|
فللمجلــــي
غــــادةٌ
حســـناء
|
تفـــاخرت
بوئيهـــا
النســـاء
|
|
ومعهـــا
دســـيعةٌ
ذات
العــرى
|
قياســها
اثنــان
وعشـرون
جـرى
|
|
وللمصـــلي
حجــرةٌ
مــا
ذللــت
|
فــي
عامهـا
السـادس
بغلا
حملـت
|
|
وللمســــلي
مرجــــلٌ
قشــــيب
|
مــا
تحتــه
بعــد
علا
اللهيــب
|
|
أربعــــــةً
يملا
بالمكيـــــال
|
وشــــاقلان
ذهبــــاً
للتـــالي
|
|
وصــلة
الرمتــاح
كــوبٌ
مـزدوج
|
مـن
ذهـبٍ
فـي
النـار
قط
لم
يلج
|
|
وصــاح
يغــري
طــالبي
الرهـان
|
أتريــذ
يــا
أرغـوس
آل
الشـان
|
|
هـــذي
تــرون
تحــف
الفرســان
|
فلــو
تخاطرنــا
لميــتٍ
ثــاني
|
|
أحــرزت
حتمــاً
خطــر
الرهــان
|
فمــا
جيــادي
مـن
نتـاجٍ
فـاني
|
|
ولا
لهــا
كفــؤٌ
بــذا
المكــان
|
بهــا
حبــا
فـي
غـابر
الزمـان
|
|
فوســـيذ
فيلا
فبهـــا
حبـــاني
|
لــــذاك
لا
حاجـــة
للبرهـــان
|
|
حــتى
بهـا
هـذا
العنـا
أعـاني
|
قـــد
نــد
آه
قــابض
العنــان
|
|
ذاك
الــذي
قــد
كـان
بالإحسـان
|
يغســـل
بالمـــاء
بلا
تـــواني
|
|
أعرافهـــا
وأكـــثر
الأحيـــان
|
بـالزيت
يطليهـا
بجهـد
العـاني
|
|
فهــي
هنــا
بــدمعها
الهتــان
|
قــد
أســبلت
بفــائض
الأحــزان
|
|
فــوق
الــثرى
نواصـي
التيجـان
|
فــأنتهم
يــا
نخبــة
الفتيـان
|
|
فمـــن
يثــق
منــك
بهــذا
الآن
|
بعجــــلٍ
محكمــــة
المبـــاني
|
|
وخيلــه
يــبرز
إلــى
الميـدان
|
|
ومـا
انتهـى
حـتى
انبرى
السواق
|
إفميــل
أذميـت
الفـتى
السـباق
|
|
رواض
جــرد
الخيــل
هــب
الأولا
|
ثــم
ذيوميــذ
أخـو
البـاس
تلا
|
|
بخيـل
طـرواد
الـتي
كـان
اغتنم
|
في
الحرب
من
أنياس
بالنصل
الأصم
|
|
لمــا
أفلــون
وفــي
الطـروادي
|
ينئي
عـــــن
مواقـــــف
الجلاد
|
|
ثــم
ابــن
أتـراس
منيلا
الأشـقر
|
بفرســــي
رهــــانه
يبتــــدر
|
|
فــــوذرغسٍ
حصـــانه
الثميـــن
|
وإيثيـــا
حجــر
أغــا
ممنــون
|
|
تلــك
الــتي
بمضــمد
العجــال
|
تشــتاق
خــوض
شاســع
المجــال
|
|
كـان
ابـن
انخيـس
أخيفـول
حبـا
|
بهـا
أغـا
ممنـون
لمـا
انتـدبا
|
|
للحــرب
تحــت
معقــل
الطـرواد
|
قبلا
ليعفــى
مــن
عنـا
الجهـاد
|
|
وفـــي
ربــى
ســكيونةٍ
قريــرا
|
يظـــل
معتـــدّاً
غنــىً
وفيــرا
|
|
وانطلـــوخ
رابعــاً
هــب
إلــى
|
جيــاده
القــب
وشــد
واعتلــى
|
|
خيـــلٌ
عتـــاقٌ
جمــة
الأعــراف
|
مـــن
فيلــسٍ
كريمــة
الأوصــاف
|
|
إزاءه
والــــــده
الجليـــــل
|
نســـطور
قـــام
نحــوه
يميــل
|
|
يرشـــده
ويحســـن
التعليمـــا
|
وإن
يكــــن
بنفســـه
حكيمـــا
|
|
بنـــي
قــدودك
زفــس
وارتضــى
|
وفوســيذٌ
وثقفــا
منــذ
الصـبا
|
|
وعلمــاك
الجــري
بــالجرد
فلا
|
حاجــة
أن
أزيــدك
العلـم
أنـا
|
|
نبغـت
فـي
اسـتقبال
نصـب
يبتغى
|
لكنمــا
خيلــك
يعروهـا
البطـا
|
|
أخشـى
بهـا
ينالـك
اليوم
البلا
|
وسـائر
الجيـاد
أعـدى
في
المدى
|
|
لكنـك
السـابق
فـي
سـبل
الهـدى
|
أقــدم
إاً
بحـزمٍ
ميقـاد
الحجـى
|
|
ولا
تقــف
بنـي
عـن
نيـل
الجـزا
|
فإنمــا
الحطـاب
نـال
المرتجـى
|
|
بالحـذق
والصـنعة
ليـس
بـالقوى
|
كــذلك
الربــان
بالحــذق
سـرى
|
|
بفلكـه
فـي
البحر
في
وجه
الهوى
|
والفـارس
الفـارس
بالحـذق
رمـى
|
|
فمــن
يثــق
بخيلــه
ضــل
ومـا
|
تـراه
للسـبيل
فـي
الجري
اهتدى
|
|
وراح
فــي
الـبراح
يجـري
وغـدا
|
لا
يســتطيع
كبحهــا
ولــو
بغـى
|
|
لكنمــا
الحـاذق
حـتى
لـو
علـى
|
خيــلٍ
تـراءت
دون
سـباق
السـرى
|
|
فالنصـب
نصـب
عينـه
دومـاً
يـرى
|
حـتى
لـديه
ينثنـي
إلـى
الـورا
|
|
لا
يغفـل
العنـان
كيفمـا
انثنـى
|
يـــديره
بثبـــت
كـــفٍّ
وكــذا
|
|
يرقــب
مــن
أمـامه
قسـراً
غـدا
|
وهــا
أنـا
أريـك
حـد
المنتهـى
|
|
فالنصـب
هـاك
ليـس
في
طي
الحقا
|
باعـاً
عـن
الحضـيض
فـانظره
نتا
|
|
جــذعٌ
ولـم
يعبـث
بـه
دهـرٌ
خلا
|
مـن
شـامخ
الملول
أو
أرز
الفلا
|
|
يعضــده
صــخران
أبيضـا
الصـفا
|
حيـث
طريـق
السـهل
ضـاق
والتوى
|
|
وحـوله
المضـمار
بالعـدل
استوى
|
لعلــه
قــبرٌ
بــه
قيــلٌ
ثــوى
|
|
أو
علمــاً
كــان
قـديماً
مثلمـا
|
قـد
رامـه
أخيـل
ذا
اليـوم
لنا
|
|
فــإن
تـدنيت
فسـط
وانحـز
إلـى
|
يسـراك
في
الكرسي
وصح
صوتاً
دوى
|
|
والفـرس
اليميـن
سـق
فـإن
جـرى
|
أطلــق
عنــانه
بــذياك
الفضـا
|
|
وباليسـار
مـل
إلـى
النصـب
هنا
|
حـتى
تخـال
القطـب
والنصـب
سوى
|
|
وحــاذر
الصــدمة
بالصــخر
إذا
|
دنــوت
كيلا
يعـتري
الخيـل
الأذى
|
|
أو
يسـحق
النيـر
فيشـمت
العـدى
|
وأنـت
بيـن
القـوم
يغشاك
الحيا
|
|
بنـي
كـن
ثبتـاً
فـإن
نلت
المنى
|
وجزتــه
ولــم
يضعضــعك
العيـا
|
|
لا
ســائقٌ
جــاراك
حــتى
لوعـدا
|
وراك
أريــون
الجـواد
المجتـبي
|
|
جـواد
أدرسـت
ومـن
نسـل
العلـى
|
أو
خيــل
لومــذونٍ
الــتي
حـوى
|
|
بهــذه
الأصــقاع
تنهــب
الـثرى
|
|
كـذاك
نسـطور
ابنـه
مـذ
أرشـدا
|
عـــاد
إلـــى
ملجســه
وقعــدا
|
|
وهـــب
خامســاً
إلــى
الســباق
|
مريــون
فــي
جيــاده
العتــاق
|
|
ثــم
اعتلـوا
وطرحـوا
اىلأزلامـا
|
يجبيلهـــا
أخيـــلٌ
استقســاما
|
|
فســـهم
أنطيلـــوخ
أولاً
ظهـــر
|
فســهم
إفميــل
فأتريــذ
الأغـر
|
|
وبعــــده
مريــــون
والأخيـــر
|
أبســــلهم
ذيومـــذ
الشـــهير
|
|
فــانتظموا
صـفا
وآخيـل
اعـترض
|
يريهـم
فـي
السـهل
بـارز
الغرض
|
|
وأنفـــذ
المحنـــك
النـــبيلا
|
فينكـــــس
رواض
خيــــول
فيلا
|
|
ليرقــب
الفرسـان
فـي
المضـمار
|
وينثنــــي
بصـــادق
الأخبـــار
|
|
فرفعـــوا
ســـياطهم
وحثحثــوا
|
جيــادهم
طــرّاً
معـاً
وانبعثـوا
|
|
فانــدفعت
تضــرب
فــي
السـهول
|
نائيـــةً
عــن
موقــف
الأســطول
|
|
تحــت
الصــدور
ثــائر
الغبـار
|
كـــالغيم
أو
عجاجــة
الإعصــار
|
|
أعرافهــا
تطيــر
فــي
الهـواء
|
وخلفهـــا
العجـــال
كــالأنواء
|
|
حينــاً
تــرى
بــالأرض
رامحــات
|
وتـــارةً
فــي
الجــو
ســابحات
|
|
وراءهــا
الفرسـان
فـوق
السـدد
|
تخفـــق
قلبــاً
لبلــوغ
الأمــد
|
|
صـــاحوا
فراحــت
بهــم
نغيــر
|
بعشـــــيرٍ
فــــوقهم
يطيــــر
|
|
وعنــدما
انتهــت
وعـالادت
تجـر
|
منقلبــاتٍ
نحــو
ثغــر
البحــر
|
|
هنــاك
ثــارت
همــة
الفتيــان
|
فــــأطلقوا
أزمـــة
العنـــان
|
|
فــبرزت
خيـل
ابـن
فيريـس
ولـم
|
تكــد
فإثرهــا
ذيوميــذ
هجــم
|
|
بجـــرد
طــرواد
فزفــت
عقبــه
|
كأنهــــا
راقيـــةٌ
للمركبـــه
|
|
تنفـخ
فـي
عتـاق
إفميـل
النفـس
|
حـــرّاً
كـــأنه
بظهـــره
قبــس
|
|
طــارت
وهامهــا
علــى
هــامته
|
ألقــت
تبــاريه
علــى
غــارته
|
|
حــتى
بهــا
أوشــك
أن
يجتـازا
|
ذيومـــذٌ
أو
مثلـــه
يمتـــازا
|
|
لكـــن
فيبوســاً
بســخطه
ســطا
|
والسـوط
مـن
يـديه
حـالاً
أسـقطا
|
|
فخيلــه
ونــت
وتلــك
انطلقــت
|
وملــء
عينيـه
الـدموع
انـدفقت
|
|
ولــم
تفـت
فـالآس
تلـك
الحيلـه
|
فابتــدرت
تــدرأ
شــر
الغيلـه
|
|
أعـــادت
الســوط
لــه
وجــددت
|
عزمـــاً
بـــه
جيــاده
تشــددت
|
|
ثـــم
انــبرت
حانقــةً
وســحقت
|
مضــمد
إفميــل
وعنــه
انطلقـت
|
|
فســقط
المضــمد
والخيــل
جـرت
|
جامحــةً
وفــي
الــبراح
نفــرت
|
|
ونفــس
إفميــل
علــى
الــتراب
|
أهــوى
مــن
الكرســي
للــدولاب
|
|
يســـيل
مـــن
فيــه
ومنخريــه
|
نجيعـــه
كـــذاك
مـــن
يــديه
|
|
وانفضــخت
جبهتــه
حيــن
وقــع
|
وفاضـت
العـبرة
والصـوت
انقطـع
|
|
ومــن
أمــامه
ذيوميــذ
انـدفق
|
وســائر
الخيــل
مــبرزاً
ســبق
|
|
تفــرغ
آثينــا
القـوى
بـالجرد
|
حــتى
تنيلــه
أعــالي
المجــد
|
|
تلا
منيلا
ففـــــتى
نســـــطورا
|
مطهميــــه
ســــائقاً
مغيـــرا
|
|
يصــــيح
هلا
تفرغـــان
كلمـــا
|
عـدواً
لمثـل
الحيـن
ذا
أعطيتما
|
|
ســبق
ذيوميـذ
نعـم
لـن
أزعمـا
|
ففرســاه
اليــوم
طــارت
بهمـا
|
|
فـــالآس
تعلــي
مجــده
لكنمــا
|
وارء
أتريــذ
اســتفزا
الهممـا
|
|
فأدركـــــاه
أفلا
أخجلتمـــــا
|
وإيثيــا
حجــرٌ
جــرت
دونكمــا
|
|
شــأنكما
السـبق
فلـم
أبطأتمـا
|
لأقســـــمن
وأبــــرن
قســــما
|
|
عـن
سـابقات
الخيـل
إن
قصـرتما
|
وغيـر
أطـراف
الجـزا
لـم
تغنما
|
|
لا
خلتمــا
نســطور
يعنـي
بكمـا
|
بــل
بظــبى
أنصــله
أهلكتمــا
|
|
إيـــه
إذاً
فانبعثــا
وعنــدما
|
نبلــغ
ذيـاك
المضـيق
المظلمـا
|
|
نعمـــل
فيــه
حيلــةً
فنقحمــا
|
لمــا
أضــله
الســبيل
الأقومـا
|
|
فجزعـــا
لهـــول
ذاك
الزجـــر
|
وانــدفعا
حينــاً
ببطــن
الـبر
|
|
فـــأنطلوخ
أبصـــر
المضـــيقا
|
حيــث
الســيول
هــدت
الطريقـا
|
|
وانحـــدرت
جـــوارف
الأمطـــار
|
بهــــوةٍ
تنــــذر
بالأخطــــار
|
|
بنفســه
مـن
ثـم
أتريـذ
انحـدر
|
منفـرداً
يخشـى
لقـا
الخيل
الأخر
|
|
فـأنطلوخ
مـن
على
الكرسي
انحرف
|
وغــادر
المنهــج
يبغيــه
وخـف
|
|
فصــاح
أتريــذ
بملــء
الجــزع
|
أأنطلـــوخ
لـــم
أراك
لا
تعــي
|
|
جيــادك
أكبــح
للطريـق
الأوسـع
|
فســوف
تجتــاز
بــذاك
المهيـع
|
|
فـــإن
تزاحمنــي
كلانــا
نقــع
|
|
فلــم
يصــخ
وسـاط
ثـم
انـدفعا
|
بخيلـــه
كـــأنه
مـــا
ســمعا
|
|
فاجتــاز
مرمـى
كـرةٍ
قـد
قـذفا
|
بهـا
فـتى
بـأسٍ
عليهـا
اأتلفـا
|
|
فارتــدعت
خيــل
منيلا
القهقـري
|
ولــم
يســق
خشـية
خطـبٍ
أكـبرا
|
|
خشـــيةً
أن
تصـــطدم
العجـــال
|
فتســـقط
العجـــال
والرجـــال
|
|
وهكـــذا
فـــي
طلــب
الفخــار
|
تعفــــر
الأوجــــه
بالغبـــار
|
|
وصـــاح
أتريــذ
بغــل
الكــدر
|
أأنطلـــوخ
بيــن
كــل
البشــر
|
|
مــا
قــط
حاكــاك
شـقي
مفـتري
|
نــد
عـن
الإغريـق
صـدق
المخـبر
|
|
وهــم
يخالونــك
بالعقــل
حـري
|
فلـــن
تفـــوزن
مــهٍ
بــالظفر
|
|
أو
تقســـم
الآن
أمــام
الزمــر
|
|
وفرســـيه
ســاط
ثــم
صــاح
لا
|
يورثكمــا
الغــم
حــذار
الملا
|
|
دونكمـــا
مـــذ
كيـــان
أثقلا
|
ســـنّاً
وســـوف
يجهـــدان
عجلا
|
|
فجزعــــا
لصــــوته
وثــــارا
|
وأنطلــــوخ
أدركـــا
تكـــرار
|
|
وظلــت
الصــيد
بتلــك
الحلقـة
|
ترقــب
تلــك
الضــمر
المـدفقه
|
|
تنبــه
قلــب
الســهل
والعجـاج
|
للجــو
مــن
وقـع
الخطـى
وهـاج
|
|
وكــان
عنهــم
لليفـاع
انعطفـا
|
قيـــل
إكريــت
ومنــه
أشــرفا
|
|
فأبصـر
الخيـل
وهـم
لـم
يبصروا
|
وســمع
الصــوت
الــذي
يزدجــر
|
|
فعــرف
الفـارس
عـن
بعـد
الأمـد
|
والأشـقر
السـابق
فـي
تلك
الجدد
|
|
فـي
وجهـه
الغـرة
لاحـت
كـالقمر
|
فقــام
ثــم
صــاح
صـدق
الخـبر
|
|
يــا
صــحب
يـا
عصـابة
الأقيـال
|
ألكــم
بــدا
الــذي
بــدا
لـي
|
|
أرى
جيـــاداً
بـــرزت
حيـــالي
|
وفارسـاً
غيـر
الـذي
فـي
البـال
|
|
فالســـابقات
أصـــبحت
تــوالي
|
لا
شــك
ألفــت
قــدراً
ذا
بــال
|
|
رأيتهــا
والنصــب
بــادٍ
عــال
|
جـــــازته
والآن
بلا
انفصــــال
|
|
أســـرع
الطـــرف
علـــى
الأطلال
|
كــأنني
أســعى
إلــى
المحــال
|
|
لا
شــك
عنــد
العــود
والإقبـال
|
طــار
العنـان
مـن
يـد
الخيـال
|
|
أو
جمحـــت
فيــه
ولــم
تبــال
|
وقضــــت
النيـــر
وبالإجفـــال
|
|
ولــت
فــألقته
علــى
الرمــال
|
قومـوا
اجتلـوا
حقـائق
الأحـوال
|
|
فلـــم
أكــن
ظنــي
بالمغــالي
|
وخلتنــي
أبصــر
فــي
الأوالــي
|
|
قيــل
الإتــول
الشـائع
الأفضـال
|
رواض
متــن
الجــرد
ذا
الأهـوال
|
|
ذيومــذ
القــرم
أخـا
المعـالي
|
|
هنــا
ابــن
ويلــوس
لـه
تصـدى
|
وصـــاح
فيــه
حانقــاً
محتــدا
|
|
أإيــذمين
لــم
تكــن
بالمنصـف
|
هرفــت
ألفيــك
بمـا
لـم
تعـرف
|
|
فتلـك
تلـك
الخيـل
شـم
المعطـف
|
تنتهـب
السـهل
ومـا
الأمـر
خفـي
|
|
مـا
كنـت
بـالغض
الشـباب
الترف
|
بــل
شـاب
أنظـارك
عيـب
الضـعف
|
|
والهــذر
عــوذت
بقـول
المرجـف
|
أفقـت
أهـل
الحكم
في
ذا
الموقف
|
|
حـــتى
تشــدقت
بهــذا
الصــلف
|
فخيــل
إفميــل
نعـم
لـم
تختـف
|
|
بـل
لـم
تزل
في
الصدر
لم
تنحرف
|
يــــدير
صــــرعها
بلا
تكلـــف
|
|
فقــال
إيــذومين
يصــلى
حنقـاً
|
أيـــاس
تســـمو
قحــةً
وحمقــا
|
|
ومنطقـــاً
بكـــل
خبــثٍ
ذلقــا
|
وفــي
ســوى
ذاك
عجــزت
مطلقـا
|
|
فقـــم
وخــاطرني
فــأيٌّ
صــدقا
|
يحــرز
قــدراً
أو
إنــاءً
نمقـا
|
|
حــتى
إذا
أتريــذ
عــدلاً
نطقـا
|
هنــاك
تــدري
خسـائراً
ومنفقـا
|
|
أي
جــوادٍ
فــي
الرهــان
سـبقا
|
|
فهـــب
آيـــاس
علــى
الأقــدام
|
يثــــور
للجـــواب
باحتـــدام
|
|
وكــادت
الفتنــة
تـذكوا
ضـرما
|
لكـــن
آخيـــل
تصـــدى
لهمــا
|
|
فقــال
إيــذومين
آيــاس
كفــى
|
لا
كـان
مـن
مثلكمـا
هـذا
الجفا
|
|
سـواكما
لـو
حـل
هـذا
الموقفـا
|
عنقتمـــاه
فاجلســا
وانعطفــا
|
|
أقبلـت
الخيـل
انظراهـا
تعرفـا
|
ســـابقها
مــن
الــذي
تخلفــا
|
|
ثـــم
ذيوميـــذ
هنـــاك
لاحــا
|
منتهبـــاً
بخيلـــه
البطاحـــا
|
|
تسـبح
فـي
الهـواء
والسـوط
على
|
أكتافهــا
والنقــع
للجــو
علا
|
|
وراءهــــا
مركبـــة
المغـــار
|
تســـطع
بالنحـــاس
والنضـــار
|
|
طــارت
فأضــحى
أثــر
الــدولاب
|
يوشــك
أن
يخفــى
علـى
الـتراب
|
|
حــتى
إذا
بينهــم
حــل
انتصـب
|
ثــم
عــن
الكرســي
للأرض
وثــب
|
|
ومـن
صـدورها
إلـى
الأرض
انـدفق
|
كـذاك
مـن
أعرافهـا
رشـح
العرق
|
|
والسـوط
للمضـمد
ألقـى
وابتـدر
|
مـن
فـوره
التينـلٌ
إلـى
الخطـر
|
|
فــالبكر
والدســيعة
المكتسـبه
|
ألقــى
لصــحبه
وحــل
المركبـه
|
|
إذا
بـــأنطلوخ
للقـــوم
بــدا
|
قبـــل
منيلا
خدعـــةً
لا
مطــردا
|
|
لكنــه
مــا
نــد
عنــه
وســبق
|
إلا
كمـا
الجـواد
بـالنير
التصق
|
|
إذا
لـدى
مركبـة
القيـل
انـدفع
|
وذيلــه
حــول
المحـالات
ارتفـع
|
|
قـد
كـان
مرمـى
كـرةٍ
عنه
ابتعد
|
لكــن
مضـى
بإيثيـا
يجـري
وجـد
|
|
ولــو
مجــالهم
يســيراً
طــالا
|
لأحــرز
الســبق
وفخــرا
نــالا
|
|
ثــم
علــى
مرمــى
مثقــفٍ
أتـى
|
حــوذي
إيـذومين
مريـون
الفـتى
|
|
فليــــس
ذا
ســــلاهبٍ
كــــرام
|
وليـــس
بالمضــمار
ذا
إلمــام
|
|
وآخــر
الحلبــة
مقطـوع
الصـله
|
لاح
ابــن
أذميــت
يجـر
العجلـه
|
|
وخيلـــه
يســـوق
فــي
محنتــه
|
فـــرق
آخيـــل
لـــدى
رؤيتــه
|
|
وصـــاح
ناهضــاً
أرى
الجــديرا
|
بالســبق
أضـحى
هاهنـا
الأخيـرا
|
|
فلا
نضـــع
إقــدامه
المــبرورا
|
ذلــك
نــال
الخطــر
الخطيــرا
|
|
فلنجعــل
الثــاني
ذا
الأميــرا
|
|
فاستصـوبوا
وكـاد
يعطـي
الحجرا
|
لــو
لـم
يعـارض
انطلـوخ
جهـرا
|
|
وصــاح
يــا
أخيـل
إنـي
أنقعـم
|
منــك
إذا
اعتـديت
فيمـا
تحكـم
|
|
تحرمنــي
حقــي
وأنــت
تزعنــم
|
إفميـل
فيـه
الخيـل
وهـو
الأيهم
|
|
قــد
أصـبحت
عـن
السـباق
تحجـم
|
فلـو
سـراة
الخلـد
عونـاً
منهـم
|
|
رام
لمــا
كــان
أخيــراً
يقـدم
|
فــإن
بــه
تعنـى
وأنـت
الأكـرم
|
|
ففــي
خيامــك
المنــال
الأقـوم
|
مــن
ذهــبٍ
ومــن
نحــاسٍ
يركـم
|
|
والغيــد
والخيـل
بهـا
والنعـم
|
أمــا
لـه
إن
شـئت
فيمـا
مغنـم
|
|
مــن
صــلتي
أوفـى
نعـم
وأعظـم
|
عـــاجله
بـــالبر
إذا
فتعلــم
|
|
كــل
السـرى
أنـك
أنـت
المنعـم
|
لكننــي
فــي
مغنمــي
لا
أرغــم
|
|
ومــن
يعارضــني
بــه
فــالحكم
|
مـا
بيننـا
الصـم
بهـا
نستعصـم
|
|
فهـــش
آخيـــل
لـــه
منتصــبا
|
إذ
كــان
إلـف
وده
منـذ
الصـبا
|
|
وقــال
مــذ
قـد
رمـت
أن
أنيلا
|
مـــن
منزلـــي
جــائزةً
إفميلا
|
|
فــالآن
يعطــي
الجوشـن
الثقيلا
|
جوشــــن
عســـطروف
الصـــقيلا
|
|
ذاك
الـــذي
طرحتـــه
قـــتيلا
|
حلقــــه
صــــفرٌ
زهـــا
جميلا
|
|
وهــــو
جـــزاء
خلتـــه
جليلا
|
|
ثـــم
إلـــى
أفطومــذٍ
أشــارا
|
فهـــب
مـــن
ســـاعته
وســارا
|
|
وأحضــر
الــدرع
وإفميــل
حبـا
|
بهـــا
ففـــاض
جـــذلاً
وطربــا
|
|
لكــن
منيلا
قــام
واري
اللهــب
|
علـى
ابـن
نسـطور
وبـادي
الغضب
|
|
مــن
كــف
فيـج
صـولجاناً
قبضـا
|
يـأمر
بالصـمت
السـرى
مـذ
نهضا
|
|
وصــاح
أنطلــوخ
يـا
ذا
العقـل
|
لـم
اجـترحت
اليـوم
شـر
الفعـل
|
|
وسـمت
شـأني
الخـذل
شـر
الخـذل
|
أحرجـــت
خيلــي
وبخيــلٍ
خطــل
|
|
جــزت
ســراحيبي
الكـرام
الأصـل
|
فيــا
ســراة
القـوم
آل
الفضـل
|
|
هيـوا
افصـلوا
ما
بيننا
بالعدل
|
كــي
لا
يقـال
بعـد
هـذا
الفصـل
|
|
غــدراً
منيلا
قــد
غـدا
يسـتعلي
|
وأحــرز
الحجــر
بفضــل
النبـل
|
|
والبـأس
لا
بـالجري
فـوق
السـهل
|
وهـــاكم
حكمــي
بــذا
المحــل
|
|
ولا
إخـــالني
رهيـــن
العـــذل
|
إذ
إننــي
بــالحق
حكمـي
أملـي
|
|
قــم
أنطلــوخ
وفـق
عـرف
الهـل
|
وقــف
هنـا
قـرب
الجيـاد
مثلـي
|
|
والسـوط
ذا
السـوط
الذي
من
قبل
|
ســقت
بــه
أقبــض
بيــد
وخــل
|
|
يــداً
علـى
الخيـل
أمـام
الكـل
|
واحلــف
بهــدام
الــورى
الأجـل
|
|
أنـك
لـم
تغـدر
ولـم
تحتـل
لـي
|
|
فقــال
صــبراً
يــا
منيلا
صـبرا
|
جــاوزتني
ســنّاً
وفقــت
قــدرا
|
|
فنــزق
الشــباب
تــدري
خــبرا
|
يــدفع
فــوراً
ويضــل
الفكــرا
|
|
جهــل
الصــبا
هـذا
وأنـت
أدرى
|
فــالطيش
فيــه
علــةٌ
لا
تــبرا
|
|
أنــت
ذا
بــالعفو
كنـت
الأحـرى
|
فــدونك
الحجــر
فخــذها
جهـرا
|
|
وإن
تشـــأ
زدت
صـــلاتٍ
أخـــرى
|
فـذاك
خيـرق
لـي
يـا
ابـن
أثرا
|
|
مــن
أن
تســومني
قلــىً
وهجـرا
|
وعنــد
آل
الخلــد
أجنــي
وزرا
|
|
وقادهــــا
بيــــده
يلقيهـــا
|
إليـــه
فــاعتز
بهــا
بــديها
|
|
ومثلمــا
الســنبل
والطـل
فـرش
|
حبـابه
فـي
مـائد
الـزرع
انتعش
|
|
كــذاك
يـا
أتريـذ
لبـك
انشـرح
|
وغلـة
الغـم
علـى
الفـور
اطـرح
|
|
وقــال
أنطلــوخ
عفــت
الغضـبا
|
والآن
لـي
الإذعـان
والغيـظ
خبـا
|
|
قـد
كنـت
دومـاً
ذا
حجـىً
مهـذبا
|
لكنمـا
بالعقـل
قـد
عـاث
الصبا
|
|
لا
تخـــدعن
بعـــد
قيلاً
أنجبــا
|
منــك
فلا
ســواك
فــوراً
أذهبـا
|
|
غلــي
وقـد
شـاهدت
فيمـا
ذهبـا
|
كــم
نصــباً
عــانيتهم
ونصــبا
|
|
أنــت
وترســيميذ
ذاك
المجتـبى
|
والشــيخ
نسـطور
وكنـت
السـببا
|
|
عــذرك
قــد
قبلتــه
مستصــوبا
|
والحجــر
لــي
خـذها
حلالا
طيبـا
|
|
ليشـهد
الإغريـق
فـي
هـذي
الربى
|
أن
جنـاني
العسـف
والكـبر
أبـي
|
|
ثـــم
إلـــى
رفيقــه
نومونــا
|
ألقــى
بهـا
فاقتادهـا
مأمونـا
|
|
لــذاك
بالمرجــل
أتريــذ
ذهـب
|
وخــص
مريــون
بشــا
قلـي
ذهـب
|
|
إذ
كـان
تاليـاً
أتـى
علـى
أمـد
|
وصــلة
المرتـاح
لـم
ينـل
أحـد
|
|
لــذاك
بــالكوب
أخيــل
راحــا
|
يهــدي
إلــى
نسـطور
ثـم
صـاحا
|
|
خـذ
أيهـا
اشـيخ
فهذا
الذخر
لك
|
ذكــر
الفطرقــل
الـذي
آه
هلـك
|
|
ولـن
تـراه
بعـد
فـي
هذي
الدرك
|
إليــك
قــد
أهـديته
إذ
أثقلـك
|
|
عجــزٌ
فلــن
تكـون
ممـن
اشـترك
|
لا
بلكـــامٍ
أو
صــراعٍ
أو
ســلك
|
|
فـي
العدو
والطعن
بهذا
الممترك
|
|
والكــوب
ألقــاه
لــه
فطابــا
|
نفســـاً
ومــن
ســاعته
أجابــا
|
|
بنــي
قــد
نطقــت
بـالحق
نعـم
|
قــد
وهـت
الكـف
وخـارت
القـدم
|
|
آه
فيـا
ليـت
شـبابي
مـا
انصرم
|
ودام
لــي
إقـدام
غـابر
القـدم
|
|
لمــا
الإفيــون
ببفـراس
النعـم
|
سـعوا
إلـى
دفـن
عمارنقا
الحكم
|
|
وولـده
قـد
أجـزأوا
والحشـد
تم
|
جــوائز
الألعــاب
حــتى
تقتسـم
|
|
فلـم
يكـن
فـي
كـل
هاتيـك
الأمم
|
منهـم
ومـن
فيلـوس
أرباب
الشيم
|
|
كـذا
مـن
الإيتـول
من
معي
انتظم
|
فـإقلطو
ميـذين
إينفـس
اصـطدام
|
|
معـي
لكامـاً
فـانثنى
واري
الألم
|
ثــم
الفلــوروني
أنقــاص
هجـم
|
|
نحـوي
صراعاً
فانثنى
بادي
الندم
|
ثــم
إفكلـوس
الفـتى
مـن
اتسـم
|
|
بعـــدوه
قصــر
عنــي
واعتصــم
|
ثــم
بــزج
الرمــح
فيلاس
الأشـم
|
|
وفولــذورا
جـزت
مـأثور
العظـم
|
لكننـــي
بســبق
العجــال
لــم
|
|
أفـز
وإن
كـان
لـه
القـدر
الأهم
|
فولــدا
أكتــور
أدركـا
العلـم
|
|
قبلــي
يغنمــان
خيــر
مغتنــم
|
والفــوز
للكـثرة
بالفضـل
حكـم
|
|
والتوأمـان
أنيريـا
فـذا
اقتحم
|
بســـوطه
وذا
الأزمـــة
اســتلم
|
|
ذلـك
شـاني
كـان
مـن
قبل
الهرم
|
والآن
للفتيــان
إبــراز
الهمـم
|
|
أتمــم
إذا
مــأتم
إلفـك
الحـم
|
وهـا
أنـا
أقبـل
بالبشـر
الأتـم
|
|
ذخـرك
إذا
أكرمـت
يا
نعم
الكرم
|
حرمـة
شـيخٍ
كـان
مـن
أهل
الحرم
|
|
فلتجـزك
الأربـاب
موفـور
النعـم
|