|
فــؤادي
بريــع
الظــاعنين
أســير
|
وحزنــي
علــى
فقـد
الكـرام
كـبير
|
|
وقلــبي
نــأى
عنــي
ويمـم
نحـوهم
|
يقيـــم
علـــى
آثـــارهم
ويســير
|
|
ودمعـي
غزيـر
السـكب
فـي
عرصـاتهم
|
وحـــالي
ســقيم
والفــؤاد
كــثير
|
|
إليــك
عــذولي
لا
تحــاول
ملامــتي
|
فكيــف
اكــف
الــدمع
وهــو
غزيـر
|
|
وان
تبــاريحي
بهــم
وصــبا
بنــي
|
عكــوف
بقلــبي
مــا
لهــن
عبــور
|
|
وشــوقي
وحزنــي
وادكـاري
وحرقـتي
|
لهـــن
رواح
فــي
الحشــا
وبكــور
|
|
احـــن
اذا
غنــت
حمــائم
شــعبهم
|
ويعتـــادني
حــر
الجــوى
وزفيــر
|
|
واطــرق
ان
فكــرت
أوقــات
وصـلهم
|
وينـــزع
قلـــبي
نحــوهم
ويطيــر
|
|
واذكــر
مــن
نجـد
جـواري
بأنسـهم
|
وصـــفو
زمــان
مــر
وهــو
ســرور
|
|
وحــالات
قــرب
مــا
الــذ
زمانهـا
|
فينجـــد
شـــوقي
نحــوهم
ويغيــر
|
|
فيـا
ليـت
شـعري
عـن
محـاجر
حـاجر
|
وســـاحات
وصـــل
حشـــوهن
حبــور
|
|
وعـــن
هضــبات
بالحجــاز
ايــانع
|
وعـــــن
اثلاث
روضــــهن
نضــــير
|
|
وعـن
عـذبات
البـان
يلعبـن
بالضحى
|
عليهــن
مــن
حســن
الملاحــة
نـور
|
|
يرنحــن
الســكر
مــن
شـدة
الهـوى
|
عليهـــن
كاســات
النســيم
تــدور
|
|
فمـن
لـي
بـأن
أروى
من
الشعب
شربة
|
بهـا
الصـفو
يـأتي
والغمـوم
تسـير
|
|
ومـن
لـي
بـأن
ألفي
لدى
الحي
برهة
|
وأنظـــر
تلــك
الأرض
وهــي
مطيــر
|
|
واســمع
مــن
ســفح
البشـام
عشـية
|
تغاريـــد
أطيـــار
لهـــن
زميــر
|
|
فــإن
أخــا
الاشــواق
يطـرب
قلبـه
|
بكـــاء
حمامـــات
لهـــن
هـــدير
|
|
فيـا
جيـرة
الشـعب
اليمـاني
بحقكم
|
أغيثــوا
شـديد
الحـزن
فهـو
أسـير
|
|
ويـا
سـادة
العـرب
الكـرام
بعطفكم
|
صـلوا
أومـر
واطيـف
الخيـال
يـزور
|
|
بعـدتم
ولـم
يبعـد
عـن
القلب
حبكم
|
وتمثـــالكم
دومـــاً
إلــى
ســمير
|
|
وبنتــم
وفــي
الأحشـاء
طنـب
ودكـم
|
وغبتــم
وأنتـم
فـي
الفـؤاد
حضـور
|
|
أغــار
عليكــم
أن
تراكـم
حواسـدي
|
وأبعـــد
عنكــم
والعــدات
نــزور
|
|
ويزعجنــي
ان
شــمت
وصــل
شـوامتي
|
وأحجـــب
عنكـــم
والمحــب
غيــور
|
|
أحيبــاب
قلـبي
هـل
سـواكم
لعلـتي
|
مزيـــل
بكيــد
النابيــات
بصــير
|
|
ويـا
أهـل
ودي
مـا
لنـا
غيركم
نعم
|
طـــبيب
بــداء
العاشــقين
خــبير
|
|
غرســتم
بقلــبي
لوعــة
ثمراتهــا
|
غمــوم
بهــا
طــرف
الكئيـب
حسـير
|
|
وأغلـب
أوقـاتي
مـن
الضـر
والعنـا
|
همــوم
لهــا
حشــو
الفـؤاد
سـعير
|
|
جيــوش
هــواكم
كــل
لمحــة
نـاظر
|
علــى
دهــم
صـبري
بالقتـال
تسـير
|
|
وخيـل
جنـود
الشـوق
فـي
كـل
برهـة
|
علــى
حصــن
قلـبي
بـالغرام
تغيـر
|
|
أعيـروا
عيـوني
نظـرة
مـن
جمـالكم
|
ومــن
بعــدكم
للمســتجير
اجيـروا
|
|
ومنــوا
بتقريــبي
ولــو
بإعــارة
|
ومــا
كـل
مـن
يلـق
الوصـال
يعيـر
|
|
أقــام
علـى
قلـبي
وسـمعي
ونـاظري
|
وكلــي
مــدى
الأيــام
منــك
خفيـر
|
|
لا
زمنـي
فـي
السـقم
والصحو
والكرى
|
رقيــت
فمــا
يخفــى
عليــه
ضـمير
|
|
مــرادي
هــواكم
والهــوان
كرامـة
|
لاجلكـــم
والصـــب
فهـــو
صـــبور
|
|
ومـا
مـر
يحلـو
والصـعيب
يهـون
لي
|
لحـــق
هـــواكم
والعســير
يســير
|
|
أعــد
علــى
دينــي
ودنيـاي
بركـم
|
وبركـــــم
للســــائلين
بحــــور
|
|
وانظــر
احســان
الجنــاب
وعطفــه
|
فتنقلـــب
الاحـــزان
وهــي
ســرور
|
|
وتأخــذ
قلــبي
نشـوة
عنـد
ذكركـم
|
يكــاد
بهــا
جسـمي
الضـعيف
يطيـر
|
|
ويرتــاح
فكـري
مـن
سـماع
حـديثكم
|
كمــا
ارتــاح
صــب
خـامرته
خمـور
|
|
وإنــي
لمسـتغن
عـن
الكـون
دونكـم
|
وان
كــان
لــي
بالســيئات
عثــور
|
|
لرفــد
ســواكم
لا
أرى
لــي
تلفتـا
|
وأمـــا
اليكـــم
ســادتي
ففقيــر
|
|
أصــوم
عـن
الأغيـار
قطعـا
وذكركـم
|
شـــعاري
وأحــوالي
عليــه
تــدور
|
|
وحسـن
حـديث
القـوم
فـي
حسن
وصفكم
|
ســحور
لصــومي
فـي
الهـوى
وفطـور
|
|
وليلــة
قــدري
ليلــة
بــت
آنسـا
|
بحيكــــم
والــــوقت
ذاك
شـــكور
|
|
وســــاعاته
معمــــورة
بمســــرة
|
بكــــم
ولاقلام
القبــــول
صـــرير
|
|
وضــحوة
عيـدي
يـوم
اضـحى
بقربكـم
|
علــــى
بَســـط
الزمـــان
نضـــير
|
|
منعــم
عيــش
فـي
رضـاكم
وأن
اكـن
|
علــى
مــن
اللطــف
الخفــي
سـتور
|
|
فجــودوا
بوصــل
فالزمــان
مفــرق
|
ورقــوا
لعبــد
حــار
فهــو
ضـرير
|
|
وعــودوا
بفضــل
فــالغرام
مــدله
|
واكـــثر
عمــر
العاشــقين
قصــير
|
|
ولا
تغلقــوا
الابــواب
عنـي
لزلـتي
|
فــاني
لـدى
البـاب
الكريـم
حقيـر
|
|
وأن
كـان
مثلـي
يمنع
الرفد
والرضا
|
فـــانتم
كــرام
والكريــم
غفــور
|
|
وقـد
اثقلـت
ظهـري
الخطايـا
وانما
|
مـع
الـذنب
ظنـي
فـي
الحليـم
كبير
|
|
ولـي
سـوء
حـال
لا
مـرا
غيـر
اننـي
|
رجـــائي
لغفــار
الــذنوب
كــثير
|
|
وجــاه
رســول
اللَـه
أحمـد
نصـرتي
|
وعــوني
ولــي
فيــه
رضــا
وسـرور
|
|
ولـي
فيـه
حسـن
الظـن
وهـو
مـؤملي
|
إذا
لـم
يكـن
لـي
فـي
الخطوب
نصير
|
|
ومــدح
رســول
اللَـه
فـال
سـعادتي
|
أنــال
بــه
الزلفـى
ويكـثر
نـوري
|
|
ويرتـاح
قلـبي
مـن
همـومي
بـه
كذا
|
افــوز
بــه
يــوم
الســماء
تمـور
|
|
نــــبي
تقــــي
أريحـــي
مهـــذب
|
كـــثير
جـــدي
للّــه
جــل
شــكور
|
|
حيـــي
أميـــن
مســـتجاب
مـــوقر
|
بشـــير
لكـــل
العــالمين
نــذير
|
|
إذا
ذكــر
ارتــاحت
قلــوب
لـذكره
|
ودارت
علينـــا
بالســـرور
خمــور
|
|
خمــور
كــؤس
الحــب
لا
خمـر
عاصـر
|
وطـــابت
قلــوب
وانشــرحن
صــدور
|
|
حــرام
علـى
الـدنيا
وجـود
نظيـره
|
كــذا
وعلــى
الأخـرى
ومـا
ثـم
زور
|
|
ومثـل
رسـول
اللَـه
احمـد
لـم
يكـن
|
لقـــد
قــل
موجــود
وعــز
نظيــر
|
|
وكيـف
يسـامي
خيـر
مـن
وطـئ
الثرى
|
وأخلاقــه
الســبق
العظيــم
تشــير
|
|
وفـي
كفـه
البحـر
العظيم
من
الجدا
|
وفــي
كــل
بــاع
عــن
علاه
قصــور
|
|
وكـــل
شـــريف
عنـــده
متواضـــع
|
وكـــل
لـــبيب
بالجمـــال
أســير
|
|
وكـــل
رفيـــع
للحـــبيب
مـــوقر
|
وكـــل
عظيـــم
القريــتين
حقيــر
|
|
لئن
كـان
فـي
يمنـاه
سـبحت
الحصـا
|
فقـــد
زاد
زاد
واســـتفاد
فقيــر
|
|
ومنهـــا
كمـــا
للكرمــات
تفجــر
|
فقــد
فــاض
مــاء
للجيــوش
نميـر
|
|
وخــــاطبه
ذئب
وضــــب
وظبيــــة
|
وقــد
كــان
للجــذع
الاصــم
صـرير
|
|
وقــد
خــاطبته
بالوقــار
حجــارة
|
وعضــــو
خفــــي
ســـمه
وبعيـــر
|
|
ودر
لـــه
الضــرع
الاجــد
كرامــة
|
وفــي
مهـده
القمـر
المنيـر
سـمير
|
|
وردت
لــه
شــمس
النهــار
فخامــة
|
كمـا
انشـق
بـدر
فـي
السـماء
منير
|
|
ومثــل
حنيــن
الجـذع
سـجدة
سـرحة
|
وســـجدة
فحـــل
والكــرام
حضــور
|
|
وتســليم
أشــجار
عليـه
كمـا
أتـى
|
وانــس
غــزال
الــبر
وهــي
نفـور
|
|
وبــاض
حمــام
الايــك
فـي
اثركمـا
|
لاقـــدامه
العليــا
تليــن
صــخور
|
|
وحين
دعا
الاشجار
جاءت
كذا
وقد
بنت
|
عنكبــــوت
حيـــث
كـــان
يســـير
|
|
وأن
الغمـــام
الهـــاطلات
تظلـــه
|
كــذلك
مهمــا
ســار
معــه
تســير
|
|
تروحـــه
صـــلى
عليـــه
الهنـــا
|
بـــروح
نســـيم
أن
الـــم
هجيــر
|
|
ويـوم
حنيـن
إذ
رمـى
القوم
بالحصى
|
أصـــابهم
بعـــد
العتـــو
ذعــور
|
|
ومــذ
جـاء
نصـر
اللَـه
معجـزة
لـه
|
فولــوا
وهــم
عمـى
العيـون
وعـور
|
|
وحنــذ
فــي
بــدر
ملائكــة
السـما
|
لتأييــد
ديــن
الــرب
وهـو
قـدير
|
|
فجـــاءوا
بعــزم
نصــرة
لحــبيبه
|
فجبريــل
تحــت
الرايــتين
أميــر
|
|
ومـن
قـومه
فـي
الـبير
سبعون
سيدا
|
قلـــوبهم
كـــانت
عليـــه
تفــور
|
|
تـردوا
وصـار
الكـل
مـن
قهـر
ربنا
|
قـــتيلا
ومثــل
الهــالكين
اســير
|
|
ومـن
عزمـه
تخريـب
خيـبر
مثـل
مـا
|
أدار
رحـــا
حـــرب
عليــه
تــدور
|
|
وتـدمير
مـن
نـاواه
مـن
مكـة
كـذا
|
قريظـــة
قـــرض
والنضــير
نظيــر
|
|
وأن
رســول
اللَــه
مــن
مكـة
سـرى
|
إلــى
القــدس
ليلا
اذ
دعـاه
خـبير
|
|
وصـلى
برسـل
اللَـه
فيـه
وقـد
سـما
|
إلـى
العـرش
والـروح
الاميـن
سـمير
|
|
فجـاز
الطبـاق
السـبع
في
بعض
ليلة
|
وكــل
أهيــل
الســبع
مــه
قريــر
|
|
وقوبــل
فيهــا
بالمســرة
والهنـا
|
وفكــر
بعــد
الســبع
ايــن
يسـير
|
|
فلاح
لــه
مــن
رفــرف
النــور
لائح
|
وزج
بــــانوار
وجــــاء
ســــرور
|
|
وذلـــك
اكـــرام
وحســـن
عنايــة
|
مـن
النـور
للهـادي
البشـير
يشـير
|
|
وشــاهد
فــوق
العــرش
كـل
عجيبـة
|
ولا
غــرو
اذ
جــاه
الحــبيب
كـبير
|
|
فمـــا
ثـــم
إلا
مكـــرم
ومكـــرم
|
ومــــا
ثــــم
إلا
زائر
ومــــزور
|
|
حـــبيب
تملـــى
بــالحبيب
فخصــه
|
بتخصــيص
فضــل
مــا
حــواه
خطيـر
|
|
واكرمــه
بالوصـل
والقـول
واللقـا
|
وشـــرفه
بـــالقرب
وهـــو
جــدير
|
|
وقــال
لــه
ســلني
رضــاك
فــإني
|
كريـــم
وفضــلي
والعطــاء
كــثير
|
|
وأنــت
حــبيب
يــا
مصــفى
واننـي
|
علــى
كــل
شــيء
فـي
رضـاك
قـدير
|
|
فعـاد
قريـر
العيـن
فـي
خلع
الرضا
|
بأشــرف
حــال
مــا
إليــه
نظيــر
|
|
وسـرت
بـه
الاملاك
والسـؤل
قـد
حـوى
|
وقـــد
شـــملته
بهجـــة
وحبـــور
|
|
محمـد
قـم
بـي
فـي
الخطـوب
فان
لي
|
جنايـــة
ســـوء
والفــؤاد
كســير
|
|
ولكـن
لـي
بالفضـل
يـا
رحمة
الورى
|
تجــارة
مــدح
ليــس
فيــك
بتــور
|
|
عــرائس
لا
ترضــى
بغيــرك
ناكحــا
|
عليهــا
مـن
الحسـن
البـديع
خفيـر
|
|
تميــل
اعنــاق
الكــرام
إذا
بـدت
|
لهـــن
غزيـــرات
المهــور
مهــور
|
|
علـــت
وغلــت
إلا
عليــك
فارخصــت
|
وجــاءت
علــى
نهـج
الحيـاء
تسـير
|
|
ويممــت
القــدر
العظيــم
تعشــقا
|
لــترخص
حــورا
فـي
القصـور
قصـور
|
|
مؤلفهـــا
عبــد
الرحيــم
كأنهــا
|
قلائد
در
قــــد
حوتهــــا
نحـــور
|
|
كـــأن
مبانيهـــا
لاجلـــك
ســيدي
|
كــواكب
فــي
جــو
الســماء
تنيـر
|
|
لبســـن
معانيهــا
بمــدحك
بهجــة
|
فنــال
بهــا
طيــب
السـرور
سـمير
|
|
وسـارت
بهـا
الركبـان
إذ
شرفت
بكم
|
فلاح
لهـــا
نـــور
وفـــاح
عــبير
|
|
فقـل
أنت
في
الدارين
في
حزبنا
ومن
|
احبــك
قــد
ترخــى
عليــه
ســتور
|
|
واصــلك
مــع
فــرع
كـذلك
كـل
مـن
|
يليــــك
صـــغير
ســـنه
وكـــبير
|
|
وصــل
عليـك
اللَـه
واختـص
واجتـبي
|
وأولاك
مـــا
ترضــى
فــأنت
جــدير
|
|
ودامـت
لـك
العليـا
والدهر
والثنا
|
فـــأنت
هـــدى
للعــالمين
ونــور
|
|
وعــم
رضــاه
الآل
والصــحب
انهــم
|
كــرام
لهــم
روض
الكمــال
نضــير
|
|
هـم
الاسـد
هـم
شـهب
الـدياجي
لأنهم
|
لــدينك
يــا
شــمس
النهـار
بـدور
|