رضوخ
(ترجمها الى الإنجليزية الشاعر د. شهاب غانم)
| يا شقيقيْ | ||
| عند ما كنّا صغاراً | ||
| لا نباليْ | ||
| باللياليْ | ||
| كمْ غرقنا بين أحلام الطّفوله | ||
| كمْ صرَخنا و ضَحِكنا | ||
| وصَعدْ نا قمّة التلّ | ||
| ومثل الرئْم | ||
| كمْ زُرنا سُهوله | ||
| وإذا نحْنُ نُغالي | ||
| في أساطير البُطولهْ | ||
| وإذا العشْرونَ حلّتْ | ||
| أصْبحَ الكلّ يباهيْ | ||
| بأحاديث الرّجولهْ | ||
| واذا ليلى ببالي | ||
| سَحَرَتني بجمالٍ و دلالِ | ||
| فاذا قلتُ تعالي | ||
| أعْرضَتْ ثمّ توارتْ | ||
| خلفَ أجْفانٍ خَجولهْ | ||
| لمْ أجدْ منها سوى طيفِ خيالِ | ||
| عنْ يميني وشمالي | ||
| فعيوني في سؤا لِ | ||
| وَفؤا دي في اشتعالِ | ||
| زال صبْري و احتمالي | ||
| آهِ من حبّ الرّجالِ | ||
| لا يهابُ المرءُ ما يلقى | ||
| اذا را مَ وُصولهْ | ||
| ثم تاتي الأربعونْ | ||
| هذه سنّ الفعالِ | ||
| سنّ كدٍّ و كفاحٍ و نضالِ | ||
| واغترابٍ فانتقالِ | ||
| وانقطاعٍ فاتّصا لِ | ||
| هانتِ الأ بْعادُ في نيلِ المنالِ | ||
| فاذا عُدْ نا بجاهٍ أو بما لِ | ||
| وصَرَخنا في اختيالِ | ||
| قدْ وَصَلنا ذ رْوَة العيشِ | ||
| وادْركنا مِنَ المجْدِ اثيلهْ | ||
| نصفُ قرنٍ مرَّ فينا | ||
| كخيالِ | ||
| أوْ كأحْلام الليالي | ||
| فاذا الفجرُ شبيهٌ بالزّوالِ | ||
| و ربيعُ العمرِ صيفٌ | ||
| فشتاءٌ | ||
| بالتواليْ | ||
| لا نكادُ اليومَ ندريْ | ||
| أنّنا عشْنا فصولَه | ||
| يا صديقيْ أدْبَرَ العُمرُ | ||
| وأبْصَرْنا ذُ يوله | ||
| فتقبّلْ حكْمة الأقدارِ | ||
| انْ سامَتكَ أعْباءَ الكُهولهْ | ||