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أحيـا
اشـتياقي
والأشـواق
قد
ذهبوا
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عرامـــسُ
بــالظبيع
فوقهــا
ذهــبُ
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عرامــس
كلهــا
مــن
فوقهــا
ذهـبٌ
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لكــن
ذا
ذهــبٌ
فــي
ثغــره
شــنب
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عرامـــسٌ
ذهبـــت
بكـــل
مــا
أربٍ
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وكــــل
ذي
أرب
قبلـــي
لـــه
أربُ
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عرامــس
حســنت
حُســناً
لمـن
حملـت
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وصـــادت
الأدبـــا
فصـــادها
الأدبُ
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عرامــس
حملــت
ميمــون
لـو
طلبـت
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منـي
الفـداء
لهـا
لجاءهـا
الطلـب
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ميمـون
لـو
طلبـت
نفسـي
لقـد
طربت
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تعطـي
لهـا
النفـس
والأرواح
والطرب
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ميمـون
قـد
سـلبت
نفسـي
بهـا
وَلَهَا
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بهـا
الفـؤاد
لهـا
والجسـمُ
والسلب
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ميمـون
قـد
نصـبت
نفسـي
بهـا
ولها
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يــا
ليتهــا
قربـت
ليـذهب
النصـب
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ميمــون
شــمسٌ
فلا
تعجـب
لهـا
قمـرٌ
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لكــن
تنســيك
ذا
وتلــك
ذا
عجــبُ
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ميمــون
قــد
جملـت
أخلاقهـا
خُلُقـاً
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ذكــراً
ورؤيــا
جمـال
قربهـا
قـرب
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لأنهــا
أخــذت
حرفــا
لمــن
رغبـت
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نفسـي
بـه
وجميـع
الخلـق
قد
رغبوا
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فــي
فضــله
ولـه
عـدلٌ
وقـد
رهبـت
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نفسـي
بـه
وجميـع
الخلـق
قد
رعبوا
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ذاك
الذي
قد
سما
في
ذا
الورى
شرفاً
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وفاقهــا
حســباً
قــد
زانــه
نسـبُ
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ذاك
الذي
لن
ترى
في
ذا
الورى
حسباً
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إلاّ
لــه
كرمــاً
ومنــه
ذا
الحســبُ
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ذاك
الذي
لن
ترى
في
ذا
الورى
سبباً
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إلا
وإصـــلاح
ذاك
منـــه
والســـببُ
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ذاك
الـذي
لن
ترى
في
الناس
من
نسبٍ
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إلا
بـــه
جمعـــه
ويبــذل
النســبُ
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ذاك
الـذي
لن
ترى
في
الأرض
قد
رسبت
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قــدمٌ
سـوى
إربـه
يكـون
ذا
الرسـبُ
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هـو
الشـريف
الـذي
لـولاه
مـا
هربت
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أبطـال
كفـرٍ
ولكـن
منـه
قـد
هربوا
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هـو
الشـريف
الـذي
لـولاه
مـا
ذهبت
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شــحنا
ولكـن
بـه
أسـبابها
ذهبـوا
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هـو
الشـريف
الـذي
لـولاه
مـا
خربت
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جنـود
إبليـس
لكـن
منـه
قـد
خربوا
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هـو
الشـريف
الـذي
لـولاه
مـا
شربت
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أهـل
المعـارف
لكـن
منـه
قد
شربوا
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هـو
الشريف
الذي
في
النأْي
قد
قربت
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ضــمائر
منــه
للإلــه
قــد
قربـوا
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شـيخ
الشـيوخ
الـذي
بالفضـل
قرَّ
له
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شــرق
يميــنٌ
شـمالٌ
والـذي
غَرُبـوا
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شـيخ
الشـيوخ
الـذي
جمْع
العلوم
له
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قـد
وُهِّبَـتْ
وبـه
للخلـق
قـد
وُهِبُـوا
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شـيخ
الشـيوخ
الـذي
قد
فاقهم
رتباً
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وللمواريــد
قــد
أعلــت
بـه
رُتَـبُ
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شـيخ
الشـيوخ
الـذي
علوا
به
غلبوا
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كمـا
علـوا
برسـول
اللـه
من
غَلَبُوا
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شـيخ
الشـيوخ
الذي
صلب
الحقائق
مع
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شــرع
أقســام
وقبلاً
للـورى
صـلبوا
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محمـــدٌ
فاضـــلٌ
بفضـــله
رَحُبَـــتْ
|
صـدور
علـم
مـع
العلـوم
قـد
رحبوا
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محمـــدٌ
فاضـــلٌ
بفضـــله
فرجـــت
|
كــروب
قلــب
وعـن
جسـمٍ
جَلَـتْ
كُـرَبُ
|
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محمـــدٌ
فاضـــلٌ
وفـــاق
قاطبـــةً
|
كُـلَّ
الـذي
قبله
في
الناس
قد
قطبوا
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محمــدٌ
فاضــلٌ
نجــل
الأميــن
بــه
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ظفـرٌ
لمـن
رغبوا
في
الله
أو
طلبوا
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محمــدٌ
فاضــلٌ
لـم
تفـن
لـو
حسـبت
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مـن
مجـده
قطـرةٌ
لـو
تعـدم
الُحُقُـب
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كفــاك
إن
بــه
قــد
أكملـت
ختمـتْ
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وراثـة
الرسـل
وانتهـت
وهـم
ذهبوا
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عليهــم
مـن
صـلاة
اللـه
مـا
حسـبت
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قـوم
تعـدّ
ومـا
لـم
يـدر
من
حسبوا
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