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زار
الخيـال
وطـرف
النجـم
وسنان
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وقلصــت
مـن
قميـص
الليـل
أردان
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وقــد
ألـم
وشـخص
الصـبح
معـترض
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فراعــه
فكــأن
الصــبح
غيــران
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خيـال
سـعدى
سـرى
وهنـاً
فأيقظني
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حـــتى
تكنفنــي
حــزن
وأشــجان
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تنفـس
الريـح
بالأرجـاء
مـذ
خطرت
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كمــا
تنفــس
غــب
الطـل
ريحـان
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وغصــن
قامتهـا
إن
مـال
منعطفـا
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ورق
الحلــى
لهــا
سـجع
وألحـان
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لـم
أنس
يوم
غداة
البين
إن
رحلت
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سـعدى
وسـارت
بوادي
الجزع
أظعان
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ولـي
فـؤاد
يسـاري
الركـب
تجنبه
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مصـــفداً
غــاله
لحــظ
وأجفــان
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يـا
ساعد
اللَه
أهل
الحب
قد
سلبت
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أرواحهــم
وهــم
للحــب
أخــدان
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كـم
خضـت
بحر
الدجى
في
سابح
عرم
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وجبــت
أرضـا
بهـا
للجـن
غيطـان
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حـتى
طرقـت
كنـاس
الخـود
مزدهيا
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ولـم
ترعنـي
بطعـن
السـمر
خرصان
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ومــن
يكــن
طـالب
للـدر
يخرجـه
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فليـــس
تمنعــه
للــبر
حيتــان
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إن
لـم
أزر
مكنس
الحوراء
ملتحفا
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جنــاح
ليــل
بـه
للنسـر
طيـران
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فلا
سمت
بي
المعالي
أو
سمت
لي
في
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مــدح
ابـن
أحمـد
أوتـاد
وأوزان
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العـالم
العلـوي
المنتمـي
شـرفا
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دانـت
لمفخـره
فـي
العـرب
عدنان
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مـن
دوحـة
برسـول
اللَـه
مغرسـها
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منهـا
بناصـي
السـهى
فرع
وافنان
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قـد
نـال
في
المجد
عزاً
عز
جانبه
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مــا
ليـس
يبلغـه
كسـرى
وخاقـان
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هـو
ابـن
أحمد
في
علم
العروض
له
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بمشــكل
الشــعر
إيضـاح
وتبيـان
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وفــي
العلـوم
لـه
فقـه
ومعرفـة
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وفــي
النجـوم
لـه
حـدس
وإتقـان
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نتيجـة
الفكـر
منـه
مابهـا
خطـأ
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وحســن
منطقــه
للعلــم
ميــزان
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يا
أيها
العالم
النحرير
دم
علماً
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عــزت
لمثلــك
أنــداد
وأقــران
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إن
كـان
للـدهر
عيـن
فـي
تبصـره
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فـأنت
فـي
عيـن
هذا
العصر
إنسان
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صـنفت
شـرحا
به
شرحخ
الصدور
بدا
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علــى
الصــحيفة
منـه
لاح
عنـوان
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أفحمــت
كــل
بليـغ
فـي
فصـاحته
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حـــتى
كأنــك
بالإعجــاز
قــرآن
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فلسـت
أحصـي
صـفاتاً
أنـت
حائزها
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ومـا
لخيل
الثنا
في
الطرس
ميدان
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فخـذ
إليـك
كزهـر
الـروض
غانيـة
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بكــراً
يديــخ
لهـا
قـس
وسـحبان
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ألفاظهـا
فصـلت
فـي
حسـن
مـدحكم
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كمـــا
يفصــل
يــاقوت
ومرجــان
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لا
زال
ســـعدك
ميمـــون
بغرتــه
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مـا
رنحـت
مـن
نسيم
الصبح
أغصان
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