|
يـا
نـديمي
هـات
الأبـاريق
هات
|
إن
يــوم
الصــفاء
ليــس
بـآت
|
|
كـان
حيـا
فبـات
إذ
شرد
الدهر
|
خطــــاه
مكفنــــا
بحيـــاتي
|
|
يـا
نـديمي
ماذا
ترجى
من
العي
|
ن
ســوى
أن
تفيــض
بــالعبرات
|
|
صـبغة
اللَـه
إنهـا
ربـة
الجـم
|
ر
وأنـــى
أهيـــم
بــالجمرات
|
|
لا
تـدَعنى
إن
شـئت
نسـيان
همـي
|
واســقنيها
خلديّــة
النشــوات
|
|
هاتهـا
كالنسـيم
أطلقـه
الفـج
|
ر
رخيّـــا
معطـــر
النفحـــات
|
|
هاتهــا
نجمــة
مشعشـعة
اللـم
|
ح
وأفقـــاً
مضـــوّأ
الجنبــات
|
|
هاتهــا
لــذّة
كهمـس
العـذارى
|
فــــي
ظلال
الأحلام
والصـــبوات
|
|
أقسـم
الجـام
مـا
لـديه
سواها
|
رقرقتهــــا
روائح
الجنــــات
|
|
هاتهـا
هاتهـا
فقـد
عمـيَ
اللي
|
ل
ونفســي
مـن
عـالم
الظلمـات
|
|
لا
يضــِركَ
السـهوم
فـي
نظراتـي
|
والأنيـن
المنسـاب
فـي
كلمـاتي
|
|
فأنـا
ابـن
الحرمـان
زهرىَ
شوكٌ
|
ورياضـــي
جـــواحم
الفلــواتِ
|
|
هـات
لـي
من
شفاهها
قبلات
الطي
|
ر
تـــروى
مراشـــف
الواحــات
|
|
باركتهـا
العصور
من
عهد
باكوس
|
فكــــانت
تميمـــة
الآلهـــات
|
|
هــي
فـي
خـاطر
الزمـان
عجـوز
|
وهـي
فـي
خـاطري
شـباب
الحياة
|
|
هـي
ديـر
النسـيان
راهبة
الدن
|
صـــلاة
الأرواح
فــي
الخلــوات
|
|
رقصـت
فـوق
صـدرها
شـعل
النور
|
حبابــــاً
مفـــوّف
القطـــرات
|
|
واسـتدارت
كـالعين
تعشـى
وتـن
|
شــى
بلحـاظ
مسـحورة
اللمحـات
|
|
هاتهـا
يـا
نـديم
كالرشإ
النا
|
ئم
فــي
مضــجع
مــن
الزهـرات
|
|
واسـقنيها
أنـا
الشباب
المولى
|
شــاد
دنيــاي
هــادم
اللـذات
|
|
ودع
النــاس
مــا
أضـل
حجـاهم
|
وعليهـــم
خوالـــد
اللعنــات
|
|
تـاه
عقلـي
فلا
أقـل
مـن
النسي
|
ان
أرجــوه
كــي
يطـول
سـباتي
|
|
إيـه
يـا
سـاقي
المجانة
والله
|
و
تظــن
الغرثــان
كالمقتــات
|
|
مـا
دهتـك
السـنون
مثلـي
فعجل
|
بـــذهاب
لضـــائعي
الســكرات
|
|
هـا
هـو
المال
في
يديك
فنادمه
|
ســــرابا
يعـــج
بالترهـــات
|
|
لسـت
عبـدا
لـه
ومـا
كنت
عبدا
|
لإلـــــه
مبهــــرج
الآيــــات
|
|
أنـا
عبد
الجمال
والفكر
والخي
|
ر
وعبــد
الحقــائق
الخالـدات
|
|
أنـا
عبد
العقل
المغلف
بالصمت
|
وإن
كـــان
نــاطق
المعجــزات
|
|
فــي
الصــحارى
تفيـض
بـالعزم
|
صـماء
لـديها
الأحيـاء
كالأموات
|
|
والروابـى
تفيـض
بالشعر
فيحاء
|
تـــروى
الأشـــواك
كــالوردات
|
|
كـل
مـا
فـي
الوجـود
سـحر
وفن
|
وانطلاق
مــن
جــائر
الراحــات
|
|
غيـر
هـذا
السـجين
فـي
الأضـلع
|
الجـوف
طريد
المقادر
الجانبات
|
|
حسـب
النـاس
مـن
قلـوب
فجـازى
|
ســـيئات
الطغــام
بالحســنات
|
|
فـإذا
هـم
يشـرون
أيامه
البيض
|
بأيـــام
جـــدبه
الحالكـــات
|
|
ضــلة
للأنــام
مــا
زال
فيهـم
|
أثـــر
مــن
مجــارم
ســالفات
|
|
ليتهــم
يــذكرون
يـوم
أبيهـم
|
إذ
أضـــــلّته
أول
الحيّــــات
|
|
أطعمتــــه
تفّاحـــة
حرمتـــه
|
مــن
ظلال
الفــرادس
الوارفـات
|
|
ليتهـم
ليتهـم
ومـا
أضيع
العم
|
ر
إذا
مــا
وهبتهــم
أمنيـاتي
|
|
ليتنــي
قــد
جهلــت
أنـي
حـي
|
لأقضــى
الحيـاة
صـافي
الحيـاة
|
|
أنـا
أمشـي
في
الناس
بائع
خبز
|
زاهــدا
فيـه
قانعـاً
بالفتـات
|
|
يـا
نـديمي
أتـرع
كؤوسـك
جمرا
|
فيــه
ري
الشــفاه
واللهــوات
|
|
طـرح
القيـد
فـانطلق
بـي
هوناً
|
نتنســـّم
عـــواطر
الخطـــرات
|
|
وارأم
النفـس
صـفحة
أثبـت
اللَ
|
ه
عليهـا
مـا
شـاء
مـن
لوحـات
|
|
إن
نفسـي
شـوهاء
مـن
أثر
الحز
|
ن
فرقـــرق
تميمــة
الجلــوات
|
|
واغتبـق
نورهـا
علـى
ذكر
آمال
|
طوتهـــا
مجاهـــل
الــذكريات
|
|
إنما
هذه
الحياة
تهاويل
نمتها
|
الأيــــــــــــــــام
محتبلات
|
|
فـاطو
سـفر
الحياة
زهرا
وخمراً
|
واهتبلهــا
رنانــة
الضــحكات
|
|
جهـل
النـاس
لأدواء
سـوى
الكـأ
|
س
ترينـــي
مــآتم
النائبــات
|
|
مـن
مجيـر
الشـاكي
سـواها
ومن
|
غيـري
مـن
الناس
نابغي
الشكاة
|
|
هاتهـا
باسـم
فكـرة
شـردت
عني
|
وأمســت
فــي
ذمــة
السـافيات
|
|
أو
مجــال
فينانـة
فـي
خيـالي
|
مزقتهـــا
فواتـــك
الثــورات
|
|
أو
نعيــم
عبــت
ليــالي
منـه
|
خمــر
وصــل
يــتيه
بــالقبلات
|
|
أو
جحيـم
شـأى
الجحيـم
عـذابا
|
مـــن
جحــود
وحرقــة
وشــتات
|
|
هاتهـا
باسم
حلوة
الوعد
والدل
|
وســـر
القيثـــار
والأغنيــات
|
|
آه
يـــا
صــاحبي
وأواه
ممــا
|
خلفتـــه
للقلــب
مــن
آهــات
|
|
ســـهدتني
واستســلمت
لمنــام
|
هنئت
فيــه
بـالرؤى
الهـانئات
|
|
كـم
نعمنا
بالوصل
يهزأ
بالدهر
|
حـــثيث
التســيار
والخطــوات
|
|
لا
حـدود
المكـان
تأسـر
روحينا
|
ولا
دائر
مــــــن
الأوقـــــات
|
|
كـم
طوينا
الضفاف
وهنانة
الرم
|
ل
نهـــزّ
الضــفاف
بــالخطرات
|
|
وطوينـا
الموجـات
روحين
طفلين
|
نريـــق
الحـــديث
كالموجــات
|
|
ليــل
طفــل
وطفلــة
عبقرييـن
|
يهيمــان
بالصــفاء
المــواتي
|
|
عربــدت
فــي
قلبيهمــا
نشـوة
|
الحـب
وكـم
للغـرام
مـن
حانات
|
|
وشـراع
السـفين
تسـكره
الـري
|
ح
فيســرى
علـى
هـدى
الزهـرات
|
|
والمجـاديف
عطّلـت
غيـر
سـاقين
|
اســتراحا
إلـى
لذيـذ
السـبات
|
|
أنـــت
ســكرى
بخمــرة
الشــع
|
ر
ينسـاب
حنينـا
مرفّـه
الآهـات
|
|
وأنـا
الشـاعر
المغـرد
فـي
دو
|
حــك
عــف
الألحــان
والنغمـات
|
|
يتهـادى
خـدي
علـى
خـدك
الـور
|
د
ينـــاجيه
عاشــق
النســمات
|
|
نهـب
الكـون
قبلـة
يسجد
الثغر
|
لــــديها
مطهـــر
الصـــلوات
|
|
ثـم
نغنى
في
الكون
أقدس
روحين
|
لنحيــا
فــي
عــالم
السـبحات
|
|
طهرنـا
ديننـا
وللنـاس
أديـان
|
وبعــض
الأديــان
مــن
شــهوات
|
|
نتمنــى
علـى
الزمـان
الأمـاني
|
معجــزات
تخـال
فـي
الممكنـات
|
|
أين
منى
يا
أخت
أطيافها
الحور
|
وأن
الشـــريد
مـــن
ليلاتـــي
|
|
حـدثيني
عنهـا
فقـد
غلـل
الهج
|
ر
لســاني
وجــف
مــن
زفراتـي
|
|
آه
مــن
ذاهــب
شـقيت
بـذكراه
|
وأواه
مــــــن
مخافـــــة
آت
|
|
إن
تعــودي
إلـي
تبسـم
حيـاتي
|
وإذا
غبـت
ليـس
لـي
مـن
حيـاة
|
|
صــبواتي
ضــاعت
فــردى
علــيّ
|
اليـوم
مـا
تكنزيـن
مـن
صبوات
|
|
واعـذريني
وقـد
بخلـت
إذا
طـا
|
لـت
علـى
نضـرة
الصـبا
حسراتي
|
|
يـا
نـديمي
أفرغ
مدامك
إن
شئت
|
وهبنــي
مــا
عفـت
مـن
كاسـات
|
|
هـا
هـو
الفجـر
فاستفق
يا
أخا
|
الفجـر
ودعني
أعشق
مع
الظلمات
|
|
وإذا
مــا
ســئلت
عنــي
فحـدث
|
عــن
شــباب
سـلواه
مـن
آفـات
|
|
واعـف
عنـي
إمـا
فقـدت
رشـادى
|
وحرمــت
المرجــو
مـن
يقظـاتي
|
|
فأنـا
ابـن
الحرمـان
زهرى
شوك
|
ورياضـــي
جـــواك
الفلـــوات
|