|
هــدمَ
الليـلُ
مـا
بنـاه
النهـارُ
|
واســـتكانت
للظلمـــةِ
الأنــوار
|
|
ومضـى
الكـون
يشـرب
الليـل
كأساً
|
عبقريّــــا
حبــــابه
الأقمـــار
|
|
واســتحال
الضـجيج
صـمتاً
رهيبـاً
|
زحمتــــه
الأشـــباحُ
والأســـرار
|
|
أيـن
راح
النهـار
كيـف
أتى
اللي
|
لُ
وفيــم
الإشــراقُ
فيـم
السـرار
|
|
هــي
حـرب
البقـاء
تنتظـم
الخُـل
|
ق
ســـواءً
صـــغارهم
والكبـــار
|
|
وتــداعت
فــي
الخــافقين
قلـوب
|
حيـن
طـارت
فـي
الخـافقين
قلـوب
|
|
عــــالم
جامـــح
وحـــظٌّ
مشـــِتٌّ
|
وصـــراعُ
يشــيب
منــه
المشــيب
|
|
فهنـا
قلـب
عابـد
الخـبز
والمـا
|
ءِ
جــــراحٌ
أحلامــــه
ونــــدوب
|
|
يتنـــزّى
دمــا
فلا
يجــد
الــدم
|
ع
يعــزّى
بــه
الغريــب
الغريـبُ
|
|
فــإذا
اشــتاق
مـا
يعـاف
سـواه
|
فالريـــاض
المنضـــرات
جـــدوب
|
|
وهنـــاك
المعربِـــدُ
النشـــوانُ
|
قــد
تــولّى
تربيبَــهُ
الشــيطان
|
|
مســــتحيلات
غيــــره
ممكنـــاتٌ
|
فـــي
يــديه
وقــوله
الفرقــان
|
|
ولــديه
الحيــاة
كــأسٌ
وحــورا
|
ء
وبحــــرٌ
أمــــواجه
ألحـــان
|
|
ولــه
الأمــرُ
كلمــا
شـاء
أمـراً
|
وإرادات
عقلــــــه
ســــــلطان
|
|
فــإذا
شــاء
فالحيــاة
اضـطراب
|
وإذا
شـــاء
فالحيـــاة
أمـــان
|
|
قلــت
يــا
نفــس
إن
هـذا
قضـاء
|
قــدّرته
قبــل
الوجــود
السـماء
|
|
مــا
أردت
الوجــود
قبـلَ
وجـودي
|
وبرغمــي
بعــد
الوجـود
الفنـاء
|
|
وأرى
القصـرَ
تـوأمَ
الكـوخ
لـولا
|
أن
هــــذا
فقـــرٌ
وذاك
ثـــراءُ
|
|
وأرانــي
لصــاحب
القصــر
نـورا
|
ولــو
أنــي
فــي
عينــه
ظلمـاء
|
|
أنــا
إن
مــتُّ
مــات
فــنٌّ
رفيـعٌ
|
وهـــو
إن
مـــات
طيـــن
ومــاء
|
|
قــالت
النفـس
إن
دنيـا
الأمـاني
|
هـــي
دنيــا
الخلــود
للإنســان
|
|
عــش
بــه
تنــس
أنّ
عمــرَك
ولّـى
|
فــي
جحيـم
مـن
الهـوى
والهـوان
|
|
وتريــك
الكــوخ
المحطّــم
قصـرا
|
شــائع
الظــلِّ
ســامِقَ
البنيــان
|
|
والكســاء
الرديـم
يمسـي
حريـراً
|
كســــــروىّ
الظلال
والألـــــوان
|
|
قلــتُ
والواقــع
المريـر
فقـالت
|
ذاك
داء
يطَـــــبُّ
بالنســـــيان
|
|
فطــــويت
الأعـــوام
والأيامـــا
|
حلمـــاً
رائعَ
الســـنا
بســـّاما
|
|
وجهلـــتُ
الزمــان
فهــو
هبــاءٌ
|
ونســـيت
المكـــان
والأحجامـــا
|
|
حيــن
شـفّت
روحـي
فشـاهدتُ
قصـراً
|
يتحــــدّى
جمــــالُه
الأحلامــــا
|
|
ورياضــاً
تُغَــرد
الطيــر
فيهــا
|
وتريــق
الألحــان
تنــدى
غرامـا
|
|
وعبيـــداً
يشــدون
شــتّى
لحــونٍ
|
فــي
حمـى
القصـر
سـجّداً
وقيامـا
|
|
وتبعــتُ
الحــادي
وكــان
خيـالا
|
عــاش
فـي
عـالم
المنـى
أجيـالا
|
|
أيُّ
فــــنٍّ
ســـامٍ
وأيُّ
ابتـــداعٍ
|
جمــلّ
مــن
صــاغ
حسـنه
وتعـالى
|
|
التماثيـــلُ
كالأناســـيّ
كـــادت
|
تتهــــــادى
رشــــــاقة
ودلالا
|
|
والريـوم
الخرسـاء
تهتـف
بالرائ
|
ي
فيجثــــــو
أمـــــامهنّ
جلالا
|
|
نفــخ
الفــن
روحــه
فــي
حلاهـا
|
وكســــاها
جلالــــةً
وجمــــالا
|
|
عشـتُ
فـي
الفَقـرِ
كـالأمير
المطاع
|
شــــاعريّ
الرغـــاب
والأطمـــاع
|
|
كـــلّ
دنيـــاي
لـــذّةٌ
وجمـــالٌ
|
وانبعــاثٌ
إلـى
الهـوى
والمتـاع
|
|
بيــن
حــورٍ
عيــنٍ
وأكـواب
خمـرٍ
|
وأغــــانٍ
علويّــــة
الإيقــــاع
|
|
ونــدامى
كــالزهر
يرجـون
صـفوى
|
ويخـــافون
ثـــورتي
وانــدفاعي
|
|
قاســموني
مجــدي
وظنّـوا
نعيمـي
|
خالـــداً
غيـــر
مــؤذنٍ
بضــياع
|
|
يــا
نــداماي
والليــالي
تجـورُ
|
بــي
حنيــنٌ
إلـى
البكـا
وشـعور
|
|
أفرِغــوا
أكــؤس
المــدام
فـإني
|
كــاد
قلــبي
ممــا
يخـاف
يطيـرُ
|
|
أنـا
أخشـى
انهيـار
مجـدي
وأرجو
|
أن
يقينـــا
أحــداثَه
المقــدور
|
|
يــا
نـداماي
يـا
لقلـبي
وعقلـي
|
هــا
هــي
الأرض
بالبنــاء
تـدور
|
|
يا
لقصرى
إذ
عربد
الريح
في
الجوّ
|
وشــــقّت
لســــاكنيه
القبـــور
|
|
هبّــت
الريــح
عاصــفاً
مكفَهــرّاً
|
فأحــال
القصــر
المُمَــرَّد
ذكـرى
|
|
رب
مــا
كــان
ذلــك
القصـر
إلا
|
حلمــاً
لــم
يطـل
نعيمـا
وعمـرا
|
|
خــدعتني
نفســي
بمـا
قـد
تمنّـي
|
تُ
فهــل
كــان
مــا
تمنيـتُ
شـراً
|
|
أم
ترانـي
جبلـت
مـن
طينـة
البؤ
|
سِ
فروحــي
تـرى
الفراديـس
قفـرا
|
|
أم
ترانـــي
نهبــتُ
أحلام
غيــري
|
ولنفسـي
منـىً
علـى
الـدهر
أُخـرى
|
|
وإذا
هــــاتفٌ
يهــــزُّ
ســـكوني
|
أنـت
أخطـأت
فـي
التمنـي
ظنـوني
|
|
قلـتُ
يـا
نفـس
قـالت
النفس
دعني
|
مــا
تمنيــت
غيــر
مــاءٍ
وطيـن
|
|
ذلــك
القصــرُ
والنــدامى
هبـاءٌ
|
حيــن
تصـحو
علـى
صـراخِ
المنـونِ
|
|
فاســم
عـن
بهـرَجِ
الـدنى
وتطهّـر
|
بألوهيّـــةِ
الهـــوى
والفنـــون
|
|
إن
فــي
الفــن
قــوّتي
وخلــودي
|
ويقينـــي
إذا
افتقــدتُ
يقينــي
|
|
وكمــا
يحلُــم
الصــبا
بـالغرام
|
وتهيــــم
الزهـــور
بالأنســـام
|
|
رحـتُ
أبنـى
فـي
عالمِ
الوهم
مجدي
|
فـوق
مـا
خلّـف
الهـوى
مـن
حطامي
|
|
وسـرَرَت
بـي
الأوهـام
تخـترِق
الحج
|
بَ
إلــى
عــالم
مـن
النـور
سـامِ
|
|
حيــثُ
قــام
الأولمـب
تمـرح
فيـه
|
آلهــــاتُ
الأقــــداس
والآثـــام
|
|
والقرابيـن
مـن
بنـي
الفـنّ
تزجى
|
مـــن
بنـــات
الأفكـــار
والأحلام
|
|
يـا
منـايَ
اخلـدي
ويـا
نفسُ
طيبي
|
أصــبحَ
الفــنّ
كلّــه
مـن
نصـيبي
|
|
أيــن
لــي
بــالإله
رب
الأغــاري
|
د
أبولّــو
يملأ
مـن
الخلـد
كـوبى
|
|
ويتـــوَّج
رأســـي
بمــا
ضــفّرته
|
يـــده
مـــن
أزاهـــر
وطيـــوب
|
|
فتنــاهى
إلــيّ
مــن
جــانب
الأف
|
قِ
نـــداءٌ
كوسوســـات
الحـــبيب
|
|
يــا
غريـب
الفـؤاد
لا
قيـت
أهلاً
|
إنّ
ضــيف
الأولمــب
غيــر
غريــب
|
|
رنّ
هــذا
النــداءُ
فــي
أُذُنيّــا
|
وســرى
كــاللهيب
فــي
أصــغريّا
|
|
فكـــأني
مزّقـــتُ
ثــوبَ
تُرابــي
|
وطــويتُ
الســماء
روحــاً
عليّــا
|
|
وكــأني
أصـبحت
فـي
خـاطر
التـا
|
ريـــخ
معنـــى
مجنّحــا
قدُســِيّا
|
|
حيـــن
ألفيتُنـــي
أنــادِمُ
أحلا
|
مــى
رحيـقَ
الخلـود
طهـرا
نـديّا
|
|
وعــذارى
فينــوس
يرقصــن
حـولي
|
ويمجّـــــدن
فنّــــىَ
الأبــــديّا
|
|
ثـــم
يمّمـــن
معبـــد
الأربــاب
|
حيــث
تــوّجن
بــالخلود
شــبابي
|
|
وتغنّيـــــن
للإلــــه
أبولــــو
|
آيـــةً
خلّـــدت
علـــى
الأحقــاب
|
|
كــل
مـا
فـي
الوجـود
آيـات
فـنٍّ
|
ســوف
تفنــى
والملــك
للوهّــاب
|
|
غيــر
أنّ
الحيــاة
بـالفكر
ربّـا
|
نيَّـــةٌ
طلقـــةٌ
بغيـــر
حســـاب
|
|
كــلُّ
عبــدٍ
فيهــا
إلــهٌ
صــغيرٌ
|
يتســامى
مــا
جــدّ
فـي
الأسـباب
|
|
لتمنّيــــت
أن
أعيـــش
حيـــاتي
|
بيــن
تلــك
الفـرادس
الوارفـات
|
|
بيــد
أن
القيـدَ
الـترابيّ
أضـنا
|
نـــي
فخلّفـــتُ
عــالمَ
الالهــات
|
|
وهبطـــتُ
الأرض
الشــقية
كالنــا
|
ســـِك
يغشــى
مــواطن
الشــهوات
|
|
وبــدأت
الصــراع
فـي
زحمـة
الأح
|
يــاء
ســعيا
وراء
هـذا
الفتـاتِ
|
|
وعمــــادي
خــــواطرٌ
عبقريّـــا
|
تٌ
ووحـــيٌ
مـــن
الســـماوات
آت
|
|
لــم
يكـن
يخطـر
الشـقاء
ببـالي
|
لا
ولا
الخـوف
مـن
صـروف
الليـالي
|
|
كنـــت
كالطفـــل
رقّــةً
وحيــاءً
|
ونزوعــاً
إلــى
ســماء
الخيــال
|
|
أحســبُ
الأرض
جنّــتي
أنــا
وحـدي
|
لــي
فيهــا
مـا
شـئت
مـن
آمـال
|
|
فـــإذا
جنّـــتي
ســـرابٌ
وآمــا
|
لِـــيَ
بيـــدٌ
تضـــجُّ
بـــالأهوال
|
|
وإذا
بــي
أُجــابِهُ
الـدهر
فـرداً
|
أرهقتــــه
الأيـــام
بالأثقـــال
|
|
هــذه
الأرض
لــم
تــزد
بوجــودي
|
غيــر
طيـر
يسـمو
علـى
التقييـد
|
|
همّــه
الحــبّ
والينـابيع
والـوك
|
رُ
ونجــــوى
رفيقـــه
الغريـــد
|
|
وأنــا
طــائر
الفنــون
فمـا
ذن
|
بــي
حــتى
أحيـا
حيـاة
الطريـد
|
|
ألِأنّـــي
أعيـــشُ
للفـــنّ
أعــرى
|
وأخـو
الطيـن
نـاعمٌ
فـي
الـبرود
|
|
مــا
أذلّ
الحيـاةَ
إن
كـان
دنـبي
|
هـو
زهـدي
فـي
الجـوهر
المعبـود
|
|
روّعَـــت
هــذه
التهاويــلُ
حســّي
|
فاســتوى
عنــدها
رجـائي
ويأسـي
|
|
وانتبهنـا
أنـا
ونفسـي
مـن
الحُل
|
مِ
وكــم
ضـاع
فيـه
يـومى
وأمسـي
|
|
ليــت
يـا
نفـسُ
والحقـائقُ
تبكـي
|
نـا
وجدنا
في
الحلم
ما
كان
ينسى
|
|
ليــت
يــا
خـاطري
ودنيـاي
بحـرٌ
|
كنـت
ترسـي
حيـث
الحقـائقُ
ترسـى
|
|
رُبَّ
حلــمٍ
ودِدتُ
لــو
عــاش
دهـراً
|
ثـــم
ولّـــى
فكــان
ميلاد
بــؤس
|
|
أنـت
يـا
نفـسُ
سـرُّ
هـذا
الشـقاء
|
شــدت
مجــدي
علــى
أسـاسٍ
هبـاء
|
|
مــن
ســماء
الخيـال
عـدتُ
لأقتـا
|
تَ
تـــرابَ
الحقيقـــة
النكــراء
|
|
وهنــا
الكــوخ
فــانعمى
بحمـاه
|
بجمـــال
الطبيعـــة
العـــذراء
|
|
إن
هـذا
الوجـود
قصـرٌ
بنـاه
الل
|
ه
مـــا
بيــن
أرضــه
والســماء
|
|
فــدعيني
أعــش
كمــا
شـاءت
الأق
|
دار
حيّــــا
بقـــاؤُه
للفنـــاء
|