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العلـم
مـذ
كـان
محتـاج
إلى
العلم
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وشـفرة
السـيف
تسـتغني
عـن
القلم
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وخيــر
خليــك
إن
غــامرت
فــي
شــرف
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عـزم
يفـرق
بيـن
الساق
والقدم
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إن
المعــالي
عــروس
غيـر
واصـلة
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إن
لــم
تخلــق
ردائيهـا
بنضـح
دم
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تـرى
مسـامع
فخـر
الـدين
تسمع
ما
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أملاه
خــاطر
أفكــاري
علــى
قلمـي
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فــإن
أصــبت
فلـي
حـظ
المصـيب
وإن
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أخطــأت
قصـدك
فاعـذرني
ولا
تلـم
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كـم
تـترك
الـبيض
فـي
الأغمـاد
ظامية
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إلـى
الموارد
في
الأعناق
والقمم
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ومقلــة
المجـد
نحـو
العـزم
شاخصـة
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فـاترك
قعـودك
عـن
إدراكهـا
وقم
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أمامـك
الفتـح
مـن
شـام
ومـن
يمن
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فلا
تـــرد
رؤوس
الخيـــل
بــاللجم
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فعمــك
الملــك
المنصـور
سـومها
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مــن
العــراق
إلــى
مصــر
بلا
سـأم
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فــاخلق
لنفســك
ملكـاً
لا
تضـاف
بـه
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إلـى
سـواك
وأور
النار
في
العلم
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وإنــه
المشـيرين
إن
لجـت
نصـيحتهم
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أولا
فـأنعم
علـى
العميان
بالصمم
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واعــزم
وصـمم
فقـد
طـالت
وقـد
سـمجت
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قضــية
لفظتهــا
ألســن
الأمـم
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طــال
الـتردد
فـي
إبـرام
منتقـض
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مـن
هـذه
الحـال
أو
فـي
نقض
منبرم
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فــرب
أمـر
يخـاف
النـاس
غـايته
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والأمــر
أهــون
فيــه
مـن
يـد
لفـم
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فكيــف
إن
نهضــت
فيمــا
هممــت
بـه
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أسـد
تسـير
مـن
الخطـي
فـي
أجم
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وأنــت
ممــن
إذا
طــارت
مهـابته
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فـي
السـمع
صـلت
نياط
القلب
بالألم
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لا
يــدرك
المجـد
إلا
كـل
مقتحـم
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فــي
مــوج
ملتطــم
أو
فــوج
مضـطرم
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لا
ينقــض
الخطــرة
الأولــى
بثانيـة
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ولا
يفكـر
فـي
العقـبى
مـن
الندم
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كأنمــا
الســيف
أفتـاه
وقـال
لـه
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فـي
فتـح
مكـة
حل
القتل
في
الحرم
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فمــا
تــروم
ســوى
فتــح
صــوارمه
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يضـحكن
فـي
كـل
يـوم
عابس
البهم
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حــتى
كــأن
لســان
السـيف
فـي
يـده
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يـروي
الشـريعة
عن
عاد
وعن
إرم
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هـذا
ابـن
تـومرت
قـد
كـانت
بدايته
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فيمـا
يقـول
الورى
لحماً
على
وضم
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وقــد
ترقــى
إلـى
أن
صـار
طـالعه
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مــن
الكــواكب
بالأنفـاس
والكظـم
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وكــان
أول
هــذا
الــدين
مـن
رجـل
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ســعى
إلـى
أن
دعـوه
سـيد
الأمـم
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والغيـث
وهـو
كمـا
قـد
قيـل
أوله
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قطــر
ومنــه
خـراب
السـد
بـالعرم
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والبـدر
يبـدو
هلالاً
ثـم
يكشـف
بـال
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أنــوار
مـا
سـترته
شـملة
الظلـم
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تنمـو
قـوى
الشـيء
بالتدريـج
إن
رزقت
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لطفاً
ويقوى
شرار
الزند
بالضرم
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حاســب
ضــميرك
عــن
رأي
أتـاك
وقـل
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نصــيحة
وردت
مــن
غيــر
متهـم
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أقســمت
مــا
أنــت
ممــن
جـل
همتـه
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مـا
راق
مـن
نعـم
أو
رق
من
نغم
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وإنمــا
أنــت
مرجــو
لواحــدة
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بنــى
بـه
الـدهر
مجـداً
غيـر
منهـدم
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كــأنني
بالليــالي
وهـي
هاتفـة
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قــد
صــم
سـمع
رجـال
دونهـا
وعمـي
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وبــالعلى
كلمــا
لاقتـك
قائلـة
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أهلاً
بمنشـــر
آمـــالي
مــن
الرمــم
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مـــولاي
دعــوة
مظلــوم
وربتمــا
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تحنو
الموالي
على
الداعي
من
الخدم
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أصــبحت
بالشــعر
ملحوظـاً
بمنقصـة
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ولـم
أزل
بيـن
أهـل
العلم
كالعلم
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صــن
معـدن
الـدر
عـن
كـف
تقلبهـا
|
ومعـدن
الـدر
واليـاقوت
فهـو
فمي
|
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والعصـر
يعلـم
أنـي
فيـه
جوهرة
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رخيصــة
السـعر
بالغـالي
مـن
القيـم
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مـا
أفقـر
الدهر
من
مثلي
وأنت
بما
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أقــول
درى
ولكــن
قلــة
القســم
|
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لـولا
تقـدم
ذنـب
الـدهر
مـا
حسنت
|
عنـدي
مواقـع
مـا
يـولي
مـن
النعم
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وصــحة
الجســم
لا
يـدرى
بقيمتهـا
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إن
لـم
ينبـه
عليهـا
عـارض
السـقم
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وهبــــت
أول
أيــــامي
لآخرهـــا
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إن
صــح
أن
الغنــى
كفـارة
العـدم
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ومــا
حســدت
جهــولاً
فضــل
ثروتــه
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والريـش
ينبـت
فوق
النسر
والرخم
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ولا
رضـــيت
لــوجهي
أن
أجــود
بــه
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علــى
بخيـل
ولا
استسـمنت
ذا
ورم
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أمــا
وغيــرك
لا
يهـتز
مـن
طـرب
|
علـــى
ترنـــم
أصــواتي
ولا
نغمــي
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فليهــن
مجــدك
أن
الفضــل
ذو
تـرع
|
إذا
مــدحت
وأن
النقــص
ذو
عمـم
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إذا
حضــرت
بقطــر
لـم
يغـب
أحـد
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مـن
الكـرام
ولا
إلهـامي
مـن
الديم
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وكــم
يــد
لـك
صـانت
وجـه
منقبـض
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عــن
السـؤال
وأهـدت
أنـس
محتشـم
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ومــا
مـدحتك
فـي
بـأس
وفـي
كـرم
|
إلا
بمــا
حــدثتني
ألســن
الشــيم
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يـروي
الهـدى
والندى
سجليك
مبتهجاً
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عــن
الغمامـة
والصمصـامة
الخـذم
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حاشـا
عـوائدك
الحسـنى
تنـام
لها
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أجفـان
عيـن
وعيـن
الشـعر
لـم
تنم
|
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غفلــت
عنهــا
وقـد
جـاءت
مـذكرة
|
لــك
القـوافي
ترجـي
فطنـة
الكـرم
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فـامنن
وعجـل
فخيـر
الجـود
مـا
شربت
|
منـه
الوفـود
ولـم
يستدن
للرهم
|
|
وأسـلم
لمثلـي
وأن
أصـبحت
مثلك
في
|
فقـد
المماثل
يا
ذا
الجود
والكرم
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