|
يـا
نسـيماً
مـن
ربـى
نجـد
سرى
|
نافحــا
يحمــل
ريّــا
العنـبر
|
|
قـف
إذا
مـا
نـوّج
الليل
الغسق
|
وعلــى
اكليلــه
النجـم
اتسـق
|
|
أو
فسـر
والصـبح
ترعـاه
الحدق
|
فصــباحا
يحمـد
القـوم
السـرى
|
|
والتثـم
وجـه
الصـباح
المسـفر
|
|
خفـت
إن
سـرت
وداجـي
الليل
جن
|
قــدّ
قـدّ
الرشـأ
الظـبي
الأغـن
|
|
حيــث
ليلاً
رام
وصــلا
وارجحــن
|
فتكــت
الحــاظه
يــا
هـل
درى
|
|
إذ
رنــى
لــن
بعينــي
جــؤذر
|
|
كـم
لنـا
مذ
غلس
الليل
البهيم
|
نشــوة
يملكهــا
ثغـر
النـديم
|
|
فـي
طلا
كـان
لهـا
الدر
النظيم
|
حببـا
إذ
ثغـره
الكـاس
انـبرى
|
|
فهــي
لا
سلســل
مــاء
الكـوثر
|
|
مذغــدت
جائلــة
فــوق
الاقـاح
|
مـن
ثنايـا
رشـا
شـاكي
السـلاح
|
|
وســقيانها
لمــى
لا
صــرف
راح
|
قتلــت
مـن
بيـن
جفنـي
الكـرى
|
|
وبــان
تحـي
الكـرى
لـم
تظفـر
|
|
يـا
مهاد
الزهر
من
بان
اللهوى
|
كـم
سـحبنا
فيـك
اذيـال
الهوى
|
|
وقصــارى
رجعــت
ايـدي
النـوى
|
حيــث
ورق
الأيــك
غنــت
سـحرا
|
|
وانثنــت
تطــرب
قلــب
السـحر
|
|
يــا
خليــل
الصــفيين
ادلجـا
|
بالمهـــارى
ولســـلع
عرجـــا
|
|
ولــدى
هــالات
اقمــار
الـدجى
|
فاعقلاهـا
والثمـا
وجـه
الـثرى
|
|
مــن
ربــوع
الظبيــات
العفـر
|
|
اربـع
طـاب
بهـا
غـرس
الولـوع
|
وتهــادى
وجــده
بيـن
الضـلوع
|
|
كم
لبسنا
عن
ظبا
الوجد
الدروع
|
ولــد
رع
الصـبر
أقواهـا
عـرى
|
|
فلعمــرى
خــاب
مـن
لـم
يصـبر
|
|
ما
حدا
المزنة
ان
تسقي
الطلول
|
صـوب
رجع
الودق
الهامي
الهطول
|
|
غيــر
ان
الرعــد
مـذلاح
يصـول
|
مـن
لمـوع
الـبرق
سـيفا
شـهرا
|
|
وثناهـــا
بزئيـــر
القســـور
|
|
فكــأن
الرنـد
فيهـا
والعـرار
|
ارقــان
اعتنقـا
عنـد
المـزار
|
|
فخــذا
عطـف
الرقيـب
الجلنـار
|
غضــبا
واحمــر
ممــا
ابصــرا
|
|
وخلــي
البــال
مـن
لـم
يبصـر
|
|
مـــذرنت
ذاك
عيــون
النرجــس
|
طأطــأت
نحــو
الـثرى
بـالارؤس
|
|
وغــدت
ترنــو
بعينــي
اخــرس
|
والاقــاحي
باســم
الثغـر
يـرى
|
|
زخرفــــــــــا
مــــــــــا
|
بــــــــالورود
النضـــــــر
|
|
روض
انــس
كــم
ليـال
بالغضـا
|
ازهرتهــا
زهــره
حـتى
انقضـى
|
|
فهـي
لـولا
أن
نـرى
عـرس
الرضا
|
مـا
عقلنـا
مثلهـا
الـدهر
نرى
|
|
لاوربـــات
الحجـــال
الضـــمر
|
|
مـن
رأى
بـدر
السـما
في
أوجها
|
عـانق
الشـمس
هـوى
فـي
برجهـا
|
|
يالهــا
مــن
آيـة
فـي
نهجهـا
|
قــد
ارت
اعيننــا
مــالا
يـرى
|
|
وكبــا
عنهــا
جــواد
الفكــر
|
|
لســت
أدري
أي
قــولي
الجميـل
|
اهـو
كـالبحر
أم
البحر
المثيل
|
|
ولـدى
الفكـرة
قـد
بان
السميل
|
يجــزر
البحـر
وذا
لـن
يجـزرا
|
|
لا
تقـــــــــل
راحتــــــــه
|
كــــــــــــــــــــــالابحر
|
|
مــن
يقـل
كفـك
سـحب
او
بحـار
|
فلعمـري
قـاس
بالليـل
النهـار
|
|
ايـن
وكف
الماء
من
وكف
النضار
|
كلمـــا
كفــك
اضــحى
ممطــرا
|
|
كـــــف
وكـــــاف
الســــحاب
|
الممطــــــــــــــــــــــر
|
|
فلـك
المجـد
بـك
الـدنيا
ملـك
|
فــاقرت
كلهــا
بالفضــل
لــك
|
|
حسـن
دور
البـدر
من
دور
الفلك
|
كــل
ممطــور
بجــدواك
انـبرى
|
|
يكــثر
الحمــد
عـداد
العـثير
|
|
كلمـا
فـي
ولـج
الركـب
الحداة
|
أعربـت
ذكـرك
فـي
تلـك
الصفات
|
|
سـعت
العيـس
بهـا
سـعي
القطاة
|
يـا
لـه
ذكـرا
بـه
الركـب
سرى
|
|
فهــو
لا
طيــب
أريــج
العنـبر
|
|
لـم
يدع
للمجد
في
معنى
الوجود
|
صــــفة
الا
لعليـــاه
تعـــود
|
|
فــإذا
مــر
بــذكراه
الحسـود
|
قـال
كـل
الصـيد
في
جوف
الفرا
|
|
قلـت
مـا
اضـللت
نهجـا
فاحـذر
|
|
كـم
علـوم
سـكنت
بحـر
الصـدور
|
هـي
فـي
طرسـك
الفـاظ
السـطور
|
|
فــزت
بـاللب
وهاتيـك
القشـور
|
مـذ
رأيـت
العلـم
يعـزى
جوهرا
|
|
ســقت
للبحــر
صــحاح
الجـوهر
|
|
ذو
مزايـا
لـو
جرت
فهي
الشمول
|
اسـكرت
فـي
عدها
العشر
العقول
|
|
فيـه
يـا
واحيرتـي
مـاذا
أقول
|
علـــم
تحســبه
بيــن
الــورى
|
|
وهــو
فيهــا
تبعـا
فـي
حميـر
|
|
خـص
اذ
عـم
الـورى
منك
السرور
|
خيــر
اعلام
كامثــال
البــدور
|
|
ضـربوا
فـي
قنـة
المجد
القصور
|
فــانثنى
مجـدهم
سـامي
الـذرى
|
|
قــل
لمــن
طــاولهم
فليقصــر
|
|
ذاك
ابراهيــم
مـن
قـدما
ربـى
|
راضـــعا
ثــدي
فخــار
وابــا
|
|
جـاد
حـتى
بلـغ
السـيل
الزبـى
|
فاختشــى
الــوارد
الا
يصــدرا
|
|
وغــدا
مــأمنه
فــي
المصــدر
|
|
اروع
رب
كمـــــال
ونـــــوال
|
يبـدء
العـافي
مـن
قبل
السؤال
|
|
فاقهــا
طــرا
وربـات
الحجـال
|
وعلـــى
منهـــج
آبــاء
جــرى
|
|
فهــو
بالعليـاء
والمجـد
حـري
|
|
غصـــن
مـــن
دوحــة
اشــهدها
|
أبــدا
عيــن
الــورى
ترصـدها
|
|
مثـــل
ابراهيمهـــا
احمــدها
|
طـاب
نفسـا
حيـث
طـابت
عنصـرا
|
|
ولبــاب
المــرء
طيـب
العنصـر
|
|
كلمــا
ادلجـت
العيـس
الوفـود
|
كـان
هادينـا
لـه
ذات
الوقـود
|
|
ينثنــي
للوفـد
محمـر
الخـدود
|
خجلا
تحســـبه
عنـــد
القـــرى
|
|
قـد
أتـى
مـالو
ابـى
لـم
يعذر
|
|
خلـت
اذ
فـي
ربعه
المجد
امتطى
|
اذنــي
المجــد
بـه
قـد
قرطـا
|
|
فلشــانيه
دجــى
عيــن
القطـا
|
ذاده
مزعجـــه
طيـــب
الكــرى
|
|
فهـو
فـي
الـدهر
حليـف
السـهر
|
|
عصــبة
ذلـت
لهـا
كـل
الصـعاب
|
فـإلى
عليائهـا
تلـوى
الرقـاب
|
|
منذ
شادت
في
ذرى
المجد
القباب
|
غرســت
للجــود
فيهــا
شــجرا
|
|
فعلـى
العـافي
اجتنـاء
الثمـر
|
|
هاكهـا
بـث
الهنـا
مـن
خيمهـا
|
ومــزاج
الــراح
مـن
تسـنيمها
|
|
لــك
قــد
زفــت
وابراهيمهــا
|
وشــقيقيه
فهــل
بكــرا
تــرى
|
|
زوجــت
مــن
اربـع
فـي
الأدهـر
|
|
قـد
هجـرت
الشـعر
لكـن
الفؤاد
|
لـج
فـي
أدائه
كذا
فرض
الوداد
|
|
وقبــولا
رمــت
لا
قــول
اجــاد
|
لا
تجيــد
الشــعر
الا
الشــعرا
|
|
كيــف
لوينشـيه
مـن
لـم
يشـعر
|
|
فعلـــى
عالمهـــا
ان
يكتمــا
|
امرهـا
عنـد
الـذي
لـن
يعلمـا
|
|
ان
لـي
مـن
لـو
رأى
القوس
رمى
|
انــت
فـادر
واخـو
الفكـر
درى
|
|
لــم
اكـن
أعـدو
لسـان
البشـر
|