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ألا
مــا
لجــابر
مبهـرر
عيـونه
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أو
السـارق
الليـل
لبـخ
زبـونه
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فمـا
بـه
سـخاً
جـابر
أحد
يخونه
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جعــل
مـن
تعـداه
توشـع
قرونـه
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فهــو
شــيخ
جـوده
علاوه
سـفاله
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وقــد
نخرتـه
لاسـيه
فـي
قـذاله
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وحيـن
لاح
فـي
الخـد
فنجان
خاله
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عليــه
الـف
ياسـين
لا
يشـقبونه
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وطلعـــة
محيـــاه
مقلا
شــبامى
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وطرفـه
علـى
زهـرة
الخـد
حـامى
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وتامـا
جلـس
تبصـر
الكـر
حـامي
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وان
خــذ
وانكــا
فللـه
سـكونه
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ولــي
نظـم
نحـو
الموفـق
تهيـا
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ومــن
شايســنب
قبــالي
فهيــا
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ومــن
يعتنــى
شــايرده
عليسـا
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ومـن
لـم
يذوق
البديع
يا
غبونه
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أنـا
مجـرد
الشـعر
ممحـوك
دارس
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أنـا
أصـلح
الشـعر
إن
كان
والس
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وفـي
البندقان
فقت
يونان
وفارس
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وشـعرى
لك
الخير
دقيق
في
طحونه
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وفي
النظم
ما
مصر
عندي
والاعماس
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اركـب
لـك
الشـعر
من
غير
قرطاس
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وعنـدي
شـطاره
وفنقـال
وفلكـاس
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ومــن
صـدق
القـول
ذا
يـاركونه
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وفنقلـت
راس
الحـبيب
وهـو
حالق
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منيبــار
مـدهن
بـائنين
خـزاوق
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يقرقـر
علـى
زوج
عيون
كالخوافق
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فمـن
لـم
يقـل
له
مليح
يادقونه
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فمـا
سلوتي
في
المقام
غير
جابر
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إذا
ما
اجتمعنا
بقا
الزبج
سابر
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ونبقــى
نشــنف
رحيـق
النـوادر
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وفـي
اللطـف
برمـان
دوني
ودونه
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وفـي
الحـاظيه
والسـمر
ما
ينعس
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ولا
تبصــره
يــوم
يمشــي
يعبـس
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وتـا
مـا
ضـحك
للغـد
مـا
يوانس
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ولـه
شـعر
رايـق
يـرى
من
لحونه
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وفـي
النحو
تلقاه
غزالي
وأزهار
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وإن
حـك
صـدره
تجشـا
لـك
أشعار
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ويمليــــك
ويرويـــك
أخبـــار
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وفـي
الخـط
زنبور
أخذ
مشق
نونه
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ولا
احــد
يقيسـه
بعلاقـة
الكـاف
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ولا
اهل
النجف
يسبكو
اشقه
القاف
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ولا
زال
ينــثر
لنـا
در
الأصـداف
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ويسـلي
المسـامع
قريض
من
مجونه
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