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أسـى
وافـى
بحادثـة
البريـد
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وحــزن
دايــم
وجــوى
بزيـد
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مصـاب
هـد
مـن
جلـدي
وصـبري
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بكـارث
خطبـه
الركـن
المشيد
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علـى
أنـي
ربيـط
الجـاش
ثبت
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وإن
حشـدت
مـن
الدهر
الجنود
|
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ولكــن
الليــالي
فاجــأتني
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بموجعـة
يـذوب
لهـا
الجليـد
|
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كــأن
ضــئيلة
لسـعت
فـؤادي
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فحـم
بسـمها
الجسـد
الجليـد
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فكــل
مصــيبة
جلــل
سـواها
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لــدي
وكــل
ذي
خطــر
زهيـد
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لقـد
قطفـت
يـد
الأيـام
غضـا
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محــل
غراسـه
قلـبي
العميـد
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أحــال
الـدهر
رونقـه
وأذوى
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نضـارة
عـوده
الزمـن
العتيدُ
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وأنشـبت
المنيـة
فيـه
ظفـراً
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فكـاد
الحـي
مـن
جـزع
يميـدُ
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وجـدن
عليـه
بالدمع
البواكي
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وكــان
بنفســه
كرمـاً
يجـودُ
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وســامته
الكـواعب
أن
يفـدَّى
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بهـن
لـو
الفـداء
هنـا
يفيدُ
|
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وأصـبح
وهـو
فـي
حشـم
عديـدٍ
|
وأمســى
وهــو
مغـترب
وحيـدُ
|
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ترحــل
قاصــداً
نـزلاً
قريبـاً
|
رجــوع
النـازلين
بـه
بعيـدُ
|
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وأم
رحـاب
مـن
تلقـى
مناهـا
|
إذا
نزلــت
بسـاحته
الوفـودُ
|
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مضـى
واختـار
بعد
جوارنا
أن
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يجـاوره
الـرؤف
بـه
الـودودُ
|
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فيــالله
مــن
قمــرٍ
بقــبرٍ
|
تعظمـــه
لســاكنه
اللحــودُ
|
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وكـم
يـا
ليـت
شعري
من
عفافٍ
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تضــمن
ذلـك
الجـدث
الجديـدُ
|
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وطيــب
شــمائلٍ
وجميـل
ذكـرٍ
|
عليــه
خـرائد
الغنَّـا
شـهودُ
|
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وعـــرض
طـــاهر
وخلال
حمــدٍ
|
لهـا
الميـزان
والشعرى
عقود
|
|
غـــرائز
هاشـــميات
وخلــق
|
جميـل
زانـه
الخلـق
الحميـدُ
|
|
يرشــحه
لهــا
نســبٌ
منيــفٌ
|
لمحتــده
ذرى
العليـا
سـجودُ
|
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نمتـه
عـروق
مجـد
أخلصته
ال
|
عمومــة
والخؤلــة
والجـدود
|
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لقـد
أودى
فـأدوع
نـار
وجـدٍ
|
لهـا
مـا
بيـن
أضـلاعي
وقـودُ
|
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فقـدت
بفقـده
الـدنيا
جميعاً
|
بروحــي
ذلـك
الإلـف
الفقيـدُ
|
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أقـام
لعشـرتي
عشـرين
عامـاً
|
وكـــل
أولئك
الأيــام
عيــدُ
|
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بـه
ابتهجـت
سـميّات
المغاني
|
وتـاه
بعـزّه
القصـر
المشـيدُ
|
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يصـرف
كيـف
شـاء
نفيـس
مالي
|
ونفســي
والعبيـد
لـه
عبيـدُ
|
|
وكــل
فعــاله
أعمــال
بــرٍّ
|
وكــل
خصــاله
كــرمٌ
وجــودُ
|
|
فمـا
نقـم
الحفـيّ
عليه
أمراً
|
يعــاب
بـه
ولا
فـاه
الحسـود
|
|
وليـس
وإن
سـما
قـدراً
وشاناً
|
بـذي
صـلفٍ
ولا
الشـكس
الكنود
|
|
ولـم
يرفع
على
الجيران
صوتاً
|
وإن
جـاروا
ويصفح
أن
يكيدوا
|
|
ولـم
يغتب
سواه
ولا
اشتكى
من
|
نميمتـه
القريـب
ولا
البعيـد
|
|
وليــس
بســيئٍ
ظنـاً
إذا
مـا
|
أسـاء
الظـن
بالنـاس
الحقود
|
|
ولـم
ينطـق
ولـو
مزحاً
بعورا
|
عــدو
المـرء
مـا
لا
يسـتعيد
|
|
نفــور
عـن
سفاسـف
كـل
أمـر
|
وعـن
مـا
لا
يليـق
بـه
شـرود
|
|
تسربل
بالنزاهة
واكتسى
بالن
|
باهــة
والحيــاء
لـه
عقيـد
|
|
دعتــه
الغيـد
سـيدهن
طوعـا
|
ومــن
ذا
بعـد
غيبتـه
يسـود
|
|
وأجمعــت
العقـائل
أنـه
فـي
|
سـمات
المجـد
ليـس
لـه
نديد
|
|
لهــن
بحسـن
سـيرته
اقتـداءٌ
|
يزيـن
ورأيـه
الـرأي
السديد
|
|
صــفاتٌ
جـاء
مطبوعـا
عليهـا
|
لـه
ولهـا
بـه
اقترن
الوجود
|
|
وإرث
خلفتـــه
لـــه
أصــول
|
كـرامٌ
مـن
بنـي
الزهراء
صيد
|
|
ولـو
منهـا
فرضـنا
جحـد
شيءٍ
|
لألقـم
دونـه
الحجـر
الجحـود
|
|
نفيــس
قـد
تكـون
مـن
نفيـس
|
وحيــد
فــي
محامــده
فريـد
|
|
بلا
ثمــن
حظيــت
بــه
لحظـي
|
بـخٍ
لـو
دام
في
الدنيا
سعود
|
|
أيحسـن
بعـده
فـي
رأي
عينـي
|
مـن
الـدنيا
طريـفٌ
أو
تليـد
|
|
وهـل
أسـلو
بلـى
أسـلو
سلوي
|
إلـى
يـوم
يقـوم
بـه
الهجود
|
|
وهــل
بتـداول
الأيـام
حزنـي
|
يقــل
لفقــده
لا
بــل
يزيـد
|
|
وهــل
يبلـى
معـاذ
اللـه
ود
|
لــه
بــالقلب
ممـتزج
أكيـد
|
|
فلا
عيشــي
يطيــب
ولا
شـرابي
|
يــروق
ولا
كـرى
جفنـي
يعـود
|
|
وتــأبى
شـيمتي
أن
يزدهينـي
|
عقـود
فـي
الخراعـب
أو
بنود
|
|
وكيــف
يلــذ
بــالعلات
وصـل
|
نعـم
منهـن
لـذّ
لـي
الصـدودُ
|
|
سـيبدو
لـي
خيـال
منـه
مهما
|
تــراءت
غــرّة
للعيــن
خـود
|
|
بحرمـــة
ودّه
أقســمت
أنــي
|
أحـب
إليـه
لـو
سـاغ
الورود
|
|
ومـالي
فـي
الحياة
هوىً
ولكن
|
قضـى
ببقاي
ذو
العرش
المجيد
|
|
أأبقـى
والمغـاني
عنـه
صـفر
|
وآونـة
الحيـاة
الـبيض
سـود
|
|
وتحزننـي
الـولائد
أن
أراهـا
|
وقـد
صـبغت
بأدمعهـا
الخدود
|
|
أســى
يبكيــن
لا
لحــذار
ذلٍّ
|
فـإن
أبـاته
العـدد
العديـد
|
|
وقيــن
الســوء
طـالعهن
إلا
|
بغيبــة
شخصــه
أبـداً
سـعود
|
|
ولــولا
أن
هـذا
الـرزء
حكـم
|
مـن
الفعـال
فينـا
مـا
يريد
|
|
لقــارعت
المنـون
قـراع
حـرٍّ
|
تهــاب
شـبا
قواضـبه
الأسـود
|
|
وخضــت
لــدرئه
غمـرات
حـرب
|
يشـيب
لهولهـا
الطفل
الوليد
|
|
ولكـن
ليـس
هـذا
الخطـب
مما
|
تقهقهـره
الجيـوش
ولا
الجنود
|
|
فخفـض
يـا
فـؤاد
عليك
واصبر
|
فمـا
الموتـور
قبلـك
مستقيد
|
|
ومــا
جـزع
علـى
ميـتٍ
بمغـنٍ
|
ولا
ضـرب
الحسـام
ولا
النقـود
|
|
وسـلم
إن
فـي
التسـليم
أجراً
|
وفـي
عـدم
الرضى
ورد
الوعيد
|
|
جـرى
قلـم
القضـاء
فكـل
ماض
|
مـن
الـدنيا
إليهـا
لا
يعـود
|
|
وليــس
لـذي
مقـام
أو
حطـام
|
يتـاح
بهـذه
الـدار
الخلـود
|
|
لريـب
الدهر
في
كل
ابن
أنثى
|
ســـهام
لا
تطيــش
ولا
تحيــد
|
|
ومـن
مـن
صـرفه
ينجو
ومن
ذا
|
علـى
ظهـر
البسـيطة
لا
يبيـد
|
|
وبـالأمم
الـتي
سـلفت
وصـارت
|
مـن
المنسـي
يعتـبر
البليـد
|
|
فكـم
غـدر
الزمـان
بذات
قرب
|
ومبعــدة
كمــا
بعـدت
ثمـود
|
|
وكـم
نقضـت
من
الدنيا
عليهم
|
مواثيــق
وكــم
نكثـت
عهـود
|
|
وكـم
ذي
زهو
افترست
سباع
ال
|
فنـاء
وخـانه
الأمـل
المديـد
|
|
ولكـن
الـورى
فـي
غفلـة
عـن
|
مصـــارعهم
كـــأنهم
رقــود
|
|
سـفاهٌ
بـابن
آدم
حيـن
يلهـو
|
ويلعــب
والحمـام
لـه
عتيـدُ
|
|
تنـاخ
بسـوحه
نجـب
المنايـا
|
وشـيممته
القسـاوة
والجمـودُ
|
|
وليـس
بمـا
يـؤل
إليـه
يدري
|
أمقبــولٌ
فينجــو
أم
طريــدُ
|
|
لعمــرك
إنــه
لقريــنُ
خسـرٍ
|
ومحفـوظ
الكتـاب
بـذا
شـهيدُ
|
|
ولـم
يفلـح
سـوى
عبـد
له
في
|
ربــا
الإيمـان
بنيـان
وطيـد
|
|
وصـدّق
واتّقـى
المـولى
وأعطى
|
ولـم
تتعـد
منـه
لـه
الحدود
|
|
ولــولا
ســبق
رحمتـه
تعـالى
|
لحــل
عــذابه
بهـم
الشـديد
|
|
علــى
جـدث
بـه
ممـن
فقـدنا
|
لطيـف
الـروح
والجسم
الوئيد
|
|
تحيـــات
معطــرة
الحواشــي
|
يضـوع
بشـنر
عبهرهـا
الوجودُ
|
|
وصــيب
رحمــة
وســجال
غيـث
|
مـن
الرضـوان
جادَ
به
الحميدُ
|
|
وشــيعت
الملائك
منــه
روحـاً
|
إلـى
الأفـق
المبين
لها
صعودُ
|
|
وأسـكنه
المهيمـن
فـي
جنـانِ
|
دعـائم
دورهـا
الـدر
النضيدُ
|
|
يطــوف
رياضــها
فـي
عبقـري
|
مجلّلــه
لهيكلهــا
الــبرود
|
|
تســـامره
هنالــك
أم
هنــدٍ
|
وفاطمــة
المطهــرة
الخـرود
|
|
وكـل
شـريفة
تنمـي
إلـى
مـن
|
هـم
فـي
مركـز
الفخر
العمود
|
|
إلـى
آل
الرسـول
عليـه
أزكى
|
صـلاة
اللـه
مـا
حـن
الرعـود
|