|
أبــي
لــي
طيــفُ
لا
يــزال
ملازمـي
|
تناســــيَ
آرامٍ
بجرعـــاءِ
جـــاثمِ
|
|
تيَمــم
رحلـي
فـي
الرحـال
فهـاجني
|
لمُتّـــرَك
مــن
عهــدها
المتقــادم
|
|
ومـا
هـاض
قـرحَ
القلب
بعد
اندماله
|
كطيــف
لطيفــات
الخصـور
النـواعم
|
|
عجبـت
لـه
أنـى
اهتـدى
لـي
ودونـه
|
مـتيه
الفيـافي
مـن
ثنايا
المخارم
|
|
فبـت
أراعـي
النجـم
وجـدا
وصـحبتي
|
نيــامٌ
ومــا
ليــل
الشـجي
بنـائم
|
|
ولكـن
لعمـري
مـا
شـفى
المرء
وجده
|
بشـــاف
كوخــد
اليعملات
الرواســم
|
|
تخَيّــرنَ
مــن
أدم
اللـوادم
منزعـاً
|
تـردد
فيهـا
العيـن
بيـن
السـوائم
|
|
إذا
علــــمٌ
بــــادرنه
فـــتركنه
|
ترفعـــن
أعيـــاراً
لاخـــر
طاســم
|
|
يكلــن
بعيــد
البيــد
كيـل
مطفّـف
|
ويـــذرعنه
شـــطحا
ذراع
مراغـــم
|
|
كــروح
نعــام
صــوب
بيــضٍ
تروحـت
|
تخـــافُ
عليــه
غــائلات
الغمــائم
|
|
فــأنت
جــدير
تــمّ
خمــس
بــزورة
|
تـداوى
مهيـض
القـرح
مـن
أم
سـالم
|
|
فـدع
عنـك
ذا
فالنسـر
عزّ
ابن
داية
|
وعشـــش
فـــي
وكريــه
ضــربة
لازم
|
|
وعاشــر
نـذير
الشـيب
أحسـن
عشـرة
|
بعــزم
علـى
التقـوى
ورد
المظـالم
|
|
وجــانب
حمــى
مـولاك
واعـن
بـأمره
|
فخيـر
خصـال
المـرء
تـرك
المحـارم
|
|
وخلّــص
فقــد
ءان
التخلــص
صـادعاً
|
بأمـداح
الاشـياخ
البحـور
الخضـارم
|
|
وخصــص
بــه
غــوث
الأنــام
محمـدا
|
مجــدد
رســم
الــدين
بعـد
تقـادم
|
|
وقطـب
رحـى
أهـل
الولايـة
مـن
زكـا
|
علــى
خــاتم
الأقطــاب
وارث
خـاتم
|
|
منــاقبه
يعيــى
المهــارق
حصـرُها
|
ولــم
تــك
تحصــيها
أنامـل
راقـم
|
|
ألا
أت
بقُـــلّ
مـــن
كــثير
وعــدّه
|
كسـرد
ثميـن
الـدر
فـي
سـلك
نـاظم
|
|
جليـــل
جميـــل
عاقـــل
متغافــل
|
شـــفيق
رفيـــق
راحــم
أي
راحــم
|
|
جـــواد
بلا
مـــنّ
كريـــم
مـــرزّءٌ
|
يـرى
البـذل
والمعروف
خير
الغنائم
|
|
حليـــم
صـــفوح
لا
يجــازي
بســيء
|
ويــدفع
بالحســنى
أذاة
المســاخم
|
|
أديـــبٌ
مهيـــبٌ
منصـــف
متواضــع
|
علــى
منصــب
الأشـياخ
غيـر
مزاحـم
|
|
وعـن
غيـر
مـا
يعنـى
ويصـعد
صـامت
|
إذا
كــان
لغـو
الجاهـل
المتعـالم
|
|
ويخطـــب
أحيانــا
بأفصــح
لهجــة
|
وأبلغهــا
فــي
المحفـل
المـتزاحم
|
|
تأمـــل
مســـاعيه
تـــدلك
أنـــه
|
مـن
اليـوم
ملحـوظٌ
لعقـد
التمـائم
|
|
يســـمى
صـــغيرا
ســـنه
متطهّــرا
|
وشــبت
لـه
إذ
شـبّ
أقـوى
العـزائم
|
|
فشــد
لــدرك
الســؤل
جهـدا
إزاره
|
فـــأدركه
مــن
أهلــه
والمواســم
|
|
فـإن
تمتحنـه
حالـة
السـخط
والرضى
|
ويســر
وعســر
واشــتداد
المــآزم
|
|
تجـــده
وليـــا
كـــاملا
متحليــا
|
بـــأخلاق
صـــدق
خالــدات
كــرائم
|
|
وتبصـــر
منــه
مــا
يــدلك
انــه
|
غـدا
مـا
لـه
فـي
عصـره
مـن
مقاوم
|
|
وتعـــرف
أخلاق
النـــبي
تواضـــعا
|
وحســـن
ســجايا
واتســاع
مراحــم
|
|
تــراه
يقُــمّ
الــبيت
يخصـف
نعلـه
|
ويخــدم
أحيانــا
بــه
كــل
خـادم
|
|
ولســـت
تـــراه
مســـتقلا
هديـــة
|
ولا
عائبــا
يومــا
اخــسّ
المطـاعم
|
|
وليــس
يــرى
فــي
مجلــس
متميـزا
|
عــن
أصــحابه
وفقــا
لافضـل
هاشـم
|
|
فعشـــرته
للأهلـــى
تخـــبر
انــه
|
علــى
ســنن
مــن
ارثــه
متعــاظم
|
|
تـراه
إذا
مـا
الليـل
أرخـى
سدوله
|
وطــاب
كراهــا
للعيــون
النـوائم
|
|
يـــبيت
ينـــاجي
ربـــه
بكلامـــه
|
فينشــقّ
عنــه
الصـبح
ليـس
بنـائم
|
|
لــه
فــي
اســاليب
الكتـاب
تـأنّقٌ
|
كصـــاحب
نخـــل
مثمـــر
مــتراكم
|
|
ويحلـــو
لـــه
تــرداده
وســماعه
|
كمــا
شـرحت
صـهباء
قلـب
المنـادم
|
|
لـه
فـي
مقـام
الحـب
عشـرون
حقبـة
|
وكــان
مقـام
الحـب
أقصـى
السـلالم
|
|
وإن
لــه
فــي
كــل
يــوم
ترقيــا
|
يســير
بـه
سـير
النسـور
الحـوائم
|
|
فشـــاهد
حــب
اللّــه
حــب
كلامــه
|
وشــــاهد
صـــدقي
لائحٌ
للمســـالم
|
|
فلــو
فقـدت
كـل
الـدواوين
وامّحَـت
|
لكــان
بــدين
اللّــه
أكمـل
قـائم
|
|
فما
القطب
والشيخ
المربى
سوى
الذي
|
ذكـرت
ومـن
لـي
بـالقلوب
السـوالم
|
|
ولايتـــه
عظمـــى
تلــوح
المبصــر
|
كتـار
القـرى
تعلـو
رؤوس
المعـالم
|
|
لعمـري
لقـد
أيقظـت
مـن
كان
نائما
|
ويصـــعب
ايقــاظ
الملا
المتنــاوم
|
|
واسـمعت
مـن
ألقـى
إلـى
الحق
سمعه
|
ولكنــــه
لا
ســــمع
للمتصــــامم
|
|
تــرى
مكــرا
يحسـو
النكيـر
كـأنه
|
جنـى
النحـل
والمحسـوّ
سـم
الأراقـم
|
|
فيــا
ويلَــهُ
مـن
شـر
أمـر
يقـوده
|
إلـى
سـخط
المـولى
وسـوء
الخـواتم
|
|
وقـد
كـان
بيـن
العـارفين
وغيرهـم
|
كمـا
بيـن
مـن
تحـت
الثرى
والنعئم
|
|
وبينهمــا
مــا
بيــن
حــي
وميــت
|
ومــا
بيــن
يقظـان
لعمـري
ونـائم
|
|
ومـا
يسـتوي
مـن
همـه
اللّـه
وحـده
|
ومــن
همــه
الأعلـى
حضـور
الـولائم
|
|
أيـا
واهـب
النعمـى
لمن
ليس
أهلها
|
ومانحهـــا
عفـــوا
لبَــرّ
وظــالم
|
|
بحــق
مقــام
الشــيخ
أدعـو
وسـره
|
ووارثــه
الاتقــى
حفيــل
المكـارم
|
|
لكشــف
حجــاب
النفـس
عنـي
فـانني
|
بفضــلك
لا
أرضــي
بعيــش
البهـائم
|
|
ومــن
يحتقـب
بـالأربعين
ولـم
يكـن
|
بحضــرتك
العليــا
نــديم
الأكـارم
|
|
أصـيب
بمـا
تعييـى
المصـائب
دونـه
|
ويقــرع
مــن
تحســاره
ســنّ
نـادم
|
|
تــذكرت
لمــا
أن
شــددت
عمــامتي
|
بنقـــص
ولـــؤمٍ
لا
يــزال
ملازمــي
|
|
تغطــى
نميــر
بالعمــائم
لؤمهــا
|
وكيــف
يغطـى
اللـؤم
لـيّ
العمـائم
|
|
علــى
أننــي
إمــا
عصــيت
فـإنني
|
أيــدنث
بــأن
اللــه
ربّ
العـوالم
|
|
وهــو
واحــد
فــي
ذاتــه
وصـفاته
|
وأفعــاله
الحســنى
مقالــةَ
جـازم
|
|
وأن
رســـول
اللّــه
أحمــد
صــادقٌ
|
وأرســاله
مــا
بيــن
عيســى
وآدم
|
|
فيــا
رب
ثبّـت
علمهـا
فـي
قلوبنـا
|
ولا
تنســناها
بالــدواهي
الـدواهم
|
|
ولا
كنــت
ممـن
حظـه
القشـر
منهمـا
|
بـل
اللـب
واختـم
لـي
بأحسـن
خاتم
|