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هــذا
وكــم
كريمــة
مصـونة
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فــي
بيتهــا
كـدرة
مكنونـة
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لا
ســمع
النــاس
لهـا
كلامـا
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ولا
يضـــيفون
لهـــا
ملامــا
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تغــض
طرفهــا
عــن
الأجـانب
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ترجـو
حلـول
أرفـع
المراتـب
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بعيــدة
عــن
مجلـس
الرجـال
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لا
تخطـر
الفحشـا
لهـا
ببـال
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علـى
العفاف
والحياء
والتقى
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مجبولة
كالحور
في
دار
البقا
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لا
تكــثر
الصـعود
والتطلّعـا
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ولا
تجيــب
أجنبيــا
إن
دعـا
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مـا
همّها
إلا
الحقوق
الواجبة
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لربهـــا
ذاهبـــة
وآيبـــة
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بغــزل
أو
خياطــة
محترفــة
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بكــل
مــا
يزينهــا
متصـفة
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طائعـــة
لزوجهــا
ممتثلــة
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لأمــــره
بحقـــه
مشـــتغلة
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تحفظـه
إن
غـاب
أو
في
حضرته
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تبـذل
كـل
الجهـد
فـي
مسرّته
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قصـيرة
اللسـان
عن
سب
الولد
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ولا
تبيــح
ســرّها
إلـى
أحـد
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لا
تـدخل
النسـاء
بيـت
زوجها
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ولا
تــرى
قــط
بغيـر
برجهـا
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وإن
دعتهـا
حاجـة
أن
تخرجـا
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ففـي
ثيـابٍ
بذلـةٍ
وقت
الدجى
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قاصـرة
علـى
الطريـق
طرفهـا
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مســـتورة
ولا
يشــم
عرفهــا
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إذا
بـدت
فـي
محفـل
النسـاء
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فــدرة
تضــيء
فــي
حصــباء
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والفخـر
ليس
بالحرير
والذهب
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ولا
بلبـــس
جنفــص
ولا
قصــب
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ففـي
البغايـا
والقحاب
أكثر
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منهـن
قـدراً
هـل
بـذاك
مفخر
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ففـي
نسـاء
الفـرس
والنصارى
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مــن
الحلـي
مـا
غلا
مقـدارا
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وكلــه
فـان
وإن
جـاء
الأجـل
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أفضـت
إلى
ما
قدمت
من
العمل
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وجـاء
فـي
حـديث
طه
الأحمران
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عـن
الجنـان
للنسـاء
ملهيان
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ما
الفخر
إلا
بالعفاف
والتقى
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وفعـل
مـا
بهـن
كـان
أليقـا
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والبعـد
عـن
مجـامع
الفضـول
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ورفـــض
كــل
خلــق
مــرذول
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فالاقتـداء
بـالبتول
الزهـرا
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وأمهــات
المــؤمنين
أحــرى
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وكــم
كـم
لهـن
مـن
متابعـة
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فـي
فعلهـا
وقولهـا
كرابعـة
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بقـول
ذي
الجلال
قل
للمؤمنات
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يغضضـن
مـن
أبصـارهن
عـاملات
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بـالقول
لا
يخضـعن
كيلا
يطمعا
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مريـض
قلـب
بالفسـاد
أولعـا
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يتركن
في
الطريق
لبس
الفاخر
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كيلا
يملــن
قلــب
كـل
فـاجر
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هـذا
ورب
الـبيت
نعم
المفخر
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وبالنجـاة
فـي
المعـاد
يثمر
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