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أنهضــهُ
فــي
أوانِ
إنهاضــِهِ
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غيــثٌ
دعــا
طرفَـهُ
بإيماضـِهِ
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أبْــرقَ
برقــاً
كــأن
لائحَــهُ
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مـن
أُفـقِ
الخيـر
نـار
حُرَّاضِهِ
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فشـــدّ
أنقاضـــه
بأرحُلهــا
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إلــى
غزيـرِ
النّـوال
فيّاضـِهِ
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مشـتركُ
الحوض
في
الجميع
إذا
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ذادت
عـن
الحـوض
كـفُّ
مُحتاضه
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ينــزلُ
أضــيافُهُ
بــذي
كـرم
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مُبصــبِص
الكلـب
غيـر
عضّاضـه
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يظــلُّ
يبكيهــمْ
إذا
رحلُــوا
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بُكـــاءَ
غَيْلان
بنــت
فضَّاضــه
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سـمحٌ
ببـذل
القِـرى
سماحَ
فتىً
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ســَلَّمَ
عِــرض
القـرى
لعرَّاضـه
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لا
يُشــفق
المســتعيدُ
نـائله
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مــن
وشــك
إملالـه
وإعراضـه
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يفـرضُ
مـا
اطـوَّع
الجواد
وما
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مطوِّعــو
الجـود
مثـلَ
فُرَّاضـه
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لا
يبـذلُ
الرّفـد
حيـن
يبـذُله
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كمشـتري
الجـودِ
أو
كمقتاضـه
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بـل
يفعـلُ
العُـرفَ
حين
يفعلُه
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لجــوهر
العــرفِ
لا
لأعراضــِه
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يفــديه
قــومٌ
يتـاجرون
بـه
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أغراضـهُمْ
فيـه
غيـرُ
أغراضـه
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فــي
وعـده
مـن
نـواله
عِـوضٌ
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أملأُ
شـــيء
لكـــفّ
معتاضــه
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مُقلِّـمُ
الـدهر
مـا
بـدا
ظُفـرٌ
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للــدهر
إلا
انـبرى
بِمقراضـِهِ
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إذا
دعـا
الشـِّعرَ
مـادحوه
له
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أقبـــل
مُعتاصــُه
كمرتاضــه
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أيسـرُ
مـا
يشـكرُ
القريـضُ
له
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تســـهيلهُ
قرضـــَهُ
لقرَّاضــه
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يممـــه
بالمديـــح
شــاعرُهُ
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طريـــدَ
إملاقـــه
وإنفاضــه
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يرجُــو
لـديه
غِنـىً
يحـطُّ
بـه
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رِحــاله
عــن
ظُهـورِ
أنقاضـِه
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كُفِّـي
مـن
الـدمع
يـا
مثبِّطتي
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عـن
زمّ
سـامي
التَليـل
نهّاضِه
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قـد
يقعِـد
المـرءَ
طولُ
رحلتِه
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ويُصـمتُ
الرَّحـل
طـولُ
إنقاضـه
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كـم
تقنع
النفس
بالكفافِ
وكم
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تــترك
خـوضَ
الغِنَـى
لخُوَّاضـه
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لـي
هِمـة
لـم
يكـن
ليرويهـا
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إلا
مـن
البحـرِ
بعـضُ
أحواضـه
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حـان
رحيلـي
إلـى
أبـي
حسـنٍ
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مُـــبرم
إقليمـــه
ونقّاضــه
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حكيمــه
المقتــدى
بحكمتــه
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طــبيبه
المرتَجــى
لأمراضــه
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ســـائس
تـــدبيره
ورائِضــه
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كخيـــر
سُوَّاســـه
وروَّاضـــه
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حُــوَّلِهِ
فــي
الخطــوب
قُلَّبِـهِ
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حيّتِــهِ
فـي
الـدهاء
نَضْنَاضـه
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صـاحِبِ
شـورى
الملـوك
مفْزعهم
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إليـه
فـي
الخطب
عند
إرْماضِهِ
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إذا
استشـاروه
جـاءَ
مـن
كَثبٍ
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بزُبــدة
الــرأي
دون
مخَّاضـه
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تكلــؤُهم
منـه
فـي
مضـاجِعهم
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عينــا
رُواع
الفـؤاد
نبّاضـه
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يرعــى
عليهـمْ
أمـورَ
مملكـةٍ
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قـــامتْ
بــإخَلاله
وإحماضــه
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يُلطــفُ
كيـد
العـدى
ويُغْمضـُهُ
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طَبّـــاً
بإلطــافه
وإغماضــه
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لــو
فتكــتْ
مــرّةً
مكــائِدُهُ
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بالـدهر
أنسـتْه
فتـك
برَّاضـه
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مكــائدٌ
لـو
رمـى
بهـا
جبلاً
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صـــارت
جلامِيــدُه
كرضراضــه
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مِـدره
أهـل
الصـلاة
كـم
دُحِضتْ
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للكفــر
مــن
حجـةٍ
بإدحاضـه
|
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يُـردي
بِمِـرْدى
مـن
الحِجاج
له
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دمّــاغ
رأس
الضــلالِ
هضّاضــه
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حســـبُ
أخــي
جُنَّــةٍ
بكيَّتــه
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وحســـبُ
ذي
عُــرّة
بخضخاضــه
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يُثنــي
عليــه
بـذاك
حاسـده
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علـــى
مُعــاداته
وإبغاضــه
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ســابق
مضــمار
كــلّ
مكرمـةٍ
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أعيــتْ
علـى
راكـضٍ
وتركاضـِه
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يـدرك
مـا
تُـوفض
السـعاةُ
له
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مـن
المعـالي
بـدون
إيفاضـه
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أصــبح
كالكُــلِّ
مــن
جلالتـه
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وسـائرُ
الخلـق
مثـلُ
أبعاضـِه
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إن
لــم
يعبـهُ
بـذاك
عـائبُه
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فمــا
لــه
عــائبٌ
ولا
عاضـه
|
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لـــولا
علـــيُّ
العُلا
ومِنّتُــهُ
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غـادرني
الـدهرُ
بعـض
أحراضه
|
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أنهضــني
بعـدما
رزَحْـتُ
وكـمْ
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مــن
رازحٍ
نــاهضٍ
بإنهاضــه
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يـا
حاسـدي
لا
خلـوتَ
مـن
حسدٍ
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حظــكَ
منــه
أليــمُ
إمضاضـهِ
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أعتبنـي
الـدهر
بعـد
معتِبـهِ
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فغاضـِبِ
الـدهر
فـيَّ
أو
راضـِه
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زرتُ
ابـن
يحيـى
الـذي
يؤمِّلُه
|
كــلُّ
أجــبِّ
السـَّنام
مُنتاضـِه
|
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فردّنــي
مُثريــاً
وفضـفض
لـي
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عيشـي
وقـد
كنـتُ
غيرَ
فضفاضِه
|
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ومهّــدت
مضــجعي
يـداهُ
فقـد
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لاءمَ
جنـــبيّ
بعــد
إقضاضــه
|
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ومــاصَ
عِرضــي
فــردّهُ
يققـاً
|
كــالثوب
أنقتـهُ
كـفُّ
رحّاضـه
|
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لمَــا
بـدا
لـي
بشـيرُ
غُرَّتـه
|
وراع
دهــري
نــذيرُ
إنباضـه
|
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أقبــلَ
حظــي
علــيَّ
مبتسـماً
|
مــن
بعـد
تعبيسـِهِ
وإعراضـه
|
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وظـــل
دهـــري
لـــه
مُلاوِذَهُ
|
مـن
خـوف
سهم
الردى
ومقراضه
|
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لا
تعـدم
الـدهرَ
يـا
أبا
حسنٍ
|
جـبرَ
كسـير
الجنـاح
منهاضـِه
|
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كفُلــتَ
هـذا
الأنـام
تُقرضـُهُم
|
عُرفـاً
إلـى
الله
شكرَ
إقراضه
|
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حــتى
كفلـتَ
الفِـراخ
كامنـةً
|
في
البيض
قبل
انقياض
مُنقاضه
|
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تكــدحُ
للنــاس
كـدحَ
مجتهـدٍ
|
ركّــاب
ظهـرِ
الـدُؤوب
ركّاضـه
|
|
خَفَضــْت
فيهــمْ
جنـاح
مَرحمـةٍ
|
قــد
قَـلَّ
جـدّاً
عديـد
خُفّاضـه
|