر
|
ومــن
دواجــي
ذراه
فــي
ورق
|
|
أكســبها
الحــبَّ
أنهـا
صـُبغت
|
صــبغة
حَــبِّ
القلـوب
والحـدق
|
|
فانصـرفت
نحوهـا
الضمائر
وال
|
أبصــار
يُعنِقــن
أيَّمــا
عنـق
|
|
يفــترُّ
ذاك
السـواد
عـن
يقـق
|
مــن
ثغرهــا
كـاللآلئ
النسـق
|
|
كأنهـــا
والمــزاح
يضــحكها
|
ليــل
تفــرّى
دجـاه
عـن
فلـق
|
|
سـحماء
كـالمهرة
المُطهمَّـة
ال
|
دهمــاء
تنضــو
أوائل
الصـِّيَق
|
|
تجــري
ويجـري
رسـيلُها
معهـا
|
شــأوين
مســتعجلين
فـي
طلـق
|
|
لهــا
هَــنٌ
تســتعير
وقــدتَه
|
مــن
قلـب
صـب
وصـدر
ذي
حنـق
|
|
كأنمــــا
حــــره
لخـــابره
|
مـا
ألهبـت
فـي
حشـاه
من
حرق
|
|
يـزداد
ضـيقاً
على
المراس
كما
|
تـزداد
ضـيقاً
أنشـوطة
الوَهـق
|
|
لــه
إذا
مــا
القُمُـدُّ
خـالطه
|
أزم
كــأزم
الخنــاق
بـالعنق
|
|
يقــول
مـن
حـدَّث
الضـمير
بـه
|
طــوبى
لمفتــاح
ذلـك
الغَلَـق
|
|
أخلـق
بهـا
أن
تقـوم
عـن
ذكَرٍ
|
كالسـيف
يفـري
مُضـاعَف
الحَلَـق
|
|
إن
جفــون
الســيوف
أكثرهــا
|
أســود
والحــق
غيــر
مختلـق
|
|
خـذها
أبـا
الفضل
كسوة
لك
من
|
خَــزِّ
الأماديــح
لا
مـن
الخـرق
|
|
وصـفتُ
فيها
الذي
هويتُ
على
ال
|
وهــم
ولـم
تُختَـبر
ولـم
تُـذَق
|
|
إلا
بأخبـــارك
الــتي
وقعَــت
|
منـك
إلينـا
عـن
ظبيـة
البُرَق
|
|
حاشــا
لســوداء
منظـر
سـكنت
|
دارك
إلا
مـــن
مخـــبر
يقــق
|
|
وبعــض
مـا
فضـل
السـواد
بـه
|
والحـــقُّ
ذو
ســُلَّمٍ
وذو
نَفَــقِ
|
|
أن
لا
تعيــب
الســواد
حلكتُـهُ
|
وقــد
يعـاب
البيـاض
بـالبهق
|
|
واهـاً
لهـا
خلعـةً
تشفُّ
أخا
ال
|
ضــغن
ولا
تُستَشــفُّ
عــن
حَــرق
|
|
أتــاك
طوعــاً
وداد
قائلهــا
|
ولــم
يعـد
كارهـاً
ولـم
يُسـَق
|
|
وإن
منعــت
الصــحاب
أكســيةً
|
تقـي
أذى
القـرِّ
أو
أذى
اللثق
|
|
مســتأثراً
دونهــم
بلبســكها
|
لا
معقبــاً
فيقــة
مـن
الفِيَـق
|
|
أعقِبهــمُ
لا
تقــم
بمخـترق
ال
|
ذم
فتُلفـــى
بـــأيِّ
مخـــترق
|
|
لحــاجتي
إن
بعثتهـا
لـيَ
فـي
|
إســكاف
والــدير
وجـه
متَّفـق
|
|
أولا
فمــا
ســُدَّ
بــاب
معـذرة
|
كلا
ولا
ســـُدَّ
بـــابُ
مرتـــزق
|