|
تــدحرج
الظلــم
إذ
زلـت
بـه
القـدم
|
|
فاستبشــر
الحــق
واهـتزت
لـه
الأمـم
|
|
آن
الأوان
إلــى
الأحــرار
فــانتقموا
|
|
للّــه
أكــبر
فــالظلام
قــد
علمــوا
|
لأي
منقلـــب
يفضـــي
الألــى
ظلمــوا
|
|
تســلم
الحكـم
أهـل
العـدل
وانخفضـت
|
|
آل
التقهقــر
بــل
أيامنــا
انقرضـت
|
|
قـل
هكـذا
حكمـة
المـولى
القدير
قضت
|
|
لقـد
هـوى
اليـوم
صرح
الظلم
وانتقضت
|
أركـــانه
وتـــولت
أهلـــه
النقــم
|
|
وكـان
مـا
كـان
من
جيش
الفتى
العمري
|
|
غــذ
قــام
منتصـرا
بالصـارم
الـذكر
|
|
فانقــذ
القــوم
مـن
هـول
ومـن
خطـر
|
|
وحصــحص
الحــق
فــي
عــز
وفـي
ظفـر
|
يحقـــه
خادمـــاه
الســيف
والقلــم
|
|
ســـلو
ســـلانيك
إذ
قـــامت
مشــيدة
|
|
لدولـــة
طالمـــا
كـــانت
مهـــددة
|
|
لا
يعـــدم
العـــدل
أنصــار
مؤيــدة
|
|
ثـــارت
لــه
عصــبة
كــانت
مشــردة
|
وقـــد
تهـــددها
الإرهــاق
والعــدم
|
|
قاســوا
الثلاثيـن
حـولا
ظلمـة
الغسـق
|
|
قاســوا
الثلاثيــن
جــولا
شــدة
الأرق
|
|
حــتى
اسـتعدوا
فـأموا
أسـلك
الطـرق
|
|
مــن
كــل
أروع
فــي
حيزومــه
حنــق
|
فــي
نفســه
عــزة
فــي
أنفــه
شـمم
|
|
قــوم
تــرى
الــذل
بالإنسـان
فاحشـة
|
|
بهـــم
غــدت
أمــة
الإســلام
ناعشــة
|
|
واصـــبحت
منهـــم
الأيـــام
داهشــة
|
|
عبــد
الحميـد
اسـتمع
منهـم
مناقشـة
|
فطالمــا
صــبروا
بــل
طالمـا
كظمـو
|
|
بــالأمس
هـذي
الضـواري
أنـت
جامعهـا
|
|
واليــوم
دارت
علـى
البـاغي
طلائعهـا
|
|
خانتــك
إذ
فيـك
قـد
خـابت
مطامعهـا
|
|
غـــادرت
أمتــك
المنكــود
طالعهــا
|
تغـــض
مقلتهـــا
إن
عـــدت
الأمـــم
|
|
كــم
خــائن
لــك
صـلى
خاضـعا
وسـجد
|
|
والأمـر
أمـرك
قـل
مـا
شـئت
ليـس
يرد
|
|
أخــذلت
دولتنــا
لــم
تســتمع
لأحـد
|
|
أطلقــت
فيهـا
سـيوف
الغـادرين
وقـد
|
كــانت
بحبلــك
بعــد
اللــه
تعتصـم
|
|
كـانوا
القطيـع
وكـان
المسـتبد
أسـد
|
|
عرينــك
العـرش
والسـرجان
فيـه
عمـد
|
|
أرهقتهــم
فعــدّوا
فــي
ذلــة
وكمـد
|
|
اللّـه
اللّـه
يـا
راعـي
القطيـع
فقـد
|
لافــت
مصــارعها
فــي
رعيــك
الغنـم
|
|
كـم
مـن
وليـد
بكـى
منكـم
علـى
أبـه
|
|
واللّــه
ناصــره
مــن
عســف
مغضــبه
|
|
هــل
كنــت
منتبهــا
أم
غيـر
منتبـه
|
|
حملتنــا
مــا
تنــوء
الراسـيات
بـه
|
كيــف
الصـنيع
وأنـت
الخصـم
والحكـم
|
|
كنــا
وكنــت
وهــذي
اليـوم
حالتنـا
|
|
إنــا
مــع
الحـق
والدسـتور
غايتنـا
|
|
أغــرب
فقـد
ظهـرت
فـي
الأفـق
آيتنـا
|
|
فكــم
شــكونا
ولــم
تسـمع
شـكايتنا
|
وكــم
دعونــا
وحــظ
الـدعوة
الصـمم
|
|
قــل
هــذه
نفحـة
القهـار
قـد
عـدلت
|
|
لاقـت
يـد
الخـائن
الفتـاك
مـا
عملـت
|
|
يـا
مـن
حمـاته
فـي
مـا
بينه
انخذلت
|
|
ولــي
نعمتنــا
قــل
لـي
أمـا
بطلـت
|
تلــك
الولايــة
لمــا
ضــاعت
النعـم
|
|
خنـت
العهـود
وخنـت
الشـرع
والوطنـا
|
|
عشــت
المهيمــن
لا
شــورى
ولا
أمنــا
|
|
أبيـــت
إلا
التمــادي
فــي
تأخّرنــا
|
|
فلــو
رفقــت
أميــر
المـؤمنين
بنـا
|
مــا
كــان
أنفــث
مصــدور
وسـال
دم
|
|
أو
غـرت
منـا
قلوبـا
طالمـا
انكسـرت
|
|
لـولا
تـوغلكم
فـي
الضـغط
مـا
انفجرت
|
|
كـم
مـن
فضـائع
فـي
المابين
قد
صدرت
|
|
محــافظ
الحرميــن
اعـدل
فهـل
أمنـت
|
فــي
ظلـك
الكعبـة
الزهـراء
والحـرم
|
|
كـــم
انتـــدبناك
لاســتجلاب
منفعــة
|
|
فمـــا
نظــرت
لحــال
منــك
مفزعــة
|
|
أفــي
زمانــك
بيــت
المـال
ذو
سـعة
|
|
أم
حــج
حجــاج
بيـت
اللّـه
فـي
دعـة
|
بــدون
أن
يرهقــوا
فيهــا
وينضـموا
|
|
بيـتٌ
حـرام
بـه
الفعـل
الحـرام
يسـن
|
|
وأنــت
راض
كــأن
الضــيم
فيـه
حسـن
|
|
كـم
غـارة
فيـه
تلقـاء
الحجيـج
تشـن
|
|
وليتــه
فاســقا
لـم
يـرع
حرمـة
مـن
|
فــي
ذمـة
اللّـه
ضـاعت
عنـده
الـذمم
|
|
عـــون
وأنـــت
إذا
عــون
لمكربهــم
|
|
يــزداد
منــك
عتــوا
فــي
تعــذبهم
|
|
هــم
أهــل
مكــة
أولـى
فـي
تقربهـم
|
|
كــم
اسـتجاروا
عليـه
فـازدريت
بهـم
|
إن
لــم
تكــن
ناقمـا
فـاللّه
منتقـم
|
|
بكــف
ظلمــك
مـن
فـي
الـدرب
تـذبحه
|
|
وتــاج
عثمــان
قــد
أوشــكت
تطرحـه
|
|
أوتيــت
ملكــا
وقــد
آليــت
تصـلحه
|
|
رب
الهلال
أجـــب
هــل
كنــت
تمنحــه
|
مــا
اعتـاد
مـن
نصـرات
ذلـك
العلـم
|
|
شــتتت
ملكــا
عظيمــا
كـان
محترمـا
|
|
فرطتـــه
مســـرفا
وزعتـــه
كرمـــا
|
|
يــا
واهبـا
مصـر
والخضـراء
للغرمـا
|
|
مــاذا
قعلــت
بــأحرار
البلاد
ومــا
|
جنوا
على
الدين
والدنيا
وما
اجترموا
|
|
هــم
طــالبوك
بدســتور
كمــا
أمـرت
|
|
بــه
الشــريعة
فاسـتنكرت
مـا
شـرعت
|
|
فلــم
تــزل
معرضــا
عـن
أمـة
منيـت
|
|
حــتى
قســمتهموا
شــطرين
فانقســمت
|
علــــى
جســـومهم
النينـــانوالرخم
|
|
قضــيت
قهــرا
فيــا
لحكــم
طاغيــة
|
|
حكمــت
دهــرا
فيــا
لهــول
داهيــة
|
|
ألقيتهــم
شــذرا
فــي
كــل
هاويــة
|
|
ســـرقت
شـــملهم
فــي
كــل
ناحيــة
|
فــارغموك
بحــول
اللــه
والتــأموا
|
|
مـن
شـدة
الضـغط
لـو
تدري
قد
انفجرت
|
|
هــذي
العيــون
ولـولا
اللّـه
لانطمسـت
|
|
فرعـون
عصـرك
لـو
أنصـفت
مـا
انتصفت
|
|
ويــا
ســلالة
عثمــان
أمــا
اتصــلت
|
منــه
إليــك
الصـفات
الغـر
والهمـمُ
|
|
أيـن
الفتوحـات
يـا
نسـل
الغزاة
ومن
|
|
كـانوا
الكواسـر
في
الغارات
حين
تشن
|
|
ايـن
انتصـارات
ذلـك
العـرش
أين
دفن
|
|
أيـن
الغطـاريف
أربـاب
العـزائم
مـن
|
أسـلافك
الصـيد
مـن
بالعـدل
قد
عظموا
|
|
آبــاؤك
الغــر
كـانوا
منبـع
الهمـم
|
|
جـابوا
الممالـك
مـن
عـرب
ومـن
عجـم
|
|
قـاموا
بخدمـة
هـذا
الـدين
عـن
قـدم
|
|
شـادوا
لـك
العـزة
القعسـاء
مـن
قدم
|
فجئت
تهــدم
مـا
شـادوا
ومـا
رسـموا
|
|
كــــأنهم
ويـــد
الإســـلام
قابضـــة
|
|
عليهــم
الأســد
فــي
الآجــام
رابضـة
|
|
وخيلهــم
فــي
ســبيل
اللــه
راكضـة
|
|
كــانت
لهــم
دولــة
بالسـيف
ناهضـة
|
وفـــي
زمانـــك
لا
ســـيف
ولا
قلـــم
|
|
هــمُ
الكــواكب
فـي
آفاقتنـا
طلعـوا
|
|
والشـــأن
مرتفـــع
والملــك
متســع
|
|
فجئتنـــا
زحلا
مــن
بعــدما
هجعــوا
|
|
حصــدت
مـا
زرعـوا
فرقـت
مـا
جمعـوا
|
هـدمت
مـا
رفعـوا
بعـثرت
مـا
نظمـوا
|
|
حفــرت
فينــا
بأيــدي
الظلمهاويــة
|
|
زلـــت
بهــا
قــدم
الإصــلاح
داميــة
|
|
كــانت
ســنيك
عجــوز
النحـس
ناعيـة
|
|
ملكتنـــا
فرأينـــا
منـــك
طاغيــة
|
لـم
يـدر
نـدا
لـه
المشـهود
والقـدم
|
|
دقــات
قلبــك
كــالأجراس
قــد
ضـربت
|
|
فيهـا
المخـازي
علـى
نبراتهـا
حسـبت
|
|
تــأججت
فيــك
نـار
الفتـك
واضـطرمت
|
|
نيــرون
عنــدك
أو
فرعـون
قـد
غفـرت
|
زلاتـــه
واســـتحبت
شــاهها
العجــم
|
|
أيـــام
حكمــك
أيــام
الشــقاء
فلا
|
|
أعادهـا
اللّـه
كـم
ذقنـا
بها
العللا
|
|
قــد
كنــت
فينـا
وإن
أمسـيت
معتقلا
|
|
حجــاج
عصـرك
بـل
تـولى
العقـاب
بلا
|
ذنــب
ومــزّاك
عنــه
الجمـع
والنهـم
|
|
كـم
مـن
يـتيم
علـى
خـديه
قـد
سـكبت
|
|
مـدامع
اليتـم
لـو
شـاهدت
مـا
كتبـت
|
|
جــاوزت
حـد
عتـاة
فـي
الملـوك
طغـت
|
|
قــد
اخـترعت
ضـروبا
للمظـالم
والـت
|
نكيــل
مــا
فطنـوا
فيهـا
ولا
حلمـوا
|
|
نصـــبتها
الفـــخ
جاسوســية
ثقلــت
|
|
فـي
النـاس
وطأتهـا
مـاذا
عليـك
جنت
|
|
يـا
صـاحب
العـرش
والدنيا
بك
انخجلت
|
|
خليفــة
اللـه
قـد
خـالفت
مـا
أمـرت
|
بــه
الشــريعة
والتنزيــل
والكلــم
|
|
مــن
مشـرق
الأرض
لـو
تـدري
لمغربهـا
|
|
تــدعو
عليــك
الضـحايا
فـي
تلهبّهـا
|
|
مـــا
للســلاطين
حــق
فــي
تغلبهــا
|
|
وســيرة
الخلفــاء
الراشــدين
بهــا
|
خيـــر
المــواعظ
للظلام
لــو
فهمــو
|
|
مـــا
للممالــك
حصــن
قــائم
ولــه
|
|
فـــي
يلـــدز
ســد
يــأجوج
يضــلّله
|
|
فقــل
لــه
عــن
لســان
فــك
معقلـه
|
|
ركبـــت
مركـــب
جـــورليس
يقبلـــه
|
ممـــن
يخلفــه
فــي
قــومه
الصــنم
|
|
أحييــت
فيهـم
وكـانوا
الآمنيـن
فتـن
|
|
مســـتبدلا
بشــرهم
واتعســهم
بحــزن
|
|
أخليـت
ملكـا
فخيمـا
لـم
يقـس
بثمـن
|
|
دمــرت
بيتــك
يــا
هــذا
فـأنت
إذن
|
عــدو
نفســك
أو
قــد
مســك
اللمــم
|
|
أقصــيت
كــل
نصــوح
أيهــا
الملــك
|
|
مــا
كنــت
تعلــم
أن
الحكـم
مشـترك
|
|
حــتى
اسـتدار
عليـك
الـدهر
والفلـك
|
|
حشــدت
زمــرة
غــدارين
كــم
سـفكوا
|
فاســتنزفوا
ثـم
لا
قيـدوا
ولا
غرمـوا
|
|
لــو
كــان
ينطـق
للبسـفور
فيـك
فـم
|
|
كـــان
الكلام
قصـــيدا
كلـــه
رمــم
|
|
ومجمــل
القــول
والتاريــخ
محــترم
|
|
المخلصــون
تولــوا
منــك
وانهزمـوا
|
والخــائنون
علــى
أبوابـك
ازدحمـوا
|
|
انشــق
منــك
فـؤاد
العـرش
واقـتربت
|
|
للنــاس
ســاعته
لــولا
الأبــاة
أبـت
|
|
طـالت
لياليـك
فاسـودت
بمـا
اكتسـبت
|
|
أسـرفت
فـي
نهـب
بيـت
المال
فاستلبت
|
منـه
الجواسـيس
مـا
شاؤوا
وما
غنموا
|
|
هــم
حزبــك
المنتقـى
جلـت
مكـانتهم
|
|
أدنيتهــم
منــك
فاشــتدت
قســاوتهم
|
|
حجــاب
قصــرك
لــم
تجحــد
رعـايتهم
|
|
عصــابة
ثقلــت
فــي
النـاس
وطـأتهم
|
صـموا
عـن
الحـق
فـي
أغراضـهم
وعموا
|
|
بــك
اســتداروا
وكــل
أنــت
واعـدهُ
|
|
والطــامع
النــذل
لا
تخفــى
مفاسـده
|
|
كــانوا
غلاظــا
يشــء
بـالابن
والـده
|
|
اخــترتهم
واختيــار
المــرء
شـاهده
|
يـا
ليتهـم
رفقـوا
بـالخلق
أو
رحموا
|
|
أبــوا
هــداك
ومــا
أدراك
بالحشــف
|
|
أبــو
الضـلال
ومـن
يحـوي
البلاط
وفـي
|
|
تلـــك
البطانـــة
أقــوام
بلا
شــرف
|
|
خـانوك
لمـا
رأوا
منـك
الخيانـة
فـي
|
بنيــك
والمــرء
موســوم
كمــا
يسـم
|
|
أتقنــت
دربتهــم
فاســتفحل
الــدرك
|
|
أشـركتهم
فـي
ارتكاب
الجرم
فاشتبكوا
|
|
بـالغت
فـي
العسـف
فـارتجت
له
السكك
|
|
حبســت
آلــك
حــتى
بعضــهم
هلكــوا
|
كأنمــا
لــم
تكــن
قربــى
ولا
رحــم
|
|
هــذا
فــؤادك
كــالفولاذ
قــد
غلظـا
|
|
وكنــت
محتجبــا
لــم
تبــد
ملتحظـا
|
|
نســخت
مــا
كــان
مزبـورا
ومحتفظـا
|
|
حـاولت
إطفـاء
نـور
الحـق
وهـو
لظـى
|
تثــور
أفــواهه
إن
ســد
منــه
فــم
|
|
فــي
عهــدك
الــدردنيل
قــل
والجـه
|
|
فــروا
وفــرت
مــع
السـاري
بـوارجه
|
|
يشـــكوك
داخلـــه
يهجـــوك
خــارجه
|
|
طــال
الزمــان
علــى
جــور
تعـالجه
|
وعيــل
صـبر
الـورى
واسـتحوذ
السـأم
|
|
حجبــت
نفســك
يــا
رعديـد
فـاحتجبت
|
|
عنــك
الحقيقــة
حـتى
بنـت
فانكشـفت
|
|
ظلمــت
قومـك
فـي
الدسـتور
فانتصـرت
|
|
فبقــت
دارتهــم
فــي
الأرض
فاتســعت
|
والمـــرء
مســـتبل
إن
حظــه
الألــم
|
|
شــاهت
صــفاتك
فــي
خلـق
وفـي
خلـق
|
|
تبـــا
وســـحقا
لمنحـــوس
ومنســحق
|
|
للّــه
وافــوك
أحــرارا
علــى
نســق
|
|
قــد
جمــع
الظلـم
منهـم
كـل
مفـترق
|
وشـدما
اسـتتروا
فـي
الأمـر
واكتتموا
|
|
فـي
عهـد
دولتـك
التعسـاء
قـد
لبثوا
|
|
نــارا
مرمــدة
ينفــى
بهــا
الخبـث
|
|
تهــب
ريحـك
لكـن
مـا
بهـا
اكـترثوا
|
|
وكلمــا
نــام
عنهـم
رهطـك
انبعثـوا
|
يــــدبرون
وإن
لاحظتهــــم
جشـــموا
|
|
كــم
كنـت
بالمـال
تغـويهم
ونخـوتهم
|
|
تـــأبى
عليهــم
أن
تنحــل
عقــدتهم
|
|
فلـن
يزالـوا
وفـي
الدسـتور
طلبتهـم
|
|
وعنـــدما
اكتملــت
للــوثب
عــدتهم
|
توكلــوا
واســتخروا
بالــذي
عزمـوا
|
|
أمــوا
حمــاك
علــى
الطيـار
مزحفـة
|
|
جــوارح
الحــي
قــد
طــارت
مخففــة
|
|
شـــقوا
عليــك
طبــاق
الأرض
مرجفــة
|
|
ســلوا
عليــك
ســيوف
العـدل
مرهفـة
|
كأنهــا
شــهُب
فــي
الأفــق
أو
رجُــم
|
|
ارتجــت
الأرض
مــن
زلزالهــم
فرقــا
|
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فــانقض
يلــدز
منحطــا
بهــم
طبقـا
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فيـا
لهـا
صـيحة
شـوكت
لهـا
انطلقـا
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شـقوا
بهـا
فـي
جلابيـب
الـدجى
شـفقا
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بشــت
لـه
الأرض
وانجـابت
بـه
الظلـم
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اللّـــه
يأخـــذ
بــالمظلوم
ظــالمه
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لا
نــال
مثلــك
يــا
طــاغي
مراحمـه
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الشــعب
حــرر
لســت
اليــوم
حـاكمه
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وطــــالبوك
بحـــق
كنـــت
هاضـــمه
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وحــاكموك
الــى
البتــار
واختصـموا
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عـــادوا
لمـــوطنهم
أهلا
بعـــودتهم
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شــادوا
معــالمهم
قــاموا
بنصـرتهم
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كــادوا
بمـن
كـاد
أن
يـردي
بملتهـم
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فــادروا
بــأرواحهم
حبــا
بــأمتهم
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فلتحـي
تلـك
السـجايا
الغـر
والهمـم
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وليحــي
فينــا
نيازينــا
وأنورنــا
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ولتعـــل
رايتنــا
وليــرق
منبرنــا
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قـد
كـان
مـا
كـان
والتاريـخ
يذكرنا
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قـد
كـان
مـا
كـان
والرحمـن
ناصـرنا
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فالعـــدل
منتصــر
والجــور
منهــزم
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اليــوم
أصــبحت
يــا
مـولاي
منتبهـا
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مــن
سـكرة
أظهـرت
مـا
كـان
مشـتبها
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بعــد
العهــود
وزلفــى
فـي
تقربهـا
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دبــرت
فتنــة
ســوء
تســتعيد
بهــا
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مـن
مجـدك
الباطـل
الغـرار
ما
هدموا
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يـا
نـاكث
العهـد
لاسترداد
ما
استلبت
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أحــرار
أمتــه
الغــرآ
بمــا
كسـبت
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حكـــم
طويــل
بــه
زلاتــك
اشــتهرت
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مجـــد
كــبير
طــوته
ظلمــة
كثفــت
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ثــم
انجلــت
فــاذا
مـا
تحتهـا
ورم
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مـا
ظـن
يومـا
بـأن
الحـق
فيـك
يـرى
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أو
أنّنــا
نلقــم
اسـتبدادك
الحجـرا
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حــتى
اتثـاروا
كمـاة
تعضـد
القـدرا
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كــروا
بعزمــة
حــر
جــاء
منتصــرا
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لنفسـه
واسـتباحوا
منـك
مـا
احترموا
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كنــت
الخليفــة
فـي
الاسـلام
متحرمـا
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وكــان
فيــك
دهــاء
أعجــز
الحكمـا
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لاذوا
بمغنـــاك
فاســـتنكف
منتقمــا
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فــأنزلوك
عــن
العـرش
الرفيـع
ومـا
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كــانوا
يريــدونها
لكنهــم
رغمــوا
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هـــي
العدالــة
تــأبى
أن
تلاحظهــا
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مــا
كــان
أعـذبها
لـو
كنـت
لافظهـا
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وحيــث
لــم
تســتمع
فينـا
مواعظهـا
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تــأبى
الشــريعة
أن
تبقيـك
حافظهـا
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وأنـــت
بالغـــدر
والإغــواء
متّهــم
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ذق
مــا
أذقتهمــو
مــن
لوعـة
وشـجن
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روح
كروحـــك
مــن
أرهقتهــم
وبــدن
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كــم
قبــل
ســجنك
مـن
حرلـديك
سـجن
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فـاليوم
تعلـم
عقـبى
مـن
يخـون
ومـن
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يطغــى
وتنــدم
إذ
لا
ينفــع
النــدم
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اللّــه
أكــبر
جــل
اللّــه
مقتــدرا
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أأنــت
هـذا
السـجين
يـا
لهـا
عـبرا
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هـويت
كـالنجم
يرمـى
فـي
الفضا
شررا
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ســقطت
مــن
قمــة
الأمجــاد
منحـدرا
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كصـــخرة
حطّهـــا
مــن
شــاهق
عــرم
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كــن
باعتقالــك
يـا
مغـرور
مقتنعـا
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وانـس
التسـيطر
وانـس
الحكم
والطمعا
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واســتعظم
الـذنب
واسـتغر
لـه
جزعـا
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ففــي
هبوطــك
عــاد
الملـك
مرتفعـا
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وفــي
هلاكــك
كـل
الخلـق
قـد
سـلموا
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كـــانت
بــدولتك
الرايــات
ناكســة
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كأنمـــا
لــم
تشــق
الأفــق
مائســة
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أبـــــت
تعاســــتكم
إلا
معاكســــة
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كـــانت
باقبالــك
الأقــدار
عابســة
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فأصـــبحت
بعـــدما
أدبــرت
تبتســم
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