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نشـــر
الربيــع
مطــارف
الأزهــار
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فـــي
طيهـــا
نفحــات
مســك
داري
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وخــرائد
الأغصــان
بالأكمــام
قــد
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رقصــت
بتشــبيب
النســيم
السـاري
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وصــوادح
الأوراق
فــي
الأوراق
قــد
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غنـــــت
بــــأعواد
بلا
أوتــــار
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والظـــل
ظـــل
محاكيــاً
بــدبيبه
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خـــط
العـــذار
بوجنــة
الأنهــار
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فبــدار
نجلـو
خمـرة
تجلـو
العنـا
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عنـــا
ولا
تركـــن
إلــى
الأعــذار
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بكـــر
إذا
مــا
قلــدت
بحبابهــا
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حلـــت
يميـــن
مـــديرها
بســوار
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شــمس
يطــوف
بــافق
مجلسـنا
بهـا
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قمـــر
تقلـــد
نجـــره
بـــدراري
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ســلب
الســلاف
مــذاقها
وفعالهــا
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برضــــابه
وبطرفــــه
الســــحار
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ســاق
تخــال
الثغــر
منـه
لئالئاً
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أو
إقحوانــــا
لاح
غــــب
قطـــار
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أو
أحرفــاً
رقمــت
بكــف
المجتـبى
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أعنـــي
ســليل
بشــارة
المغــوار
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مــاء
الطلاقــة
فــي
أســرة
وجهـه
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يجـــري
ونــار
ســطاه
ذات
شــرار
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مـولى
بـافق
سـما
المنـاقب
قد
بدا
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قمــراً
ولكــن
لــم
يــرع
بســرار
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فبــذاك
يثمــر
قصــد
كــل
مؤمــل
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وبهـــذه
تصـــلى
منـــى
لفخـــار
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شــهم
لــبيب
لــم
تلـد
أم
العلـى
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نـــداً
لــه
فــي
ســائر
الأعصــار
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أقلامــه
قــد
قلمــت
مـا
طـال
للأ
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خطـــاب
والأخطـــار
مـــن
أظفــار
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ودوانـــــه
أدوت
وداوت
كاشــــحا
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ومــــؤملا
جــــدواه
ذا
اعســــار
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مــن
آل
خاقــان
الــذين
وجــوههم
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عنــد
اســوداد
النقــع
كالأقمــار
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قــوم
إذا
شــاؤا
الصـوارم
أغمـدت
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فـــي
جيـــد
كـــل
مملــك
كــرار
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وإذا
هم
اعتقلوا
الذوابل
في
الوغى
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آبــت
نواضــر
بــالنجيع
الجــاري
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أخبـــارهم
بســـواد
كـــل
دجنــة
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حـــررن
فــوق
بيــاض
كــل
نهــار
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يـا
مـن
لـه
بـأس
يحـاكي
الصخر
في
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خلــق
أرق
مــن
النســيم
الســاري
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وعلا
تناســـق
كــابراً
عــن
كــابر
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يحكــي
أنــابيب
القنــا
الخطــار
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وإفــاك
عيــد
النحـر
طلقـاً
وجهـه
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يحكـــي
رقيـــق
نســيمه
أشــعاري
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عيـــد
يعـــود
عليكـــم
بمســـرة
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محمــــودة
الإيــــراد
والإصـــدار
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لا
زالـــت
الأيــدي
تشــير
إليكــم
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فضفاضـــة
قـــد
طـــرزت
بفخـــار
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