بـذاك
الغـراب
اسـتطار
الـوحى
|
وفطرقـــل
نحــو
أخيــل
عــدا
|
تســاقط
عينــاه
دمعـاً
سـخيناً
|
كأســـحم
مـــاءٍ
بصــخرٍ
جــرى
|
فهـــــزت
أخيــــل
لرؤتــــه
|
عواطـــف
رفـــقٍ
وفــرط
أســى
|
فمــــال
إليـــه
وقـــال
إذاً
|
أفطرقــل
قــل
لـي
علام
الشـجى
|
شـــهقت
كطـــفٍ
جـــرت
تســرع
|
ومـــن
دونهــا
أمهــا
تهــرع
|
فتعلــق
فــي
ذيــلٍ
أثوابهــا
|
ومقلتهــــا
صــــبباً
تهمـــع
|
وترســـل
طرفــاً
بليلاً
إليهــا
|
عســــاه
بــــذلتها
يشــــفع
|
وتجــــذبها
وهــــي
ضـــارعةٌ
|
لتحملهــــا
فتكـــف
البكـــا
|
أعنـــدك
مـــن
إفثيــا
خــبر
|
لـــه
قومنـــا
وأنــا
نــذعر
|
فــإن
منــتيوس
مــا
زال
حيّـاً
|
بـــذلك
قـــد
أنبـــا
الأثــر
|
وفيلا
كــــــذا
بمرامــــــده
|
عزيـــزٌ
وإمرتـــه
ائتمـــروا
|
همامــــان
لا
شـــك
موتهمـــا
|
بلاءٌ
علينـــــــــــا
وأي
بلا
|
أم
انتابــك
البـث
حزنـاً
علـى
|
لفيـــف
الأخــاءة
مــذ
فشــلا
|
تجــــاه
عمـــارتهم
جيشـــهم
|
جــــزاء
مظــــالمه
خــــذلا
|
فبـــح
بحقـــي
ضـــميرك
لــي
|
أحـــط
بالـــذي
رمتـــه
عجلا
|
فقــــال
وصــــعد
أنفاســــه
|
أجــل
يــا
أشـد
قـروم
الـورى
|
دع
الكيــد
فــالخطب
جـل
وقـد
|
تـــدفع
نقــع
جــراح
العمــد
|
ذيوميــــذ
أقعــــده
دمــــه
|
وأوذيـــس
رب
الطعـــان
قعــد
|
وأتريــــذ
ألمــــه
جرحــــه
|
كــذاك
أريفيــل
ألقـى
العـدد
|
أحــــاطت
بهـــم
بســـفائنهم
|
لضــمد
الجــراح
خيــار
الإسـى
|
وأنـت
علـى
الكيـد
صلد
الفؤاد
|
فلا
كـان
لـي
قـط
هـذا
العنـاد
|
أيـا
فاسـد
البـاس
قـل
لي
لمن
|
تعــد
اشـتداد
البـؤس
الشـداد
|
إذا
لـم
تـزح
عـن
لفيـف
الأخاء
|
عميــم
البلاء
بيــوم
الطــراد
|
فلالا
فمـــا
أنـــت
مــن
بشــرٍ
|
ولســت
ابــن
فيلا
الفـوارس
لا
|
وثيتــس
ليســت
بأمــك
أصــلا
|
بـل
اخـترت
في
لجة
البحر
أصلا
|
ومــن
كبـد
الخـر
كنـت
وليـداً
|
لأن
فــــؤادك
كالصــــخر
فعلا
|
فإمــا
خشـيت
المقـادير
فيمـا
|
روت
لــك
أمــك
عـن
زفـس
نقلا
|
فــبي
فــابعثن
وفــي
إمرتــي
|
لفيــف
المرامــد
أسـد
الشـرى
|
عســــى
بســــلاحك
إن
أقبـــل
|
يخـــالوك
وافيتهـــم
تصــطلي
|
فينجـــو
الإخـــاء
وطـــروادةٌ
|
تفــــر
وكربتنــــا
تنجلـــي
|
ونكتســـح
القـــوم
نكســـأهم
|
لإليــــون
بـــالبيض
والأســـل
|
فإنــا
وليــس
بنـا
مـن
عيـاءٍ
|
نبــدد
جيشــاً
رمــاه
العيــا
|
لتلــك
أمـانيه
عـن
دفـع
نفـس
|
إلـى
الحتـف
ساقته
في
يوم
بؤس
|
فــــإن
أخيـــل
وقـــل
لـــه
|
أفطــر
قـل
حدسـك
ليـس
يحدسـي
|
فلســت
لأخشـى
المقـادير
فيمـا
|
روت
لــي
أمــي
عـن
حكـم
زفـس
|
ولكـــن
بـــي
غصـــةً
حرقـــت
|
فــؤادي
الكليــم
بحـر
اللظـى
|
ومــا
زلـت
ألهـب
منـذ
انتصـب
|
زعيــم
السـرى
وفتـاتي
اغتصـب
|
ومــا
هــو
إلا
قرينــي
مقامـاً
|
ومـــا
هــي
الأجــزاء
النصــب
|
حبــاءٌ
حبــاني
الأراغــس
لمـا
|
فتحـــت
البلاد
ونـــالوا
الأرب
|
وأتريـــذ
معتســـفاً
رامهـــا
|
كــأني
دخيــلٌ
بــذاك
الحمــا
|
ولكـــن
لنغــض
عــن
الغــابر
|
ونلـــه
بموقفنـــا
الحاضـــر
|
فــإني
وإن
كنــت
آليــت
قبلاً
|
بـــأن
لا
أليــن
إلــى
الآخــر
|
إلــى
أن
تحيــط
بفلـك
العـدى
|
وتبــدو
لــدي
ظبــا
البــاتر
|
فمـا
كـان
للمـرء
مهمـا
التظى
|
بـأن
يكمـن
الغيـظ
طـول
المدى
|
فقــم
بســلاحي
وسـر
بالمرامـد
|
فقـد
أدرك
الفلـك
جيش
الطرواد
|
وبــالثغر
قــد
حصـروا
قومنـا
|
فضــاق
عليهـم
مجـال
المجاهـد
|
وإليـــون
خلفهـــم
انـــدفعت
|
كـأن
لهـا
النصر
ألقى
المقالد
|
ومــــا
لقيــــت
بطلائعهــــم
|
تريكــة
آخيــل
تلقــي
السـنا
|
فلــو
أن
أتريــذ
لــم
يعتسـف
|
لمــا
خلـت
جيـش
العـداة
يقـف
|
وولـــوا
وصـــرعى
كتـــائبهم
|
ببطــــن
حفائرنـــا
ترتجـــف
|
وهـــاهم
أحـــاطوا
بـــدرعنا
|
وعنهــم
ذيوميــذ
عنفــاً
صـرف
|
وليــــس
براحتــــه
عامــــلٌ
|
يهيــج
احتــداماً
لــدفع
الأذى
|
وليــس
لأتريــذ
مـن
قبـح
نطـق
|
بــه
نفثــات
الخبــائث
يلقـي
|
ولكـــن
لهكطـــور
صـــوتٍ
دوى
|
يشــق
الفضــاء
بغــربٍ
وشــرق
|
وقــد
فــاز
بالنصـر
أعـداؤنا
|
وضــجوا
وعجـوا
ونـادوا
بسـبق
|
فكــر
وق
الفلــك
مــن
نـارهم
|
لنبلغنـــا
الــوطن
المــترجي
|
لأمــري
ائتمــر
ومرامــي
أجـر
|
فتحــرز
لــي
كــل
مجـدٍ
وفخـر
|
وتحمــل
لــي
بــالجلال
فتـاتي
|
علـــى
تحـــفٍ
ونفـــائس
غــرِّ
|
عــن
الفلــك
صـد
العـدو
وعـد
|
ولــو
زفــس
أولاك
أعظــم
نصـر
|
ولا
تنــدفع
فـي
العـدى
مفـردا
|
فتبخــس
قــدري
بيــن
الــورى
|
ولا
يـــدفعنك
طيـــش
القتــال
|
لإليــون
بـالجيش
تحـت
النبـال
|
فــــرب
إلاهٍ
ولـــي
العـــداة
|
كفيبــوس
أخلــى
الألمـب
وصـال
|
إذاً
حالمـــا
الأمـــن
تضــمنه
|
لأســـطولنا
وتصـــد
الرجـــال
|
فعـــد
ودع
الحـــرب
يضــرمها
|
ســـواك
وبـــادر
إلــي
هنــا
|
أيـا
زفـس
رب
العلـى
يا
أثينا
|
وفيبوســاً
الســادة
الأعظمينـا
|
أبيــدوا
الطـرواد
فـوق
الأخـا
|
ءة
يفنــو
برمتهــم
صــاغرينا
|
ولا
يبــق
حيّــاً
سـوانا
بـإليو
|
ن
نخلــوود
كأنــدك
الحصــونا
|
فـــذاك
حــديثهما
هــا
هنــا
|
وثمـــة
عــزم
أيــاس
ارتخــى
|
تــوالت
عليــه
طعــان
العـدى
|
وزفـــس
قـــوى
بأســه
بــددا
|
وفــــوق
تريكتـــه
انهملـــت
|
نبـــالهم
شاســـعات
الصـــدى
|
ويســـراه
بـــالجوب
قائمـــةٌ
|
يكــاد
مــن
العـي
يلـوي
يـدا
|
ومــا
كـل
جيـش
العـدى
بقنـاه
|
بـــدافعه
عنهـــم
القهقـــري
|
وفــــوق
جــــوارحه
العـــرق
|
مــن
الجهــد
كالســيل
ينـدفق
|
فشـــــق
تــــردد
أنفاســــه
|
عليـــه
وقـــد
كــاد
يختنــق
|
وســـيم
علـــى
أزمــةٍ
أزمــةً
|
وزاد
علـــى
القلـــق
القلــق
|
ألا
ليـــت
شــعري
كيــف
الأوار
|
علا
الفلــك
فلـن
قيـان
العلـى
|
لآيـــاس
هكطــور
جريــاً
جــرى
|
وعــــامله
بالحســـام
بـــرى
|
فـــأهوى
الســـنان
بثعلبـــه
|
يصـــل
صــليلاً
لــوجه
الــثرى
|
فبـــات
أيــاس
بعــودٍ
ضــئيلٍ
|
وفــي
ســخط
آل
العلــى
شـعرا
|
وقــد
خــال
زفــس
بـرى
دونـه
|
عمــاد
القتــال
لنصـر
العـدى
|
لـذاك
التـوى
عـن
مرامي
الظبا
|
وبالفلـك
أورى
العـدى
اللهبـا
|
بكــل
الغــراب
الســعير
فشـا
|
وفـــي
ســـطح
وجهتــه
نشــبا
|
فصـــاح
أخيـــل
لــذا
لاطمــاً
|
بكفيــــه
فخـــذيه
مضـــطربا
|
بــدار
أفطرقـل
يـا
فـرع
زفـسٍ
|
بــدار
أيــا
فارسـاً
قـد
سـما
|
أرى
الفلــك
بالنــار
تلتهــب
|
وأعـــداؤنا
جملـــةً
وثبـــوا
|
فــوا
لهفــي
هــل
ينالونهــا
|
ويمنــع
فــي
وجهنــا
الهــرب
|
فقـــم
بســـلاحي
إذاً
ريثمـــا
|
أعـــبي
كتائبنـــا
واذهبــوا
|
فقطــر
قــل
شــك
بزاهـي
سـلاح
|
بـــبراق
فـــولاذه
قــد
أضــا
|
فـــأوثق
خفيـــن
بالقـــدمين
|
بســاقيه
شـدت
عـرى
مـن
لجيـن
|
وألقـــى
علـــى
صــدره
لأمــةً
|
لآخيـــل
رواعـــة
الفيلقيـــن
|
وجنتـــه
تلــك
ذات
الوابــال
|
تناولهــا
ثــم
فيهــا
اكتمـى
|
وتلـــك
التركيــة
والعــذبات
|
تطيـــر
بقونســـها
ســـابحات
|
رماهـــا
علــى
ثبــت
هــامته
|
تـــذل
لرؤيتهـــا
العزمـــات
|
وقـــام
علـــى
ثبــت
هــامته
|
بـــذل
لرؤيتهـــا
العزمـــات
|
وقـــام
يهــز
قنيّــاً
ثقــالاً
|
تخـــفُّ
عليــه
لــدى
الأزمــات
|
كــذا
غيــر
صـلد
قنـاة
أخيـل
|
جميـــع
ســـلاح
أخيـــل
حــوى
|
فمـا
كـان
فـي
القوم
غير
أخيل
|
فـتىً
ذلـك
الرمـح
منهـم
يجيـل
|
وعــــامله
زانــــةٌ
قطعــــت
|
بقنــة
فليــون
عــوداً
ثقيــل
|
وخيـــرون
أهــدى
لفيلا
ســلاحاً
|
علــى
رقبــات
العــداة
وبيـل
|
ومـــذ
شــك
فطرفــل
أفطمــذاً
|
لشــد
الجيــاد
ســريعاً
دعــا
|
فـتىً
كـان
يـوم
انتيـاب
الشدد
|
وليّـــاً
وفيّـــاً
لـــه
وســند
|
ومــا
كــان
يرعـى
فـتىً
مثلـه
|
مـن
الصـيد
بعـد
ابـن
فيلا
أحد
|
فهـــــب
لزنثــــس
يقرنــــه
|
ببــــاليس
ببهــــي
العـــدد
|
جــــوادان
عنقـــاء
أمهمـــا
|
وقـد
عليقـت
مـن
نسـيم
الهـوا
|
نعـم
تلـك
فوذرغـةٌ
وهـي
تسـعى
|
علــى
ضــفة
الأقيــانس
ترعــى
|
كــذا
حملــت
والجـوادان
شـبا
|
كعاصــفة
الريـح
جريـاً
وطبعـا
|
وللنيـــر
شــد
فــداس
الــذي
|
أخيــل
بــإيتينٍ
نــال
ســفعا
|
جــوادٌ
وإن
كــان
رهـن
الـردى
|
فجــري
جيــاد
الخلــود
جــرى
|
وبــالخيم
طــار
أخيــل
وصـاح
|
يعــــبي
مرامـــده
للكفـــاح
|
فهبــوا
كسـرب
الـذئاب
الكـوا
|
سـر
يـدفعه
البـأس
دفع
الرياح
|
تمـــزق
فـــوق
الـــذرى
إيلا
|
وأفواههــا
داميــات
الصــفاح
|
وتنضــم
جيشــاً
جــرى
والغــاً
|
بســـلط
اللســـان
بمــاءٍ
حلا
|
فتنبـذ
فـي
المـاء
تلـك
الدما
|
وتـــروي
ولا
ترتخـــي
هممـــا
|
وكــذا
حــول
فطرقــل
كبـارهم
|
لفيفهـــــم
دار
وانتظمـــــا
|
وبينهـــم
خـــل
زفــس
أخيــل
|
يحــضُّ
الكمــاة
حمــاة
الحمـا
|
بخمســـين
فلكــاً
أتــى
بهــم
|
بخمســـين
كـــل
غــرابٍ
أتــى
|
بخمســـة
صـــيدٍ
بهــم
وثقــا
|
بــــإمرته
كفـــل
الفيلقـــا
|
فــــأولى
جرائدهـــم
نظمـــت
|
بـــإمرة
مينســـتيوس
اللقــا
|
هـو
ابـن
لجـدول
إسفر
خيوس
ال
|
ذي
كــان
مــن
زفــسٍ
انبثقــا
|
ولكنمـــا
أمــه
فولــدورا
ال
|
جميلـــة
وابنــة
فيلا
النهــى
|
ومــن
بعــد
ذاك
الإلاه
بغاهــا
|
بــروس
بــن
فيريــرسٍ
وحباهـا
|
فكـــانت
لـــه
علنــاً
زوجــة
|
وشـــاع
بــأن
فتــاه
فتاهــا
|
وثانيـــة
الفـــرق
انتظمـــت
|
لأفــدور
مـن
جـل
بأسـاً
وجاهـا
|
هـو
ابـن
فليميلـة
ابنـة
فيلا
|
س
مــن
ولــدته
بشــرخ
الصـبا
|
بديعــة
حســنٍ
بمغنــى
الطـرب
|
بهــا
هرمــسٌ
بـالغرام
التهـب
|
رآهــا
تغنــي
وترقـص
بيـن
ال
|
عــذارى
لـدى
ذات
قـوس
الـذهب
|
فقاتـــل
أرغــوص
هــام
بهــا
|
وفـي
ذروة
القصـر
فيهـا
احتجب
|
وأولــــدها
ولـــداً
نابغـــاً
|
إذا
مــا
عــدا
وإذا
مـا
رمـى
|
ولمــا
تبــدى
لشــمس
النهـار
|
وثــــم
إليثيـــةٌ
بانتظـــار
|
إخكليـــس
أكطـــور
أنزلهـــا
|
بمنزلــــه
بأجــــل
شــــعار
|
وفـــي
حجــر
فيلاس
ظــل
الغلام
|
يشــب
ربيبــاً
عزيــز
المنـار
|
وثالثـــة
الفـــرق
اجتمعـــت
|
لفيســندر
بــن
ممــال
الفـتى
|
فــتىً
لــم
يفقـه
بهـز
القنـا
|
بهــم
غيــر
فطرقــل
إن
طعنـا
|
وفينكــــس
رابـــع
قـــوادهم
|
هـو
الفـارس
الشـيخ
إلف
العنا
|
وخامســهم
القميـذ
بـن
الرفـي
|
س
مــن
عاديـات
الـوغى
امحنـا
|
كـــــذلك
آخيــــل
كتبهــــم
|
وصــــاح
يثبتهــــم
للـــوغى
|
مرامــدة
ادكــروا
كــم
علــى
|
عـــداكم
صــديد
الوعيــد
علا
|
فكلكــــم
عــــاذلي
كلمــــا
|
حنقــــت
وكــــلٌّ
قلـــى
وتلا
|
أيـا
ظالمـاً
يـا
ابـن
فيلا
فأم
|
ك
قــــد
أرضـــت
مـــرةً
وقلا
|
تصــلبت
لبّــاً
وقســراً
حجــرت
|
رفاقــك
عــن
أشــرف
الملتقـى
|
هلـــم
بنـــا
للـــديار
وإلا
|
فمــاذا
التحامــل
حقـداً
وغلا
|
لتلــــك
أقـــاويلكم
جملـــةً
|
فــدونكم
جــذوة
الحـرب
تصـلى
|
وتلــــك
أمـــانيكم
فليكـــر
|
إليهـا
الـذي
كـان
للكـر
أهلا
|
فهبــــوا
ولبـــوا
مليكهـــم
|
كتـــائب
رصــت
كــرص
البنــا
|
كصـــخرٍ
بصـــخرٍ
قــد
اتصــلا
|
بحـــائط
دارٍ
ســـمت
للعلـــى
|
وأحكــــم
بناؤهـــا
رصـــفها
|
فليســـت
تبـــالي
بنــوءٍ
ولا
|
كـــــذاك
تــــألب
جيشــــهم
|
قـــود
لاصـــق
البطــل
البطلا
|
وبــالخوذة
الخــوذة
اشــتبكت
|
وفــوق
المجــن
المجـن
انحنـى
|
بهبتهـــم
عـــذبات
القــوانس
|
تلاقــت
تمــوج
بهـام
القـوامس
|
وفطرقــــل
شــــك
وأفطمــــذٌ
|
وقــد
بـرز
الإلتقـاء
الـدراهس
|
همامــــان
همهمــــا
واحـــدٌ
|
نكــال
العـدو
بصـدر
الفـوارس
|
وأمــا
أخيـل
فلمـا
اسـتتم
اِن
|
تظـــامهم
للخيـــام
انثنـــى
|
هنــــاك
غطــــاء
خزانتــــه
|
أمـــــاط
يــــؤج
ببهجتــــه
|
فتلــك
الخزانــة
قـد
أتخفتـه
|
بهـــا
أمـــه
يـــوم
غزوتــه
|
وقــــد
شــــحنتها
بأرديـــةٍ
|
تصــــد
الهــــواء
بهبتــــه
|
وأكســــيةٍ
وطنــــافس
غــــرٍّ
|
تشـــوق
برؤيتهـــا
مـــن
رأى
|
فــأخرج
كوبــاً
بــديعاً
سـناه
|
بــه
ليــس
يشـرب
خمـراً
سـواه
|
لزفـس
بـه
الـراح
ترفـع
صـرفاً
|
وتهـــرق
مـــن
دون
كـــل
إلاه
|
بنــــار
الكبـــاريت
طهـــره
|
وغمســــه
بنقــــي
الميـــاه
|
ومـن
بعـد
غسـل
يـديه
به
الخم
|
ر
ســوداء
صــب
بكــل
اعتنــا
|
وبيــن
الســرى
قــام
يرفعــه
|
ويعلــــو
لزفــــس
تضــــرعه
|
يشــير
بعينيــه
نحـو
السـماء
|
وزفــــس
يــــراه
ويســــمعه
|
أيـا
زفـس
رب
الددون
ومولى
ال
|
فلاســـج
مـــن
بـــان
مربعــه
|
وياملكـــاً
بددونــة
حيــث
از
|
مهــر
علـى
القـوم
قـر
الشـتا
|
وحيــث
ســرى
الســلة
الســهد
|
رواتــك
مــن
حولــك
احتشـدوا
|
فلـــم
يغســلوا
لهــم
قــدماً
|
وغيــر
الـثرى
مـا
لهـم
مرقـد
|
دعوتـــــك
قبلاً
فـــــأعززتني
|
بـــذل
الأخــاء
وقــد
جهــدوا
|
ألا
فاســــتجبني
أيضــــاً
ولا
|
تخيبننــي
يــا
ســميع
الـدعا
|
فهـا
أنـا
مـا
بيـن
فلكي
مقيم
|
فيزمــع
فطرقــل
خلـي
الحميـم
|
يقــــود
مرامـــدتي
للـــوغى
|
فخــوله
نصــراً
أزفـس
العظيـم
|
وصــلبه
لبّــاً
فيعلــم
هكطــو
|
ر
هـل
هـو
كفـؤٌ
لرغـم
الغريـم
|
وهـــل
لا
يكـــر
ويبطـــش
إلا
|
إذا
مــا
وراء
أخيــل
انــبرى
|
وشــدده
حــتى
إذا
مـا
انتصـر
|
وعـن
موقـف
الفلـك
زال
الخطـر
|
يـــأوب
إلـــي
هنــا
ســالماً
|
بعســــكره
وســــلاحي
الأغـــر
|
لزفـــس
دعـــاء
أخيــل
رقــى
|
وزفـــس
وعــى
جــابراً
وكســر
|
فخــول
فطرقــل
صــون
الخلايـا
|
وأمـــــا
ســــلامته
فــــأبى
|
وأمـــا
أخيـــل
فمـــذ
أكملا
|
فــــــروض
عبــــــادته
قفلا
|
بموضـــعه
الكـــوب
أودع
ثــم
|
إلـــى
بـــاب
خيمتـــه
أقبلا
|
وظــــل
هنالــــك
مرتقبــــاً
|
منازلــــة
الجحفـــل
الجحفلا
|
وقطرقـــل
والجيـــش
منتظـــمٌ
|
بــــإمرته
للكفــــاح
مشـــى
|
كــأنهم
الــدبر
ثــار
يمــور
|
وخشـــرمه
بســـبيل
العبـــور
|
وثمـــــة
ولــــدٌ
تحثحثــــه
|
فيبعـــث
منتشـــراً
بالشــرور
|
يمـــر
علـــى
جهلـــه
عــابرٌ
|
فيــــدفعه
فعليــــه
يثـــور
|
يــذب
عــن
الــبيض
مستبســلاً
|
حديــد
الحمــات
شـديد
القـوى
|
ســـرى
المرمـــدون
بشـــدتهم
|
كــذا
انبعثــوا
مـن
عمـارتهم
|
وفطرقــل
يصــرخ
مــذ
أقبلـوا
|
يعــــج
الفضــــاء
بضـــجتهم
|
مراميــد
ليــس
لقــوم
أخيــل
|
بــأن
ينثنــوا
عــن
عزيمتهـم
|
علينـــا
ونحــن
ســراه
بــأن
|
نجـــل
أجـــل
فــتىً
بالســرى
|
ليعلــم
أتريــذ
مــا
اجترحـا
|
بحـــط
أشـــد
قــروم
الــوحى
|
فهــــاجت
لــــذاك
حميتهـــم
|
وكلهـــــم
للقــــا
طمحــــا
|
وكـــروا
وصـــاحوا
وصــيحتهم
|
صــــداح
بفلكهــــم
صــــدحا
|
وفطرقــــل
يزهـــو
وأفطمـــذٌ
|
بصــــدرهم
ببهــــي
الحلـــى
|
فخـــار
الطــراودُ
وارتعبــوا
|
لمنظـــر
فطرقـــل
واضــطربوا
|
وخــالوا
أخيــل
ارعـوى
مقبلاً
|
عليهــم
وقــد
فــاته
الغضــب
|
فكلهـــم
التـــاع
مستشـــرفاً
|
يــرى
كيــف
ينجـو
بـه
الهـرب
|
ومعظهـــم
عـــج
حيــث
غــراب
|
فروطســــلاس
الأبــــي
رســــا
|
هنالـــك
فطرقــل
حــث
خطــاه
|
وأرســل
يقــذف
صــلد
القنـاه
|
فـأدرك
بـالكتف
فيرخم
مولى
ال
|
فيونــة
صـيد
الجيـاد
العتـاه
|
بهـم
مـن
أميـدون
مـن
جد
أكسي
|
يـــس
خـــف
معتصــماً
بقــواه
|
فخــــر
وخــــارت
كتــــائبه
|
وولــوا
شــتاتاً
بعــرض
الفلا
|
مقابســهم
غــادروا
بالتهــاب
|
وقــد
لهمـت
نصـف
ذاك
الغـراب
|
ففطرقـــل
أخمـــدما
والعــدى
|
تبــــدد
شـــملهم
باصـــطخاب
|
وهــب
الأخــاء
بتلــك
الخلايـا
|
وهــــدة
نعرتهـــم
للســـحاب
|
عــن
الفلــك
شـت
العـدو
وقـد
|
بــدا
فــرجٌ
بعـد
طـول
العنـا
|
كــأن
مــثير
الصــواعق
بــدد
|
سـحاباً
بـه
شـامخ
الطـود
يربد
|
فتبـدو
الضـواحي
وشـم
الرواسي
|
وبطــن
الوهــاد
ونــجٌ
وفدفـد
|
وينفتــح
الجـو
والنـور
يلقـي
|
بلــب
الرقيــع
شــعاعاً
توقـد
|
ولكنمــا
الحــرب
مــا
بلغــت
|
بشـــدتها
غيـــاة
المنتهـــى
|
فطــروادةً
ســاق
حكـم
اضـطرار
|
فغـادرت
الفلـك
تبغـي
الفـرار
|
وظلـــت
تــذود
وفــي
إثرهــا
|
علــى
كــل
قــرمٍ
عميـدٌ
أغـار
|
وفطرقـل
فـي
صـدر
جنـد
الأخـاء
|
علــى
عرليــق
الســنان
أطـار
|
فأنفـــذ
فـــي
حقــه
والجــاً
|
إلـى
العظـم
فـانقض
فوق
الثرى
|
ور
ثــــواس
برمــــح
منيـــل
|
وعـن
صـدره
الجـوب
كـان
أميـل
|
وأمفقـــل
رام
مجيـــس
ولكــن
|
مجيـــس
تلقــى
برمــحٍ
صــقيل
|
فبتـــــت
قلـــــب
شــــظيته
|
فخــر
غضــيض
الجفــون
قتيــل
|
وأنطيلــخٌ
شــق
خصــر
أتمنــي
|
يســاً
فلــدى
قــدميه
التــوى
|
فحـــرق
مــاريس
مــوت
أخيــه
|
فخـــــف
لجثتــــه
ليقيــــه
|
وقــد
كــاد
يطعــن
أنطيلخــاً
|
ولكــن
بــدا
ترســميذ
يليــه
|
فبــــادر
عــــانقه
بســـنانٍ
|
فـرى
اللحـم
والعظـم
ينفذ
فيه
|
فخـــــر
وصـــــل
بشـــــكته
|
وعينيـــه
غشـــى
ظلام
الــردى
|
كلا
الأخـــوين
رمـــى
الأخــوان
|
فمـن
ولـد
نسطور
ذي
الفضل
ذان
|
وذانــــك
فرعـــاً
أميســـودر
|
ســليل
خميــرة
هــول
الزمـان
|
حليفـــــاً
وداد
لســـــرفيذنٍ
|
وشــهمان
قرمـان
يـوم
الطعـان
|
همــا
لأريبــا
كــذا
انحــدرا
|
وقــد
غـادرا
قـرع
صـم
القنـا
|
كــذاك
أيــاس
بـن
ويلـوس
كـر
|
إذا
إقليوبـــول
حيّـــاً
ظهــر
|
تربــك
يبغــي
الفـرار
فـوافي
|
أيـــاس
بماضــي
غــرارٍ
أغــر
|
فــواراه
فــي
جيــده
ففــراه
|
وأخــرج
يلهــب
والقــرم
خــر
|
وليقـــــون
رام
فنيلا
وكــــلٌّ
|
رمـــى
وكلا
العـــاملين
نبــا
|
فكـــــرا
وكــــلٌّ
براحتــــه
|
حســـــامٌ
فخــــفَّ
بضــــربته
|
فعامـــل
ذاك
أصـــاب
الــتري
|
كــة
فــانقض
مـن
كعـب
قبضـته
|
ولكـن
فنيلا
فـرى
الجيـد
والرأ
|
س
علــــق
يهــــوي
بجلـــدته
|
فغــــادره
نــــور
مقلتــــه
|
وفــوق
الحضــيض
صــريعاً
هـوى
|
ومريـون
مـذ
أقبـل
السهل
ينهب
|
أكامــاس
أدرك
إذ
هــم
يركــب
|
فــــألقى
بعــــاتقه
طعنـــةً
|
فجنـدل
عـن
طرفـه
النـور
يحجب
|
وإيــــذومنٌ
إرمـــاس
أصـــاب
|
بفيــه
وفيــه
الســرية
غيــب
|
فشــققت
العظــم
تحـت
الـدماغ
|
وأســنانه
قلقــت
فــي
اللـثى
|
فمــن
منخريــه
النجيـع
تفجـر
|
ومـن
فيـه
والطـرف
بالدم
محمر
|
ومـن
فـوقه
المـوت
ألقى
سحاباً
|
كثيفــاً
بســترته
قــد
تســتر
|
وجيــش
الطــرواد
ولـى
شـتاتاً
|
وقـد
فـاته
البأس
والذب
والكر
|
وإثرهــم
انقــض
جنــد
الأخـاء
|
وكـــل
زعيـــمٍ
زعيمــاً
فــرى
|
كســـرب
ذئابٍ
بشـــم
الجبــال
|
قـد
انقـض
يبغـي
قطيـع
السخال
|
وقــد
فرقتــه
الرعــاة
بجهـلٍ
|
فيـــدهمه
بفســـيح
المجـــال
|
ويبطـــــش
فيــــه
يمزقــــه
|
وليـــس
لــه
مهجــةٌ
للنضــال
|
فــذا
شــأنهم
وأيــاس
حشــاه
|
لإدراك
هكطـــور
فيــه
التظــى
|
ولكــن
هكطــور
وهــو
الهمـام
|
وقــد
حنكتــه
ضــروب
الصـدام
|
أصـــــاخ
بســــترة
جنتــــه
|
لقــرع
القنـا
وهزيـر
السـهام
|
وقــد
شــهد
النصــر
رجحــانه
|
لقــوم
العــداة
فهــام
وحـام
|
تثبـــت
يفكـــر
فـــي
صــحبه
|
يـــروم
لهــم
نجــوةً
ترتجــى
|
فمـن
موقـف
الفلـك
بالعنف
ثار
|
هديــد
الـوغى
وصـديد
الفـرار
|
كمـا
اندفع
الغيم
بالجو
في
يو
|
م
صــحوٍ
بـه
زفـس
نـوءاً
أطـار
|
وفيلـق
إليـون
قـد
فـر
حتى
ال
|
حفيـــر
بغيــر
هــدىً
وقــرار
|
بهكطــــورهم
جمحـــت
جـــرده
|
فــألقته
عنهــم
بعيـد
المـدى
|
وبينهـــم
بــات
ذاك
الحفيــر
|
لهــم
حــاجزاً
حــثيث
المسـير
|
فكــم
مــن
عجــالٍ
بــه
سـحقت
|
وقــد
غادرتهـا
الجيـاد
تطيـر
|
وفطرقــــل
ينخـــي
كتـــائبه
|
لســحق
جيــوش
العــدى
ويغيـر
|
فولـــوا
بعـــرض
الفلا
شــرداً
|
وقــد
ولولــوا
والفـؤادُ
وهـى
|
فعــــج
عجــــاجهم
للســـحاب
|
وفطرقــل
يطلــب
لــب
العبـاب
|
فكـم
فـارسٍ
بـات
تحـت
العجـال
|
وقــد
خـر
يخفـق
فـوق
الـتراب
|
وكــم
فــرسٍ
غــادر
المركبـات
|
تخــــب
ووجهـــة
إليـــون
آب
|
ولــم
تكـن
جـرد
أخيـل
لتعبـا
|
بـذاك
الحفيـر
العميـق
الهـوى
|
تعـــددته
كـــالبرق
رامحـــةٌ
|
مــن
الجــرف
للجــرف
ســابحةً
|
سـلاهب
خلـدٍ
بنـو
الخلـد
كـانت
|
لفيلا
الفـــــوارس
مانحـــــةً
|
ومهجـــة
فطرقــل
مــا
لبثــت
|
لإدراك
هكطــــــور
طامحـــــةً
|
ولكــن
هكطــور
والخيــل
شـطت
|
بــه
جامحــات
الصــدور
نــأى
|
وخيلهــــم
وهــــي
منطقــــه
|
تغيــــر
وتصــــهل
منـــدفقه
|
كــأن
الغيــوم
بيــوم
خريــفٍ
|
بنـــوءٍ
علـــى
الأرض
منطبقــه
|
فيهمـر
زفـس
السـيول
انتقامـاً
|
مــن
الخلـق
إذ
تنبـذ
الشـفقه
|
وتقضـــي
القضـــاة
بمجلســها
|
ولا
قســط
فــي
حكمهـا
والقضـا
|
وقــد
فاتهــا
حمقـاً
أن
تهـاب
|
بنـي
الخلـد
إن
نهضـت
للعقـاب
|
فتطغى
مجاري
المياه
وتطمو
الس
|
ســيول
وتنقــض
فــوق
الهضـاب
|
تغــادر
شــم
الجبــال
زعابـاً
|
إلـى
البحـر
يعلـو
لظهـر
زعاب
|
تعيــث
وتفســد
فـي
الأرض
حـتى
|
عنــا
النـاس
يصـبح
طـرّاً
هبـا
|
وفطرقــل
بيــن
الصــدو
صــدر
|
وسـاق
إلـى
الفلـك
تلـك
الزمر
|
علـــى
رغمهـــم
دون
عــودتهم
|
لإليــون
حــال
وأجــرى
العـبر
|
وجنــدهم
بيــن
مرسـى
الخلايـا
|
وســــيموسٍ
والحصـــار
حصـــر
|
وصـــــــال
وأو
صـــــــولته
|
علــى
أفرنــوس
الهمــام
سـطا
|
بـــدا
صـــدره
تحـــت
جنتــه
|
وفطرقــــل
خــــف
بطعنتــــه
|
فجنــــدله
لا
حــــراك
بــــه
|
وأهـــــوى
يصــــل
بشــــكته
|
وثنــى
بثســطور
إينفــس
لمـا
|
تلملـــم
مـــن
فـــوق
ســدته
|
تضــعض
خوفــاً
فـأرخى
العنـان
|
وقطرقــل
فــي
إثـره
قـد
مضـى
|
بصــفحة
وجنتــه
الرمـح
ألقـى
|
فغــاص
وشــق
النواجــذ
شــقا
|
ومــن
ثمــة
اجــتره
بالسـنان
|
عـن
العـرش
بالرمـح
يلصق
لصقا
|
كمـا
اصـطاد
بالشص
من
فوق
صخرٍ
|
فـتىً
سـمك
البحـر
والشـص
دقـا
|
فألقــاه
والرمــح
يفغـر
فـاه
|
علــى
وجهــه
ثـم
عنـه
اغتـدى
|
فإريــال
ألفــى
إليـه
ابتـدر
|
فبــــادره
قــــاذفً
بحجــــر
|
فحـــــل
ببطــــن
تريكتــــه
|
وهـــامته
شـــق
ثــم
انحــدر
|
فخــر
صــريعاً
ومــن
حـوله
ال
|
حمــام
مبيــد
الحيـاة
انتشـر
|
ومـــن
ثـــم
أتبعــه
بقــرومٍ
|
علــى
بعضـهم
بعضـهم
قـد
ثـوى
|
فمنهـــم
إريمــاس
أمفــوطروس
|
وإيفلـــط
إيفيـــسٌ
إيخيـــوس
|
وإطلــــوفليم
فريـــس
كـــذا
|
فليميـــل
أرغيـــسٍ
إيبفـــوس
|
فلمـــا
رأى
صـــبحه
ســرفذون
|
بهــم
لعبــت
عاديـات
البـؤوس
|
تحـــدم
يصـــرخ
فـــي
قــومه
|
فواعــاركم
يــا
بنــي
ليقيـا
|
قفــوا
لا
تفــروا
علام
الوجــل
|
فـــإني
أطلــب
هــذا
البطــل
|
لأعلـم
مـن
ذا
الـذي
عـاث
فينا
|
ومنــا
العديــد
الـوفير
قتـل
|
ترجــل
يعــدو
وفطرقــل
لمــا
|
رآه
ترجـــــل
ثــــم
حمــــل
|
كأنهمـــا
عنـــدما
اصـــطدما
|
عقابــان
مــن
فـوق
صـخرٍ
نتـا
|
يهبـــــان
هبـــــة
مظفــــر
|
بعقـــف
المخـــالب
والمنســر
|
يصــــران
صرصــــرةً
ويشـــبا
|
ن
مــن
فــوق
ذيالــك
الحجــر
|
وزفــــس
بعزلتــــه
راقــــبٌ
|
فهــاج
بــه
الرفــق
بالبشــر
|
فقــــال
لهيــــرا
شـــقيقته
|
وزوجتــــه
آه
حـــل
القضـــا
|
أرى
ســـرفذون
أحــب
العبــاد
|
إلـــي
بعامــل
فطرقــل
بــاد
|
ينــازع
قلــبي
أمــران
إمــا
|
مـــواراته
عــن
مجــال
الجلاد
|
وإلقـــاؤه
وهــو
حــيٌّ
مفــدى
|
إلــى
قــومه
فـي
خصـيب
البلاد
|
وإمــــا
الســـماح
بمقتلـــه
|
فيبلــغ
فطرقــل
منــه
المنـى
|
فقـــالت
وأي
مقـــالٍ
تقـــول
|
أيـا
ابـن
قرونـس
قيـل
القيول
|
فـتىً
مـن
بني
الموت
حكم
الردى
|
رمــاه
وأنــت
بجــوز
الأصــول
|
فأنفــذ
مرامــك
إن
رمـت
لكـن
|
بنـو
الخلـد
لا
يظهـرون
القبول
|
فـــدونك
منـــي
مقالــة
حــقٍّ
|
فــألق
مقــالي
بسـامي
الحجـى
|
إذا
ســرفذون
إلـى
الأهـل
حيـا
|
أعــدت
فــآل
العلــى
تتهيــا
|
وتطلـــب
إنقـــاذ
أبنائهـــا
|
مـن
الحتـف
مثلـك
شـيئاً
فشـيا
|
فـــإن
أنـــت
أحيتــه
ســمته
|
علـى
مضـض
الكيـد
غيظـاً
وغيـا
|
فخـــــل
حنــــوك
وا
أذن
إذاً
|
ففطرقــل
ينفــذ
حكمــاً
مضــى
|
فــإن
غــادرته
الحيـاة
وبـاذ
|
مـر
المـوت
فـوراً
وعذب
الرقاد
|
إلـــى
ليقيــا
يحملاه
ســريعاً
|
لإخـــوته
والصـــحاب
البعــاد
|
فيـدفن
فـي
اللحـد
حـرّاً
كريماً
|
ونصــب
الكــرام
عليــه
يشـاد
|
فــذاك
جــزاء
الأولـى
جاهـدوا
|
ومــاتوا
كرامـاً
ونعـم
الجـزا
|
فـأذعن
زفـس
لهـا
ثم
أمطر
على
|
الأرض
طلّاً
مـــن
الـــدم
أحمــر
|
قيامــاً
بــإجلال
فــرعٍ
حــبيبٍ
|
ســيردي
غريبـاً
وفطرقـل
يفخـر
|
فكــــرا
وفطرقـــل
ثرســـملاً
|
رمـى
بالصـفاق
فمـن
فـوره
خـر
|
تلا
ســـرفذون
بســوق
الجيــاد
|
وكــان
حليـف
الصـبا
المرتضـى
|
وعــــامله
ســــرفذون
قـــذف
|
ولكـــن
بكتـــف
فــداس
وقــف
|
فخــر
لــوجه
الــثرى
صــاهلاً
|
وقــد
زفهقــت
بروحـه
وارتجـف
|
فأزعـــج
مصـــرته
الفرســـين
|
فشـــبا
ونيرهمــا
قــد
قصــف
|
صــرع
عنانيهمـا
التـف
فاسـتل
|
ل
أفطمـــذٌ
ســـيفه
وانتضـــى
|
وخـــف
وبــت
ربــاط
الجــواد
|
فعـــاد
لروعهمـــا
والطــراد
|
وعـاد
الكميـان
للضـرب
والطـع
|
ن
فـي
حومـة
الحـرب
قرمي
عناد
|
رمــــى
ســــرفذون
مثقفــــه
|
فعـن
كتـف
فطرقـل
يسـراه
حـاد
|
ولكـــــن
فطــــرق
عــــامله
|
أطــار
ومــا
إن
أطــار
ســدى
|
ففــي
سـرفذون
السـنان
انتشـب
|
علـى
عضـل
القلـب
حيـث
انتصـب
|
فــأهوى
يصــر
أمــام
العجـال
|
بأســـنانه
والحضــيض
اختضــب
|
كملولــــــة
أو
كصفصـــــافةٍ
|
وباســـقة
الأرز
فــوق
الهضــب
|
بهـا
نفـذ
الحـد
فـي
كـل
وشـا
|
رفلــكٍ
مــتين
الجــذوع
بــرى
|
وخــر
كثــورٍ
بصــدر
الصــوار
|
عتــا
وعليــه
الغضــنفر
ثـار
|
ومـــن
تحـــت
صــكة
أنيــابه
|
يخــور
إلــى
أن
تـرج
القفـار
|
كــذا
خــر
مـولى
بنـي
ليقيـا
|
ومـن
كـف
فطرقـل
ألفـى
البوار
|
ولكنــــــــه
بتجلــــــــده
|
علا
صـــوته
بجهيـــر
النـــدا
|
ألا
يغلــــوكس
خيـــر
أليـــف
|
لـذا
الحين
حين
الصدام
العنيف
|
لئن
كنـــت
ذا
مهجــةٍ
وجنــانٍ
|
فلا
تصـــب
إلا
لقــرع
الســيوف
|
أثـــر
بقيــول
بنــي
ليقيــا
|
لــدى
ســرفذون
أوار
الحتــوف
|
وذودن
عنـــي
وللحــرب
ألهــب
|
قلــوب
الســرى
بسـعير
الجـذى
|
وإلا
وبهـــم
العــدى
صــرعوني
|
وجنـدلت
فـي
وجـه
هـذي
السفين
|
ســأوريك
الـدهر
خزيـاً
وعـاراً
|
إذا
مـا
العـدى
شـكتي
سـلبوني
|
ومـــن
ثـــم
أخمــد
أنفاســه
|
وأغمــض
عينيــه
سـتر
المنـون
|
وفطرقـــل
داس
علـــى
صـــدره
|
لينـــتزع
العامــل
الممتهــي
|
فـــأخرج
يعلـــق
ذاك
العضــل
|
بحـــد
الســنان
وروح
البطــل
|
وهـــم
المرامـــد
فــي
عجــلٍ
|
ليسـتوقفوا
الجـرد
تحـت
العجل
|
عتـــاقٌ
وغادرهـــا
فارســـها
|
فحثحثهـــا
للفـــرار
الوجــل
|
وأمــا
غلــوكس
فالتــاع
بثّـاً
|
لــذاك
النــدا
وحشـاه
انفـأى
|
لقـد
بسـط
الكـف
فـوق
الـذراع
|
وليـــس
بـــه
قــوةٌ
للــدفاع
|
فمــا
زال
يــؤلمه
نبـل
طفقـي
|
لمــــا
تســـلق
فـــوق
القلاع
|
فــألفت
يــدعو
ألـون
رب
الـس
|
ســـهام
ألا
رب
جــد
باســتماع
|
فحيــث
تكـن
أنـت
يبلغـك
صـوت
|
كئيـــبٍ
تلهـــف
مثلــي
أنــا
|
أفـي
ليقيـا
كنـت
أرض
اليسـار
|
أم
اخــترت
إليــون
دار
قـرار
|
فــأنت
تــرى
ألمــي
وجراحــي
|
وســـيل
دمٍ
مــن
ذاعــي
فــار
|
تثقــل
كتفــي
مــن
هـز
رمحـي
|
إذا
مــا
علا
بالبـدار
الغبـار
|
وذا
سـرفذون
العميـد
ابـن
زفسٍ
|
ومـا
صـانه
زفـس
ألفـى
التـوى
|
فــــآلامي
الآن
ســـكن
وخفـــف
|
وبأســاً
أنلنــي
والــدم
جفـف
|
لكـــي
اســتحث
بنــي
ليقيــا
|
وحــول
القتيـل
الرمـاح
نكثـف
|
دعــا
فاسـتجيب
الـدعا
ومسـيل
|
الدماء
على
الفور
بالجرح
أوقف
|
وآلامــــه
ســــكنت
وحشــــاه
|
ببــأسٍ
شــديدٍ
ذكــا
واصــطلى
|
فمـــالت
بـــه
هــزة
الطــرب
|
لمــا
نــال
مــن
بلغــة
الأرب
|
بصـيد
بنـي
ليقيـا
طـاف
يسـتن
|
هــض
البهــم
للــذود
والطلـب
|
وبيــن
الطــرواد
جــال
فمـال
|
لفوليـــدماس
الهمــام
الأبــي
|
وأنيـــاس
ألفــى
فحــث
وخــف
|
إلــى
آغنـور
الفـتى
المجتـبى
|
وهكطــور
وافـى
بقلـب
الحديـد
|
يـــؤج
فصـــاح
بصــوتٍ
شــديد
|
أشـــأنك
هكطــور
عــن
حلفــا
|
ئك
تغضــي
وصـيد
سـراهم
تبيـد
|
بحبــك
قــد
هلكــوا
وعــداهم
|
عـن
الأهـل
والـدار
بـون
بعيـد
|
فــذا
ســرفذون
المليـك
الـذي
|
حـوى
البـأس
والعـدل
غضـا
ذوى
|
أريـــس
براحــة
فطرقــل
قــد
|
رمــــاه
وحرقنـــا
بالكمـــد
|
أمــا
مــا
كررتـم
وقلبكـم
ال
|
تياعـــاً
بحـــر
الأوار
اتقــد
|
ألا
مـــا
خشـــيتم
أن
المــرا
|
مــد
ينــتزعون
زهــي
العــدد
|
ويولـونه
الـذل
منـا
انتقامـاً
|
لبهــمٍ
أبــدنا
بغــر
الظبــا
|
فهــد
الطــراود
ذاكـي
اللهـف
|
علــى
ســرفدون
وفــاض
الأســف
|
فقــد
كــان
وهــو
دخيـلٌ
بهـم
|
لهـم
منعـةً
مـن
عـوادي
التلـف
|
مشـى
إثـره
البهـم
جيشـاً
وليس
|
لـــه
بهـــم
شـــبهٌ
أو
خلــف
|
فهــاجوا
وهكطــور
فـي
صـدرهم
|
تحــدم
غيظــاً
يحــدث
الخطــى
|
ولكــن
فطرقــل
بيــن
الأخــاء
|
عــــدا
يســــتحثهم
للقـــاء
|
وأقبــل
يــدعو
الأياسـين
لكـن
|
فــؤاد
الأياسـين
يـذكو
اصـطلاء
|
ألا
الآن
دونكمـا
الـذود
مـذ
كن
|
تمــا
خــبر
كــل
قـروم
البلاء
|
فـذا
سـرفذون
الفتى
من
إلى
ال
|
معاقــل
قبــل
الجميــع
رقــى
|
عســــى
أن
نفــــوز
بجثتـــه
|
نجردهــــــــا
لمـــــــذلته
|
ونفــري
بحــد
الغـرار
الأولـى
|
بـــذبون
مـــن
جنــد
عصــبته
|
فهبــا
ومــن
كــل
صــوب
تكـش
|
شـــف
جيـــشٌ
يجيـــش
بهمتــه
|
وحــول
القتيـل
اصـطدام
عنيـفٌ
|
وعـــجٌّ
مخيـــفٌ
وصــل
الشــبا
|
بنــو
ليقيـا
ولفيـف
الطـراود
|
وجنــد
الأخـاء
وجيـش
المرامـد
|
جميعهـــم
انـــدفعوا
دفعـــةً
|
بصلصــــلةٍ
ووحـــىً
متصـــاعد
|
وزفـــس
علـــى
فرعــه
حســرةً
|
تحـرق
يبغـي
اشـتداد
الشـدائد
|
فأحـدق
فيهـم
وقـد
كيـد
كيـداً
|
وأســــبل
ســــتر
ظلامٍ
دجـــا
|
ففـي
البـدء
جيش
القتيل
اندفق
|
وصــد
الأخــاء
الحـداد
الحـدق
|
فــبين
المرامــد
خــر
إفيجـي
|
يــس
بـن
أغكليـس
فخـر
الفـرق
|
لقــــد
كـــان
قبلاً
ببوذيـــةٍ
|
فنادرهـــا
تحــت
جــرمٍ
ســبق
|
مضــى
فاتكــاً
بــابنِ
عـمٍّ
لـه
|
وعنـــد
ثـــتيس
وفيلا
التجــا
|
إلــى
حــرب
طــروادةٍ
ســيراه
|
لآخيــل
خــراق
جيــش
الكمــاه
|
لقـد
رام
سـلب
القتيـل
وهكطـو
|
ر
فــوراً
بجلمــود
صـخرٍ
رمـاه
|
وهـــــــامته
بـــــــتريكته
|
لشـــطرين
شـــق
فــألفى
رداه
|
ومــن
فـوره
خـر
فـوق
القتيـل
|
وحــرق
فطرقــل
فــرط
الشــدا
|
حكـى
مـذ
مضـى
في
الطلائع
صقراً
|
لــديه
الزرازيـر
يفـرزن
فـرا
|
وســرب
العقــاعق
مــن
وجهــه
|
شــتاتاً
تســاق
بـه
حيـث
كـرا
|
فسـعديك
يـا
ابـن
منـتيوس
هزم
|
ت
كــل
فــتىً
هالمــاً
مقشـعرا
|
بنــي
ليقيــا
والطـراود
طـرّاً
|
قهــرت
انتقامــاً
لإلــفٍ
كبــا
|
وعنــق
ابــن
إيـثيمنٍ
إسـتنيل
|
دتقـــت
بصــخرٍ
قــذفت
ثقيــل
|
ففــر
الطــراود
فــي
وجههــم
|
كـــذلك
هكطــور
ولــى
ذليــل
|
إلــى
أن
أبينـوا
علـى
روعهـم
|
علــى
بعـد
مرمـى
سـنانٍ
صـقيل
|
علــى
العنـف
يرمـي
بـه
طـاعنٌ
|
بـدار
الـوغى
أو
بعـرض
اللهـى
|
ولكـــن
غلــوكس
ثــم
انثنــى
|
وعــاد
فأعمــل
شــهب
القنــا
|
وأصــمى
بثكليــس
خلكــون
مـن
|
بهيلاذةٍ
ناعمــــــاً
ســـــكنا
|
ومــا
كـان
بيـن
الطـراود
مـن
|
حكـــاه
بهـــم
ثــروةً
وغنــى
|
لقــد
كـاد
يرمـي
غلـوكس
لمـا
|
وراء
العـــداة
حثيثــاً
ســعى
|
فعـــاد
غلـــوكس
والرمــح
زج
|
وفـي
الصـدر
حـد
السـنان
ولـج
|
علــى
بأســه
خـر
فـارتجت
الأر
|
ض
والتهبـــت
بــذويه
المهــج
|
ولكـــن
جيــش
العــدى
فرحــاً
|
تكثـــف
مــن
حــوله
وابتهــج
|
وأمــا
الأخــاء
فلــم
ينثنـوا
|
بــل
انــدفعوا
كزعــابٍ
طغــا
|
ومريــون
بيــن
العــدى
ظفـرا
|
بقــــرمٍ
بلوغــــونسٍ
شـــهرا
|
هــو
ابـن
أنيطـوز
كـاهن
زفـس
|
بإيـــذا
ومــن
مثلــه
وقــرا
|
أصـيب
علـى
مقتـل
الأذن
فـإنقض
|
ض
لا
رمــقٌ
فيــه
فــوق
الـثرى
|
فبــادر
أنيــاس
يطعــن
مريـو
|
ن
لكـــن
ذاك
الســـنان
هفــا
|
لقــد
كــان
مريــون
مســتتراً
|
بجنتــــه
عنـــدما
ابتـــدرا
|
فمــال
عـن
الرمـح
والنصـل
زل
|
ومـــن
خلفــه
للحضــيض
ســرى
|
وظــــل
هنالــــك
مرتعشــــاً
|
علــى
ذلــك
العــزم
إذ
خـدرا
|
رمتـه
ذراعٌ
لهـا
البـأس
ينمـي
|
فأنفــذ
لكــن
ببطــن
النقــا
|
وأنيــاس
صــاح
مغيظــاً
أجــل
|
أمريــون
فاتــك
ســهم
الأجــل
|
وإلا
فمهمـــا
تفـــوقت
رقصــاً
|
لــو
النصـل
وافـاك
عزمـك
فـل
|
فقــال
أأنيــاس
هيهـات
تصـمي
|
جميــع
العــداة
وأنــت
بطــل
|
وأنــت
رهيــن
الحمــام
عســى
|
أصـــيبك
مهمــا
حشــاك
عســا
|
فإمـــا
رمتـــك
ظبــا
أســلي
|
وقــد
أدركتــك
انتهــى
أملـي
|
فلا
شـــك
تهبـــط
فـــي
فشــلٍ
|
لآذيـــس
روحــك
والفخــر
لــي
|
ولكـــن
فطرقــل
ســيء
فقــال
|
يــــؤنب
مريــــون
بالعجـــل
|
علام
أخــي
ذا
المقـال
المهيـن
|
وأنــت
بلوتــك
ســامي
النهـى
|
أتزعـــــم
أن
حديــــد
الكلام
|
يصــد
الطــراود
يـوم
الصـدام
|
فمــاذا
بــدافعهم
عــن
قتيـلٍ
|
حـــــواليه
تصـــــطك
لامٌ
بلام
|
ولـن
يرجعـوا
عنـه
حـتى
يضـاف
|
صــريعاً
لــذاك
الهمـام
همـام
|
فللحــرب
فعــلٌ
وللســلم
قـولٍ
|
وهــذا
أوان
الــوغى
لا
اللغـا
|
فخــف
ومريــون
فـي
الإثـر
خـف
|
كـــربٍّ
وللجيـــش
جيــشٌ
زحــف
|
وفـي
السـهل
للبيض
والسمر
قرعٌ
|
بفـــولاذهم
وإهـــاب
الحجـــف
|
كـــــأن
بــــأذرع
حطابــــةٍ
|
بغــابٍ
فؤوســاً
صــداها
قصــف
|
وحـول
القتيـل
اسـتطار
العجاج
|
ووبــل
الــدما
والنصـال
همـى
|
مـن
الـرأس
غشـاه
حـتى
القـدم
|
فمــا
كـاد
يبصـر
بيـن
الرمـم
|
وفيلـــق
كـــل
فريــقٍ
لــديه
|
بهــــدته
للكفـــاح
ازدحـــم
|
كــــأنهم
بـــالربيع
ذبـــابٌ
|
يطــن
طنينــاً
بــبيت
النعــم
|
وقــد
حـام
مـن
حـول
ألبانهـا
|
إذا
مـــا
الإنـــاء
رآه
امتلا
|
وزفــس
بشــامخ
تلــك
الــذرى
|
عــن
الحـرب
مـا
حـول
النظـرا
|
ولكنـــه
لـــم
يــزل
راقبــاً
|
بمقتــــل
فطرقـــل
مفتكـــرا
|
يجيــــل
بــــأمرين
هاجســـه
|
أيــــدفع
هكطـــور
مســـتعرا
|
فيقتلـــه
فــوق
ذاك
القتيــل
|
ويســـلب
منـــه
ســلاحاً
زهــا
|
أم
الحـرب
عنفـاً
شـديدا
يزيـد
|
وفيهــا
قــروم
الرجـال
يبيـد
|
فعــول
أن
يســتحث
إلـى
الفـت
|
ك
بـالبهم
إلـف
أخيـل
العميـد
|
فيــدفع
هكطــور
والجيـش
طـرّاً
|
لإليـون
مـن
تحـت
قـرع
الحديـد
|
لــذلك
أوهــن
هكطــور
قلبــاً
|
فهــــب
لمركبــــه
واعتلـــى
|
وولــى
ونــادى
بهـم
بـالفرار
|
وأوجــس
مـن
زفـس
عنـه
ازورار
|
درى
أن
كفــــــة
ميزانـــــه
|
أميلـــت
ودور
الـــدوائر
دار
|
وعــزم
بنـي
ليقيـا
خـار
حـتى
|
غــدوا
لا
يقـر
لهـم
مـن
قـرار
|
وراعهــــم
صــــرع
ملكهــــم
|
فولـــوا
وقــد
جلــت
الأربــى
|
رأوا
طعيـــن
الحشــا
جنــدلا
|
ومـــن
فـــوقه
جثـــث
النبلا
|
حــواليه
خــر
الصـناديد
لمـا
|
قضــى
زفــس
أن
يــدلهم
البلا
|
فجـــرده
قـــوم
فطرقــل
شــك
|
تـــه
وإلــى
فلكهــم
أرســلا
|
فصـــاح
بفيبـــوس
زفـــس
إذاً
|
ألا
يــا
ولــي
الــوداد
كفــى
|
إلــى
سـرفذون
الأميـر
الخطيـر
|
ســر
الآن
فــوراً
وجـد
المسـير
|
فـــإن
جئتـــه
فامضــين
بــه
|
إلــى
عزلــةٍ
قـرب
مـاءٍ
غزيـر
|
وطهــره
مـن
دنـس
الـدم
حـالاً
|
وانزلـه
فـي
مـاء
ذاك
الغـدير
|
وبــالعنبر
ادهنــه
ثـم
اكسـه
|
ملابـــس
لا
يعتريهـــا
الفنــا
|
لأســـرع
قــادة
كــل
العبــاد
|
إلـى
التـوأمين
الردى
والرقاد
|
بـــه
ألـــق
يحتملاه
ســـريعاً
|
لإخـــوته
والصـــحاب
البعــاد
|
فيــدفن
فـي
ليقيـا
ضـمن
لحـدٍ
|
ونصــب
الكــرام
عليــه
يشـاد
|
فــذاك
جــزاء
الأولـى
جاهـدوا
|
ومــاتوا
كرامـاً
ونعـم
الجـزا
|
فلــبى
أفليــون
طوعــاً
يسـير
|
ومــن
طــور
إيــذة
هـب
يطيـر
|
أتـــى
ســـرفذون
وســار
بــه
|
إلــى
عزلــةٍ
فـوق
سـيل
غزيـر
|
وطهـــــره
مــــن
دمٍ
دنــــسٍ
|
ونقــاه
فـي
مـاء
ذاك
الغـدير
|
وطيبــــه
عنــــبراً
وكســـاه
|
ملابـــس
لا
يعتريهـــا
الفنــا
|
لإســـرع
قــادة
كــل
العبــاد
|
إلـى
التـوأمين
الردى
والرقاد
|
بـــه
راح
يلقــي
فطــار
بــه
|
لإخـــوته
والصـــحاب
البعــاد
|
ليـدفن
فـي
اللحـد
حـرّاً
كريما
|
ونصــب
الكــرام
عليــه
يشـاد
|
فــذاك
جــزاء
الأولـى
جاهـدوا
|
ومــاتوا
كرامـاً
ونعـم
الجـزا
|
وفطرقـــل
أفطمــذا
والخيــول
|
وراء
العـدى
حـث
فـوق
السـهول
|
وبـــالنفس
ألقـــى
لتهلكـــةٍ
|
وضــل
ضــلال
الغــبي
الجهــول
|
فلـو
لأخيـل
ارعـوى
مـا
انـبرت
|
عليــه
عــوادي
الحمـام
تصـول
|
ولكـــن
زفــس
إذا
مــا
نــوى
|
فمــا
للـورى
رد
مـا
قـد
نـوى
|
فقــد
يــدفع
الفــارس
البطلا
|
ليـــوليه
الـــذل
والفشـــلا
|
لـــذلك
فطرقــل
حــث
وأغــرى
|
ليبلــــغ
فـــي
كـــره
الأجلا
|
ألا
قــل
أفطرقــل
مــن
آخــراً
|
ومـــن
أنـــت
جنـــدلته
أولا
|
عــدا
وبأدرســت
ثــم
بــأوطو
|
نــــؤوس
وإيخيكلـــوس
بـــدا
|
كـذاك
ابـن
ميغـاس
فيريـم
ثما
|
فلرتــس
ثــم
إفســتور
أصــمى
|
وإيلاس
موليســــاً
ميلنيفــــاً
|
وســـائرهم
للهزيمـــة
همـــا
|
وكــاد
الأخــاءة
إليــون
يــف
|
تتحــون
بهمــة
فطرقــل
رغمـا
|
ولكـن
رقـى
الحصـن
فيبوس
ينوي
|
لــه
الشـر
والحصـن
منـه
وقـى
|
ثلاثــاً
لركــن
الحصـار
انـدفع
|
وفيبـــوس
عنــه
ثلاثــاً
دفــع
|
براحتـــــه
صـــــد
جنتــــه
|
فمـا
ارتـد
عـن
عزمـه
وارتـدع
|
بـــل
انقـــضَّ
رابعــةً
كــإلاهٍ
|
فمــا
خــال
إلا
الـدوي
ارتفـع
|
وفيبــوس
صــاح
ألا
عـد
أيـافر
|
ع
زفــس
فمـا
لـك
ذا
المنتسـا
|
فمـا
دك
إليـون
فـي
الغيـب
لك
|
ولا
لأخيــــل
الــــذي
فضـــلك
|
تقهقــــر
فطرقـــل
مضـــطرباً
|
لخشـــيته
ســـخط
ذاك
الملــك
|
وهكطـــور
فــي
بــاب
إســكيةٍ
|
علــى
جــرده
فــاكرٌ
بالــدرك
|
أيــدفعها
للجهــاد
أم
القــو
|
م
يجمــع
للــذود
خلـف
الربـى
|
وإذا
كـــان
يفكـــر
مضــطرباً
|
إليــــه
أفلــــونٌ
اقـــتراب
|
دنــا
وحكـى
خـال
هكطـور
آسـي
|
يســاً
فــرع
ديمــاس
منتــدبا
|
شــقيقٌ
لإيقـاب
مـن
ثغـر
سـنغا
|
رس
بفريجـــا
بشـــرخ
الصــبا
|
وصــاح
علام
اعــتزلت
الكفــاح
|
أهكطـــور
ليـــس
بشـــأنك
ذا
|
فلــو
زفــس
لــي
بقـواك
حكـم
|
لأوليتـــك
الآن
مـــر
النـــدم
|
فعـــد
وجيـــادك
حـــث
عســى
|
تخلـــد
ذكـــرك
بيــن
الأمــم
|
لعــل
أفلــون
يوليــك
نصــراً
|
وفطرقـــل
ترمــي
بحــدٍّ
أصــم
|
ومــن
ثــم
عنــه
الإلاه
تـوارى
|
وكــالبرق
بيــن
الجيـوش
سـرى
|
وهـــد
قلــوب
الأخــاءة
هــدا
|
وطـــروادةً
بـــالولاء
أمـــدا
|
وفـي
قـبريون
ابـن
فريـام
صاح
|
يـرد
الجيـاد
إلـى
الحـرب
ردا
|
فسـاط
وهكطـور
مـن
دون
كـل
ال
|
أراغــس
يقصــد
فطرقــل
قصـدا
|
ولكــن
فطرقـل
مـا
ارتـاع
بـل
|
ترجــــل
محتفــــزاً
للقــــا
|
بيســراه
عامــل
رمــحٍ
مــتين
|
كـــذا
حجــرٌ
خشــنٌ
بــاليمين
|
رمــــاه
فأخطــــأه
ومضــــى
|
إلــى
قــبريون
أخيــه
الأميـن
|
فــــأدركه
وهــــو
مستمســـكٌ
|
بصــــرع
أعنتـــه
بـــالجبين
|
فقــض
العظـام
علـى
الحـاجبين
|
وعينــــاه
طيرتـــا
للـــبرى
|
فخـر
علـى
الخيـل
كالبرق
يسري
|
إلــى
الأرض
يهـوي
كسـابر
قعـر
|
وفطرقـــل
صــاح
بــه
ســاخراً
|
فيــا
للبــاقته
كيــف
يجــري
|
فلـــو
مــن
ســفينته
واثبــاً
|
إلــى
اليــم
غـاص
للجـة
بحـر
|
لصـاد
حلـزّاً
ولـو
صـدع
النـوء
|
يكفــي
الجمــاهير
شـر
الطـوى
|
لئن
غـاص
بـالبر
من
تي
العجال
|
فغاصــة
طــرواد
نعـم
الرجـال
|
ومـن
ثمـة
انقـض
فـوق
القتيـل
|
كليــثٍ
بقلــب
الحظــائر
صـال
|
فيــدركه
الســهم
فــي
صــدره
|
ويلقــي
بــه
بأســه
للوبــال
|
فويحـــك
فطرقــل
مــن
صــائلٍ
|
علـــى
قــبريون
تهيــج
صــلا
|
وهكطـــور
عــن
خيلــه
نــزلا
|
وفـــي
طلـــب
الجثــة
اقتتلا
|
كليــــثين
بينهمـــا
ظبيـــةٌ
|
بهــا
فتكــاً
فــوق
طــودٍ
علا
|
كلا
البطليــن
يهيــج
احتـداماً
|
ليعمـــل
فـــي
نــدِّهِ
الأســلا
|
فهكطـــور
بـــالرأس
مستمســكٌ
|
وفطرقـــل
بالقـــدمين
كـــذا
|
وحولهمـــا
اصـــطدام
الجحفلان
|
بنقــعٍ
علا
تحــت
قـرع
الطعـان
|
كــأن
الصــبا
عرضــت
للجنـوب
|
بغــابٍ
تشــامخ
فــوق
القنـان
|
تزعـــزع
دردارهـــا
والقــرا
|
نيـاو
كـذا
الـزان
بين
الرعان
|
فيلتـــف
غصـــنٌ
بغصــنٍ
فيــن
|
قــض
بيــن
حفيــفٍ
وقصــفٍ
دوى
|
كـذا
اشـتبكوا
والـوغى
التحما
|
يــــثير
بهبتــــه
الهممـــا
|
طعــانٌ
تشــقٌّ
الــدروع
وغيــث
|
ســـهامٍ
بعــرض
الفلا
التطمــا
|
وصــخرٌ
يقـضُّ
الـترائك
حـول
ال
|
قتــل
الـذي
خـر
هـامي
الـدما
|
ســهام
عنهــم
تحــت
عــثيرهم
|
وللــدهر
عــن
جـرده
قـد
لهـا
|
تســاوت
مراميهــم
مـا
اسـتوت
|
بــراح
بقلــب
الســما
وعلــت
|
ولمــا
دنــا
آن
حــلِّ
الثيـار
|
ومــالت
فجنـد
الأأخـاء
ارتمـت
|
ورغــــم
القضــــاء
بجثتـــه
|
خلـــت
وبهــا
للــبراح
جــرت
|
وشـــكته
انـــتزعت
وانثنـــت
|
فطرقــل
كيــد
العـداة
انتـوى
|
ثلاثـــاً
كـــآريس
كــر
يصــيح
|
بصـوتٍ
دوى
فـي
الفضـاء
الفسيح
|
ثلاثـــاً
ثلاثـــة
صـــيدٍ
رمــى
|
وأقبــــل
رابعـــةً
يســـتبيح
|
فويبــك
فطرقــل
قـد
قضـي
الأم
|
ر
فــاليوم
قتلـك
حتمـاً
أبيـح
|
وفيبـــوس
وافـــاك
منحـــدراً
|
بظــل
الســحاب
بطــي
الخفــا
|
ومـــن
خلفــه
جــاء
مســتتراً
|
لـــذلك
فطرقـــل
مــا
شــعرا
|
وألقـــى
علـــى
ظهــره
يــده
|
فعينــــاه
ألهبتـــا
شـــررا
|
ودحــــــرج
للأرض
خــــــوذته
|
أمـام
خطـى
الخيـل
فـوق
الثرى
|
فصــــلت
ودنســـت
العـــذبات
|
بنقــع
الحضــيض
وسـيل
الـدما
|
تريكـــة
آخيـــل
تلــك
ومــا
|
إلــى
الأرض
قــط
هــوت
قــدما
|
ولـم
تـك
إلا
لـذاك
الجـبين
ال
|
ذي
بالفخـــار
ســـما
عظمـــا
|
وزفـــس
قضــى
أن
تجلــل
هــا
|
مــة
هكطـور
لمـا
هنـا
أقـدما
|
ولــن
تلبثــن
لــه
غيـر
حيـنٍ
|
لأن
الحمــــام
إليـــه
دنـــا
|
وعامـــل
فطرقـــل
فــي
كفــه
|
تســـتحق
ينـــذر
فــي
حتفــه
|
وجنتـــــــه
بحمائلهـــــــا
|
أميلــت
إلــى
الأرض
عـن
كتفـه
|
وحلـــت
عـــن
الصــدر
لأمتــه
|
بصــــرف
أفلــــون
لا
صـــرفه
|
فــأوقف
يهلــع
رعبــاً
وخـارت
|
قــواه
وغشــى
حجــاه
العمــى
|
وثمـــة
كـــان
فــتىً
دردنــي
|
تفـــوق
فـــي
فتيــة
الزمــن
|
بــأوفرب
فنثــوس
يعــرف
وهـو
|
أخــوا
لبـاس
والعـدو
والحصـن
|
لقــد
كــان
وهــو
يكــر
فـتىً
|
تحنكــــه
ســــاحة
المحــــن
|
رمـى
عـن
صدور
العجال
من
الصي
|
د
عشــرين
قرمـاً
لظهـر
الحـثى
|
فـــذلك
ذلـــك
فطرقـــل
قــد
|
أتــاك
وظهــرك
بالرمــح
قــد
|
وذلــــك
أول
قــــرمٍ
رمـــاك
|
ولكنـــه
خـــاب
فيمــا
قصــد
|
فعـــامله
اجـــتر
ثــم
جــرى
|
يفـــر
إلــى
قــومه
وارتعــد
|
لقـد
سـمته
الرعـب
حـتى
اتقـى
|
وإن
كنـــت
أعـــزل
لا
تتقـــي
|
ولكـــن
فطرقـــل
هــد
قــواه
|
ســــنان
القنـــاة
وروع
الإلاه
|
لــذاك
تنصــل
خــوف
المنــون
|
إلـــى
صـــبحه
لائذاً
بســـراه
|
وهكطـــور
لمـــا
رآه
جريحــاً
|
تقفــــاه
بينهــــم
ورمـــاه
|
فشــــق
الصــــفاق
لأحشـــائه
|
فخـــر
وقلـــب
ذويـــه
ذكــا
|
كــأن
علــى
الشـم
خرنـوص
بـر
|
دهــاه
علـى
الـورد
ليـثٌ
فكـر
|
وفـــي
طلـــب
الوشــل
اقتتلا
|
فمـا
انكفـأ
الليـث
حتى
انتصر
|
كــذلك
هكطــور
فطرقــل
أصـمى
|
وهـــد
بــه
صــائحاً
وافتخــر
|
زعمــت
أفطرقــل
أن
لـك
الجـو
|
و
مــن
فـوق
إليوننـا
قـد
خلا
|
أخلــــت
بــــدك
معاقلنــــا
|
نفــــوز
وســــبي
عقائلنـــا
|
لقومـــك
بالفلـــك
تحملهـــن
|
افاتــــك
طعــــن
ذوابلنـــا
|
تعســت
ألــم
تــدر
أن
بهكطـو
|
ر
تنســـاب
جـــرد
صـــواهلنا
|
ليرفــــع
عنهــــن
ذلـــة
رقٍّ
|
برمــحٍ
بقلــب
العــداة
مضــى
|
هلكــت
فــرح
مطعمــاً
للصـقور
|
فهلا
كفـــاك
أخيـــل
الثبــور
|
كــأني
بـه
قـال
حيـن
الـوداع
|
بتلــك
الخيـام
مقـال
الغـرور
|
إلى
الفكل
فطرقل
لا
عواد
ما
لم
|
تمــن
العـداة
بـأدهى
الشـرور
|
تمــزق
عـن
صـدر
هكطـور
درعـاً
|
كســتها
الـدماء
خضـيب
الكسـا
|
أجــل
قــوله
ذاك
مــذ
أرسـلت
|
وانــت
اغـتررت
بمـا
قـال
لـك
|
أجــاب
علــى
زفــرات
المنـون
|
علــى
العجـب
فـوزك
قـد
حملـك
|
بصــولة
زفــس
وفيبــوس
فطـرق
|
ل
لا
بــأس
هكطــور
حتمـاً
هلـك
|
همـــا
عريـــاني
مــن
عــدتي
|
وإلا
أريتـــك
قطـــع
الطلـــى
|
بعشـــرين
هكطـــور
مثلــك
لا
|
أبــالي
إذا
مــا
الغبـار
علا
|
أصــــلمهم
وســـنان
قنـــاتي
|
شـــحيذٌ
لهـــم
يحمـــل
الأجلا
|
فــإن
الــردى
وابــن
لاطونــةٍ
|
وأوفـــرب
هــم
علــتي
والبلا
|
ومــا
كنــت
أنــت
بطعنـك
لـي
|
ســـوى
ثــالثٍ
قــد
تلا
وونــى
|
ومنـــي
خـــذ
نبـــأً
صـــدقا
|
ففطرقــل
بــالحق
قــد
نطقــا
|
فمــا
أنــت
بعـدي
حـيٌّ
طـويلاً
|
فــإن
الــردى
بـك
قـد
أحـدقا
|
وقــد
حــان
حينــك
فاشـق
بـه
|
قريبــاً
بكــف
أخيــل
اللقــا
|
ومــن
ثــم
أســبل
ظــل
الظلام
|
عليــه
ســتار
الــردى
فطفــا
|
هــوى
روحــه
صــبباً
تســتطير
|
لــرب
الجحيـم
بـوادي
الزفيـر
|
هنالــك
تنــدب
حكــم
القضـاء
|
وتلـك
القـوى
والشـباب
النضير
|
وهكطــور
مــا
زال
يــزري
بـه
|
علام
بحتفـــي
كنـــت
النــذير
|
فمـن
قـال
عمـر
ابـن
ثيتيس
لا
|
بحــد
قنــاتي
قبلــي
انقضــى
|
وعـــامله
اجــتر
مــن
صــدره
|
وألقـــاه
فيــه
علــى
ظهــره
|
وفـــي
نفســـه
قتــل
أفطمــذٍ
|
فأقبـــل
ينقـــضُّ
فــي
إثــره
|
ولكـــن
إلـــف
أخيــل
بخيــل
|
أخيـــل
تــوارى
علــى
قهــره
|
وليســـت
لتــدرك
بيــن
الملا
|
عتـــاقٌ
بهــا
زفــس
فيلاحبــا
|