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طـار
يطـوى
مجاهـل
الأفـق
والنا
|
ر
تلـــظ
فــي
قلبــه
الوثــاب
|
|
يطــبيه
الحسـن
المشـاع
فيسـرى
|
مصـــعدا
فــي
غيــاهب
وضــباب
|
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تشـرق
الشـمس
حيـن
تشـرق
دنيـا
|
ه
بحلــم
يطــوى
كطــى
الكتـاب
|
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وهـو
يشـتار
من
ندى
الفجر
شهدا
|
ومــن
الليــل
أكؤسـا
مـن
صـاب
|
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زاده
فنـــه
ونجـــواه
قيثـــا
|
ر
هـــواه
وزهــرةٌ
مــن
شــباب
|
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تهــزم
الريــح
حــوله
فيغنــى
|
بلحــون
مــن
قلبــه
المنســاب
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قـال
يـا
ريـح
كـن
بساطى
إليها
|
ففــؤادي
أضــناه
طـول
اللـواب
|
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أنــا
فــي
راحتيـك
قلـب
جريـح
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يتنــــدى
كــــأعين
الأحبـــاب
|
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يتنــزى
شـوقا
إلـى
عشـر
بلقـي
|
س
فهبنــــى
كالناســــك
الأواب
|
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واطـــوني
فـــي
يــديك
رب
طلاء
|
عبقــري
أحســوه
يــذهب
مــابي
|
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إن
لـي
فـي
الندى
طلاء
وفي
البر
|
ق
ابتسـاما
وفـي
السـماء
كتابي
|
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أتغنـــى
بآيهـــا
كـــل
حيــن
|
فهـــي
إعجـــاز
مبــدع
وهــاب
|
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لـي
مـع
النجـم
سـبحة
مـن
خيال
|
ومــع
الــبرق
حسـوةٌ
مـن
رضـاب
|
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ومــع
البــدر
والكـواكب
تسـيا
|
ر
بطىــء
الخطـا
جميـم
الخطـاب
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هــو
خمــري
ونشــوتي
وحــديثي
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وغرامــــي
ومنيـــتي
وطلابـــي
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فـامض
يـا
ريـح
بـي
فقلـبي
غـر
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فــي
هــواه
وفـي
هـواه
عـذابي
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يكتــوى
مفـرداً
بحسـن
العـذارى
|
وهــو
حســن
كبهــرج
مـن
سـراب
|
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تخـــذ
النــاس
ســلوة
وعــزاء
|
عــن
أمــان
جوفـاء
صـنو
حبـاب
|
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فهــو
يهـذى
فـي
صـمته
وينـاجي
|
ســـر
آلامـــه
بجمـــرٍ
مـــذاب
|
|
فـارحميه
يـا
ريح
من
صمته
الدا
|
جـــى
وردى
أحلامـــه
للصـــواب
|
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إن
فــي
صــمته
جحيمــا
لنفسـي
|
وهـي
كالزهر
في
الفيافي
اليباب
|
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فتقبـل
نجـواي
يـا
ريـح
واهـزم
|
فهزيــم
الريــاح
فــي
أصــلابي
|
|
نجنــى
مـن
عـذاب
قلـبي
ونفسـي
|
فهمـــا
توأمــا
أســى
وعــذاب
|
|
أنــا
يــا
ريــح
جـوهر
مستسـر
|
فــي
كنــوز
فــي
عـالم
مرتـاب
|
|
تخــذ
الشــك
لليقيــن
ســبيلا
|
فهـو
فـي
ظلمـة
الهـوى
الكـذاب
|
|
طهرينـي
مـن
رجـس
دنيـاي
بالنا
|
ر
تلظـــى
فـــي
روحـــك
الغلاب
|
|
وانظــري
هــل
تريـن
إلا
خـداعا
|
قـــد
كـــواني
بلمحـــه
الخلاب
|
|
يـا
ريـاح
المغيـب
هـبي
بقلـبي
|
وبنفســـي
وراحـــتي
وشـــبابي
|
|
واقـذفي
بالتراب
حينا
إلى
الشم
|
س
وحينــا
إلــى
ضـمير
العبـاب
|
|
علـــه
يكتــوى
بســفع
لظاهــا
|
فهــو
ســر
لشــقوتي
واكـتئابي
|
|
عاصـــفٌ
إثـــر
عاصــف
ونجــوم
|
ورجــوم
تغلــى
علــى
الأحقــاب
|
|
وعلــى
الأفــق
ثـائر
مـن
لهيـب
|
وعلــى
الشـمس
غيهـب
مـن
حجـاب
|
|
وإذا
الكـون
يشـرب
الليـل
كأسا
|
ويغنــــى
بثــــاقب
وشــــهاب
|
|
ثـم
يفنـى
الوجـود
في
كف
باريه
|
لتحيــا
الحيــاة
فــي
الألبـاب
|
|
وإذا
العـــالم
العـــي
بليــغ
|
ذائع
الســـر
معلـــم
الأســباب
|
|
وإذا
الخــافق
الغريــر
حكيــم
|
وإذا
النفـس
فـي
طريـق
التصابي
|
|
وإذا
راهـــب
الليــالي
خيــال
|
شـارد
الخطـو
كالمهـا
في
الغاب
|
|
خلصـــلت
روحــه
فســال
ضــياء
|
وطـــوى
طينــه
ســجل
الرغــاب
|
|
فهـو
يشـدو
في
مأتم
الروح
لحنا
|
ويبكــى
فــي
مفرحــات
الـتراب
|
|
يقـرأ
اللكون
في
صحيفته
العليا
|
ســطورا
مــا
بيــن
صـاف
وكـاب
|
|
فـرأى
الخيـر
فـي
المـآذن
يخبو
|
وهـو
الخيـر
فـي
النواقيس
خابي
|
|
ورأى
الشـر
فـي
الجميـع
مشـاعا
|
فتـــولى
عـــن
رفقــة
وصــحاب
|
|
ورأى
النجم
دمعة
الشمس
في
المغ
|
رب
والـــدمع
تــوأم
الإغــتراب
|
|
ورأى
البـدر
ثـاني
اثنين
في
حب
|
ســــماء
ســــحرية
الأبــــواب
|
|
ورأى
الأرض
قبضـــة
مــن
تــراب
|
طوقتهـــا
غلالـــة
مــن
ســحاب
|
|
ورأى
الزهـر
فـي
الريـاض
شئونا
|
وشـــجونا
للعاشـــق
المنتــاب
|
|
ورأى
النحــل
أمــة
فــي
هـواء
|
ورأى
النمــل
أمــة
فــي
هضـاب
|
|
ورأى
الحــب
نســمة
مــن
نعيـم
|
ورأى
الحــب
عاصــفا
مـن
عـذاب
|
|
ورأى
اللــه
جهــرة
فـي
مجـالي
|
ه
قريبــاً
منــه
بغيـر
اقـتراب
|
|
فهــو
بيــن
النكـران
والإعجـاب
|
وهــو
بيــن
اليقيـن
والإضـطراب
|
|
ورأى
المـوت
لابـل
المـوت
أغـرا
|
ه
بلقيــاه
بعــد
طــول
لعــاب
|
|
جـاءه
فـي
اعـتزاله
يطلـب
السر
|
وفــي
السـر
ضـاع
فجـر
الشـباب
|
|
قـال
يـا
شـيخ
قـد
أتيتـك
أدعو
|
ك
إلــى
عــالم
رفيــع
الجنـاب
|
|
فـانطلق
مـن
قيـود
دنياك
إن
كا
|
ن
يســيرا
عليــك
نـزع
اللبـاب
|
|
أو
فـدعني
أنـزع
لبابـك
يـا
قش
|
ر
تمــت
ســالما
مــن
الأوصــاب
|
|
ثـــم
ولــى
عنــه
وخلــف
دودا
|
مســتكفاً
حـول
الذبيـح
المصـاب
|
|
وانطــوى
عمــرى
ليــذهب
ذكـرا
|
خالــداً
فــي
الأعمـار
والأحقـاب
|