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كـن
لـي
على
شكر
ما
أوليت
من
نعم
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عونـاً
فـإني
بحـق
الشـكر
لم
أقم
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أولا
فأرشـد
إلـى
مـا
تسـتحق
فقد
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أقـررت
بـالعجز
عنـه
غيـر
محتشـم
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ولــو
نظمـت
النجـوم
النيـرات
إذاً
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قلـت
فكيـف
ولم
أنظم
سوى
الكلم
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ســمت
ببــدر
بــن
رزيـك
وهمتـه
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ذوائب
المجـد
فاسـتعلت
ذرى
الهمـم
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متـــوج
تخـــدم
الأملاك
ســاحته
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لثمـاً
ويلقـى
الأعـادي
غيـر
ملتثـم
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قـد
جـرب
الـدهر
منـه
فـي
وقـائعه
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قرمـاً
صـوارمه
تشـكو
مـن
القرم
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مقســم
الفكــر
فـي
بـأس
ومكرمـة
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مـوزع
الـرأي
بيـن
العفو
والنقم
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قـد
حـالف
النصـر
والتأييـد
صـارمه
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فمــا
يريـق
دمـاً
إلا
لحقـن
دم
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كـم
ظفـر
نائبة
في
الدهر
قلمها
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عــزم
المظفــر
بالصمصـام
والقلـم
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وموقــف
ينــثر
الهنــدي
مــا
نظمـت
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فيـه
الأسـنة
مـن
أشلاء
كل
كمي
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غــدوت
يــا
فـارس
الإسـلام
فارسـه
ال
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مشهور
بالكر
في
مستبهم
البهم
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تقــدمت
بــك
فيـه
عزمـة
حلفـت
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لا
تثنــي
أو
تلــم
الـبيض
بـاللمم
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لمـا
رأيت
الطلى
والبيض
قد
جمعا
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جمعــاً
بــه
فرقـة
الأرواح
للرمـم
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نـادت
صـفاحك
صـفحاً
عنـد
قـدرتها
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والأسـد
تـأنف
مـن
لحـم
علـى
وضم
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وعــدت
عنــه
ونــور
الفتـح
مشـتعل
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عـن
جانبيـك
ومـن
خلف
ومن
أمم
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ورب
نازلـــة
شـــمرت
مجتهـــداً
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فـي
كشـف
غمتهـا
عـن
كاشـف
الغمم
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فعــل
الوصــي
علــي
بــالنبي
وقـد
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همـت
بحرمتـه
الكفار
في
الحرم
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مـواطن
نبـت
فيهـا
عنـد
غيبتـه
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عنهــا
ولســت
علــى
غيــب
بمتهـم
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بنيــت
بالسـيف
مجـداً
قـال
شـامخه
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إن
العمــاد
عمـاد
غيـر
منهـدم
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نجــل
كريــم
رأينـا
مـن
نجـابته
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حكـم
الكهول
ولم
يبلغ
مدى
الحلم
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شــبيه
مجــدك
فــي
خلـق
وفـي
خلـق
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والشبل
كالليث
في
بطش
وفي
قحم
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أخــو
النجـوم
الـتي
بالسـعد
طالعهـا
|
بدر
يجلي
سواد
الظلم
والظلم
|
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ملـك
تظـل
الخطايـا
وهـي
عايـذة
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مــن
عفــوه
بمقيـل
عـثرة
القـدم
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لــه
الصـوارم
مـازلت
مضـاربها
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يخطبـن
عنـه
غـداة
الروع
في
القمم
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وكــل
سـابغة
المضـمار
مـا
برحـت
|
آذانهـا
في
الوغى
تغني
عن
اللجم
|
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والمكرمـات
الـتي
مـا
نـال
أيسـرها
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مؤمـل
قـط
مـن
كعـب
ومـن
هـرم
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قـد
خصـه
الله
بالنعمى
فعم
بها
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أثـرى
البريـة
والمـثري
مـن
العدم
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فــي
وجهــه
ويـديه
مـن
سـنى
وحيـا
|
ما
في
الغمامة
من
ماء
ومن
ضرم
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فمـا
يريـك
جبينـاً
غيـر
منطلق
|
ولا
بنـــان
يميـــن
غيـــر
منســجم
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لـو
أقسـم
الغيـث
يوماً
أن
يصافحني
|
نـابت
أنامـل
بدر
عنه
في
القسم
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جــاورت
منــه
كريمـاً
لا
بـوائقه
|
تخشــى
ولا
جــاره
يومــاً
بمنهضـم
|
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لـو
لـم
أشـاهد
بعينـي
مجـد
شيمته
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مـا
كنت
أعرف
معنى
الجد
والشيم
|
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لا
عرفــه
ببعيــد
عــن
مــؤمله
|
ولا
معــــارفه
مذمومـــة
الـــذمم
|
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إذا
تهلــل
بشــراً
واســتهل
نـدى
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أدل
قاصـــــده
إدلال
ذي
رحــــم
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لـم
يخـدم
الـدهر
والأيـام
لـي
أملاً
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حـتى
غـدوت
لـه
مـن
جملة
الخدم
|
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قــد
كـثرت
عـدد
الحسـاد
أنعمـه
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عنـدي
ومـا
كـثر
الحسـاد
كـالنعم
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كـم
رحـت
منـه
أجـر
الـذيل
من
خلع
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أعلامهـا
كريـاض
الحـزن
والعلـم
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أختـال
ما
بين
إنعام
وتكرمة
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يكــل
عــن
شــكرها
المفـروض
كـل
فـم
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إن
كنـت
أحسـنت
فالإحسـان
أنطقنـي
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والشـكر
فـي
نفحـات
الروض
للديم
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شـكر
القـوافي
علـى
مقدار
ما
شربت
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مـن
خمـرة
عصـرت
من
كرمة
الكرم
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فـإن
بـدا
لـك
من
ألفاظها
طرب
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فهـــز
عطفـــي
معانيهــا
فلا
تلــم
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