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هجـع
الكـون
يا
حبيبي
وعادت
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كــل
روح
إلــى
مقـرّ
هواهـا
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كـلّ
شـيءٍ
حـولى
يعانِقُه
الصم
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تُ
وكـلّ
العيـون
نـامت
رؤاها
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لـم
يعـد
فـي
الظلام
روح
شقي
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غيـر
روح
محـا
الظلام
سـناها
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هـي
روحـي
الـتي
أحبّتـك
حتى
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قدّســت
فيـك
حزنهـا
وأسـاها
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كـل
شـيء
حـولي
كئيـبٌ
رهيـب
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يبعث
الوجد
أو
يثير
الشجونا
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كـل
شـيءٍ
حولي
يشاركني
الوح
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دة
والشـوق
والضنى
والحنينا
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خمــدت
جـذوة
الحيـاة
وشـبّت
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جــذوة
الحـب
لوعـة
وأنينـا
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ومشـى
الليل
ذاهل
الحسّ
نشوا
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ن
يحيــى
بروحـه
العاشـقينا
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اسـأل
الليـل
يـا
حبيبي
عني
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فأنـا
أسـأل
المقـادير
عنكا
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اسـأل
الليل
ربما
أسعد
اللي
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ل
نـداء
يحبّـه
الليـل
منكـا
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كــم
شــربناهُ
رقّـة
وحنانـا
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وأرقنـــاه
أدمعــاً
تتشــكّى
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وغرسـنا
آمالنـا
فيـه
زهـرا
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كيـف
عـدنا
نبدّل
الزهر
شوكا
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يـا
غريـب
الديرا
لاذُقت
يوما
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مـا
أقاسـي
من
محنتي
وخطوبي
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يـا
غريـب
الديار
هذي
مغاني
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ك
تنـادى
ومالهـا
مـن
مجيـب
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أنـت
صـيّرتها
من
البعد
ثكلى
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تتســاقى
مــع
الظلام
نحيـبي
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وشــبابي
علـى
رباهـا
خيـال
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عـاثِرُ
الظـل
عبقـريّ
الشـحوب
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يـا
حبيـبي
هـذا
نصـيبي
مـن
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حبــك
قلــب
يعيـش
للحرمـان
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هـذه
واحـتي
الحزينـة
تبكـي
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ك
وتشـكو
إليـك
ظلـم
زمـاني
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أتراهــا
كـانت
جنايـة
حظّـي
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يـا
حبيـبي
أم
قسـوة
الإنسان
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أهلـك
الكـافرون
بالحب
أهلي
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والقضـاء
الـذي
رمـاك
رماني
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اسـأل
الليـل
يـا
حبيبي
عني
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واعـذر
الليـل
حين
يطرق
عيّا
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أنـا
علّمتـه
الـذهول
بصـمتي
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وذهــولي
ممــا
جنيـت
عليـا
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رحـم
الحـبّ
كـل
أغنيـة
مـات
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ت
وحـالت
رسـماً
علـى
شـفتيّا
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كـان
يهفـو
إلى
صداها
زماني
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ليغنّـى
بهـا
الوجـود
الشقيّا
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