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لقــد
لاح
مــن
هنـد
هـدى
راح
لائحـاً
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وظلــت
طيــورٌ
فـي
الهـواء
سـوانحا
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وأمســت
دمـوعي
فـي
الـرداء
كأنهـا
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لآلٍ
كثغـــرٍ
منـــهَ
يلمـــع
رائحــا
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لآلٍ
علــى
هنــد
الفطيــن
يـرى
لهـا
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بـدور
الليـالي
الـبيض
للشمس
واضحا
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وكنــت
إذا
مــا
جئت
بُرقِــعَ
وجههـا
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وصـــارت
لنـــأي
للــبراقع
لائحــا
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وقــد
كنــت
حــولاً
والعـواذل
تشـهدُ
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أروح
وأغــدو
مــن
هواهــا
مسـامحا
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ولكنّنـــي
للحـــب
حبـــاً
رأيتـــه
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إذا
آض
للأحبـــاب
يصـــبح
ناصـــحا
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نصـــعت
لأحبـــابي
بخـــالص
ودهــم
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ففــاح
جنــاب
المسـك
أصـبح
فائحـا
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بــذكرٍ
لبعــض
الصـرف
ناصـع
طبعهـم
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خليقتهــم
صــرف
بـه
العـدل
صـالحا
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بـدور
الـدياجي
والشـموس
إلى
الضحى
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ســيوف
المعــادي
للطــواغ
كوالحـا
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نواصـي
المعـالي
يمينهـم
قد
تقودها
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تخـــطُّ
بـــأقلام
بجـــود
مكافحـــا
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يقــود
لكــل
أصــل
كـل
بـذا
العلا
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أصــيل
العــوالي
للمعـالي
مصـافحا
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يقـود
الجميـع
الفـرد
فـي
القطبنيةِ
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وقطــــب
لأفـــراد
الأوادم
ســـامحا
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جــواهر
علــم
مــن
زواجــر
لفظــه
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كــدمع
علــى
خَــدِّهْ
ليـالِهْ
وصـائحا
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محمــد
فاضــلٍ
لــذا
الخلــق
فـائق
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بــه
فــاقت
الأرواح
راحــت
مصـابحا
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قناديــل
خلــق
مــن
مصـابيح
قلبـه
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حيــاة
لــروح
الـروح
حقـاً
وواضـحا
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هـو
الشـمس
والبـدر
النجـوم
تضـاههْ
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هـــدايته
تحيـــي
لكــونِهَ
راجحــا
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هـو
البحـر
والحـبر
الـذي
سـر
سـره
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بــه
الــري
يبـدي
للسـرائر
بائحـا
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هــو
الــبر
والفجــار
تُسـْقَى
بِبِـرِّهِ
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بــه
طــابت
الأيــام
بــارح
سـانحا
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هو
الغيث
في
النجوى
وفي
الأخفى
شاهدٌ
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بــه
الحـق
لا
يخفـى
وبـالحق
جامحـا
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هـو
العيـن
عيـن
العين
إنسانها
بدا
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وإنســان
إنــس
الإنـس
يبصـر
سـامحا
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هــو
الفــرع
والأصـل
الأصـيل
وفرعـه
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وثمــرٌ
لأصـل
الطيـب
بـالطيب
طامحـا
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وســهم
الفــؤاد
اللــوذعي
مطلسـما
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مهــــذب
أخلاق
ويبســــط
ســــاطحا
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تـبيت
نيـار
الضـيف
في
الصيف
مضرما
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وأنــوار
غيــب
غيــب
قلــبٍ
للافحـا
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لــه
إرث
نــور
النــور
وهـو
محمـد
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لــه
الحمـد
محمـود
وللحمـد
ناصـحا
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مكلَّلـــةٌ
منـــه
المعــارف
لؤلــؤاً
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مؤلَّلـــة
منـــه
الجـــواهر
لامحــا
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هــو
المصـطفى
الأصـفى
صـفي
ومصـطفى
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لـه
المعـالي
قصداً
بالمعالي
منافحا
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هـو
الـذات
عيـن
الـذات
سـرٌّ
لعينها
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وســـرٌّ
لســـرِّ
الســرِّ
ســرك
لامحــا
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وليــس
ســواك
الــذات
اللـه
ربنـا
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لـك
النعت
في
الإخلاص
في
النعت
فاسحا
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فــأنت
أنــا
وهــو
الأنيــة
سـابقا
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ولا
لــك
غيــر
فــي
الهويـة
فاتحـا
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لـك
الحمـد
والمـدح
القـديم
وأهلـه
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لـك
المجـد
ثـان
فـي
الأواخـر
مادحا
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وليــس
سـواك
اللـه
بـالأواخر
عـالم
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طلبــت
لفضــلٍ
منــك
للصـدر
شـارحا
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يكمّــل
مــا
أرجــو
ويكمــل
قصـدنا
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ويختــم
بالحســنى
ويحســن
فاصــحا
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وصــلِّ
صــلاةً
لا
لهــا
الحــدُّ
ناهيـاً
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علـى
مـن
نهـى
حـد
الكمـال
ومانحـا
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