|
لـك
يـا
ابـن
فيلا
الباسـل
احتشـدا
|
حوليـــك
قومـــك
ينظــم
العــددا
|
|
أنتــــم
إزاء
الفلـــك
قـــابلكم
|
فــوق
الهضــاب
يعــج
جيــش
عــدى
|
|
وثميـــس
زفـــس
دعـــا
فأنفــذها
|
تـــدعو
ذويـــه
لمجلـــس
عقـــدا
|
|
طـــارت
مـــن
الأولمـــب
جائبـــة
|
كـــل
الـــورى
تســتقدم
العمــدا
|
|
لبــوا
وغيــر
الأوفيــانس
لا
نهــرٌ
|
تخلـــــف
بـــــل
جـــــروا
عجلا
|
|
لـــم
يبـــق
مــن
حوريــةٍ
ســكنت
|
نبعـــاً
جـــرى
أو
جـــدولاً
جــدلا
|
|
أو
غابــــةً
أو
روضــــةً
نضــــرت
|
إلا
ســـــــعت
فــــــوراً
لتمتثلا
|
|
فــإذا
بهــم
والصــرح
غــص
بهــم
|
مـــن
حــول
زفــس
بمحفــلٍ
حشــدا
|
|
جلســوا
علــى
ســددٍ
تفيــض
ســنا
|
لأبيـــه
هيفســـت
النبيـــل
بنــى
|
|
ومزعـــزع
الأرضــين
مــن
لجــج
ال
|
أعمــــاق
هـــب
ملبيـــاً
علنـــا
|
|
ثـــم
انـــبرى
إذ
قـــر
وســـطهم
|
مستفســـراً
عمـــا
دعـــاه
هنـــا
|
|
يــا
ذا
الـذي
يرمـي
الصـواعق
مـا
|
أفضــى
لحشــد
بنــي
العلـى
وبـدا
|
|
أبــــذينك
القــــومين
تفتكــــر
|
والحـــــرب
بينهــــم
ستســــتعر
|
|
فأجـــاب
ركـــام
الغيـــوم
نعــم
|
أدركــت
مــا
علقــت
بــه
الفكــر
|
|
مـــا
زلــت
دومــاً
عانيــاً
بهــم
|
حــتى
ولــو
هلكــوا
ولــو
دمـروا
|
|
فأنـــا
أســـرح
نـــاظري
جـــذلاً
|
فــوق
الألمــب
إذا
اللظــى
اتقـدا
|
|
وجميعكــم
بيــن
الســرى
انقسـموا
|
وبســــلك
أي
شــــئتم
انتضـــموا
|
|
مــا
خلــت
طــرواداً
تطيــق
لقــا
|
آخيـــل
لـــو
فـــذّاً
بــدا
لهــم
|
|
مــــرآه
راعهـــم
فكيـــف
وقـــد
|
أضـــحى
علـــى
فطرقـــل
يحتـــدم
|
|
لا
بـــــدع
إن
دك
الحصـــــون
وإن
|
قصـــد
القضـــاء
خلاف
مــا
قصــدا
|
|
فبهـــم
أوار
الفتنـــة
التهبـــا
|
وتطـــايروا
كـــلٌّ
كمـــا
رغبـــا
|
|
للفلـــك
هيـــرا
أســـرعت
وكــذا
|
فــــالأس
ثمــــة
فوســـذٌ
ذهبـــا
|
|
وكــــذلك
القــــوام
هرمـــس
وال
|
جبـــار
هيفســـت
القـــوى
عقبــا
|
|
يجـــري
ويجمـــع
لا
تطيـــق
لـــه
|
ســــاقاه
حملاً
إن
جــــرى
وعـــدا
|
|
وأريــــس
رب
القــــونس
القلـــق
|
أم
الطــــرواد
بــــادي
الحنـــق
|
|
مـــع
أرطميـــسٍ
فـــي
كنانتهـــا
|
مـــع
عفرذيـــت
المبســم
الطلــق
|
|
وكـــذاك
لاطونـــا
وزنـــث
جـــرى
|
مــــن
ضــــفتيه
جـــري
منـــدفق
|
|
وكـــذاك
فيبـــوسٌ
مـــن
انســدلت
|
تزهــــو
غـــدائره
لكـــل
مـــدى
|
|
وقبيــل
مــا
آل
العلــى
انحـدروا
|
كـــرت
ســـرى
الإغريـــق
تفتخـــر
|
|
آخيــــل
عـــاد
عقيـــب
عزلتـــه
|
ولهـــول
رؤيتــه
العــدى
صــغروا
|
|
ألفـــــوه
مشـــــتدّاً
بشـــــكته
|
كـــأريس
هـــول
الإنـــس
يســـتعر
|
|
وبنـو
العلـى
بالنـاس
مـا
اشتبكوا
|
حـــتى
غمـــام
الفتنــة
التبــدا
|
|
فـــالاس
بيـــن
الثغـــر
والحفــر
|
صـــاحت
تشـــدد
جملـــة
الزمـــر
|
|
وأريــــس
هـــب
هبـــوب
عاصـــفةٍ
|
يغـــري
طـــرواده
علـــى
الأثـــر
|
|
بهضــــاب
ســـيموسٍ
يهـــد
وفـــي
|
قلــــل
المعاقـــل
وأري
الشـــرر
|
|
فكـــــذلك
الأربــــاب
فتنتهــــم
|
صــدعت
وزفــس
مــن
العلــى
رعـدا
|
|
فتنـــوا
ســرى
الجيــش
فاصــطدما
|
وفســــيذ
هــــز
الأرض
محتــــدما
|
|
فارتـــج
أيـــذا
مـــن
دعـــائمه
|
حـــتى
أمـــاد
بميـــده
القممــا
|
|
وتزعـــــزت
طـــــروادةٌ
وغــــدا
|
بالفلـــك
وجـــه
اليــم
ملتطمــا
|
|
حــــتى
بجــــوف
الأرض
آذس
عــــن
|
عـــرش
الجحيـــم
اهــتز
مرتعــدا
|
|
بالويـــل
صـــاح
وهــاله
الخــبر
|
يخشــــى
فجــــاج
الأرض
تنفجــــر
|
|
ومنــــازل
الظلمــــات
ظــــاهرةً
|
تبـــدو
يراهـــا
الجــن
والبشــر
|
|
تلــــك
الوهـــاد
اللاء
مخبرهـــا
|
حــتى
بنــو
العليــا
لــه
ذعـروا
|
|
ولــــذاك
زلـــزال
العـــوالم
إن
|
بســرى
العلـى
عـادي
الشـقاق
عـدا
|
|
لفســيذ
ملــك
الهــول
مــذ
ظهـرا
|
فيبـــوس
بيـــن
ســـهامه
صـــدرا
|
|
ولهرمـــــسٍ
لاطونـــــةٌ
بـــــرزت
|
وإلــــى
أثينــــا
آرس
انحـــدرا
|
|
ولــزوج
زفــس
بــدت
شــقيقة
مــن
|
فـــي
القاصـــيات
ســهامه
نشــرا
|
|
هـــي
أرطميـــس
تميـــد
ســـاطعةً
|
قـــوس
النضـــار
بكفهـــا
ميــدا
|
|
وعلـــى
هفســـت
انقـــض
مصــطفقاً
|
ذيالـــك
الهـــر
الــذي
انــدفقا
|
|
فـي
الخلـد
زنـث
جـرى
اسـمه
وكسـا
|
بالإســكمندر
فــي
الــورى
انطلقـا
|
|
هــــذي
هـــي
الأربـــاب
فتتهـــم
|
وأخيــــل
ظـــل
يـــؤج
محترقـــا
|
|
للقـــاء
هكطـــورٍ
وخـــرقٍ
ســـرى
|
تلـــك
الكتـــائب
صـــبره
نفــدا
|
|
يــــذكو
ليـــروي
فـــي
تحـــدمه
|
رب
الـــوغى
الســـفاك
مــن
دمــه
|
|
لكــــن
فيبوســــاً
أثـــار
لـــه
|
أنيـــاس
يعصـــم
بـــأس
معصـــمه
|
|
فـــي
شـــكل
ليقـــاوون
خـــاطبه
|
أنيــــاس
أيـــن
صـــلى
تعظمـــه
|
|
آليـــــت
للطــــرواد
مرتشــــفاً
|
لتلاقيـــــــن
أخيلا
منفـــــــردا
|
|
قـــال
ابـــن
فريـــامٍ
علام
علــى
|
رغمــــي
إليــــه
تســـوقني
عجلا
|
|
ليســــت
بــــأول
مـــرةٍ
ثبتـــت
|
قـــدمي
لـــديه
فســـامني
فشــلا
|
|
فـــي
إيـــذةٍ
مــن
وجــه
صــعدته
|
وليـــــــت
قبلاً
هالعــــــاً
وجلا
|
|
لمـــا
اســـتباح
صــوارنا
ورمــى
|
لرنيســــةً
وفــــداس
ومضــــطهدا
|
|
لكــــن
زفــــس
مشـــدِّداً
ركـــبي
|
وقـــواي
أنقـــذني
مـــن
العطــب
|
|
أو
لا
فكــــــان
أبـــــادني
عجلاً
|
وأمـــامه
فـــالاس
فـــي
الحجـــب
|
|
تــــوليه
نصـــرتها
ليقتضـــب
ال
|
لميليــــغ
والطـــرواد
بالقضـــب
|
|
مـــا
كـــان
إنســـيٌّ
لــه
كفــؤاً
|
وبنــو
العلــى
كــانوا
لـه
عضـدا
|
|
إن
يـــرم
صـــانوه
وحيـــث
رمــى
|
طـــارت
مناصـــله
تســـيل
دمـــا
|
|
فلــو
أنهــم
مــا
بيننــا
عـدلوا
|
مـــا
ســـلمني
ذلّاً
كمـــا
زعمـــا
|
|
حــــتى
ولـــو
صـــلبت
مفاصـــله
|
مثـــل
النحــاس
وصــال
واقتحمــا
|
|
فأجـــاب
فيبـــوس
ادع
أنـــت
إذاً
|
رهطـــاً
بأكنـــاف
العلــى
خلــدا
|
|
فلعفرذيـــــتٍ
ســــاقه
النســــب
|
ولبنـــت
شـــيخ
البحـــر
ينتســب
|
|
فــإذاً
لــك
الرجحــان
عــن
ثقــةٍ
|
حســــباً
وزفــــس
لعفرذيــــت
أب
|
|
فهلـــــم
بــــادره
بنصــــلك
لا
|
يأخـــذك
مـــن
نعراتـــه
الرعــب
|
|
مـــن
ثـــم
أفــرغ
فيــه
قــدرته
|
فـــــانقضَّ
لا
يرتــــد
مبتعــــدا
|
|
فرأتـــه
هيـــراً
بـــارزاً
يثـــب
|
مــــن
جيشــــه
لأخيـــل
يقـــترب
|
|
فـــدعت
إليهـــا
مـــن
بطانتهــا
|
مـــن
نصـــرة
الأرغوســة
اطلبــوا
|
|
قـــالت
أثينـــا
فوســذ
انتبهــا
|
لمـــآل
حـــربٍ
دونهـــا
الحـــرب
|
|
أنيــــاس
رام
أخيــــل
مــــدرعاً
|
بأســـاً
علـــى
فيبـــوس
معتمــدا
|
|
فيبـــــوس
فلنــــدفع
بلا
مهــــل
|
أو
بعضـــنا
فـــوراً
أخيــل
يلــي
|
|
ويخــــــولنه
فـــــوق
شـــــدته
|
بأســـاً
ويعصـــمه
مـــن
الوجـــل
|
|
فيـــرى
عينـــاً
صـــيد
أســـرتنا
|
أولــــوه
ودّاً
جـــل
عـــن
مثـــل
|
|
وجميــــع
أحلاف
الطــــراود
مـــا
|
هـــالوا
وعنـــا
يقصـــرون
يــدا
|
|
أفمـــا
انحــدرنا
للكفــاح
هنــا
|
لنقــي
أخيــل
اليــوم
كــل
عنــا
|
|
فـــإذا
كمنــا
الأمــر
ثــم
بــدا
|
فــــي
وجهـــه
ربٌّ
عتـــا
جبنـــا
|
|
فمنـــــاظر
الأربــــاب
مرعبــــةٌ
|
ولأي
إنســـــيٍّ
بـــــدت
وهنـــــا
|
|
مــن
ثــم
فليــرد
الحمــام
كمــا
|
غــزل
القضــاء
ســنيه
مــذ
وجـدا
|
|
فأجـــاب
فوســـيذٌ
دعــي
الشــططا
|
مــا
كــان
شــأنك
أعهــد
الغلطـا
|
|
مـــا
رمــت
إذ
كنــا
أشــد
قــوىً
|
حـــرب
العبـــاد
نلــي
فننخرطــا
|
|
للإنـــس
خلـــي
الحـــرب
نرقبهــا
|
مــن
فــوق
ذاك
التــل
طــي
غطــا
|
|
وإذا
أريــــس
وفيبـــس
اعتـــديا
|
فـــوراً
عمـــدنا
مثلمـــا
عمــدا
|
|
وأخيــــــل
إن
ردا
وإن
ردعـــــا
|
فنــــاك
بـــأس
أكفنـــا
صـــدعا
|
|
وهنـــاك
ظنـــي
للعلـــى
هلعـــاً
|
نلقاهمـــا
لســرى
العلــى
رجعــا
|
|
مــــن
ثــــم
قوســـيذٌ
بأســـرته
|
هرعـوا
إلـى
السـور
الـذي
ارتقعـا
|
|
ســـورٌ
لأجـــل
هرقــل
قبــل
بنــت
|
فـــالاس
والطـــرواد
مـــذ
جهــدا
|
|
مــن
وجــه
وحـش
البحـر
فيـه
لجـا
|
لمــــا
عليـــه
هاجمـــاً
خرجـــا
|
|
فهنــــاك
فوســـيذٌ
بمـــن
معـــه
|
فـــي
طـــي
حجــب
غمامــةٍ
ولجــا
|
|
وإلـــى
ريـــاض
هضـــاب
ســـيميسٍ
|
فيبـــــوس
مــــال
وآرسٌ
عرجــــا
|
|
بجميـــع
أنصـــار
الطــرواد
مــن
|
حوليهمـــا
فـــوق
الرقــى
قعــدا
|
|
وكـــذا
مـــن
الصـــوبين
قائمــةً
|
لبثـــت
ســـرى
الأربـــاب
ناقمــةً
|
|
ظلــــت
هنـــاك
بظـــل
عزلتهـــا
|
عـــن
ســـاحة
الهيجـــاء
واجمــة
|
|
لكــــن
زفــــس
بعــــرش
عزتـــه
|
قــــاض
بــــأن
تنقـــض
هاجمـــة
|
|
وصــــفائح
الجيشــــين
ســــاطعة
|
أجـــت
ونقـــع
خطاهمـــا
صـــعدا
|
|
والأرض
تحــــت
الرجـــل
والعجـــل
|
مـــادت
لوطـــأة
هـــاته
الملــل
|
|
مــــن
كـــل
جيـــش
زف
مقتحمـــا
|
بطــــلٌ
تحــــدم
أيمــــا
بطـــل
|
|
أنيــــاس
رب
البــــأس
قــــابله
|
آخيـــــل
رب
الــــبيض
والأســــل
|
|
هـــز
القنـــاة
مـــبرزاً
وعـــدا
|
أنيـــاس
فــي
الميــدان
منجــردا
|
|
فــــي
رأســـه
أعـــراف
خـــوذته
|
قـــد
هـــاج
يرفــع
صــلد
جنتــه
|
|
فــــانقض
آخيـــلٌ
كليـــث
شـــرى
|
نهـــض
الجمـــوع
لكســـر
شــوكته
|
|
فزعـــت
لهـــم
كـــل
البلاد
فلــم
|
يعبــــأ
وظـــل
علـــى
ســـكينته
|
|
حتى
رماه
بهم
حنقاً
تقدم
فاغراً
فمه
|
يصـــــلى
بمهجتـــــه
تضـــــرمه
|
|
أســـــنانه
صـــــرت
ومقلتـــــه
|
بشـــــرارها
تـــــذكي
تحــــدمه
|
|
ولـــذيله
فـــي
صـــفحتيه
غـــدا
|
قــــرعٌ
يــــروع
مــــن
توســـمه
|
|
فيهـــــب
منقضــــاً
ليهلــــك
أو
|
ليبيـــد
مـــن
أبطـــالهم
عــددا
|
|
فلــــــذاك
آخيـــــلٌ
تحرقـــــه
|
للقـــــاء
أنيـــــاس
يشـــــوقه
|
|
حـــتى
إذا
ضـــاق
المجــال
أتــا
|
ه
مخاطبــــاً
بــــالعنف
يرمقـــه
|
|
وأنيـــاس
جيشــك
لــم
أراك
كــذا
|
بــــرزت
عنــــه
إلـــي
تســـبقه
|
|
أزعمــــت
فريامـــاً
يشـــاطرك
ال
|
أحكـــام
فـــي
طـــروادة
أبـــدا
|
|
كلّا
فلــــن
يجزيــــك
ذاك
فمــــا
|
هـــو
قاصــرٌ
حكمــاً
بمــا
حكمــا
|
|
كلّا
وإن
مـــا
بـــي
ضـــفرت
هنــا
|
فلـــديه
أبنـــاءٌ
ســـموا
عظمــا
|
|
ولعلــــه
إن
بــــي
فتكــــت
إذاً
|
مــن
أرضــه
لــك
يجــزل
الكرمــا
|
|
بقعـــاً
زهـــت
كرمـــاً
ومزرعهــا
|
خصـــبٌ
فتحشـــد
كــل
مــا
حصــدا
|
|
هيهــات
تــدرك
هــا
هنــا
الأربـا
|
أفمـــا
لـــواك
مثقفـــي
هربـــا
|
|
أفمــا
ادكــرت
اليــوم
يـوم
علـى
|
إيـــذا
فـــررت
لـــدي
مضـــطربا
|
|
إذ
عــن
ســوامك
قــد
قصــلتك
لـم
|
تنفــــت
فـــردت
وراءك
الهضـــبا
|
|
فلجـــأت
فـــي
لرنيســـةٍ
وأنـــا
|
هـــدمت
مـــن
لرنيســـة
العمــدا
|
|
زفـــــــــــسٌ
وآثينـــــــــــا
|
بعونهمـا
إذ
واصـلاني
عـدت
مغتنمـا
|
|
وســـبيت
منهــا
الغيــد
مســتلباً
|
حريــــــةً
متعنهـــــا
قـــــدما
|
|
لكــــن
زفــــس
وآلـــه
حفظـــوا
|
أنيـــاس
حـــتى
ناجيـــاً
ســـلما
|
|
وآخــالهم
ذا
الحيــن
مــا
عـبئوا
|
فيـــه
فصـــانوه
كمــا
اعتقــدوا
|
|
فـــارجع
نصــحتك
بيــن
قومــك
لا
|
تتصـــد
لـــي
فتســـام
شـــر
بلا
|
|
فـــالغر
ليـــس
بـــذاعنٍ
ابـــداً
|
إلّا
إذا
بهـــــــوانه
اتصــــــلا
|
|
قــال
ابــن
فيلا
لســت
أعجــز
عـن
|
فــــظ
الكلام
فــــذلك
ابتــــذلا
|
|
أزعمــــت
إرعــــابي
بقولـــك
ذا
|
أو
خلــت
تلقــى
هــا
هنــا
ولـدا
|
|
إن
غـــاب
عـــن
أبصــارنا
الأثــر
|
مــا
غــاب
عنــا
العلــم
والخـبر
|
|
فلقــد
روى
الــراوون
قبــل
لنــا
|
آثـــار
أســـلافٍ
لنـــا
اشــتهروا
|
|
لأيــــاك
إمــــا
كنـــت
متصـــلاً
|
وكـــذا
لثيـــتيسٍ
كمـــا
ذكــروا
|
|
للزهــــرة
الغــــراء
منتســــبي
|
والشـــهم
أنخيـــسٌ
أبـــي
عهــدا
|
|
لا
بـــد
إحـــدى
الأســـرتين
تــرى
|
ذا
اليـــوم
نادبــةً
فــتىً
قهــرا
|
|
مــا
كــان
لغــو
القــول
فاصـلنا
|
عــن
موقــف
الطعـن
الـذي
اسـتعرا
|
|
ولئن
تــــرم
تحقيــــق
نســـبتنا
|
وفقـــاً
لمــا
قــد
ذاع
وانتشــرا
|
|
فـــاعلم
فـــدردانوس
وهــو
فــتى
|
زفـــسٍ
بنـــى
دردانيـــا
بلـــدا
|
|
إليـــون
فـــي
ذيالـــك
الزمـــن
|
فــي
عــرض
هــذا
السـهل
لـم
تكـن
|
|
والنـــاس
قـــد
كــانت
منــازلهم
|
فــي
ســفح
إيــذا
الشـامخ
القنـن
|
|
مــن
ثــم
دردانــوس
منـه
نشـا
ال
|
مـــولى
إرخثـــونٌ
فـــتى
الفطــن
|
|
أثـــرى
الـــورى
طـــرّاً
مســارحه
|
مرحــــت
بهـــن
خيـــوله
رغـــدا
|
|
ألــــفٌ
وألفـــا
حجـــرةٍ
ســـرحت
|
مـــن
خلفهـــا
أفلاءهـــا
مرحـــت
|
|
بريـــاس
هـــام
ببعضـــها
فحكــى
|
مهـــراً
نواصـــيه
لقـــد
ســـبحت
|
|
فعلقــن
بــاثني
عشــر
مــا
سـحقت
|
قمـــم
الســـنابل
حيثمــا
رمحــت
|
|
وإذا
هببــن
علــى
البحــار
فمــن
|
فـــوق
الميـــاه
وثبـــن
مطــردا
|
|
هــــذا
إرخثـــونٌ
ومنـــه
نمـــا
|
أطـــروس
مـــن
طـــروادةً
حكمـــا
|
|
إيلــــوس
عســـا
زاقـــسٌ
وكـــذا
|
غانيمــــذٌ
أبنــــاؤه
العظمــــا
|
|
غانيمـــــذٌ
لجمـــــال
طلعتــــه
|
رفعتـــه
أبنـــاء
العلــى
قســما
|
|
ليكـــون
ســـاقي
زفـــس
بينهـــم
|
فلـــذاك
فـــي
أولمبهـــم
ســعدا
|
|
إيلـــوس
كـــان
للومـــذون
أبــا
|
وللومــــذون
طثــــونٌ
انتســــبا
|
|
وكـــــذاك
فريـــــامٌ
قليطيــــسٌ
|
هيقيطــــوون
ولمبــــس
النجبـــا
|
|
وبنجـــــل
عســــاراقسٍ
عرفــــوا
|
قـــافيس
جـــدي
مـــن
علا
رتبـــا
|
|
فــأبى
ابنــه
أنخيــس
كــان
كمـا
|
فريـــام
هكطـــورٌ
فتـــاه
غـــدا
|
|
هـــذا
فخـــاري
نســـبتي
ودمـــي
|
ولزفــــس
ذلــــك
قيـــم
الأمـــم
|
|
إن
شــــاء
أعلــــى
همــــةً
وإذا
|
مــا
شــاء
أوهــن
عــالي
الهمــم
|
|
فهنــا
مجــال
الطعــن
ليــس
لنـا
|
كالولـــد
فيـــه
ســـاقط
الكلــم
|
|
فلســـان
كــل
فــتىً
بقيــه
يــرى
|
ذلفـــاً
ومهمـــا
يبتغـــي
ســردا
|
|
ميـــدان
هـــذا
اللغـــو
متســـع
|
وســـبابهم
مــن
أســمعوا
ســمعوا
|
|
إن
نبـــغ
يشـــحن
لغونــا
فلكــاً
|
مئةٌ
أردمــــــــه
ولا
يســــــــع
|
|
فعلام
كــــــامرأتين
أشــــــربتا
|
ســــفهاً
بموقــــع
حطـــةٍ
نقـــع
|
|
شــــتماً
تقاذفتهــــا
بقارعــــةٍ
|
كـــذباً
علــى
صــدقٍ
بغيــر
هــدى
|
|
كلّا
فلســـــت
برائعــــي
جزعــــا
|
أقبــل
نجــل
صــم
النصــال
معــا
|
|
مـــن
ثـــم
أرســل
رمحــه
فمضــى
|
وعلـــى
المجـــن
ســـنانه
وقعــا
|
|
فعليــــه
صـــل
وفـــوق
هـــامته
|
آخيــــل
صــــلد
مجنـــه
رفعـــا
|
|
قـــد
خـــاف
أن
الرمـــح
يخرقــه
|
لكنمـــا
ذا
الخـــوف
كــان
ســدى
|
|
هيهــات
عجــز
الإنــس
يعمــل
فــي
|
مـــا
أولــت
الأربــاب
مــن
تحــف
|
|
وقــف
الســنان
علـى
النضـار
فلـم
|
ينفـــذ
ولـــولا
ذاك
لـــم
يقـــف
|
|
خمـــسٌ
طبـــاق
الـــترس
طرقهـــا
|
هيفســـت
تـــدفع
آفـــة
التلـــف
|
|
نضــد
اثنــتين
مــن
الفلــز
علـى
|
ظهــر
المجــن
ونعــم
مــا
نضــدا
|
|
وعليهمـــا
لـــوحٌ
مـــن
الـــذهب
|
ومـــن
النحـــاس
صـــفيحتا
عجــب
|
|
خــرق
النحــاس
النصــل
يرجـع
عـن
|
لـــوح
النضـــار
رجـــوع
مضــطرب
|
|
فرمـــى
أخيـــل
ســـنانه
فمضـــى
|
فـــي
جـــوب
أنيــاسٍ
ولــم
يخــب
|
|
فــي
صــفحةٍ
حيــث
النحــاس
علــي
|
ه
والســـبت
رق
وطـــائراً
صـــردا
|
|
متلملمــــاً
أنيــــاس
مســــتترا
|
مــــد
المجـــن
أمـــامه
حـــذرا
|
|
فقنــــاة
قليـــونٍ
بـــه
نفـــذت
|
والجـــوب
مـــاد
يصـــل
منكســرا
|
|
والنصــــل
أنيــــاسٌ
رآه
إلــــى
|
وجــه
الــثرى
عــن
وجهــه
صــدرا
|
|
فلـــق
الحضـــيض
يغـــل
مرتعشــاً
|
فيـــه
وكـــاد
يفلـــق
الكتـــدا
|
|
فنجـــا
ولكـــن
صـــدره
انتفضــا
|
وأخيـــل
صـــاح
ودونــه
اعترضــا
|
|
ســـل
الحســـام
وفـــي
حزازتـــه
|
أنيـــاس
هـــائل
صـــخرةٍ
قبضـــا
|
|
بطليـــن
تجهـــض
فــي
زمانــك
ذا
|
فبهــــا
بغيـــر
تكلـــفٍ
نهضـــا
|
|
ومزعــــزع
الأرضــــين
بأســــهما
|
مـــن
حيــث
قــر
مراقبــاً
شــهدا
|
|
لــــــولاه
أنيـــــاسٌ
بحـــــدته
|
لرمـــى
أخيـــل
بصـــلد
صـــخرته
|
|
ولكـــان
صـــان
أخيـــل
مجـــوبه
|
أو
خـــــوذةٌ
لمعــــت
بجبهتــــه
|
|
ولكـــان
ســيف
أخيــل
فــي
يــده
|
أنيــــاس
أدنـــى
مـــن
منيتـــه
|
|
لكـــــن
فوســـــيذاً
بأســـــرته
|
فــي
الحــال
صـاح
ينيلـه
المـددا
|
|
أنيـــــاس
آخيـــــلٌ
ســـــيقتله
|
أســـفاً
ونحـــو
أذيـــس
يرســـله
|
|
فيبــــوس
أغـــواه
فـــدان
لـــه
|
جهلاً
وذا
فيبـــــــوس
يغفلــــــه
|
|
فعلام
وهـــــو
الــــبر
تــــدهمه
|
نـــوب
الأنـــام
ونحـــن
نهملـــه
|
|
مــا
قــط
عــن
بــث
الفـروض
لهـا
|
بيــن
العبــاد
لكــل
مــن
عبــدا
|
|
لا
شـــك
زفـــس
يغـــاظ
إن
ســفكا
|
دمـــه
أخيـــلٌ
فــاتقوا
الملكــا
|
|
يــأبي
القضــاء
لــه
الهلاك
هنــا
|
وســـليل
دردانـــوس
مـــا
هلكــا
|
|
أو
كيــــف
دردانــــوس
أســــرته
|
طـــرّاً
تبيـــد
وتـــألف
الــدركا
|
|
وهــو
الــذي
مــن
نســل
زفـس
لـه
|
فــي
الإنــس
عهـد
الـود
قـد
عقـدا
|
|
فعلــى
بنــي
فريــام
قــد
غضــبا
|
زفـــسٌ
وأنيـــاس
اجتـــبى
وحبــا
|
|
فلـــذاك
ســـوف
يســـود
محتكمــاً
|
بيـــن
الطـــرواد
كيفمــا
رغبــا
|
|
وبنــــوه
ثـــم
بنـــوهم
وكـــذا
|
مــن
بعــدهم
مــن
ولــدهم
نجبــا
|
|
قـــالت
لـــه
هيـــرا
برأيــك
رم
|
أو
نجــــــوةً
أو
كشــــــفةً
وردى
|
|
لكنمــــــا
فـــــالاس
أقســـــمت
|
ولكــم
أنــا
أقســمت
مــن
جهــتي
|
|
أن
لا
نعيــن
بنــي
الطــرواد
لــو
|
إليــــون
بــــالنيران
ألهبــــت
|
|
فــــانقض
فوســــيذٌ
لمشـــتجر
ال
|
أرمـــاح
حيـــث
الصـــم
صلصـــلت
|
|
حيـــث
ابـــن
أنخيـــس
بصـــرخته
|
وحســــامه
آخيـــل
قـــد
جـــردا
|
|
فلـــدى
أخيـــل
غمامـــةً
نشـــرا
|
غشـــيت
نـــواظره
فمـــا
نظـــرا
|
|
ومـــن
المجـــن
اجـــتر
زانتـــه
|
وأمـــامه
ألقـــى
بهـــا
وجـــرى
|
|
وبوثبـــةٍ
فـــوق
الرجـــال
ومــن
|
فـــوق
العجـــال
بنـــدره
عــبرا
|
|
فــإذا
بــه
طــرف
الكتــائب
حــي
|
ث
معســـكر
القفقونـــة
انتضـــدا
|
|
قـــال
ابـــن
أنخيـــس
وأي
ســري
|
أعمــــاك
فاســــتهدفت
للخطــــر
|
|
آخيـــــل
آل
الخلــــد
تــــؤثره
|
ولقـــد
عـــداك
فكــن
عــن
حــذر
|
|
أولا
فـــــدار
أيــــس
تبلغهــــا
|
بالقســر
عمــا
خــط
فــي
القــدر
|
|
وســـواه
فـــي
الإغريـــق
لا
بطــلٌ
|
تلقــــى
إذا
لا
قيتـــه
الشـــددا
|
|
وإذا
القضــــاء
أبــــاده
فجـــل
|
صـــدر
الكتـــائب
باطشـــاً
وصــل
|
|
مــــن
ثــــم
غـــادره
بمـــوقفه
|
وخلاف
هـــذا
القـــول
لـــم
يقــل
|
|
وأنـــار
حـــول
أخيــل
فانقشــعت
|
تلــك
الغيــاهب
عنــه
فـي
العجـل
|
|
فــــرأى
وصــــعد
حـــر
زفرتـــه
|
لهفــاً
ينــاجي
النفــس
والخلــدا
|
|
ربـــــاه
أي
عجيبـــــةٍ
رمقــــا
|
طرفــي
فــذا
رمحـي
الـذي
انطلقـا
|
|
لا
أبصـــر
القـــرم
الــذي
طعنــت
|
كفـــــي
أروم
هلاكـــــه
حمقــــاً
|
|
قــد
خلــت
أنيــاس
انتمــى
خطــا
|
لبنــي
العلــى
فــإذا
بــه
صـدقا
|
|
إن
ينـــج
حينـــاً
حســـبه
فـــرجٌ
|
أبــداً
فهــذا
الــورد
لــن
يـردا
|
|
ولأدفعـــــن
كتـــــائبي
وأنــــا
|
لــي
عنــه
فـي
بهـم
العـداة
غنـى
|
|
ومضـــى
يجـــوب
صـــفوف
فيلقـــه
|
علنـــاً
يمنيهـــم
بنيـــل
منـــى
|
|
هلا
رأيـــت
بنـــي
أخـــاي
هنـــا
|
كـــل
امــرئٍ
منهــم
فــتىً
طعنــا
|
|
مــا
كــان
لــي
مـا
صـلت
منفـرداً
|
أردي
وأحطــــــم
جحفلاً
أجــــــدا
|
|
لا
آرسٌ
ذا
الجمـــــع
إن
هجمــــوا
|
أو
نفـــــس
فـــــالاسٍ
تصـــــدهم
|
|
ســـأكر
مــا
ثبتــت
قــوى
قــدمي
|
ويـــدري
أصـــول
بهـــم
ولا
أجــم
|
|
وأخـــوض
كـــل
ســـرى
كتـــائبهم
|
فـــي
همــةٍ
مــن
دونهــا
الهمــم
|
|
مــا
خلــت
مــن
يلقـى
ظـبي
أسـلي
|
هـــذا
اللقـــاء
هنيهـــةً
حمــدا
|
|
فهنــــا
أخيـــل
يحـــث
عصـــبته
|
وهنـــــاك
هكطـــــورٌ
بطــــانته
|
|
نبلاءَ
طـــــــروادٍ
أخيــــــل
فلا
|
تخشـــــوا
تبجحـــــه
وصــــولته
|
|
وأنـــا
أطيـــق
كــذا
عــن
حمــقٍ
|
رهـــط
الخلـــود
أهيـــن
حرمتــه
|
|
لكـــن
إذا
بـــدت
القنــا
علنــاً
|
بـــات
الهمـــام
أمــامهم
خــردا
|
|
إن
قــال
بعــض
القــول
ثــم
وفـى
|
فباســـائر
الأقـــوال
قــد
هرقــا
|
|
فلأبــــرزن
لـــه
لـــو
التهبـــت
|
كالنـــار
كفـــاه
كمـــا
وصـــفا
|
|
كالنـــار
لـــو
كفـــاه
ألهبتــا
|
أو
كالحديــد
الصــلب
لــو
وقفــا
|
|
فارتــــدت
الطــــرواد
مســــبلةً
|
ســـمر
القنـــا
مشـــتدةً
جلـــدا
|
|
وتكثفـــــــوا
وعلا
هديـــــــدهم
|
لكــــن
جـــرى
فيبـــوس
بينهـــم
|
|
قــال
ابــن
فريــامٍ
أخيــل
علــى
|
حــــدةٍ
هنــــا
إيـــاك
تقتحـــم
|
|
قــابله
فــي
قلــب
الســرى
أبـداً
|
إذا
غــــص
بالــــدراع
حشــــدهم
|
|
أو
لا
فــــإن
فاتتــــك
صــــعدته
|
مـــا
عنـــك
حــد
حســامه
شــردا
|
|
فارتـــاع
هكطـــورٌ
لمـــا
ســمعا
|
وانصـــاع
بيـــن
جنـــوده
هلعــا
|
|
وأخيــــل
صـــاح
تـــروع
هـــدته
|
وبعزمـــه
بيــن
العــدى
انــدفعا
|
|
بســـــليل
أطرنـــــتٍ
إفيــــتينٍ
|
مــن
خيــر
صــيد
جنــودهم
شــرعا
|
|
فـــي
ســـفح
إيمـــولٍ
بهيــذة
ذا
|
ت
الخصـــب
مـــن
حـــورةٍ
ولـــدا
|
|
لاقــــــاه
آخيــــــلٌ
بكرتـــــه
|
بالرمـــح
يفلـــق
صـــلب
هــامته
|
|
فهــــوى
يصــــل
ســـلاحه
وعـــدا
|
آخيـــــل
مفتخـــــراً
بنصــــرته
|
|
يــا
أشــجع
الأبطــال
أنــت
هنــا
|
ميـــتٌ
نـــأى
عـــن
أرض
نشـــأته
|
|
عــن
بحــر
غيغــس
حيـث
هيلـس
وال
|
هــدار
هرمــس
قــد
ســقى
الجـددا
|
|
غشـــــى
ظلام
المــــوت
مقلتــــه
|
والمركبـــــات
تـــــرض
جثتــــه
|
|
وأخيـــل
ذيمـــول
بـــن
انطنـــر
|
ذا
البــــــاس
أورده
منيتــــــه
|
|
فـــي
الصــدغ
وارى
رمحــه
فمضــى
|
للعظـــــم
مخترقــــاً
تريكتــــه
|
|
قـــــض
الــــدماغ
فقضــــه
بطلاً
|
وارى
العزيمــــة
باســـلاً
نجـــدا
|
|
وهفودمـــاس
رمـــاه
مـــذ
وثبــا
|
عــــن
خيلـــه
متملصـــاً
هربـــا
|
|
فـــي
ظهـــره
فــأكب
يــزأر
مــث
|
ل
الثـــور
قيـــد
لفوســـذٍ
قــرب
|
|
ومزعـــزع
الأرضـــين
يجـــذل
فــي
|
هيليقـــــةٍ
لعجيجـــــه
طربــــا
|
|
وكــــذا
عـــج
هفودمـــاس
إلـــى
|
أن
فــــارقت
أنفاســـه
الجســـدا
|
|
مـــن
ثــم
آخيــل
انثنــى
وســعى
|
وفليـــذر
ابـــن
ملكهـــم
صــرعا
|
|
مـــن
ولـــد
فريـــامٍ
وأحـــدثهم
|
ســــنّاً
وأعــــداهم
إذا
طلعــــا
|
|
وأحبهــــم
طـــرّاً
إليـــه
لـــذا
|
منــع
الــوغى
عنــه
فمـا
امتنعـا
|
|
فجـــرى
بصـــدر
الجيــش
مفتخــرا
|
فـــي
عــدوه
حمقــاً
ومــا
رشــدا
|
|
آخيـــــل
وافـــــاه
بعـــــدوته
|
فــي
الظهــر
ينفــذ
حــد
صــعدته
|
|
حيـــث
النجـــاد
هنـــاك
يكنفــه
|
حلـــق
النضـــار
ووصـــل
لأمتـــه
|
|
نفــــذ
الســــنان
إزاء
ســــرته
|
فــــأكب
يشـــهق
فـــوق
كربتـــه
|
|
أمعــــاؤه
انــــدلعت
فأمســـكها
|
بــــــــأكفه
للأرض
مســـــــتندا
|
|
فــــرآه
هكطـــور
فهـــاج
أســـى
|
فــــورا
وعينيــــه
الظلام
كســـا
|
|
فـــانقض
مثـــل
النـــار
يــؤلمه
|
أن
ظـــل
مـــن
آخيـــل
محترســـا
|
|
بشـــحيذ
منصـــله
انــبرى
ومضــى
|
يجـــري
أخيـــل
وباللقــا
أنســا
|
|
قــال
اطمئنــي
نفــس
هــاك
بــدا
|
مـــن
قـــد
أذاب
حشاشــتي
كمــدا
|
|
ذا
قاتـــل
الخــل
الحــبيب
دنــا
|
فعســى
هنــا
فصــل
الخطــاب
لنـا
|
|
مــا
بعــد
هــذا
القـرب
مـن
فـرجٍ
|
بلياذنــــا
بــــالجيش
يفصـــلنا
|
|
مــن
ثــم
أحــدق
ثــم
صــاح
بــه
|
هــي
ادن
فــالموت
الــزؤام
هنــا
|
|
فأجـــابه
مـــن
غيــر
مــا
جــزعٍ
|
أفخلــت
تلقــى
هــا
هنــا
ولــدا
|
|
لـــن
تجزعنـــي
هـــاته
الكلـــم
|
لــن
يعجزنــي
شــتم
مــن
شــتموا
|
|
لـــن
أبخســـنك
طـــول
باعــك
لا
|
إذ
فقتنــــي
والبهــــم
كلهــــم
|
|
لكنمـــــا
الأربــــاب
عصــــمتنا
|
يؤتـــون
مـــن
شـــاؤوا
ولاءهـــم
|
|
ولعـــل
ذا
النصـــل
الشــحيذ
إذا
|
وافـــاك
فـــي
أحشـــائك
اطــردا
|
|
ورمــى
القنـاة
وفـي
الخفـا
وقفـت
|
فـــالآس
تنفـــخ
حينمـــا
حـــذفت
|
|
رجعـــت
لـــدى
قـــدميه
ســـاقطةً
|
وعــن
ابـن
فيلافـي
الهـوى
انحرقـت
|
|
فعـــدا
أخيـــلٌ
ثـــائراً
حنقـــاً
|
فـــي
هــدةٍ
بيــن
الســرى
قصــفت
|
|
لكـــــن
فيبوســـــاً
بقــــدورته
|
وولائه
هكطـــــــوراً
افتقــــــدا
|
|
بغمامـــــةٍ
دهمـــــاء
حجبـــــه
|
وأخيـــــل
منقضـــــاً
تعقبـــــه
|
|
فعـــدا
ثلاثـــاً
ضـــارباً
حنقـــاً
|
بطـــن
الغمـــام
يضـــيع
مضــربه
|
|
ثـــم
انـــبرى
كـــالرب
رابعـــةً
|
بهديـــــده
يـــــوري
تلهبـــــه
|
|
ذي
نجــــوةٌ
أخــــرى
وذاك
جـــدا
|
فيبـــــوس
ياكبــــاً
وأي
جــــدا
|
|
مــا
خضــت
نقــع
الحــرب
مزدلفـا
|
إلا
لجـــــأت
لعـــــونه
ســــلفا
|
|
فلئن
أنــل
نصــر
الأولــى
نصــروا
|
مـــا
عـــدت
إلا
منـــك
منتصـــفا
|
|
والآن
لـــي
بســـواك
عنـــك
غنــى
|
فــي
كــل
مــن
بلغــت
يـدي
وكفـي
|
|
وبجيـــــد
ذريـــــوفٍ
مثقفـــــه
|
وأرى
فــــأهوى
يكـــدم
الثـــأدا
|
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وســــــليل
فيليتــــــورٍ
البطلا
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ذيموخســــاً
وافــــى
وقـــد
قفلا
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فــــي
طعنـــةً
نفـــذت
بركبتـــه
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فرمتـــــه
ثــــم
بســــيفه
حملا
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وعليـــه
أجهـــز
ثــم
كــر
علــى
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ولــــدي
بيــــاسٍ
عمـــدة
النبلا
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ألقـــــرم
دردانــــوس
يصــــحبه
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لوغــــوس
مــــن
لوفــــوده
فئدا
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فكلاهمـــــا
كانـــــا
بمركبــــة
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وكلاهمـــــا
خـــــرا
بصلصـــــلة
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هــــذا
بــــراه
بالحســــام
وذا
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بمثقـــــفٍ
للمـــــوت
منصـــــلت
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وغـــــدا
فلا
فــــتى
ألســــطرأط
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بـــروسٌ
لـــديه
بقلـــب
معمعـــة
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فلركبـــــتي
آخيــــل
مرتميــــاً
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أحنـــى
ومنهـــد
القـــوى
ســجدا
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قــال
اعــف
وارفـق
بالصـبا
كرمـا
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مــذ
كنــت
تربــك
واحقنــن
دمــا
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واجهلــــه
قـــد
فـــاته
حمقـــاً
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أن
ابـــن
فيلا
قـــط
مـــا
رحمــا
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لنـــدائه
مـــا
رق
يســـمع
بـــل
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بحســــامه
ذاك
النــــدا
حســـما
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فـــي
طعنـــةٍ
فهقـــت
بســـيلٍ
دمٍ
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واســـتخرجت
مــن
جــوفه
الكبــدا
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مـــن
ثــم
مــن
مــوليس
اقتربــا
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وبصــــعدةٍ
ذاك
الفــــتى
ضـــربا
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خرقتــــه
مــــن
أذنٍ
إلــــى
أذنٍ
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فــــأكب
فــــوق
الأرض
منقلبــــا
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وتلاه
إيخكلــــــــوس
آغنـــــــرٍ
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بمهنــــدٍ
فــــي
رأســـه
نشـــبا
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والســـيف
حـــتى
كعـــب
مقبضـــه
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بـــدم
القتيـــل
بكفـــه
ومـــدا
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وبزنـــــد
ذوقليــــونٍ
البطــــل
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وأرى
الســـنان
بمجمـــع
العضـــل
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فأميـــــل
ســـــاعده
بثقلتــــه
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فثـــوى
يراقـــب
وافـــد
الأجـــل
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بحســـــامه
آخيـــــل
هـــــامته
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أنــــأى
بخـــوذته
ولـــم
يمـــل
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متنـــاثراً
طـــار
الــدماغ
ومــن
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ه
الجســـم
ظـــل
هنــاك
منجــردا
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وتلاه
رغمـــوس
بـــن
فيـــرس
مــن
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كـــانت
لــه
إثــراق
خيــر
وطــن
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فســــنانه
آخيـــل
أنفـــذ
فـــي
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رئتيـــه
لمـــا
بالســـنان
طعــن
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فارتـــــاع
آريثــــوس
ســــائقه
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فلـــوى
العنــان
وللفــرار
ركــن
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فــــي
ظهــــره
آخيـــل
بـــادره
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فــــأكب
والخيـــل
انثنـــت
زؤدا
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هــــذا
أخيـــل
وتلـــك
ســـطوته
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كـــالرب
صـــال
تـــروع
صـــولته
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حيـــث
انـــبرى
أجــرى
ســيول
دمٍ
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واجتـــــاحت
الأعــــداء
كرتــــه
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مثـــل
اللهيـــب
بقنـــةٍ
كســـيت
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أجمــــاً
بهــــا
تشـــتد
هبتـــه
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حيــث
الريـاح
جـرت
بـه
التهـم
ال
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أشـــجار
يحطـــم
كيفمـــا
وقــدا
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وكأنمــــا
فـــي
بيـــدرٍ
طرقـــا
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ثـــوران
فــوق
الســنبل
انطلقــا
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بســـط
الشـــعير
لــديهما
فغــدا
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بخطاهمـــــا
ينــــدق
منســــحقا
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داس
وعجّـــــا
تحــــت
نيرهمــــا
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ومــن
الســنابل
حبهمــا
انــدفقا
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وكـــذا
بمركبـــةٍ
أخيـــل
جـــرى
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فمضـــت
تــدوس
البهــم
والــزردا
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ومـــن
المحـــالات
النجيــع
غــدا
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ومـــن
الحـــوافر
طــائراً
أمــدا
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متفجـــــراً
ســـــيلاً
يخضــــب
ذا
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ك
الجــذع
تحــت
الخيــل
والعـددا
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وأخيــل
للشــرف
الرفيــع
وللعــز
|
ز
المنيـــع
بـــه
المــرام
حــدا
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وبراحتـــــه
وقـــــد
تخضــــبتا
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نقــع
العجــاج
علـى
الـدما
جمـدا
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