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وفـى
لـك
حـد
الجـد
والسـيف
غادر
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وأنهضـك
التأييـد
والـدهر
عـاثر
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وأغنتـك
عـن
سـل
المواضـي
سعادة
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تـدور
بهـا
فيمـن
عصـاك
الـدوائر
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فتــوح
لهــا
فــي
كـل
يـوم
مسـرة
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تباشـر
سمع
المجد
منها
البشائر
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قضـى
اللـه
يـا
ذخـر
الأئمـة
أن
من
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يناويـك
أو
ينوي
لك
الغدر
خاسر
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ليهنــك
فتــح
أنجبــت
لــك
أمـه
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وأم
العلـى
بالنصـر
والفتح
عاقر
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أتــاك
بـه
الجـد
السـعيد
وسـلمت
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مقــادته
فــي
راحتيـك
المقـادر
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صــرفت
بـن
أم
الكبـائر
بعـدما
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نســينا
بهــا
منهـن
مـاأنت
ذاكـر
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وأبطلــت
كيــد
الخــارجي
بـن
يوسـف
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وأنـت
كفيـل
لابـن
يوسـف
ناصر
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تــوهم
أن
الملـك
مـا
سـولت
لـه
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وسـاوس
أمثلهـا
المنـى
والخـواطر
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وهـذا
مـرام
لـم
تـزل
دون
نيله
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مـــوارد
حتـــف
مـــالهن
مصــادر
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نصـبت
لـه
فـوق
الـتراب
وتحتـه
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حبــائل
كيــد
مــا
لهــن
مــرائر
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وســدت
عليــه
الأرض
صــولتك
الـتي
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مهابتهــا
سـور
علـى
الأرض
دائر
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ومـازال
مرعيـاً
مـن
الصـبح
والدجى
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بعيــن
رقيـب
طرفهـا
لـك
سـاهر
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يقــرب
مثــواه
مــن
البعـد
نحـوكم
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هــواجر
تحــدو
عيسـه
وديـاجر
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ومــن
كــانت
الأقــدار
خادمـة
لـه
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مضـت
في
العدى
أحكامه
وهو
قادر
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وكــان
ورد
النيــل
أقصـى
أمـانه
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فحــل
بـه
مـن
أمنـه
مـا
يحـاذر
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ومـــا
راعـــه
إلا
تـــوثب
أروع
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يبــاده
فـي
نصـر
الهـدى
ويبـادر
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جزى
الله
عز
الدين
عزاً
فلم
تزل
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تـزورك
بشـرى
النصـر
فيمـا
يباشـر
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هـو
الفخـر
لـم
يسـبق
إليه
وإن
يكن
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لـه
قبلهـا
في
الناكثين
نظائر
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أخــو
النصــح
مـازالت
طويـة
سـره
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تبــاطن
فيمــا
ســركم
وتظـاهر
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وذو
الحـزم
والعزم
الذي
طال
ما
غدا
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يــراوح
فيمـا
تشـتهي
ويبـاكر
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فشــد
بــه
يمنـى
يـديك
فإنمـا
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حســام
حســام
فــي
يمينــك
بـاتر
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ومــا
هــو
إلا
نعمــة
لـك
حمـدها
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وكـافر
نعمـاكم
مـن
النـاس
كافر
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وخصصـت
بهـا
بيضـاء
لـم
يفتخـر
بهـا
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مـن
الوزراء
الصيد
قبلك
فاخر
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تجـاوزت
قدر
الحمد
فيها
فما
الذي
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يقــوم
بــه
منــا
خطيـب
وشـاعر
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وأسـبغتها
نعمـى
عممـت
بهـا
الـورى
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فـأثنى
بمـا
أوليـت
باد
وحاضر
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ووســعتها
مـن
بعـدما
ضـاق
رحبهـا
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وغصـت
بأنفـاس
الرجـال
الحناجر
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لكـم
يـا
بنـي
رزيـك
لازال
ظلكم
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مــواطن
سـحب
المـوت
فيهـا
مـواطر
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ســللتم
علــى
عبــاس
بيــض
عـزائم
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قهرتـم
بهـا
سـلطانه
وهو
قاهر
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ولـو
لـم
تغيبـوا
فاز
بالنصر
فائز
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وخلــص
مـن
ظفـر
المنيـة
ظـافر
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حفظتــم
لآل
الحــافظ
الحرمـة
الـتي
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رعـى
حقهـا
منكـم
قـديم
وآخـر
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أبـوك
سـقى
فـي
مثلهـا
ابن
مدافع
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كؤوســاً
بهـا
خمـر
المنيـة
دائر
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وأنــت
كفيــت
العاضــد
بـن
محمـد
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عـدواً
أتـاه
ثـائراً
وهـو
ثـائر
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فــأنتم
لهـذا
الـبيت
كـف
وسـاعد
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وأنتـم
لهـذا
الدسـت
سـمع
وناظر
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وكـم
لـك
عنـد
العاضد
الطهر
من
يد
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لـك
اللـه
فيهـا
عن
إمامك
شاكر
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ولا
مثـــل
خطــب
تقشــعر
لمثلــه
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جلـود
الورى
خوفاً
وتبلى
السرائر
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تـزل
بـه
الأقـدام
بعـد
ثبوتهـا
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وتـــذهل
أبصــار
وتعمــى
بصــائر
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ولــولاك
بعـد
اللـه
فيهـا
لزعزعـت
|
أســرة
ملــك
للهــدى
ومنــابر
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خـبيت
لـذا
الفتـح
المـبين
ذخيرة
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ويــا
رب
خطــب
فرجتـه
الـذخائر
|
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فـدامت
معاليـك
الجسـام
الـتي
بهـا
|
وجــوه
ليالينــا
زواه
زواهـر
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