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أســعد
اللـه
صـبحها
ومسـاها
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وحماهــا
حـتى
تـوافي
حماهـا
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يعملاتٍ
تخــوض
بحــراً
مـن
الآ
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ل
ســراعاً
بغيـر
حـادٍ
حـداها
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واكنّــت
بيـن
الضـلوع
غرامـاً
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نـاب
عـن
حثّهـا
وجـذب
بُراهـا
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فــانبرت
للسـرى
بغيـر
دليـلٍ
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غيــر
شــوق
تضــمه
احشــاها
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مــرقلاتٍ
نحـو
الحجـاز
لتقضـي
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واجبــاتٍ
يفــوز
مــن
أدّاهـا
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فــإذا
ســالت
الأباطـح
منهـا
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ظنهــا
مـوج
لجـةٍ
مـن
يراهـا
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وهـي
كـانت
بـالامس
قـرة
عيـنٍ
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عنــدما
تشــرئب
فـي
مرعاهـا
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ليـت
شـعري
مـن
بعد
ما
الفته
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مـن
طويل
الهدوّ
ماذا
اعتراها
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ذكـرت
معهـداً
لهـا
فـي
حـراءٍ
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بـالترامي
عليـه
مـا
أحراهـا
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نفــرت
فجـأة
تـذوب
اشـتياقاً
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بزفيـــرٍ
همّللـــة
عيناهـــا
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تقطـع
الليـل
بيـن
جـدٍّ
ووجـد
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وحنيــن
عــن
الحـدا
أغناهـا
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ودمــوعٍ
تنهــلّ
شــوقاً
ولكـن
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حمــدت
حيــن
اصـبحت
مسـراها
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فاعـذراها
يـا
صـاحبّي
إذا
ما
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جـانبت
وردهـا
وعـافت
كراهـا
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وذراهــا
تفـري
الفلا
ورباهـا
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ودعاهـا
فالشـوق
طبعـاً
دعاها
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حملـت
مثلهـا
اشـتياقاً
ووجداً
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فغـدت
تنهـب
الفيـافي
خطاهـا
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لهمـا
اللـه
مـن
حليفـي
غرامٍ
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ورعــاه
مــن
راكــبٍ
ورعاهـا
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ولهـا
اللـه
مـن
رفيقـة
رفـق
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لـم
يكـن
واصـل
الحمـى
لولاها
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مَـن
يراهـا
تفيـض
مـن
عرفـاتٍ
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نحـــو
دارٍ
يشــوقها
مرآهــا
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وكسـاها
قـرب
المـزار
وقـاراً
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قـال
عنهـا
العـروس
في
مجلاها
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ولـدى
المشـعر
الحـرام
أقامت
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ســحَراً
تملأ
الفضــا
برغاهــا
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وصــباحاً
للخيـف
أمّـت
ونـالَت
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فـي
منـى
أمنَهـا
وكـلّ
مناهـا
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واسـتفادت
من
بطن
نعمان
طيباً
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فشــذاه
ينبــاع
مـن
ذفراهـا
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ثــم
وافـت
رحـاب
مكـة
تزهـو
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وبأســـعاد
جـــدها
تتبــاهى
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وببــاب
الصـفا
أنـاخت
وحيَّـت
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حرَمــاً
شــوقها
لــه
أنضـاها
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وانتشـت
مـن
وجودهـا
في
ربوعٍ
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أرضـها
بالتقـديس
تسمو
سماها
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حــرَمٌ
آمــنٌ
بــه
مــن
أتـاه
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وعلــى
الأرض
بالمشـاعر
تاهـا
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عظمــاء
الملــوك
إن
دخلــوه
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عفّــروا
فيـه
أوجهـاً
وجباهـا
|
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فهـي
تزهـو
علـى
الركاب
بفخرٍ
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لـم
ينلـه
مـن
النعيـم
سواها
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حملت
فوق
ظهرها
من
بني
العرب
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سـليل
السـادات
مـن
آل
طاهـا
|
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آل
بيـت
زانـوا
الوجـود
بآيا
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ت
هـــدى
للانــام
لاح
ســناها
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وكفــاهم
أنّ
الخلافــة
فيهــم
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رغــم
مَـن
عـن
ضـلالةٍ
ناواهـا
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وأبــوه
حــوى
المعـالي
بحـق
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وباســنادها
الصــحيح
رواهـا
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امـرة
المـؤمنين
وافتـه
عفواً
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ورأينــا
فــي
ذاتـه
معناهـا
|
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حاميــاً
للــذمار
ذا
ســطوات
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فــي
انــاةٍ
عــدّوة
يخشــاها
|
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كـابن
عـونٍ
وأين
مَن
كابن
عونٍ
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شــرفاً
باذخـاً
وعلمـاً
وجاهـا
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ذي
الأيـادي
الـتي
بنّيـة
صـدقٍ
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لـذوي
البـأس
طالمـا
أسـداها
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ظهـرت
في
عمارة
المسجد
الاقصى
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وتشـــييد
صـــرحه
إحـــداها
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همـمٌ
فـي
اقتنـا
الثواب
كبار
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فــاقت
الــدهر
عـزةً
صـغراها
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ولـه
الكعبة
التي
نحوها
تهوي
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قلــوب
الانــام
بــل
تهواهـا
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قبلـة
المؤمنين
مَن
كان
جبريل
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يطيــل
التّـرداد
فـي
مغناهـا
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وعليه
معوّل
العرب
في
جمع
شتا
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تٍ
بكــــل
خطــــبٍ
دهاهــــا
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حـرس
اللـه
ذاتـه
معدن
المجد
|
وقـــوّى
لكــل
خيــرٍ
قواهــا
|
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وحبانـا
مـن
طـول
عمـر
بنيـه
|
ذروة
العــز
مشــمخراً
بناهـا
|
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يـا
سليل
الرسول
يا
ابن
حسينٍ
|
ســيّد
العــرب
كهفهـا
مولاهـا
|
|
عـد
الينـا
عـود
الشفا
لسقيم
|
فسـعود
المرضـى
بنيـل
شـفاها
|
|
أو
كعــود
الحيـا
لازهـار
روضٍ
|
منعــوادي
ذبولهــا
أحياهــا
|
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وتهنـأ
بمـا
حـويت
مـن
اليُمن
|
بارجــــاء
مكـــة
وفناهـــا
|
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وليمــت
كـل
حاسـدٍ
لـك
غيظـاً
|
فالامـــاني
برغمــه
نلناهــا
|
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وابـق
واسـلم
تاجـاً
على
هامة
|
الـدهر
بعـزٍ
يبقـى
ولا
يتناهى
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