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أفخــر
فحسـبك
مـا
أوتيـت
مـن
حسـب
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كفـــاك
مجــدك
مــن
إرث
ومكتســب
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لــولا
الحفـاظ
علـى
الأنسـاب
مكرمـة
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أغنــاك
فضـلك
أن
تعـزى
إلـى
نسـب
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وقـد
رأينـا
رسـول
اللـه
أشـرف
مـن
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نعــده
وهــو
منســوب
إلـى
العـرب
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فليهــن
دولــة
مصــر
أنهـا
نصـرت
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مــن
آل
ســعد
بخيـر
ابـن
وخيـر
أب
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بشـــاور
وشـــجاع
عـــز
نصــرهما
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عــزت
علــى
طــارق
الأيـام
والنـوب
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غيثــان
إن
وهبـا
ليثـان
إن
وثبـا
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فاضـا
علـى
الخلـق
بالإعطـاء
والعطب
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هــو
الكفيـل
ولكـن
قـد
كفلـت
لـه
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أبـا
الفـوارس
نجـح
السـعي
والطلـب
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لــو
لــم
تناصـب
عـداه
دون
مطلبـه
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مـا
قـر
مـن
دسـته
فـي
أشرف
الرتب
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ومــا
أتتــه
مــن
الأيــام
نازلـة
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إلا
وســـيفك
فيهــا
كاشــف
الكــرب
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مــواطن
لـم
يغـب
لمـا
حضـرت
بهـا
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والشـبل
إن
يحـم
غـاب
الليث
لم
يغب
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دارت
عليــك
أمـور
الملـك
قاطبـة
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وهـــل
تــدور
رحــى
إلا
علــى
قطــب
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أصــبحت
منــه
كنــوز
الشـمس
مشـرقة
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أو
لا
كمثـل
فرنـد
السيف
ذي
الشطب
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كـم
عقـدة
مـن
خطـوب
الـدهر
مبرمة
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قــد
حـل
سـعدك
منهـا
عقـدة
الـذنب
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فـي
كـل
يـوم
إلـى
الأعـداء
مرتحـل
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يشـكو
بـه
الظهـر
جور
السرج
والقتب
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وعســـكر
كـــأتي
الســيل
منــدفعاً
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إمــا
إلـى
صـعد
فـي
الأرض
أو
صـبب
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كـــانت
لواتـــة
حيـــاً
لا
يروعـــه
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حــي
وشــعباً
صـحيحاً
غيـر
منشـعب
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وطالما
أمعنوا
في
البغي
واحتقروا
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جـــر
الكتــاب
والتهديــد
بــالكتب
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وكـم
دعتهـا
ملـوك
العصـر
قبلكم
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إلــى
المجيــر
فلـم
تسـمع
ولـم
تجـب
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حـتى
رمـاهم
أبـو
الفتـح
الذي
ضمنت
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أســيافه
فتـح
بـاب
المعقـل
الأشـب
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بـث
الجيـوش
علـى
التدريـج
فـانبعثت
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فـي
غزوهـم
سـرباً
كالوابـل
السرب
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وكنــت
آخــر
ســهم
فــي
كنــانته
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وفـارس
الـروع
مـن
يحمـي
حمى
العقب
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ولــم
يــزل
عنـدهم
منـع
ومقـدرة
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وأمرهـــم
مســـتمر
غيـــر
مضـــطرب
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حــتى
نهضــت
فلــم
تنهــض
قـوائمهم
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والرعـب
يخفـق
فـي
الأحشاء
والركب
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وسـار
مـن
ذكـرك
العـالي
مقدمة
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كـــانت
طليعــة
ذاك
الــذعر
والرعــب
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وما
على
القوم
من
عار
إذا
اعصتموا
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أبــا
الفـوارس
خوفـاً
منـك
بـالهرب
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ولــو
قــدحت
شــهاب
العـزم
معتزمـاً
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حـرب
الكـواكب
خـافت
أنفـس
الشهب
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ومــا
لواتــة
بــالمحقور
جانبهـا
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لكنــك
البحــر
مــداً
وهـي
كـالقلب
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ولــو
وصــفتهم
بالضــعف
مـا
نسـبت
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إليــك
مكرمـة
فـي
القهـر
والغلـب
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كسـر
العمـود
هـو
الفتـح
الـذي
جبرت
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بـن
ظبـاكم
عمـاد
الملـك
والطنـب
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يــد
لكـم
فـي
رقـاب
الجنـد
تشـكركم
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لأجلهــا
ألســن
الأيــام
والحقــب
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رد
الإلــه
بكــم
إقطــاعهم
ولقـد
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كـانت
علـى
مـا
مضـى
نهـبى
المنتهـى
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وســـوف
تشـــكركم
آثــار
نعمتكــم
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فـي
جنـد
مصـر
كشـكر
الـروض
للسحب
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عممتــم
النــاس
بالحســنى
فشـكركم
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ديــن
علــى
ذمـة
الأشـعار
والخطـب
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وزاد
فــــي
خطـــر
الآداب
أنكـــم
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أغليتـــم
بعــد
رخــص
قيمــة
الأدب
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وإن
شــاعركم
المثنــي
عليــك
بمـا
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شـادت
مماليـك
يسـتغني
عـن
الكـذب
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لمــا
أرحــت
ضـمير
الملـك
مـن
تعـب
|
بــاتت
لخـدمتك
الأشـعار
فـي
تعـب
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